प्रासंगिक

हर मनुष्य को आज़ाद होना चाहिए, यही उसकी बुनियादी ज़रूरत है: जोतिबा फुले

‘किसी समय ब्राह्मणों की राजसत्ता में हमारे पूर्वजों पर जो भी कुछ ज़्यादतियां हुईं, उनकी याद आते ही हमारा मन घबरा कर थरथराने लगता है.’

Jyotiba

आज समाज सुधारक और कार्यकर्ता जोतीराव गोविंदराव फुले यानी महात्मा जोतिबा फुले की जन्मतिथि है. महात्मा फुले एक ऐसे विचारक, समाजसेवी और क्रांतिकारी थे जो पूरे जीवन दलितों और महिलाओं के लिए संघर्षरत रहे. भारतीय समाज की जड़ता पर क़रारा प्रहार करने वाले जोतिबा फुले ने 1848 में पुणे में अछूतों के लिए पहला स्‍कूल खोला था. 1857 में उन्होंने भारत में लड़कियों के लिए पहला स्‍कूल खोला, जिसकी कमान उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले ने संभाली. फुले दंपत्ति ने तमाम तकलीफ़ें उठाकर परिवर्तन और समानता की अलख जगाई. आज जोतिबा फुले की जन्मतिथि के अवसर पर पढ़ें उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गुलामगीरी’ की भूमिका:

सैकड़ों साल से आज तक शूद्रादि-अतिशूद्र (अछूत) समाज, जब से इस देश में ब्राह्मणों की सत्ता क़ायम हुई तब से लगातार ज़ुल्म और शोषण से शिकार हैं. ये लोग हर तरह की यातनाओं और कठिनाइयों में अपने दिन गुज़ार रहे हैं. इसलिए इन लोगों को इन बातों की ओर ध्यान देना चाहिए और गंभीरता से सोचना चाहिए. ये लोग अपने आपको ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों की ज़ुल्म-ज़्यादतियों से कैसे मुक्त कर सकते हैं, यही आज हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल हैं. यही इस ग्रंथ का उद्देश्य है.

यह कहा जाता है कि इस देश में ब्राह्मण-पुरोहितों की सत्ता क़ायम हुए लगभग तीन हज़ार साल से भी ज़्यादा समय बीत गया होगा. वे लोग परदेश से यहां आए. उन्होंने इस देश के मूल निवासियों पर बर्बर हमले करके इन लोगों को अपने घर-बार से, ज़मीन-जायदाद से वंचित करके अपना ग़ुलाम (दास) बना लिया. उन्होंने इनके साथ बड़ा अमावनीयता का रवैया अपनाया था. सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी इन लोगों में बीती घटनाओं की विस्मृतियां ताज़ी होती देखकर कि ब्राह्मणों ने यहां के मूल निवासियों को घर-बार, ज़मीन-जायदाद से बेदख़ल कर इन्हें अपना ग़ुलाम बनाया है, इस बात के प्रमाणों को ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने तहस-नहस कर दिया. दफ़ना कर नष्ट कर दिया.

उन ब्राह्मणों ने अपना प्रभाव, अपना वर्चस्व इन लोगों के दिलो-दिमाग़ पर क़ायम रखने के लिए, ताकि उनकी स्वार्थपूर्ति होती रहे, कई तरह के हथकंडे अपनाए और वे भी इसमें क़ामयाब भी होते रहे. चूंकि उस समय ये लोग सत्ता की दृष्टि से पहले ही पराधीन हुए थे और बाद में ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने उन्हें ज्ञानहीन-बुद्धिहीन बना दिया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों के दांव-पेंच, उनकी जालसाज़ी इनमें से किसी के भी ध्यान में नहीं आ सकी. ब्राह्मण-पुरोहितों ने इन पर अपना वर्चस्व क़ायम करने के लिए, इन्हें हमेशा-हमेशा लिए अपना ग़ुलाम बना कर रखने के लिए, केवल अपने निजी हितों को ही मद्देनज़र रख कर, एक से अधिक बनावटी ग्रंथों की रचना करके कामयाबी हासिल की.

उन नकली ग्रंथों में उन्होंने यह दिखाने की पूरी कोशिश की कि उन्हें जो विशेष अधिकार प्राप्त हैं, वे सब ईश्वर द्वारा प्रदत्त हैं. इस तरह का झूठा प्रचार उस समय के अनपढ़ लोगों में किया गया और उस समय के शूद्रादि-अतिशूद्रों में मानसिक ग़ुलामी के बीज बोए गए. उन ग्रंथों में यह भी लिखा गया कि शूद्रों को (ब्रह्म द्वारा) पैदा करने का उद्देश्य बस इतना ही था कि शूद्रों को हमेशा-हमेशा के लिए ब्राह्मण-पुरोहितों की सेवा करने में ही लगे रहना चाहिए और ब्राह्मण-पुरोहितों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं करना चाहिए. मतलब, तभी इन्हें ईश्वर प्राप्त होंगे और इनका जीवन सार्थक होगा.

लेकिन अब इन ग्रंथों के बारे में कोई मामूली ढंग से भी सोचे कि, यह बात कहां तक सही है, क्या वे सचमुच ईश्वर द्वारा प्रदत्त हैं, तो उन्हें इसकी सच्चाई तुरंत समझ में आ जाएगी. लेकिन इस प्रकार के ग्रंथों से सर्वशक्तिमान, सृष्टि का निर्माता जो परमेश्वर है, उसकी समानत्ववादी दृष्टि को बड़ा गौणत्व प्राप्त हो गया है. इस तरह के हमारे जो ब्राह्मण-पंडा-पुरोहित वर्ग के भाई हैं, जिन्हें भाई कहने में भी शर्म आती है, क्योंकि उन्होंने किसी समय शूद्रादि-अतिशूद्रों को पूरी तरह से तबाह कर दिया था और वे ही लोग अब भी धर्म के नाम पर, धर्म की मदद से इनको चूस रहे हैं.

एक भाई द्वारा दूसरे भाई पर ज़ुल्म करना, यह भाई का धर्म नहीं है. फिर भी हमें, हम सभी को उत्पन्नकर्ता के रिश्ते से, उन्हें भाई कहना पड़ रहा है. वे भी खुले रूप से यह कहना छोड़ेंगे नहीं, फिर भी उन्हें केवल अपने स्वार्थ का ही ध्यान न रखते हुए न्यायबुद्धि से भी सोचना चाहिए. यदि ऐसा नहीं करेंगे. तो उन ग्रंथों को देख कर-पढ़ कर बुद्धिमान अंग्रेज़, फ्रेंच, जर्मन, अमेरिकी और अन्य बुद्धिमान लोग अपना यह मत दिए बिना नहीं रहेंगे कि उन ग्रंथों को (ब्राह्मणों ने) केवल अपने मतलब के लिए लिख रखा है. उन ग्रंथों को में हर तरह से ब्राह्मण-पुरोहितों का महत्व बताया गया है.

