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क्यों भारत ने 1971 के युद्ध के बाद 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा किया था

1971 में पाकिस्तान के सरेंडर के बाद इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी चिंता मुजीबुर्रहमान की हिफ़ाज़त थी. पाकिस्तानी युद्धबंदियों की रिहाई वो क़ीमत थी, जो उन्होंने इस बांग्लादेशी नेता की सुरक्षित वापसी के लिए ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को चुकाई थी.

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1971 में बांग्लादेश में पाकिस्तानी सैनकों का सरेंडर (फोटो साभार: bdnews24.com)

2 अगस्त, 1972 को, यानी 16 दिसंबर, 1971 को भारत-पाकिस्तान के बीच 13 दिन चले युद्ध की समाप्ति के आठ महीने के बाद- दोनों देशों ने शिमला समझौते पर दस्तखत किए जिसमें भारत ने युद्ध के दौरान हिरासत में लिए गए सभी 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा करने का फैसला किया.

युद्धबंदियों को रिहा करने के इस फैसले ने विवाद को जन्म दिया और भारत में कई लोगों ने यह सवाल उठाया कि आखिर क्यों प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कश्मीर की समस्या का समाधान भारतीय शर्तों पर करने के एक सुनहरे अवसर को यूं ही हाथ से जाने दिया.

युद्धबंदियों को रिहा करने के लिए श्रीमती गांधी को किस चीज ने प्रेरित किया? पर्दे के पीछे क्या चला था? क्या कोई ऐसी न टाली जा सकनेवाली स्थितियां थीं, जिनके बारे में लोगों को पता नहीं था? अगर ऐसी कोई बात थी, तो आदर्श स्थिति यह होगी कि उन्हें सार्वजनिक दायरे में लाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां इतिहास की एक सीख का फायदा उठा सकें.

चूंकि मैं निजी तौर पर इस घटनाक्रम का राजदार था, एक सेवानिवृत्त राजनयिक के तौर पर मैं वह कहानी सुना सकता हूं, भले ही उस घटना को हुए 40 से ज्यादा साल बीत चुके हैं.

16 दिसंबर, 1971- यानी उस दिन जब पाकिस्तानी सेना ने ढाका में आयोजित सरेंडर के कार्यक्रम में भारतीय सेना और बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी की संयुक्त कमान के सामने आत्मसमर्पण किया- भारतीय और बांग्लादेश के सैन्य इतिहास का सर्वाधिक यादगार पल बन गया.

इसमें एक सेना पुरानी थी और एक बिल्कुल नई. लेकिन, जिस वक्त दोनों सेनाएं, एक कभी भी बाज न आनेवाले दुश्मन के ख़िलाफ़ अपनी सैन्य जीत का जश्न मना रही थीं, श्रीमती गांधी भारत के सामने मौजूद एक गंभीर मसले को लेकर सोच में डूबी हुई थीं.

भारत को युद्ध पर हुए भारी खर्चे का तो सामना करना ही था, साथ ही पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए भयावह अत्याचारों- जिसे सामान्य तौर पर 1971 के बांग्लादेश नरसंहार के तौर पर जाना जाता है- के कारण पूर्वी पाकिस्तान से भाग कर भारत आए 1 करोड़ शरणार्थियों की देखभाल के आर्थिक बोझ को भी उठाना था.

दूसरी बड़ी चुनौती युद्धबंदी बनाए गए 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों की देखभाल की थी. यह चुनौती राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मसले से संबद्ध होने के कारण काफी जटिल थी, साथ ही काफी सावधानी बरतने की मांग करती थी.

यह एक अचानक आ गई अप्रत्याशित जिम्मेदारी थी, जिसके खर्चे का पहले से कोई अनुमान नहीं लगाया था. भारत चाहता था कि पाकिस्तानी सैनिकों को जिनेवा संधि के प्रावधानों से भी ज्यादा आरामदेह स्थिति में रखा जाए.

