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बिहार में क्यों निशाने पर हैं आरटीआई कार्यकर्ता?

विशेष रिपोर्ट: एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2005 से लेकर अब तक देशभर में 79 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है, जिसमें क़रीब 20 फीसदी की हत्याएं केवल बिहार में हुई हैं. साल 2018 में बिहार में पांच आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या के मामले सामने आए हैं.

बिहार में मार दिए गए आरटीआई कार्यकर्ता शशिधर मिश्रा, रामकुमार ठाकुर और वाल्मीकि यादव (बाएं से दाएं).

बिहार में मार दिए गए आरटीआई कार्यकर्ता शशिधर मिश्रा, रामकुमार ठाकुर और वाल्मीकि यादव (बाएं से दाएं).

पटना: 40 वर्षीय आरटीआई कार्यकर्ता नारायण गिरि बिहार के रोहतास ज़िले के नटवार थाना क्षेत्र के बरुना गांव में कच्चे घर में रहते हैं. वह आरटीआई के ज़रिये पंचायत स्तर पर होने वाली अनियमितताओं को उजागर करते हैं और इस कारण उन पर जानलेवा हमला भी हो चुका है.

नारायण के परिवार में माता-पिता, पत्नी और तीन बच्चे हैं. इनकी ज़िम्मेदारी उनके सिर पर है. इसके बावजूद वह जोख़िम उठाकर लगातार आरटीआई आवेदन डाल रहे हैं.

हाल ही में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले बढ़ने के बाद वह अतिरिक्त सतर्कता बरतने लगे हैं.

वह कहते हैं, ‘अब पहले जितना लापरवाह नहीं रहता. कोई फोन कर बुलाता है तो उससे मिलने जाने से पहले एहतियात बरतता हूं. अगर किसी निजी काम से बाहर निकलता हूं तो गिने चुके लोगों को ही बताता हूं और अगर किसी ऐसी जगह जा रहा हूं, जहां किसी तरह की गड़बड़ी की आशंका है तो अपने साथ एक और व्यक्ति को ले जाता हूं.’

नारायण गिरि वर्ष 2008 से ही आरटीआई के माध्यम से सूचनाएं जुटाने में लगे हुए हैं.

उन्होंने बताया, ‘मैं अक्सर समाचारों में सुनता था कि आरटीआई के ज़रिये कैसे घोटाले को उजागर किया गया. उसी वक़्त मैंने तय किया था कि मैं भी आरटीआई को हथियार बना कर विभिन्न घोटालों को सामने लाऊंगा.’

उनका कहना है कि आरटीआई कार्यकर्ताओं को शुरू से ही मुश्किलों के सामना करना पड़ रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में हालात और भी संगीन हुए हैं.

बिहार में हालिया वक़्त में आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या का ग्राफ तेज़ी से बढ़ा है, जिससे नारायण गिरि जैसे सैकड़ों आरटीआई कार्यकर्ता ख़ौफ़ के साये में जीने को विवश हैं.
आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या की ताज़ा घटना बीते साल 22 दिसंबर को बिहार के बांका ज़िले में हुई.

ख़बरों के अनुसार, उस रोज़ दोपहर में बांका ज़िले में फुल्लीडुमर थाना क्षेत्र के बनरझोंप के रहने वाले आरटीआई कार्यकर्ता भोला शाह मकान बनवा रहे थे. उसी वक्त एक बोलेरो आकर वहां रुकी.

बोलेरो में सवार लोगों ने भोला शाह को आवाज़ दी कि वे लोग फुल्लीडुमर थाने से आए हैं. भोला शाह ने कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि उनके (भोला शाह) ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी का परवाना जारी हुआ है, इसलिए उन्हें थाने चलना होगा.

भोला शाह उनकी पुकार पर आए, मगर किसी साज़िश की आशंका को भांपते हुए उन्होंने बोलेरो में सवार होने से इनकार कर दिया. तभी तीन से चार नकाबपोश लोग वाहन से बाहर निकले. भोला शाह को जबरन बोलेरो में बिठाया और तेज़ रफ्तार से भाग निकले. भोला शाह के परिजनों ने जब थाने से संपर्क किया तो उन्हें बताया गया कि उनके ख़िलाफ़ कोई वारंट जारी नहीं हुआ है.