ब्राह्मण-पुरोहितों का शूद्रादि-अतिशूद्रों के दिलो-दिमाग़ पर हमेशा-हमेशा के लिए वर्चस्व बना रहे इसलिए उन्हें ईश्वर से भी श्रेष्ठ समझा गया है. ऊपर जिनका नाम निर्देश किया गया है, उनमें से कई अंग्रेज़ लोगों ने इतिहासादि ग्रंथों में कई जगह यह लिख रखा है कि ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए अन्य लोगों को यानी शूद्रादि-अतिशूद्रों को अपना ग़ुलाम बना लिया है. उन ग्रंथों द्वारा ब्राह्मण-पुरोहितों ने ईश्वर के वैभव को कितनी निम्न स्थिति में ला रखा है, यह सही में बड़ा शोचनीय है. जिस ईश्वर ने शूद्रादि-अतिशूद्रों को और अन्य लोगों को अपने द्वारा निर्मित इस सृष्टि की सभी वस्तुओं को समान रूप से उपभोग करने की पूरी आज़ादी दी है, उस ईश्वर के नाम पर ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों एकदम झूठ-मूठ ग्रंथों की रचना करके, उन ग्रंथों में सभी के (मानवी) हक़ को नकारते हुए स्वयं मालिक हो गए.

इस बात पर हमारे कुछ ब्राह्मण भाई इस तरह प्रश्न उठा सकते हैं कि यदि ये तमाम ग्रंथ झूठ-मूठ के हैं, तो उन ग्रंथों पर शूद्रादि-अतिशूद्रों के पूर्वजों ने क्यों आस्था रखी थी? और आज इनमें से बहुत सारे लोग क्यों आस्था रखे हुए हैं? इसका जवाब यह है कि आज के इस प्रगतिकाल में कोई किसी पर ज़ुल्म नहीं कर सकता. मतलब, अपनी बात को लाद नहीं सकता. आज सभी को अपने मन की बात, अपने अनुभव की बात स्पष्ट रूप से लिखने या बोलने की छूट है.

कोई धूर्त आदमी किसी बड़े व्यक्ति के नाम से झूठा पत्र लिख कर लाए तो कुछ समय के लिए उस पर भरोसा करना ही पड़ता है. बाद में समय के अनुसार वह झूठ उजागर हो ही जाता है. इसी तरह, शूद्रादि-अतिशूद्रों का, किसी समय ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों के ज़ुल्म और ज़्यादतियों के शिकार होने की वजह से, अनपढ़ गंवार बना कर रखने की वजह से, पतन हुआ है. ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए समर्थ (रामदास) के नाम पर झूठे-पांखडी ग्रंथों की रचना करके शूद्रादि-अतिशूद्रों को गुमराह किया और आज भी इनमें से कई लोगों को ब्राह्मण-पुरोहित लोग गुमराह कर रहे हैं, यह स्पष्ट रूप से उक्त कथन की पुष्टि करता है.

ब्राह्मण-पंडा-पुरोहित लोग अपना पेट पालने के लिए, अपने पाखंडी ग्रंथों द्वारा, जगह-जगह बार-बार अज्ञानी शूद्रों को उपदेश देते रहे, जिसकी वजह से उनके दिलों-दिमाग में ब्राह्मणों के प्रति पूज्यबुद्धि उत्पन्न होती रही. इन लोगों को उन्होंने (ब्राह्मणों ने) इनके मन में ईश्वर के प्रति जो भावना है, वही भावना अपने को (ब्राह्मणों को) समर्पित करने के लिए मजबूर किया. यह कोई साधारण या मामूली अन्याय नहीं है. इसके लिए उन्हें ईश्वर को जवाब देना होगा. ब्राह्मणों के उपदेशों का प्रभाव अधिकांश अज्ञानी शूद्र लोगों के दिलो-दिमाग पर इस तरह से जड़ जमाए हुए है कि अमेरिका के (काले) ग़ुलामों की तरह जिन दुष्ट लोगों ने हमें ग़ुलाम बना कर रखा है, उनसे लड़ कर मुक्त (आज़ाद) होने की बजाए जो हमें आज़ादी दे रहे हैं, उन लोगों के विरुद्ध फिज़ूल कमर कस कर लड़ने के लिए तैयार हुए हैं.

यह भी एक बड़े आश्चर्य की बात है कि हम लोगों पर जो कोई उपकार कर रहे हैं, उनसे कहना कि हम पर उपकार मत करो, फ़िलहाल हम जिस स्थिति में हैं वही स्थिति ठीक है, यही कह कर हम शांत नहीं होते बल्कि उनसे झगड़ने के लिए भी तैयार रहते हैं, यह ग़लत है. वास्तव में हमको ग़ुलामी से मुक्त करनेवाले जो लोग हैं, उनको हमें आज़ाद कराने से कुछ हित होता है, ऐसा भी नहीं है, बल्कि उन्हें अपने ही लोगों में से सैकड़ों लोगों की बलि चढ़ानी पड़ती है. उन्हें बड़ी-बड़ी जोखिमें उठा कर अपनी जान पर भी ख़तरा झेलना पड़ता है.

अब उनका इस तरह से दूसरों के हितों का रक्षण करने के लिए अगुवाई करने का उद्देश्य क्या होना चाहिए, यदि इस संबंध में हमने गहराई से सोचा तो हमारी समझ में आएगा कि हर मनुष्य को आज़ाद होना चाहिए, यही उसकी बुनियादी ज़रूरत है. जब व्यक्ति आज़ाद होता है तब उसे अपने मन के भावों और विचारों को स्पष्ट रूप से दूसरों के सामने प्रकट करने का मौक़ा मिलता है. लेकिन जब से आज़ादी नहीं होती तब वह वही महत्वपूर्ण विचार, जनहित में होने के बावजूद दूसरों के सामने प्रकट नहीं कर पाता और समय गुज़र जाने के बाद वे सभी लुप्त हो जाते हैं.