इंदिरा गांधी के लिए सबसे बड़ी चिंता यह थी कि बांग्लादेशी नेता शेख मुजीबुर्रहमान को उनके देश जीवित और सकुशल कैसे लाया जाए. वे उनकी जिंदगी को बचाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार थीं.

प्रधानमंत्री ने अपने तथाकथित ‘किचेन कैबिनेट’ के कम से कम एक व्यक्ति के साथ यह बात साझा की थी. ये व्यक्ति, राम नाथ काव थे, जो कि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के प्रमुख थे. वे इस तथ्य से भली-भांति परिचित थीं कि मुजीब पर एक पाकिस्तानी सैन्य अदालत में मुकदमा चलाया गया था और देशद्रोह के आरोप में इस बांग्लादेशी नेता को फांसी की सजा सुनाई गई थी.

साथ ही जैसा कि पाकिस्तानी सेना की विशेषता है, उसकी सुरक्षा एजेंसियों ने हद दर्जे के ओछेपन का प्रदर्शन किया. मुजीबुर्रहमान की जेल की कोठरी में एक 6.5 फीट की कब्र खोद दी गई थी, जिसके एक सिरे पर फांसी का फंदा लटक रहा था- जो इस बात की चेतावनी था कि वे किसी भी क्षण क्रूर मौत का शिकार हो सकते हैं.

अगर पाकिस्तानी सेना मुजीबुर्रहमान को मौत की सजा की तामील कर देती, तो यह श्रीमती गांधी के लिए किसी दुःस्वप्न सरीखा होता और दूसरी तरफ यह बांग्लादेश को अनाथ हाल में छोड़ देता.

भारत के लिए, जिसने बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष का समर्थन पूरे दिलोजान से किया था, मुजीब की फांसी एक कभी भी भरपाई न की जा सकनेवाली विपदा, एक सपने के टूट जाने की तरह होती इसलिए मुजीब की जिंदगी को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करना भारत के हित में था- मुजीब के लिए, मुजीब के परिवार के लिए, बांग्लादेश के लिए और अपने लिए.

दूसरी तरफ अपने कट्टर दुश्मन भारत के हाथों मिली हार को पाकिस्तान के राष्ट्रत्व के लिए असहनीय अपमान के तौर पर देखा गया. पाकिस्तान के लिए इससे भी ज्यादा असहनीय अपना आधा भूक्षेत्र बांग्लादेश के हाथों गंवा देना था, जिसने मोहम्मद अली जिन्ना के दो राष्ट्र के सिद्धांत- जो कि पाकिस्तान के अस्तित्व का वैचारिक आधार था- को दरका दिया था.

इसका नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह याहया खान ने अचानक लिए गए फैसले में इस राष्ट्रीय आपदा की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए इस्तीफा दे दिया. उन्होंने ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को, जो उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में हिस्सा ले रहे थे, वापस आने को कहा.

भुट्टो को याहया खान ने यह भी बताया गया कि उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है कि और उन्हें (भुट्टो को) पाकिस्तान का चीफ मार्शल लॉ प्रशासक नियुक्त किया गया है. लेकिन, भुट्टो को यह निर्देश दिया गया कि रावलपिंडी के लिए फ्लाइट लेने से पहले वे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन, जो उस समय पाकिस्तान के संरक्षक थे, से वाशिंगटन डीसी में मुलाकात कर लें.

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शेख़ मुजीबुर्रहमान और इंडिया गांधी (ऊपर बाएं से) ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो, डीपी धर और लंदन से ढाका की एक फ्लाइट में मुजीबुर्रहमान के साथ सशांक बनर्जी (नीचे बाएं से) (फोटो साभार: विकिमीडिया, यूट्यूब और सशांक बनर्जी)

ग्रैंड फाइनल और अप्रत्याशित रोमांच

भुट्टो की वाशिंगटन -रावलपिंडी फ्लाइट को ईंधन भरवाने के लिए लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर थोड़ी देर के लिए रुकना था. भुट्टो की वतन वापसी के बारे में अंदरूनी जानकारी मिलने के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने साउथ ब्लॉक के अपने दफ्तर में अपने वॉर कैबिनेट की एक आपातकालीन बैठक बुलाई.

