भारत

आलोक वर्मा को हटाने का फैसला करने वाले जस्टिस सीकरी को मोदी सरकार ने दिया बड़ा ओहदा

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जज एके सीकरी को लंदन स्थित राष्ट्रमंडल सचिवालय पंचायती ट्रिब्यूनल में नामित करने का फैसला पिछले महीने लिया जब आलोक वर्मा मामले की सुनवाई कोर्ट में चल रही थी. सीकरी आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से हटाने वाली उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति के सदस्य थे.

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आलोक वर्मा, एके सीकरी और नरेंद्र मोदी.

नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश एके सीकरी को लंदन स्थित राष्ट्रमंडल सचिवालय पंचायती ट्रिब्यूनल (सीएसएटी) में अध्यक्ष/सदस्य के खाली पद पर नामित करने का फैसला किया. द वायर को विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है.

एके सीकरी सुप्रीम कोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम जज हैं और हाल ही में आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से हटाने वाली चयन समिति के सदस्य थे. सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद छह मार्च को सीकरी सीएसएटी में पदभार ग्रहण करेंगे.

सीएसएटी के सदस्यों को चार साल के कार्यकाल के लिए नियुक्त किया जाता है, जिसे एक और कार्यकाल के लिए रिन्यू किया जा सकता है.

मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा आलोक वर्मा की सीबीआई निदेशक पद पर बहाली के बाद बीते गुरुवार को नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली चयन समिति ने 2:1 के फैसले से उनका तबादला कर दिया था. समिति में मोदी के अलावा सुप्रीम कोर्ट जज एके सीकरी और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे थे.

चयन समिति के तीन सदस्यों में से प्रधानमंत्री मोदी और जस्टिस एके सीकरी सीवीसी जांच के आधार पर आलोक वर्मा को बतौर सीबीआई निदेशक पद पर बने रहने के खिलाफ थे. चयन समिति के इस फैसले की काफी आलोचना हो रही है.

यहां तक कि आलोक वर्मा मामले में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के जांच की निगरानी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एके पटनायक ने बीते शुक्रवार को कहा कि वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली समिति ने उन्हें हटाने के लिए बहुत जल्दबाजी में फैसला लिया.

आलोक वर्मा के भविष्य का फैसला करने के लिए एके सीकरी का वोट महत्वपूर्ण था क्योंकि वह मोदी और खड़गे के अलावा उच्च-स्तरीय चयन समिति के तीसरे सदस्य थे. बैठक में जस्टिस सीकरी का सरकार के समान दृष्टिकोण था जबकि खड़गे ने कड़ी नाराजगी जाहिर की थी.

सीएसएटी अपने 53 सदस्य देशों के बीच विवादों का अंतिम मध्यस्थ है. इसमें अध्यक्ष सहित आठ सदस्य होते हैं जिन्हें राष्ट्रमंडल सरकारों द्वारा उच्च नैतिक चरित्र वाले ऐसे व्यक्तियों का चुनाव किया जाता है जिनके पास राष्ट्रमंडल देश में उच्च न्यायिक पदों पर काम करने का अनुभव हो या जो कम से कम 10 वर्षों के अनुभव के साथ वकील हो.’

ट्रिब्यूनल में वर्तमान में एक पद खाली है और भारत कई वर्षों से सीएसएटी का सदस्य नहीं है. कई मौजूदा सदस्यों की कार्यकाल भी अगले कुछ महीनों में खत्म हो रही है.

नामांकन की पुष्टि करते हुए, राजनयिक सूत्रों ने द वायर को बताया कि सीकरी को लंदन भेजने का प्रयास उस समय धीमा पड़ गया जब श्रीलंका ने खाली सीएसएटी पद के लिए बोली लगाने का फैसला किया. हालांकि राष्ट्रमंडल सचिवालय द्वारा इसकी पुष्टि कुछ दिन पहले ही हुई है.

सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों ने द प्रिंट को बताया कि केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पिछले महीने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को पत्र लिखकर जस्टिस सीकरी को इस पद पर नामित करने और उनकी सहमति लेने के विदेश मंत्रालय के फैसले से अवगत कराया था.

जस्टिस सीकरी को इस पद पर नामित करने का निर्णय उच्चतम स्तर पर लिया गया था. यह पता चला है कि रंजन गोगोई ने जस्टिस सीकरी से पता करने के बाद सरकार को सकारात्मक में जवाब दिया था.

यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार ने मुख्य न्यायाधीश को एक जज नामित करने का अनुरोध किया था या जस्टिस सीकरी को चुनने का एकतरफा फैसला था, सूत्र ने कहा, ‘सरकार ने जब मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था तो वह स्पष्ट थी कि उसके दिमाग में जस्टिस सीकरी हैं. हो सकता है, सरकार में किसी ने पहले ही उनकी सहमति ले ली हो.’

उस समय जब सरकार ने सीकरी को नामांकित करने का निर्णय लिया था, वो ये जानते थे कि आलोक वर्मा मामले के किसी भी उच्चाधिकार प्राप्त समिति के सदस्य होने सकते हैं.

अगर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक को छुट्टी पर भेजने की सरकार की इच्छा का समर्थन किया होता, तो मामला वहीं खत्म हो जाता. लेकिन अगर अदालत सरकार के खिलाफ फैसला देती और वर्मा को हटाने की घोषणा को अवैध ठहराती तो यह स्पष्ट था कि मुख्य न्यायाधीश गोगोई इस मामले को सुलझाने के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति का हिस्सा नहीं होंगे, क्योंकि उन्होंने इस मामले की सुनवाई करने वाली पीठ का नेतृत्व किया था.

ऐसी स्थिति में यह लगभग तय था कि वरिष्ठतम जज के रूप में जस्टिस सीकरी को मुख्य न्यायाधीश की जगह समिति का तीसरा सदस्य बनाया जाएगा जहां प्रधानमंत्री मोदी और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे भी होंगे.

मालूम हो कि पिछले साल मई में, जस्टिस सीकरी ने सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ का नेतृत्व किया था जिसने कर्नाटक चुनाव में तत्काल फ्लोर टेस्ट करने का आदेश दिया था और राज्यपाल द्वारा भारतीय जनता पार्टी को दी गई 15 दिन की समयसीमा को रद्द कर दिया था.

एके सीकरी छह मार्च, 2019 को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हो रहे हैं.

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