आज़ाद होने से मनुष्य अपने सभी मानवी अधिकार प्राप्त कर लेता है और असीम आनंद का अनुभव करता है. सभी मनुष्यों को मनुष्य होने के जो सामान्य अधिकार, इस सृष्टि के नियंत्रक और सर्वसाक्षी परमेश्वर द्वारा दिए गए हैं, उन तमाम मानवी अधिकारों को ब्राह्मण-पंडा-पुरोहित वर्ग ने दबोच कर रखा है. अब ऐसे लोगों से अपने मानवी अधिकार छीन कर लेने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखनी चाहिए. उनके हक़ उन्हें मिल जाने से उन अंग्रेज़ों को ख़ुशी होती है. सभी को आज़ादी देकर, उन्हें ज़ुल्मी लोगों के ज़ुल्म से मुक्त करके सुखी बनाना, यही उनका इस तरह से ख़तरा मोल लेने का उद्देश्य है. वाह! वाह! यह कितना बड़ा जनहित का कार्य है!

उनका इतना अच्छा उद्देश्य होने की वजह से ही ईश्वर उन्हें, वे जहां गए, वहां ज़्यादा से ज़्यादा कामयाबी देता रहा है. और अब आगे भी उन्हें इस तरह के अच्छे कामों में उनके प्रयास सफल होते रहे, उन्हें कामयाबी मिलती रहे, यही हम भगवान से प्रार्थना करते हैं.

दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका जैसे पृथ्वी के इन दो बड़े हिस्सों में सैकड़ों साल से अन्य देशों से लोगों को पकड़-पकड़ कर यहां उन्हें ग़ुलाम बनाया जाता था. यह दासों को ख़रीदने-बेचने की प्रथा यूरोप और तमाम प्रगतिशील कहलाने वाले राष्ट्रों के लिए बड़ी लज्जा की बात थी. उस कलंक को दूर करने के लिए अंग्रेज़, अमेरिकी आदि उदार लोगों ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ कर अपने नुकसान की बात को दरकिनार कर, उन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की और ग़ुलामों की मुक्ति के लिए लड़ते रहे. यह ग़ुलामी प्रथा कई सालों से चली आ रही थी.

इस अमानवीय ग़ुलामी प्रथा को समूल नष्ट कर देने के लिए असंख्य ग़ुलामों को उनके परमप्रिय माता-पिता से, भाई-बहनों से, बीवी-बच्चों से, दोस्त-मित्रों से जुदा कर देने की वजह से जो यातनाएं सहनी पड़ीं, उससे उन्हें मुक्त करने के लिए उन्होंने संघर्ष किया. उन्होंने जो ग़ुलाम एक दूसरे से जुदा कर दिए गए थे, उन्हें एक-दूसरे के साथ मिला दिया. वाह! अमेरिका आदि सदाचारी लोगों ने कितना अच्छा काम किया है! यदि आज उन्हें इन ग़रीब अनाथ ग़ुलामों की बदतर स्थिति देख कर दया न आई होती तो ये ग़रीब बेचारे अपने प्रियजनों से मिलने की इच्छा मन-ही-मन में रख कर मर गए होते.

दूसरी बात, उन ग़ुलामों को पकड़ कर लानेवाले दुष्ट लोग उन्हें क्या अच्छी तरह रखते भी या नहीं? नहीं, नहीं! उन ग़ुलामों पर वे लोग जिस प्रकार से ज़ुल्म ढाते थे, उन ज़ुल्मों, की कहानी सुनते ही पत्थरदिल आदमी की आंखें भी रोने लगेंगी. वे लोग उन ग़ुलामों को जानवर समझ कर उनसे हमेशा लात-जूतों से काम लेते थे. वे लोग उन्हें कभी-कभी लहलहाती धूप में हल जुतवा कर उनसे अपनी ज़मीन जोत-बो लेते थे और इस काम में यदि उन्होंने थोड़ी सी भी आनाकानी की तो उनके बदन पर बैलों की तरह छांटे से घाव उतार देते थे.

इतना होने पर भी क्या वे उनके खान-पान की अच्छी व्यवस्था करते होंगे? इस बारे में तो कहना ही क्या! उन्हें केवल एक समय का खाना मिलता था. दूसरे समय कुछ भी नहीं. उन्हें जो भी खाना मिलता था, वह भी बहुत ही थोड़ा-सा. इसकी वजह से उन्हें हमेशा आधे भूखे पेट ही रहना पड़ता था. लेकिन उनसे छाती चूर-चूर होने तक, मुंह से ख़ून फेंकने तक दिन भर काम करवाया जाता था और रात को उन्हें जानवरों के कोठे में या इस तरह की गंदी जगहों में सोने के लिए छोड़ दिया जाता था, जहां थक कर आने के बाद वे ग़रीब बेचारे उस पथरीली ज़मीन पर मुर्दों की तरह सो जाते थे. लेकिन आंखों में पर्याप्त नींद कहां से होगी? बेचारों को आख़िर नींद आएगी भी कहां से?

इसमें पहली बात तो यह थी कि पता नहीं मालिक को किस समय उनकी गरज़ पड़ जाए और उसका बुलावा आ जाए, इस बात का उनको ज़बरदस्त डर लगा रहता था. दूसरी बात तो यह थी कि पेट में पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं होने की वजह से जी घबराता था और टांग लड़खड़ा‌ने लगती थी. तीसरी बात यह थी कइ दिन-भर-बदन पर छांटे के वार बरसते रहने से सारा बदन लहूलुहान हो जाता और उसकी यातनाएं इतनी ज़बर्दस्त होती थीं कि पानी में मछली की तरह रात-भर तड़फड़ाते हुए इस करवट पर होना पड़ता था. चौथी बात यह थी कि अपने लोग पास न होने की वजह से उस बात का दर्द तो और भी भयंकर था. इस तरह बातें मन में आने से यातनाओं के ढेर खड़े हो जाते थे और आंखें रोने लगती थीं. वे बेचारे भगवान से दुआ मांगते थे कि ‘हे भगवान! अब भी तुझको हम पर दया नहीं आती! तू अब हम पर रहम कर. अब हम इन यातनाओं को बर्दाश्त करने के भी क़ाबिल नहीं रहे हैं. अब हमारी जान भी निकल जाए तो अच्छा ही होगा.’