इंदिरा गांधी किसी भी कीमत पर एक ऐसा संपर्क चाहती थीं, जो हीथ्रो पर भुट्टो के उतरने के वक्त वहां मौजूद रहे ताकि उन्हें उस समय भारत के हिसाब से यह बेहद जरूरी जानकारी मिल सके कि पाकिस्तान के सैन्य कोर्ट द्वारा मुजीबुर्रहमान को मौत की सजा दिए जाने के बारे में भुट्टो की सोच क्या है?

इस बैठक में विदेश मंत्रालय में हेड ऑफ पॉलिसी प्लानिंग दुर्गा प्रसाद धर; रॉ प्रमुख रामनाथ काव; प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीएन हक्सर और विदेश सचिव टीएन कॉल मौजूद थे.

श्रीमती इंदिरा गांधी के निर्देश पर पूर्वी पाकिस्तान के भूतपूर्व मुख्य सचिव मुज़फ्फ़र हुसैन, जो कि 16 दिसंबर, 1971 तक ढाका में तैनात सबसे आला रैंक के लोकसेवक थे, और जो फिलहाल भारत के युद्धबंदी थे, डीपी धर के आधिकारिक निवास में वीआईपी अतिथि के तौर पर रखे गए थे.

उनकी पत्नी लैला, जो 3 दिसंबर, 1971 को युद्ध छिड़ जाने के वक्त लंदन में थीं, वापस घर नहीं आ सकीं थीं और वहीं लंदन में फंसी हुई थीं. ये पति-पत्नी (दिल्ली में और लंदन में) राजनयिक चैनलों से आपस में संपर्क में थे. मुझे वीआईपी संदेशवाहक का काम सौंपा गया था. दोनों के बीच संदेशवाहक का काम करने के चलते मैंने जल्दी ही लैला हुसैन के सामने एक काम लायक छवि बना ली.

प्रधानमंत्री इस बात से अच्छी तरह वाकिफ़ थीं कि लैला और भुट्टो लंबे समय तक अंतरंग मित्र रहे हैं और दोनों के बीच दोस्ती आज भी बरकरार है. पीएमओ की यह राय बनी कि वे वीआईपी लॉउंज, हीथ्रो एयरपोर्ट के अलकॉक एंड ब्राउन सुइट में, अपने तरह के अकेले राजनयिक शिखर सम्मेलन में एक अहम किरदार निभा सकने की स्थिति में हैं.

मैं लंदन में नौ महीनों- 25 मार्च, 1971 से 16 दिसंबर, 1971 के बीच, यानी जब बांग्लादेश का मुक्ति संघर्ष चल रहा था, कई दफे धर से मिला था. इसी दौरान हमारे बीच मित्रता हुई. वे एक विनम्र और साहित्यिक व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे, जिन्हें उर्दू शायरी का काफी अच्छा ज्ञान था.

हैदराबाद की ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के जमाने से ही उर्दू शायरी के प्रति मेरा लगाव हमारी आधिकारिक स्थिति में बड़े अंतर के बावजूद हम दोनों की अप्रत्याशित मित्रता की वजह बना. जहां डीपी एक कैबिनेट मंत्री थे, मैं बस एक नौकरशाह था.

जिस दिन भुट्टो लंदन पहुंचनेवाले थे, उससे महज दो दिन पहले, मुझे दिल्ली से डीपी का एक टेलीफोन कॉल आया. वे चाहते थे कि मैं लैला को इस बाबत सूचना दूं कि भुट्टो को पाकिस्तान का चीफ मार्शल लॉ प्रशासक नियुक्त किया गया है और वे वाशिंग्टन से इस्लामाबाद जाने के रास्ते में हैं और उनकी फ्लाइट ईंधन भरवाने के लिए हीथ्रो एयरपोर्ट पर रुकेगी.

मुझे लैला को भुट्टो से मिलने के लिए राजी करना था. लैला इस बात से भली-भांति वाकिफ़ थीं कि मुझे अतीत में उनके और भुट्टो के संबंध के बारे में जानकारी है. बातचीत कैसे आगे बढ़ेगी, यह देखना हमारे लिए काफी दिलचस्पी भरा था.