23 दिसंबर की सुबह भोला शाह के परिजनों तक जो ख़बर पहुंची, उससे घर में हाहाकार मच गया. भोला शाह की हत्या कर शव को जंगल में फेंक दिया गया था.

इस मामले में मोथाबाड़ी पंचायत की मुखिया के पति समेत कुल सात लोगों को नामज़द किया गया है. पुलिस ने कुछ आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया है.

बांका की एसपी स्वप्ना जी. मेश्राम ने बताया, ‘अब तक हत्या के दो संभावित कारण सामने आए हैं. पहला कारण ये सामने आया है कि नामज़द आरोपितों में एक के साथ भोला शाह का ज़मीन विवाद था. वहीं एफआईआर में नामज़द अन्य आरोपितों को लेकर भोला शाह ने कुछ सूचनाएं निकालनी चाही थी. इस कारण इन आरोपितों को डर था कि उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है.’

बिहार के आरटीआई कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय कथित तौर पर फ़र्ज़ी मामलों में कई बार जेल जा चुके हैं.

बिहार के आरटीआई कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय कथित तौर पर फ़र्ज़ी मामलों में कई बार जेल जा चुके हैं.

स्थानीय लोगों का कहना है कि भोला शाह ने आरटीआई के ज़रिये पंचायत स्तर पर कई घपलों को उजागर किया था. बताया जाता है कि कुछ शिक्षकों की बहाली में फ़र्ज़ी दस्तावेज़ के इस्तेमाल का मामला भी उन्होंने उठाया था, जिसके चलते कुछ लोग उनसे नाराज़ थे.

2018 में पांच आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2005 में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम लागू होने के बाद से लेकर अब तक देशभर में 79 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी हैं. इनमें से करीब 20 फीसदी यानी 15 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या केवल बिहार में हुई हैं. वहीं, सात आरटीआई कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले किए गए.

बिहार में आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या की पहली वारदात वर्ष 2010 में हुई थी. बेगुसराय के फुलवरिया गांव निवासी आरटीआई कार्यकर्ता शशिधर मिश्रा को 14 फरवरी 2010 की रात उनके घर के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. उन्होंने दो साल में ही क़रीब 1000 आरटीआई आवेदन देकर कई घोटालों को उजागर किया था.

वर्ष 2018 की बात करें तो यह साल आरटीआई कार्यकर्ताओं के लिए सबसे खौफ़नाक रहा. इस एक साल में ही पांच आरटीआई कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतार दिया गया.

वर्षवार देखें, तो 2010 और 2011 में एक-एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या हुई थी. वर्ष 2012 में तीन आरटीआई कार्यकर्ताओं की जान ले ली गई थी. वर्ष 2013 में भी एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या हुई थी. वर्ष 2014 में एक भी मौत नहीं हुई थी, लेकिन 2015 में दो आरटीआई कार्यकर्ताओं का क़त्ल किया गया था. इसी तरह वर्ष 2016 और 2017 में भी एक-एक आरटीआई कार्यकर्ता की जान ले ली गई थी.

वर्ष 2018 में आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या की पहली घटना फरवरी में हुई थी. सहरसा ज़िले के आरटीआई कार्यकर्ता राहुल झा की हत्या कर दी गई थी.

राहुल झा के पिता भी आरटीआई कार्यकर्ता हैं और उनके साथ राहुल भी आरटीआई आवेदन दाख़िल कर पुलिसिया जांच में लापरवाही को उजागर किया करते थे.

आरटीआई कार्यकर्ता जयंत कुमार.

आरटीआई कार्यकर्ता जयंत कुमार की हत्या पिछले साल कर दी गई.

पिछले साल चार अप्रैल को वैशाली ज़िले के गोरौल थाना क्षेत्र के चकव्यास गांव के वासी आरटीआई कार्यकर्ता जयंत कुमार की हत्या शूटरों की मदद कर दी गई थी. बताया जाता है कि जयंत ने आरटीआई के ज़रिये फ़र्ज़ी दस्तावेज़ के सहारे ज़िले में 25 कर्मचारियों की नियुक्ति को उजागर किया था.

जयंत कुमार की हत्या के करीब ढाई महीने बाद ही 19 जून को मोतीहारी के राजपुर गांव के रहने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट राजेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई थी.