इस तरह की यातनाएं सहते-सहते, इस तरह से सोचते-सोचते ही सारी रात गुज़र जाती थी. उन लोगों को जिस-जिस प्रकार की पीड़ाओं को, यातनाओं को सहना पड़ा, उनको यदि एक-एक करके कहा जाए तो भाषा और साहित्य के शोक-रस के शब्द भी फीके पड़ जाएंगे, इसमें कोई संदेह नहीं. तात्पर्य, अमेरिकी लोगों ने आज सैकड़ों साल से चली आ रही इस ग़ुलामी की अमानवीय परंपरा को समाप्त करके ग़रीब लोगों को उन चंद लोगों के ज़ुल्म से मुक्त करके उन्हें पूरी तरह से सुख की ज़िंदगी बख़्शी है. इन बातों को जान कर शूद्रादि-अतिशूद्रों को अन्य लोगों की तुलना में बहुत ही ज़्यादा ख़ुशी होगी, क्योंकि ग़ुलामी की अवस्था में ग़ुलाम लोगों को, ग़ुलाम जातियों को कितनी यातनाएं बर्दाश्त करनी पड़ती हैं, इसे स्वयं अनुभव किए बिना अंदाज़ करना नामुमकिन है. जो सहता है, वही जानता है.

अब उन ग़ुलामों में और इन ग़ुलामों में फ़र्क़ इतना ही होगा कि पहले प्रकार के ग़ुलामों को ब्राह्मण-पुरोहितों ने अपने बर्बर हमलों से पराजित करके ग़ुलाम बनाया था और दूसरे प्रकार के ग़ुलामों को दुष्ट लोगों ने एकाएक ज़ुल्म करके ग़ुलाम बनाया था. शेष बातों में उनकी स्थिति समान है. इनकी स्थिति और ग़ुलामों की स्थिति में बहुत फ़र्क़ नहीं है. उन्होंने जिस-जिस प्रकार की मुसीबतों को बर्दाश्त किया है; वे सभी मुसीबतें ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों द्वारा ढाए ज़ुल्मों से कम हैं.

यदि यह कहा जाए कि उन लोगों से भी ज़्यादा ज़्यादतियां इन शूद्रादि-अतिशूद्रों को बर्दाश्त करनी पड़ी हैं, तो इसमें किसी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए. इन लोगों को जो ज़ुल्म सहना पड़ा, उसकी एक-एक दास्तान सुनते ही किसी भी पत्थरदिल आदमी को ही नहीं बल्कि साक्षात पत्थर भी पिघल कर उसमें से पीड़ाओं के आंसुओं की बाढ़ निकल पड़ेगी और उस बाढ़ से धरती पर इतना बहाव होगा कि जिन पूर्वजों ने शूद्रादि-अतिशूद्रों को गुलाम बनाया, उनके आज के वंशज जो ब्राह्मण, पुरोहित भाई हैं उनमें से जो अपने पूर्वजों की तरह पत्थरदिल नहीं, बल्कि जो अपने अंदर के मनुष्यत्व को जाग्रत रख कर सोचते हैं, उन लोगों को यह ज़रूर महसूस होगा कि यह एक जलप्रलय ही है.

हमारी दयालु अंग्रेज़ सरकार को, शूद्रादि-अतिशूद्रों ने ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों से किस-किस प्रकार का ज़ुल्म सहा है और आज भी सह रहे हैं, इसके बारे में कुछ भी मालूमात नहीं है. वे लोग यदि इस संबंध में पूछ्ताछ करके कुछ जानकारी हासिल करने की कोशिश करेंगे तो उन्हें यह समझ में आ जाएगा कि उन्होंने हिंदुस्थान का जो भी इतिहास लिखा है उसमें एक बहुत बड़े, बहुत भंयकर और बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्से को नज़रअंदाज़ किया है. उन लोगों को एक बार भी शूद्राद्रि-अतिशूद्रों के दुख-दर्दों की जानकारी मिल जाए तो सच्चाई समझ में आ जाएगी और उन्हें बड़ी पीड़ा होगी. उन्हें अपने (धर्म) ग्रंथों में, भयंकर बुरी अवस्था में पहुंचाए गए और चंद लोगों द्वारा सताए हुए, जिनकी पीड़ाओं की कोई सीमा ही नहीं है, ऐसे लोगों की दुरावस्था को उपमा देना हो तो शूद्रादि-अतिशूद्रों की स्थिति की ही उपमा उचित होगी, ऐसा मुझे लगता है.

इससे कवि को बहुत विषाद होगा. कुछ को अच्छा भी लगेगा कि आज तक कविताओं में शोक रस की पूरी तसवीर श्रोताओं के मन में स्थापित करने के लिए कल्पना की ऊंची उड़ाने भरनी पड़ती थीं, लेकिन अब उन्हें इस तरह की काल्पनिक दिमागी कसरत करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि अब उन्हें यह स्वयंभोगियों का ज़िंदा इतिहास मिल गया है. यदि यही है तो आज के शूद्रादि-अतिशूद्रों के दिल और दिमाग़ अपने पूर्वज की दास्तानें सुन कर पीड़ित होते होंगे, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि हम जिनके वंश में पैदा हुए हैं, जिनसे हमारा ख़ून का रिश्ता है, उनकी पीड़ा से पीड़ित होना स्वाभाविक है.

किसी समय ब्राह्मणों की राजसत्ता में हमारे पूर्वजों पर जो भी कुछ ज़्यादतियां हुईं, उनकी याद आते ही हमारा मन घबरा कर थरथराने लगता है. मन में इस तरह के विचार आने शुरू हो जाते हैं कि जिन घटनाओं की याद भी इतनी पीड़ादायी है, तो जिन्होंने उन अत्याचारों को सहा है, उनके मन कि स्थिति किस प्रकार की रही होगी, यह तो वे ही जान सकते हैं. इसकी अच्छी मिसाल हमारे ब्राह्मण भाइयों के (‌धर्म) शास्त्रों में ही मिलती है. वह यह कि इस देश के मूल निवासी क्षत्रिय लोगों के साथ ब्राह्मण-पुरोहित वर्ग के मुखिया परशुराम जैसे व्यक्ति ने कितनी क्रूरता बरती, यही इस ग्रंथ में बताने का प्रयास किया गया है. फिर भी उसकी क्रूरता के बारे में इतना समझ में आया है कि उस परशुराम ने कई क्षत्रियों को मौत के घाट उतार दिया था. और उस (ब्राह्मण) परशुराम ने क्षत्रियों की अनाथ हुई नारियों से, उनके छोटे-छोटे चार-चार पांच-पांच माह के निर्दोष मासूम बच्चों को ज़बरदस्ती छीन कर अपने मन में किसी प्रकार की हिचकिचाहट न रखते हुए बड़ी क्रूरता से उनको मौत के हवाले कर दिया था.