भारत की दिलचस्पी सिर्फ एक बात जानने में थी: रहमान के बारे में भुट्टो की सोच क्या थी, क्या वे उन्हें घर वापसी के लिए रिहा करने के बारे में सोच रहे थे या सैन्य अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा की तामील किए जाने के बारे में सोच रहे थे.

मैं उन दोनों के बीच मुलाकात तय कराने में कामयाब रहा. काफी अरसे से बिछड़े हुए दो दोस्त, लैला और भुट्टो हीथ्रो एयरपोर्ट के वीआईपी लॉउंज में मिले. यह मुलाकात काफी दोस्ताना और यथासंभव खुशनुमा रही. इस बात में कोई शक नहीं है कि पिछले दरवाजे से करवाई गई यह मुलाकात ऐतिहासिक महत्व की साबित हुई. यह सचमुच में किसी रोमांच पटकथा के क्लाइमेक्स जैसी थी.

भुट्टो ने चीजों को भांपने में देरी नहीं की. जहां उन्होंने भारत की हिरासत से अपने पति को छुड़ाने में मदद करने लैला की अपील पर प्रतिक्रिया दी, वहीं वे यह समझने से भी नहीं चूके कि ये महिला वास्तव में भारत सरकार की तरफ से काम कर रही है.

भुट्टो की आंखों में चमक आ गई और उन्होंने विषय बदल दिया. फिर लैला को एक तरफ ले जाते हुए फुसफुसाते हुए उनके कानों में भारत के प्रधानमंत्री के लिए काफी संवेदनशील, अतिगोपनीय संदेश कहा. लैला ने मुझे जैसा बताया, उसे मैं यहां दोहरा रहा हूं :

‘लैला मुझे मालूम है कि तुम क्या चाहती हो. मैं यह कल्पना कर सकता हूं कि तुम श्रीमती इंदिरा गांधी की [दरख्वास्त लेकर] आयी हो. तुम उन तक यह संदेश जरूर से पहुंचाओ कि वतन वापसी पर पद संभालने के बाद मैं मुजीबुर्रहमान को रिहा कर दूंगा और उन्हें अपने घर लौटने की इजाजत दूंगा. इसके बदले में मैं क्या चाहता हूं, यह मैं श्रीमती इंदिरा गांधी को किसी दूसरे रास्ते बताऊंगा. अब तुम जा सकती हो.’

मुलाकात के बाद लैला ने मुझे भुट्टो के संदेश के बारे में बताया और मैंने बिना कोई समय गंवाए दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय को एक गोपनीय संदेश भेजा, जिसमें लैला द्वारा दी गई जानकारी का जिक्र था.

उम्मीद के मुताबिक़ श्रीमती गांधी को इस बात की थोड़ी तसल्ली हुई कि भुट्टो की तरफ से, अनौपचारिक रास्ते से ही सही, सकारात्मक संदेश आया था. हालांकि, वे इस बात को लेकर सशंकित थीं कि क्या भुट्टो पर यकीन किया जा सकता है?

प्रधानमंत्री काफी सावधानी के साथ आशावादी थीं. क्या भुट्टो भारत को भटकाने की कोशिश कर रहे हैं? क्या वे किसी शरारतपूर्ण इरादे से झूठा वादा कर रहे हैं? वे जितनी जल्दी हो सके, पाकिस्तान में हमारे राजनयिक मिशन से लैला द्वारा मुहैया कराई गई सूचना की पुष्टि चाह रही थीं.

इसी बीच कुछ घंटों के भीतर ही, इस्लामाबाद से एक रिपोर्ट आयी, जो लैला की बात की प्रामाणिकता पर मुहर लगानेवाली थी. इस मुकाम पर श्रीमती गांधी ने चीजों को अपने हाथ में ले लिया और बातचीत को नौकरशाहों के स्तर से राजनीतिक स्तर तक उठा दिया.