वह मोतिहारी कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के बाद मोटरसाइकिल से घर लौट रहे थे. उसी वक़्त एक सुनसान जगह पर उन्हें गोली मारी गई थी.

राजेंद्र सिंह ने आरटीआई के माध्यम से स्थानीय स्तर पुलिस और शिक्षकों की नियुक्ति में घपले को सामने लाया था. यही नहीं, उन्होंने शौचालय निर्माण योजना और इंदिरा आवास योजना के फंड में हेराफेरी को भी उजागर किया था. उनके आरटीआई के चलते ही कई मामलों को लेकर थाने में शिकायत दर्ज हुई थी.

इस हत्या के दो हफ़्ते के भीतर ही (बीते साल एक जुलाई को) जमुई ज़िले के सिकंदरा थाना क्षेत्र में एक अन्य आरटीआई कार्यकर्ता वाल्मीकि यादव व उसके दोस्त धर्मेंद्र यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

एक के बाद एक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हो रही हत्याएं न केवल सूबे के सुशासन की कलई खोल रही है बल्कि इससे यह भी पता चल रहा है कि निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी जा चुकी हैं. इतनी गहरी कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोग हत्याएं तक कराने से पीछे नहीं हट रहे हैं.

पुलिसिया कार्रवाई

आरटीआई कार्यकर्ता जयंत कुमार की हत्या के मामले की पुलिसिया तहक़ीक़ात में पता चला था कि हत्या का मुख्य आरोपी एक मध्यस्थ को हर साल कुछ रुपये देकर बिहार स्टेट फूड कॉरपोरेशन का ठेका ले लिया करता था. जयंत ने आरटीआई के ज़रिये इस गिरोह के बारे में पुख़्ता तथ्य निकाल लिए थे.

यही नहीं, जयंत ने आरटीआई से अहम सूचनाएं निकाल कर कुछ पुलिस कर्मचारियों, राजनीतिज्ञों व ठेकेदारों को भी बेनकाब किया था. इस हत्याकांड का एक आरोपी अब भी पुलिस की पहुंच से बाहर है.

2008 से लगातार आरटीआई एक्ट का इस्तेमाल कर फ़र्ज़ीवाड़े की सूचना निकाल रहे रोहतास ज़िले के नारायण गिरि पर साल 2016 में कथित रूप से फ़र्ज़ी एफआईआर दर्ज कर गिरफ़्तार कर लिया गया था. दो महीने पांच दिन जेल में बिताने के बाद उन्हें ज़मानत मिली.

2008 से लगातार आरटीआई एक्ट का इस्तेमाल कर फ़र्ज़ीवाड़े की सूचना निकाल रहे रोहतास ज़िले के नारायण गिरि पर साल 2016 में कथित रूप से फ़र्ज़ी एफआईआर दर्ज कर गिरफ़्तार कर लिया गया था. दो महीने पांच दिन जेल में बिताने के बाद उन्हें ज़मानत मिली.

इस संबंध में गोरौल थाने के स्टेशन हाउस अफसर (एसएचओ) अभिषेक कुमार ने कहा, ‘ब्लाइंड केस था. जांच में छह लोगों के नाम सामने आए थे. इनमें से पांच लोग गिरफ़्तार हो चुके हैं. इस मामले में आरोप पत्र जुलाई में ही दाख़िल किया जा चुका है, लेकिन सुनवाई शुरू होनी अभी बाकी है.’

आरटीआई एक्टिविस्ट राजेंद्र सिंह की हत्या के मामले में भी कुछ आरोपी फ़रार चल रहे हैं. उनके दामाद राजेश रंजन ने बताया कि वह अपने प्रखंड में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे थे.

उन्होंने कहा, ‘आरटीआई के माध्यम से वह तमाम योजनाओं में घोटाले को उजागर करते थे और फिर घोटालों को लेकर शिकायत दर्ज कराते थे. शिकायत पर कार्रवाई नहीं होती, तो वह कोर्ट भी चले जाते थे. इन वजहों से वह कई लोगों के निशाने पर थे. पूर्व में उन पर चार बार हमले हो चुके थे. उन्होंने थाने में सुरक्षा की गुहार लगाई थी, लेकिन उन्हें सुरक्षा नहीं दी गई.’