यह उस ब्राह्मण परशुराम का कितना जघन्य अपराध था. वह चंड इतना ही करके चुप नहीं रहा, अपने पति की मौत से व्यथित कई नारियों को, जो अपने पेट के गर्भ की रक्षा करने के लिए बड़े दुखित मन से जंगलों-पहाड़ों में भागे जा रही थीं, वह उनका क़ातिल शिकारी की तरह पीछा करके, उन्हें पकड़ कर लाया और प्रसूति के पश्चात जब उसे यह पता चलता कि पुत्र की प्राप्ति हुई है, तो वह चंड होकर आता और प्रसूतिशुदा नारियों का क़त्ल कर देता था. इस तरह की कथा ब्राह्मण ग्रंथों में मिलती है. और जो ब्राह्मण लोग उनके विरोधी दल के थे, उनसे उस समय की सही स्थिति समझ में आएगी, यह तो हमें सपने में भी नहीं सोचना चाहिए.

हमें लगता है कि ब्राह्मणों ने उस घटना का बहुत बड़ा हिस्सा चुराया होगा. क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने मुंह से अपनी ग़लतियों को कहने की हिम्मत नहीं करता. उन्होंने उस घटना को अपने ग्रंथ में लिख रखा है, यही बहुत बड़े आश्चर्य की बात है. हमारे सामने यह सवाल आता है कि परशुराम ने इक्कीस बार क्षत्रियों को पराजित करके उनका सर्वनाश क्यों किया और उनकी अभागी नारियों के अबोध, मासूम बच्चों का भी क़त्ल क्यों किया? शायद इसमें उसे बड़ा पुरुषार्थ दिखता हो और उसकी यह बहादुरी बाद में आनेवाली पीढ़ियों को भी मालूम हो, इसलिए ब्राह्मण ग्रंथकारों ने इस घटना को अपने शास्त्रों में लिख रखा है.

लोगों में एक कहावत प्रचलित है कि हथेली से सूरज को नहीं ढंका जा सकता. उसी प्रकार यह हक़ीक़त, जबकि उनको शर्मिंदा करने वाली थी, फिर भी उनकी इतनी प्रसिद्धि हुई कि ब्राह्मणों ने उस घटना पर, जितना परदा डालना संभव हुआ, उतनी कोशिश की, और जब कोई इलाज ही नहीं बचा तब उन्होंने उस घटना को लिख कर रख दिया. हां, ब्राह्मणों ने इस घटना की जितनी हक़ीक़त लिख कर रख दी, उसी के बारे में यदि कुछ सोच-विचार किया जाए तो मन को बड़ी पीड़ा होती है क्योंकि परशुराम ने जब उन क्षत्रिय गर्भधारिणी नारियों का पीछा किया तब उन गर्भिनियों को कितनी यातनाएं सहनी पड़ी होंगी!

पहली बात तो यह कि नारियों को भाग-दौड़ करने की आदत बहुत कम होती है. उसमें भी कई नारियां मोटी और कुलीन होने की वजह से, जिनको अपने घर की दहलीज पर चढ़ना भी मालूम नहीं था, घर के अंदर उन्हें जो कुछ ज़रूरत होती, वह सब नौकर लोग ला कर देते थे. मतलब जिन्होंने बड़ी सहजता से अपने जीवन का पालन-पोषण किया था, उन पर जब अपने पेट के गर्भ के बोझ को लेकर सूरज की लहलहाती धूप में टेढ़े-मेढ़े रास्तों से भागने की मुसीबत आई, इसका मतलब है कि वे भयंकर आपत्ति की शिकार थीं. उनको दौड़-भाग करने की आदत बिलकुल ही नहीं होने की वजह से पांव से पांव टकराते थे और कभी धड़ल्ले से चट्टान पर तो कभी पहाड़ की खाइयों में गिरती होंगी. उससे कुछ नारियों के माथे पर, कुछ नारियों की कुहनी को, कुछ नारियों के घुटनों को और कुछ नारियों के पांव को ठेस-खरोंच लग कर ख़ून की धाराएं बहती होंगी. और परशुराम पीछे-पीछे दौड़ कर आ रहा है, यह सुन कर और भी तेज़ी से भागने-दौड़ने लगती होंगी.

रास्ते में भागते-दौड़ते समय उनके नाजुक पांवों में कांटे, कंकड़ चुभते होंगे. कंटीले पेड़-पौधों से उनके बदन से कपड़े भी फट गए होंगे और उन्हें कांटे भी चुभे होंगे. उसकी वजह से उनके नाज़ुक बदन से लहू भी बहता होगा. लहलहाती धूप में भागते-भागते उनके पांव में छाले भी पड़ गए होंगे. और कमल के डंठल के समान नाज़ुक नीलवर्ण कांति मुरझा गई होगी. उनके मुंह से फेन बहता होगा. उनकी आंखों में आंसू भर आए होंगे. उनके मुंह को एक-एक दिन, दो-दो दिन पानी भी नहीं छुआ होगा. इसलिए बेहद थकान से पेट का गर्भ पेट में ही शोर मचाता होगा. उनको ऐसा लगता होगा कि यदि अब धरती फट जाए तो कितना अच्छा होता. मतलब उसमें वे अपने-आपको झोंक देतीं और इस चंड से मुक्त हो जातीं.

ऐसी स्थिति में उन्होंने आंखें फाड़-फाड़ कर भगवान की प्रार्थना निश्चित रूप से की होगी कि ‘हे भगवान! तूने हम पर यह क्या ज़ुल्म ढाए हैं? हम स्वयं बलहीन हैं, इसलिए हमको अबला कहा जाता है. हमें हमारे पतियों का जो कुछ बल प्राप्त था, वह भी इस चंड ने छीन लिया है. यह सब मालूम होने पर भी तू बुजदिल हो कर कायर की तरह हमारा कितना इम्तिहान ले रहा है! जिसने हमारे शौहर को मार डाला और हम अबलाओं पर हथियार उठाए हुए है और इसी में जो अपना पुरुषार्थ समझता है, ऐसे चंड के अपराधों को देख कर तू समर्थ होने पर भी मुंह में उंगली दबाए पत्थर जैसा बहरा अंधा क्यों बन बैठा हैं?’

