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सुप्रीम कोर्ट ने अडाणी-टाटा पावर की बिजली क़ीमत बढ़ाने की मांग ख़ारिज की

अडाणी-टाटा पावर ने दलील दी थी कि रुपये की क़ीमत गिरने और इंडोनेशिया से आने वाला कोयला महंगा होने के कारण बिजली की लागत बढ़ गई है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: रायटर्स)

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: रायटर्स)

अडाणी और टाटा पावर को बिजली क़ीमतों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने झटका दे दिया है. दरअसल, दोनों ही समूहों ने पांच राज्यों में बिजली के कंपनसेटरी टैरिफ (क्षतिपूर्ति शुल्क) में बढ़ोत्तरी की मांग की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने नामंज़ूर कर दिया है. अदालत ने सीइआरसी के दिसंबर 2016 कंपनसेटरी टैरिफ के आदेश को पलट दिया है.

द क्विंट की ख़बर के अनुसार अदालत ने कहा है कि अडाणी पावर और टाटा पावर जैसी बिजली कंपनियां ग्राहकों से कंपनसेटरी टैरिफ (क्षतिपूर्ति शुल्क) नहीं वसूल सकती हैं. अदालत के इस फ़ैसले के बाद दोनों ही समूहों को भारी नुकसान सहना पड़ा. अडाणी पावर के शेयर में 16 फ़ीसदी गिरावट दर्ज़ की गई है, जबकि टाटा पावर के शेयर भी 6.5 फ़ीसदी गिरावट आई है.

दोनों समूहों ने केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (सीईआरसी) में याचिका दायर की थी और दलील दी थी कि रुपये की क़ीमत गिरने और इंडोनेशिया से आने वाला कोयला महंगा होने के कारण उनकी लागत बढ़ गई है. इसलिए उन्हें ज्यादा फ़ीस वसूलने की अनुमति दी जाए.

जस्टिस पीसी घोष और जस्टिस आरएफ नरीमन की पीठ ने सीईआरसी के आदेश को ख़ारिज कर दिया. अदालत ने याचिका ख़ारिज करने के पीछे दलील देते हुए कहा कि कोयले के दाम में बढ़ोत्तरी से कंपनियां अपने कॉन्ट्रैक्ट के नियमों का पालन करने से मुक्त नहीं हो जाती हैं.

पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए आगे कहा कि बिजली वितरण कंपनियों के साथ किए गए बिजली ख़रीद समझौते में बदलाव नहीं किया जा सकता. समझौते में यह भी कहा गया है कि यह कोई ज़रूरी नहीं कि इंडोनेशिया से ही एक निर्धारित दाम पर कोयला ख़रीदा जाए.

मामले पर अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा, ‘चूंकि कंपनियों ने बिजली वितरण के लिए बोली लगाते समय जान बूझकर जोखिम लिया था. इसलिए अब वो कॉन्ट्रैक्ट के दायित्वों से पीछे नहीं हट सकतीं.’ कंपनियों ने जिन पांच राज्यों में बिजली क़ीमतों में बढ़ोत्तरी करने के लिए अनुमति मांगी थी, उनमें गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान और हरियाणा शामिल हैं.