राजनीति

भाजपा के दस साल के कामकाज से नाखुश होने के बाद भी जनता ने उसे क्यों चुना?

दिल्ली नगर निगम चुनाव से पहले लगभग सभी ओपीनियन पोल में जनता भाजपा शासित एमसीडी के कामकाज से नाखुशी जताते हुए भी वोट भाजपा को ही देने की बात कर रही थी.

BJP-mcd reuters

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) चुनाव में भाजपा को मिली जीत बिल्कुल अप्रत्याशित है. अप्रत्याशित इस संदर्भ में कि बीजेपी पिछले दस साल से एमसीडी पर काबिज है. इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद जनता के मन में शिकायतें पैदा होती हैं.

यह बात भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी बखूबी समझ रहा था. इसीलिए उसने इस बार अपने किसी भी पार्षद को टिकट नहीं दिया. यही नहीं पार्षदों के रिश्तेदारों को भी टिकट नहीं मिला. इतनी लंबी एंटी इनकंबेंसी के बावजूद भाजपा ने यह जीत हासिल की है तो इसके मायने क्या हैं?

सबसे पहले चर्चा दिल्ली के नीर-क्षीर विवेकी मतदाता की. अगर पिछले तीन चुनावों को देखें तो दिल्ली के मतदाताओं का मूड तेजी से स्विंग हो रहा है. लोकसभा चुनाव में भाजपा, विधानसभा चुनाव में आप और फिर एमसीडी चुनाव में भाजपा को जनता ने बहुमत दिया है.

इस बार जितने ओपीनियन पोल हो रहे थे उसमें गजब के विरोधाभासी तथ्य सामने आ रहे थे. एमसीडी के कामकाज से जनता नाखुश थी लेकिन वोट भाजपा को देने की बात कर रही थी. आखिर दिल्ली के विवेकशील मतदाता इतने भ्रम में क्यों थे?

अगर एमसीडी में भाजपा का कामकाज पसंद नहीं था तो कांग्रेस, आप, जदयू, बसपा, स्वराज अभियान समेत अन्य दलों पर वो भरोसा क्यों नहीं जता रहे थे?

इसका कारण समझने के लिए चुनाव के लिए बनाई गई सभी दलों की रणनीति पर नजर डालना होगा. अगर हम देखें तो यह चुनाव कोई भी राजनीतिक दल स्थानीय मुद्दों पर नहीं लड़ रहा था.

साफ-सफाई, डेंगू-चिकनगुनिया, सड़क-अस्पताल और जलभराव से ज्यादा इस चुनाव को कांग्रेस, भाजपा और आप ने अपने वर्चस्व की लड़ाई बना दिया था. यह सभी राजनीतिक दलों की चालाकी और नाकामी दोनों थी लेकिन फायदा भाजपा को मिला.

‘उन्मादी राष्ट्रवाद’ की जो लहर भाजपा ने इस चुनाव में फैलाई उसने जीत की राह को आसान बनाया. जरूरी मुद्दों पर बात न करके भावनाओं पर वोट लेने की कला में भाजपा अभी बाकी दलों से कोसों आगे हैं. एमसीडी चुनाव में बढ़त के तुरंत बाद भाजपा ने अपनी जीत को छत्तीसगढ़ में मारे गए जवानों को समर्पित कर दिया.

यह बाकी दलों की नाकामी थी कि वो जनता का ध्यान भाजपा के दस साल के शासनकाल के भ्रष्टाचार पर नहीं दिला पाए. कांग्रेस जहां नेताओं की गुटबाजी से नहीं उबर पाई तो वहीं दूसरी ओर आप का पूरा ध्यान ईवीएम पर रहा.

अगर एमसीडी के चुनाव को राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा जा रहा था तो कश्मीर में हिंसा, किसानों की आत्महत्या, नोटबंदी के बाद बढ़ी बेरोजगारी, नक्सली हिंसा जैसे तमाम राष्ट्रीय मुद्दों को सही संदर्भ में पेश कर पाने में विरोधी दल असफल रहे.

इसके अलावा भाजपा मतदाताओं के दिमाग में यह बात डालने में सफल रही कि यदि एमसीडी में उनका बहुमत रहेगा तो केंद्र में उनकी सरकार होने के वजह से कामकाज बेहतर ढंग से होगा. विधानसभा चुनाव में आप की जीत के बाद से लगातार टकराव के हालात बने हुए हैं.

दिल्ली में प्रशासन की तिकड़मी व्यवस्था ने इस बात में उनकी मदद की. साथ ही अरविंद केजरीवाल और एलजी के बीच टकराव की खबरों सोने पर सुहागा साबित हुई.

सबसे बड़ी बात यह चुनाव भाजपा ने मोदी के नाम पर लड़ा. हाल में पांच राज्यों में मिली जीत ने इसमें मनोवैज्ञानिक भूमिका निभाई. जहां मतदाताओं को लग रहा था कि भाजपा को हराना मुश्किल है तो वहीं बाकी दल मोदी के तीन साल के कामकाज की नाकामी बताने मेें असफल रहे.

वहीं दूसरी ओर इस छोटे चुनाव में बसपा, जेडीयू, स्वराज अभियान जैसी पार्टियां परिदृश्य से लगभग गायब हो गईं. पिछले चुनाव में बसपा को करीब 18 सीटें एमसीडी चुनाव में मिली थी.

स्वराज अभियान से इस बार बड़ी उम्मीदें थी. जदयू ने भी बिहारी वोटरों पर नजर गड़ाई हुई थी. मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए ओवैसी की पार्टी भी मैदान में थी. लेकिन इन पार्टियों को सफलता नहीं मिली.

हालांकि इस चुनाव परिणाम से अभी तीन बातें साफ निकलकर सामने आ रही हैं. पहली आम आदमी पार्टी की दो साल पहले शुरू की गई कथित शुचितावादी राजनीति का दौर खत्म हो रहा है. उन्हें अपनी चुनावी रणनीति में तुरंत बड़े बदलाव की जरूरत है.

दूसरी बात कांग्रेस के लिए है. उनके नेता यह दावा कर रहे है कि एमसीडी चुनाव में उनको मिली सीटें बताती हैं कि अब भी जनता में उनके लिए विश्वास बना हुआ है. विधानसभा चुनावों में जहां उनका सूपड़ा साफ हो गया था. पर यह उनके लिए सबक देने वाला परिणाम हैं. जहां चार साल पहले आई पार्टी मुख्य विपक्षी की भूमिका निभा रही हैं, वही इतनी पुरानी पार्टी और लंबे समय दिल्ली पर शासन करने के बाद उनकी हालत यह हो गई है.

तीसरी बात भाजपा के लिए हैं. अभी दिल्ली ही नहीं देश केे बड़े हिस्से में उसका नशा चढ़ा हुआ है. उसे मिल रही भारी सफलता यह बता रही है कि वोटर उससे ‘बड़ी उम्मीद’ लगाए बैठे हैं.

अगर उन्हें अपेक्षित परिणाम दे पाने में वो नाकाम रहे तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आप को मिली पराजय उनके लिए उदाहरण का काम करेगी. फिलहाल अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने एक बार फिर साबित किया है कि अभी उनके मुकाबले में कोई नहीं है. उनकी रणनीति का कोई तोड़ विपक्षियों के पास नहीं है.