इस तरह वे नारियां बेसहारा हो कर किसी के सहारे की तलाश में मुंह उठाए ईश्वर की याचना कर रही थीं. उसी समय चंड परशुराम ने वहां पहुंच कर उन अबलाओं को नहीं भगाया होगा? फिर तो उनकी यातनाओं की कोई सीमा ही नहीं रही होगी. उनमें से कुछ नारियों ने बेहिसाब चिल्ला-चिल्ला कर, चीख़-चीख़ कर अपनी जान गंवाई होगी? और शेष नारियों ने बड़ी विनम्रता से उस चंड परशुराम से दया की भीख नहीं मांगी होगी कि ‘हे परशुराम, हम आपसे इतनी ही दया की भीख मांगना चाहते हैं कि हमारे गर्भ से पैदा होने वाले अनाथ बच्चों की जान बख्शो! हम सभी आपके सामने इसी के लिए अपना आंचल पसार रहें हैं. आप हम पर इतनी ही दया करो. अगर आप चाहते हो तो हमारी जान भी ले सकते हो, लेकिन हमारे इन मासूम बच्चों की जान न लो! आपने हमारे शौहर को बड़ी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया है, इसलिए हमें बेसमय वैधव्य प्राप्त हुआ है. और अब हम सभी प्रकार के सुखों से कोसों दूर चले गए हैं. अब हमें आगे बाल-बच्चों होने की भी कोई उम्मीद नहीं रही. अब हमारा सारा ध्यान इन बच्चों की ओर लगा हुआ है. अब हमें इतना ही सुख चाहिए. हमारे सुख की आशा स्वरूप हमारे ये जो मासूम बच्चे हैं, उनको भी जान से मार कर हमें आप क्यों तड़फड़ाते देखना चाहते हो? हम आपसे इतनी ही भीख मांगते हैं. वैसे तो हम आपके धर्म की ही संतान हैं. किसी भी तरह से क्यों न हो, आप हम पर रहम कीजिए.

इतने करुणापूर्ण, भावपूर्ण शब्दों से उस चंड परशुराम का दिल कुछ न कुछ तो पिघल जाना चाहिए था, लेकिन आख़िर पत्थर-पत्थर ही साबित हुआ. वह उन्हें प्रसूत हुए देख कर उनसे उनके नवजात शिशु छीनने लगा. तब ये उन नवजात शिशुओं की रक्षा के लिए उन पर औंधी गिर पड़ी होंगी और गर्दन उठा कर कह रही होंगी के ‘हे परशुराम, आपको यदि इन नवजात शिशुओं की ही जान लेनी है तो सबसे पहले यही बेहतर होगा कि हमारे सिर काट लो, फिर हमारे पश्चात आप जो करना चाहें सो कर लो, किंतु हमारी आंखों के सामने हमारे उन नन्हें-मुन्हें बच्चों की जान न लो!’

लेकिन कहते हैं न, कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी ही रहती है. उसने उनकी एक भी न सुनी. यह कितनी नीचता! उन नारियों को गोद में खेल रहे उन नवजात शिशुओं को ज़बर्दस्ती छीन लिया गया होगा, तब उन्हें जो यातनाएं हुई होंगी, जो मानसिक पीड़ाएं हुई होंगी, उस स्थिति को शब्दों में व्यक्त करने के लिए हमारे हाथ की कलम थरथराने लगती है. खैर, उस जल्लाद ने उन नवजात शिशुओं की जान उनकी माताओं की आंखों के सामने ली होगी.

उस समय कुछ माताओं ने अपनी छाती को पीटना, बालों को नोंचना और ज़मीन को कुदेरना शुरू कर दिया होगा. उन्होंने अपने ही हाथ से अपने मुंह में मिट्टी के ढले ठूंस-ठूंस कर अपनी जान भी गंवा दी होगी. कुछ माताएं पुत्र शोक में बेहोश हो कर गिर पड़ी होंगी. उनके होश-हवास भूल गए होंगे. कुछ माताएं पुत्र शोक के मारे पागल-सी हो गई होंगी. ‘हाय मेरा बच्चा, हाय मेरा बच्चा!’ करते-करते दर-दर, गांव-गांव, जंगल-जंगल भटकती होंगी. लेकिन इस तरह सारी हक़ीक़त हमें ब्राह्मण-पुरोहितों से मिल सकेगी, यह उम्मीद लगाए रहना फिज़ूल की बातें हैं.

इस तरह ब्राह्मण-पुरोहितों के पूर्वज, अधिकारी परशुराम ने सैकड़ों क्षत्रियों को जान से मार कर उनके बीवी-बच्चों के भयंकर बुरे हाल किए और उसी को आज के ब्राह्मणों ने शूद्रादि-अतिशूद्रों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर, सारी सृष्टि का निर्माता कहने के लिए कहा है, यह कितने बड़े आश्चर्य की बात हैं! परशुराम के पश्चात ब्राह्मणों ने इन्हें कम परेशान नहीं किया होगा. उन्होंने अपनी ओर से जितना सताया जा सकता है, उतना सताने में कोई कसर बाक़ी छोड़ी नहीं होगी. उन्होंने घृणा से इन लोगों में से अधिकांश लोगों के भयंकर बुरे हाल किए. उन्होंने इनमें से कुछ लोगों को इमारतों-भवनों की नींव में ज़िंदा गाड़ देने में भी कोई आनाकानी नहीं की, इस बारे में इस ग्रंथ में लिखा गया है.

उन्होंने इन लोगों को इतना नीच समझा था कि किसी समय कोई शूद्र नदी के किनारे अपने कपड़े धो रहा हो और इत्तिफ़ाक से वहां यदि कोई ब्राह्मण आ जाए, तो उस शूद्र को अपने सभी कपड़े समेट करके बहुत दूर, जहां से ब्राह्मण के तन पर पानी का एक मामूली क़तरा भी पड़ने की कोई संभावना न हो, ऐसे पानी के बहाव के नीचे की जगह पर जा कर अपने कपड़े धोना पड़ता था. यदि वहां से ब्राह्मण के तन पर पानी की बूंद का एक क़तरा भी छू गया, या उसको इस तरह का संदेह भी हुआ, तो ब्राह्मण-पंडा आग के शोले की तरह लाल हो जाता था और उस समय उसके हाथ में जो भी मिल जाए या अपने ही पास के बर्तन को उठा कर, न आव देखा न ताव, उस शूद्र के माथे को निशाना बना कर बड़े ज़ोर से फेंक कर मारता था उससे उस शूद्र का माथा ख़ून से भर जाता था. बेहोशी में ज़मीन पर गिर पड़ता था. फिर कुछ देर बाद होश आता था तब अपने ख़ून से भीगे हुए कपड़ों को हाथ में लेकर बिना किसी शिकायत के, मुंह लटकाए अपने घर चला जाता था.

यदि सरकार में शिकायत करो तो चारों तरफ़ ब्राह्मणशाही का जाल फैला हुआ था; बल्कि शिकायत करने का ख़तरा यह रहता था कि ख़ुद को ही सज़ा भोगने का मौक़ा न आ जाए. अफ़सोस! अफ़सोस!! हे भगवान, यह कितना बड़ा अन्याय है!