राजेश रंजन ने कहा कि मामले को लेकर आरोप-पत्र दायर हो चुका है, लेकिन अब तक सुनवाई शुरू नहीं हुई है.

आरटीआई कार्यकर्ता वाल्मीकि यादव ने भी आरटीआई के मार्फ़त पंचायत स्तर पर चलने वाली कई योजनाओं में हेराफेरी को उजागर किया था. यही नहीं, उन्होंने पंचायत स्तर पर आंगनबाड़ी सेविकाओं की नियुक्ति में धांधली को भी सामने लाया था.

पुलिस के मुताबिक, वाल्मीकि यादव के आरटीआई आवेदनों के चलते पंचायत स्तर पर कई प्रोजेक्ट रुक गए थे, यह उनकी हत्या की एक वजह हो सकती है. इसके साथ ही व्यक्तिगत रंज़िश की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है.

इस हत्या में स्थानीय मुखिया कृष्णदेव रविदास, सत्ताधारी पार्टी जदयू के ब्लॉक अध्यक्ष सुरेश महतो समेत 9 लोगों को नामज़द किया गया था.

सिकंदरा थाने के एक पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘तीन आरोपित अब भी फरार चल रहे हैं. इनमें से कुछ की संपत्तियां कुर्क की गई हैं.’

इस मामले में पुलिस ने चार्जशीट दाख़िल कर दी है, लेकिन सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है. पुलिस की छानबीन में सभी हत्याओं में एक चीज़ कॉमन मिली है कि इस काम के लिए पेशेवर शूटरों का इस्तेमाल किया गया और उन्हें मोटी रकम दी गई.

फ़र्ज़ी मामले

आरटीआई कार्यकर्ताओं की मानें, तो हत्या भ्रष्टाचारियों का आख़िरी हथियार होता है. इससे पहले फ़र्ज़ी मामलों में फंसाने का खेल होता है.

आरटीआई कार्यकर्ता नारायण गिरि पर वर्ष 2016 में फ़र्ज़ी एफआईआर दर्ज कर गिरफ़्तार कर लिया गया था. दो महीने और पांच दिन जेल में बिताने के बाद उन्हें जमानत मिली.

वह कहते हैं, ‘मुझे जिस मामले में फंसाया गया था, उससे मेरा कोई लेना-देना नहीं था. बल्कि उस दिन मैं पटना में था. एफआईआर दर्ज होने के बाद मैंने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए सारे तथ्य दिए. लेकिन, दो साल बाद मुझे उसी मामले में गिरफ़्तार कर लिया गया.’

मोतीहारी के राजपुर गांव के रहने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट राजेंद्र सिंह की 19 जून 2018 को गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. (फाइल फोटो)

मोतीहारी के राजपुर गांव के रहने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट राजेंद्र सिंह की 19 जून 2018 को गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. (फाइल फोटो)

बताया जाता है कि ऐसे आरटीआई कार्यकर्ताओं की संख्या सैकड़ों में है, जो फ़र्ज़ी मामले झेल रहे हैं.

फ़र्ज़ी मामलों में कई बार जेल जा चुके आरटीआई कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय कहते हैं, ‘पूरे बिहार में 600 से ज़्यादा आरटीआई कार्यकर्ताओं पर झूठे केस दर्ज हैं.’

उन्होंने कहा, ‘जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, वे साज़िश करते हैं कि किसी भी सूरत में सूचना देने से रोका जा सके. सबसे पहले वे मैनेज करना चाहते हैं. जब मैनेज नहीं हो पाता है, तो दबाव बनाने की कोशिश करते हैं. फ़र्ज़ी मामलों में फंसाते हैं. उससे भी बात नहीं बनती है, तो आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले किए जाते हैं.’

पहले आवेदन पर नहीं मिलती सूचना

आरटीआई कार्यकर्ताओं से बातचीत में जो एक अहम बात सामने आई, वो ये थी कि पहले आवेदन पर उन्हें सूचना नहीं मिलती है. आरटीआई कार्यकर्ताओं की मानें, तो महज़ 20 फीसदी मामलों में ही पहले आवेदन पर सूचनाएं मिल जाती हैं. 80 फीसदी मामलों में कई बार अपील करनी पड़ती है.

बहुतेरे मामलों में तो सुनवाई के लिए राज्य सूचना आयोग का दरवाज़ा भी खटखटाना पड़ता है. यही कारण है कि राज्य सूचना आयोग के पास अपीलों का अंबार लगा हुआ है.

