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जजों की नियुक्ति: एनजेएसी क़ानून को निरस्त करने के फैसले पर पुनर्विचार याचिका ख़ारिज

सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2015 को जजों द्वारा जजों की नियुक्ति की 22 साल पुरानी कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेने वाले एनजेएसी क़ानून, 2014 को असंवैधानिक और अमान्य घोषित किया था.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून को निरस्त करने वाले उसके 2015 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग वाली याचिका खारिज कर दी. साल 2015 के इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली पुनर्जीवित हुई थी.

एनजेएसी कानून 2014 में उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की ज्यादा भूमिका की व्यवस्था थी.

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिका दायर करने में 470 दिन की देरी हुई है और इसमें कोई दम नहीं है.

पीठ ने 27 नवंबर के अपने आदेश में कहा, ‘वर्तमान पुनर्विचार याचिका दायर करने में 470 दिन की देरी हुई है, जिसके लिए कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया. पुनर्विचार याचिका केवल देरी के आधार पर खारिज किए जाने लायक है.’

इस आदेश को शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर बीते शनिवार को डाला गया. पीठ में जस्टिस मदन बी. लोकूर, जस्टिस कुरियन जोसफ (अब सेवानिवृत्त), जस्टिस एएम खानविल्कर और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे.

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

पीठ ने कहा कि हमने पुनर्विचार याचिका और संलग्न कागजात पर गौर किया है. हमें इसमें कोई गुण नहीं मिला. पुनर्विचार याचिका देरी और गुण की कमी के आधार पर खारिज की जाती है.

यह याचिका ‘नेशनल लॉयर्स कैंपेन फॉर ज्यूडीशियल ट्रांसपेरेंसी एंड रिफॉर्म्स’ ने पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले पर फिर से विचार करने के लिए दायर की थी. पुनर्विचार याचिका में दावा किया गया था कि 2015 का फैसला असंवैधानिक एवं अमान्य है.

सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2015 को जजों द्वारा जजों की नियुक्ति की 22 साल पुरानी कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेने वाले एनजेएसी कानून, 2014 को निरस्त कर दिया था.

संविधान पीठ के चार जजों ने एनजेएसी कानून और संविधान (99वां संशोधन) अधिनियम, 2014 दोनों को असंवैधानिक तथा अमान्य घोषित किया था, जबकि जस्टिस जे. चेलामेश्वर (अब सेवानिवृत्त) ने संविधान संशोधन कानून की वैधता को बरकरार रखा था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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