ख़ैर, यह एक दर्दभरी कहानी है, इसलिए कहना पड़ रहा है. किंतु इस तरह की और इससे भी भयंकर घटनाएं घटती थीं, जिसका दर्द शूद्रादि-अतिशूद्रों को बिना शिकायत के सहना पड़ता था. ब्राह्मणवादी राज्यों में शूद्रादि-अतिशूद्रों को व्यापार-वाणिज्य के लिए या अन्य किसी काम के लिए घूमना हो तो बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था, बड़ी कठिनाइयां बर्दाश्त करनी पड़ती थीं. इनके सामने मुसीबतों का तांता लग जाता था. उसमें भी एकदम सुबह के समय तो बहुत भारी दिक्कतें खड़ी हो जाती थीं, क्योंकि उस समय सभी चीज़ों की छाया काफ़ी लंबी होती है.

यदि ऐसे समय शायद कोई शूद्र रास्ते में जा रहा हो और सामने से किसी ब्राह्मण की सवारी आ रही है, यह देख कर उस ब्राह्मण पर अपनी छाया न पड़े, इस डर से कंपित होकर उसको पल-दो-पल अपना समय फ़िज़ूल बरबाद करके रास्ते से एक ओर होकर वहीं बैठ जाना पड़ता था. फिर उस ब्राह्मण के चले जाने के बाद उसको अपने काम के लिए निकलना पड़ता था. मान लीजिए, कभी-कभार बगैर ख़याल के उसकी छाया उस ब्राह्मण पर पड़ी तो ब्राह्मण तुरंत क्रोधित हो कर चंड बन जाता था और उस शूद्र को मरते दम तक मारता-पीटता और उसी वक्त नदी पर जा कर स्नान कर लेता था.

शूद्रों से कई लोगों को (जातियों को) रास्ते पर थूकने की भी मनाही थी. इसलिए उन शूद्रों को ब्राह्मणों की बस्तियों से गुज़रना पड़ा तो अपने साथ थूकने के लिए मिट्टी के किसी एक बरतन को रखना पड़ता था. समझ लो, उसकी थूक ज़मीन पर पड़ गई और उसको ब्राह्मण-पंडों ने देख लिया तो उस शूद्र के दिन भर गए. अब उसकी ख़ैर नहीं. इस तरह ये लोग (शूद्रादि-अतिशूद्र जातियां) अनगिनत मुसीबतों को सहते-सहते मटियामेट हो गए. लेकिन अब हमें वे लोग इस नरक से भी बदतर जीवन से कब मुक्ति देते हैं, इसी का इंतज़ार है. जैसे किसी व्यक्ति ने बहुत दिनों तक जेल के अंदर ज़िंदगी गुज़ार दी हो, वह क़ैदी अपने साथी मित्रों से बीवी-बच्चों से भाई-बहन से मिलने के लिए या स्वतंत्र रूप से आज़ाद पंछी की तरह घूमने के लिए बड़ी उत्सुकता से जेल से मुक्त होने के दिन का इंतज़ार करता है, उसी तरह का इंतज़ार, बेसब्री इन लोगों को भी होना स्वाभाविक ही है.

ऐसे समय बड़ी ख़ुशक़िस्मत कहिए कि ईश्वर को उन पर दया आई, इस देश में अंग्रेज़ों की सत्ता क़ायम हुई और उनके द्वारा ये लोग ब्राह्मणशाही की शारीरिक ग़ुलामी से मुक्त हुए. इसीलिए ये लोग अंग्रेज़ी राजसत्ता का शुक्रिया अदा करते हैं. ये लोग अंग्रेज़ों के इन उपकारों को कभी भूलेंगे नहीं. उन्होंने इन्हें आज सैकड़ों काल से चली आ रही ब्राह्मणशाही की ग़ुलामी की फ़ौलादी ज़ंजीरों को तोड़ करके मुक्ति की राह दिखाई है. उन्होंने इनके बीवी-बच्चों को सुख के दिन दिखाए हैं. यदि वे यहां न आते तो ब्राह्मणों ने, ब्राह्मणशाही ने इन्हें कभी सम्मान और स्वतंत्रता की ज़िंदगी न गुज़ारने दी होती.

इस बात पर कोई शायद इस तरह का संदेह उठा सकता है कि आज ब्राह्मणों की तुलना में शूद्रादि-अतिशूद्रों की संख्या क़रीबन दस गुना ज़्यादा है. फिर भी ब्राह्मणों ने शूद्रादि-अतिशूद्रों को कैसे मटियामेट कर दिया? कैसे ग़ुलाम बना लिया? इसका जवाब यह है कि एक बुद्धिमान, चतुर आदमी इस अज्ञानी लोगों के दिलो-दिमाग़ को अपने पास गिरवी रखा सकता है. उन पर अपना स्वामित्व लाद सकता है. और दूसरी बात यह है कि दस अनपढ़ लोग यदि एक ही मत के होते तो वे उस बुद्धिमान, चतुर आदमी की दाल ना गलने देते, एक न चलने देते; किंतु वे दस लोग दस अलग-अलग मतों के होने की वजह से ब्राह्मणों-पुरोहितों जैसे धूर्त, पाखंडी लोगों को उन दस भिन्न-भिन्न मतवादी लोगों को अपने जाल में फंसाने में कुछ भी कठिनाई नहीं होती.

शूद्रादि-अतिशूद्रों की विचार प्रणाली, मत मान्यताएं एक दूसरे से मेल-मिलाप न करे, इसके लिए प्राचीन काल में ब्राह्मण-पुरोहितों ने एक बहुत बड़ी धूर्ततापूर्ण और बदमाशी भरी विचारधारा खोज निकाली. उन शूद्रादि-अतिशूद्रों के समाज की संख्या जैसे-जैसे बढ़ने लगी, वैसे-वैसे ब्राह्मणों में डर की भावना उत्पन्न होने लगी. इसीलिए उन्होंने शूद्रादि-अतिशूद्रों के आपस में घृणा और नफ़रत बढ़ती रहे, इसकी योजना तैयार की. उन्होंने समाज में प्रेम के बजाय ज़हर के बीज बोए. इसमें उनकी चाल यह थी के यदि शूद्रादि-आतिशूद्र (समाज) आपस में लड़ते-झगड़ते रहेंगे तब कहीं यहां अपने टिके रहने की बुनियाद मज़बूत रहेगी और हमेशा-हमेशा के लिए उन्हें अपना ग़ुलाम बना कर बग़ैर मेहनत के उनके पसीने से प्राप्त कमाई पर बिना किसी रोक-टोक के गुलछर्रे उड़ाने का मौका मिलेगा.