छपरा के आरटीआई कार्यकर्ता राधेश कुमार शर्मा कहते हैं, ‘स्थानीय स्तर पर आरटीआई आवेदन का जवाब नहीं मिलने पर मैंने वर्ष 2014-2015 में राज्य सूचना आयोग में अपील की, लेकिन अभी तक सुनवाई की तारीख़ मुझे नहीं मिली है.’

बिहार सूचना आयोग में सूचना आयुक्त रह चुके अरुण कुमार वर्मा ने कहा, ‘मैंने तीन साल चार महीने में 36 हज़ार अपीलों की सुनवाई कर आदेश जारी किया था. इस साल जनवरी में जब मैं रिटायर हुआ था, तो महज़ 294 अपीलें लंबित थीं.’

वर्मा ने आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या व फ़र्ज़ी मुक़दमा दर्ज करने पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा, ‘यह बहुत अफसोस की बात है. आरटीआई कार्यकर्ताओं को सुरक्षा देने की ज़रूरत है.’

कई आरटीआई कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कि वे जो सूचना मांगते हैं, वे न देकर अनर्गल सूचनाएं उन्हें दे दी जाती हैं और वह भी कई अपीलों के बाद.

आरटीआई कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय कहते हैं, ‘दरअसल, सिस्टम की कोशिश है कि आरटीआई के ज़रिये सूचना लेने की प्रक्रिया को इतना कठिन कर दिया जाए कि आरटीआई कार्यकर्ताओं का मनोबल नीचे गिर जाए और वे सूचनाएं न मांगें.’

इस संबंध में सरकार का पक्ष जानने के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय को सवालों की सूची मेल की गई है. सवालों का जवाब आने पर स्टोरी अपडेट कर दी जाएगी.

सिस्टम निष्क्रिय

गौरतलब है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के लागू होने के बाद वर्ष 2006 में राज्य सूचना आयोग का गठन हुआ था. उस वक्त नीतीश सरकार भी इस एक्ट को लेकर गंभीर थी. बाद के वर्षों में आरटीआई कार्यकर्ताओं की सहूलियत के लिए कई सुविधाएं शुरू की गईं.

Patna: Bihar Chief Minister Nitish Kumar speaks to the media during Lok Samvad programme, in Patna, Monday, Jan. 7, 2019. (PTI Photo) (PTI1_7_2019_000059B)

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. (फोटो: पीटीआई)

मसलन, वर्ष 2007 में बिहार सरकार ने ‘जानकारी’ प्रोजेक्ट के तहत कॉल सेंटर खोला था, जहां कॉल कर आरटीआई आवेदक सूचनाएं मांग सकते थे. यही नहीं, इस कॉल सेंटर में ही पहली और दूसरी अपील भी दायर करने की व्यवस्था थी. उस वक़्त बिहार इकलौता राज्य था, जहां यह अनोखी व्यवस्था शुरू हुई थी. इसके लिए 2009 में बिहार सरकार को पुरस्कार भी मिला था.

यह व्यवस्था आरटीआई कार्यकर्ताओं के लिए काफी फायदेमंद साबित हुई थी और महज़ दो वर्षों में 22,600 फोन कॉल आए थे. लेकिन, लंबे समय से यह कॉल सेंटर बंद है.

यही नहीं, वर्ष 2013-2014 में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये अपीलों की सुनवाई की व्यवस्था शुरू की गई थी, ताकि दूरदराज़ के इलाकों में रहने वाले आरटीआई कार्यकर्ताओं को पैसा और समय बर्बाद कर राजधानी पटना न आना पड़े.

इसके साथ ही वर्ष 2009 में ही सरकार ने आवेदन में प्रगति की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराने के लिए एक वेबसाइट भी तैयार की थी.

आरटीआई कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि ये सारी सुविधाएं लंबे समय से ठप हैं.

एक तरफ आरटीआई कार्यकर्ताओं की हो रही हत्याएं, दूसरी तरफ सूचनाएं देने में लेटलतीफी व ठप व्यवस्था और इन सबके बीच सरकार की लंबी ख़ामोशी बिहार में आरटीआई के सिपाहियों के लिए बुरे दिनों का संकेत तो नहीं है?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)