अपनी इस चाल, विचारधारा को कामयाबी देने के लिए जातिभेद की फ़ौलादी ज़हरीली दीवारें खड़ी करके, उन्होंने इसके समर्थन में अपने जाति-स्वार्थसिद्धि के कई ग्रंथ लिख डाले. उन्होंने उन ग्रंथों के माध्यम से अपनी बातों को अज्ञानी लोगों के दिलों-दिमाग़ पर पत्थर की लकीर तरह लिख दिया. उनमें से कुछ लोग जो ब्राह्मणों के साथ बड़ी कड़ाई और दृढ़ता से लड़े, उनका उन्होंने एक वर्ग ही अलग कर दिया. उनसे पूरी तरह बदला चुकाने के लिए उनकी जो बाद की संतान हुई, उसको उन्हें छूना नहीं चाहिए, इस तरह की ज़हरीली बातें ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने उन्हीं लोगों के दिलो-दिमाग़ में भर दीं, फ़िलहाल जिन्हें माली, कुनबी (कुर्मी आदि) कहा जाता है.

जब यह हुआ तब इसका परिणाम यह हुआ कि उनका आपसी मेल-मिलाप बंद हो गया और वे लोग अनाज के एक-एक दाने के लिए मोहताज हो गए. इसीलिए इन लोगों को जीने के लिए मरे हुए जानवरों का मांस मजबूर हो कर खाना पड़ा. उनके इस आचार-व्यवहार को देख कर आज के शूद्र जो बहुत ही अहंकार से माली, कुनबी, सुनार, दरजी, लुहार बढ़ई (तेली, कुर्मी) आदि बड़ी-बड़ी संज्ञाएं अपने नाम के साथ लगाते हैं, वे लोग केवल इस प्रकार का व्यवसाय करते हैं. कहने का मतलब यही है कि वे लोग एक ही घराने के होते हुए भी आपस में लड़ते-झगड़ते हैं और एक दूसरे को नीच समझते हैं.

इन सब लोगों के पूर्वज स्वदेश के लिए ब्राह्मणों से बड़ी निर्भयता से लड़ते रहे, इसका परिणाम यह हुआ के ब्राह्मणों ने इन सबको समाज के निचले स्तर पर ला कर रख दिया और दर-दर के भिखारी बना दिया. लेकिन अफ़सोस यह है कि इसका रहस्य किसी के ध्यान में नहीं आ रहा है. इसलिए ये लोग ब्राह्मण-पंडा-परोहितों के बहकावे में आ कर आपस में नफ़रत करना सीख गए. अफ़सोस! अफ़सोस!!

ये लोग भगवान की निगाह में कितने बड़े अपराधी है! इन सबका आपस में इतना बड़ा नजदीकी संबंध होने पर भी किसी त्योहार पर ये उनके दरवाज़े पर पका-पकाया भोजन मांगने के लिए आते हैं तो वे लोग इनको नफ़रत की निगाह से ही नहीं देखते हैं, कभी-कभी तो डंडा ले कर इन्हें मारने के लिए भी दौड़ते हैं. ख़ैर, इस तरह जिन-जिन लोगों ने ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों से जिस-जिस तरह से संघर्ष किया, उन्होंने उसके अनुसार जातियों में बांट कर एक तरह से सज़ा सुना दी या जातियों का दिखावटी आधार दे कर सभी को पूरी तरह से ग़ुलाम बना लिया.

ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों सब में सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिकार संपन्न हो गए, है न मज़े की बात! तब से उन सभी के दिलो-दिमाग आपस में उलझ गए और नफ़रत से अलग-अलग हो गए. ब्राह्मण-पुरोहितों अपने षड्यंत्र में कामयाब हुए. उनको अपना मनचाहा व्यवहार करने की पूरी स्वंतत्रता मिल गई. इस बारे में एक कहावत प्रसिद्ध है कि ‘दोनों का झगड़ा और तीसरे का लाभ’ मतलब यह है कि ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने शूद्रादि-अतिशूद्रों के बीच आपस में नफ़रत के बीज ज़हर की तरह बो दिए और ख़ुद उन सभी की मेहनत पर ऐशो-आराम कर रहे हैं.

संक्षेप में, ऊपर कहा ही गया है कि इस देश में अंग्रेज़ सरकार आने भी वजह से शूद्रादि-अतिशूद्रों की ज़िंदगी में एक नई रोशनी आई. ये लोग ब्राह्मणों की ग़ुलामी से मुक्त हुए, यह कहने में किसी प्रकार का संकोच नहीं है. फिर भी हमको यह कहने में बड़ा दर्द होता है कि अभी भी हमारी दयालु सरकार के, शूद्रादि-अतिशूद्रों को शिक्षित बनाने की दिशा में, ग़ैर-ज़िम्मेदारीपूर्ण रवैया अख़्तियार करने की वजह से ये लोग अनपढ़ ही रहे. कुछ लोग शिक्षित, पढ़े-लिखे बन जाने पर भी ब्राह्मणों के नकली पाखंडी (धर्म) ग्रंथों के शास्त्रपुराणों के अंध भक्त बनकर मन से, दिलो-दिमाग से ग़ुलाम ही रहे.

इसलिए उन्हें सरकार के पास जाकर कुछ फ़रियाद करने, न्याय मांगने का कुछ आधार ही नहीं रहा है. ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों लोग अंग्रेज़ सरकार और अन्य सभी जाति के लोगों के पारिवारिक और सरकारी कामों में कितनी लूट-खसोट करते हैं, गुलछर्रे उड़ाते हैं, इस बात की ओर हमारी अंग्रेज़ सरकार का अभी तक कोई ध्यान नहीं गया है. इसलिए हम चाहते हैं कि अंग्रेज़ सरकार को सभी जनों के प्रति समानता का भाव रखना चाहिए और उन तमाम बातों की ओर ध्यान देना चाहिए जिससे शूद्रादि-अतिशूद्र समाज के लोग ब्राह्मणों की मानसिक ग़ुलामी से मुक्त हो सकें. अपनी इस सरकार से हमारे यही प्रार्थना है.

इस किताब को लिखते समय मेरे मित्र विनायक राव बापू जी भंडारकर और सा. राजन्नलिंगू ने मुझे जो उत्साह दिया, इसके लिए मैं उनको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं.

जोतीराव गोविंदराव

(महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की वेबसाइट हिंदीसमयडॉटकॉम से साभार)