अपने स्तर से गांधी को इस बात की जानकारी मिली थी कि रहमान पहले लंदन में उतरेंगे, उसके बाद वहां से ढाका की सीधे या वाया दिल्ली उड़ान भरेंगे. अपने किचन कैबिनेट के एक सदस्य के साथ उन्होंने इस बात को साझा किया कि उनके पास इस बात की पुख्ता सूचना है भुट्टो रहमान की रिहाई के बदले में क्या चाहते हैं.

भुट्टो के पास रहमान को पहले रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. युद्धबंदियों का सवाल इसके बाद आता था. जाहिर है भुट्टो, श्रीमती गांधी की शालीनता पर भरोसा कर रहे थे कि वे उन्हें निराश नहीं करेंगी. यह नजर आने लगा था कि इंदिरा गांधी ने निश्चय कर लिया है.

अगर भुट्टो व्यक्तिगत तौर पर उनसे युद्धबंदियों को रिहा करने के लिए कहेंगे तो वे इसे स्वीकार करने में नहीं हिचकेंगीं. भलमनसाहत के प्रदर्शन का जवाब उसके उपयुक्त शिष्टाचार से दिया जाना चाहिए. इससे कुछ भी कम नहीं.

एक भू-राजनीतिक भलमनसाहत का प्रदर्शन करते हुए भुट्टो (हकीकत में आईएसआई) ने रावलपिंडी के एक सैन्य कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सजा को पलट दिया और 8 जनवरी, 1972 को मुजीबुर्रहमान को रिहा कर दिया. वापस लौटकर मुजीब ने 10 जनवरी, 1972 को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली.

नवनिर्मित बांग्लादेश राष्ट्र के जन्मदाता मुजीबुर्रहमान को जीवनदान के लिए सच्ची कृतज्ञता का प्रदर्शन करते हुए, उन्हें रिहा करने के आठ महीने के बाद, भारत ने 2 अगस्त, 1972 के शिमला समझौते के तहत 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों की रिहाई का आदेश दिया.

युद्धबंदियों के मसले पर पाकिस्तान के साथ भारत का जैसा जो बर्ताव रहा, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शिष्टाचार का वैसा ऐसा प्रदर्शन दुनिया के लिए एक अनजानी चीज थी.

POW Bangladesh War

1972 में एक रेड क्रॉस प्लेन से 124 पाकिस्तानी नागरिक और युद्धबंदी अपने देश पहुंचे थे. (फोटो साभार: © ICRC/François Musy)

तीन साल आठ महीने के बाद, 15 अगस्त, 1975 को एबटाबाद में प्रशिक्षित सैन्य अधिकारियों द्वारा, जो उस समय बांग्लादेश की सेना में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत थे, मुजीबुर्रहमान और उनके परिवार की बर्बर हत्या एक तरह से आईएसआई द्वारा बांग्लादेश का बदला था.

आईएसआई पाकिस्तान की क्षेत्रीय अखंडता को खंडित करने में भूमिका के लिए इस बांग्लादेशी नेता को कठोर सजा देना चाहता था. 8 जनवरी, 1972 को मियांवाली जेल से उनकी रिहाई बस एक भटकाव था.

भारत के लिहाज से देखें, तो कश्मीर समस्या का समाधान नहीं निकला; पाकिस्तान ने आखिरकार भारत के खिलाफ एक कभी न खत्म होनेवाला छद्म युद्ध छेड़ा, जो 45 सालों से चल रहा है और आज तक खत्म नहीं हुआ है.

हजारों जानें जा चुकी हैं. खून की धार कभी बंद नहीं हुई, आंसुओं का बहना कभी बंद नहीं हुआ.

मैं अपनी बात को अबु सईद चौधरी, जो बाद में बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने, के कथन से खत्म करूंगा. 16 दिसंबर, 1971 को श्रीमती इंदिरा गांधी को संबोधित एक कड़े शब्दों में लिखे गए ख़त में उन्होंने गांधी को इस बात की चेतावनी दी कि अगर वे पश्चिमी मोर्चे पर एकतरफा युद्ध विराम करने का फैसला करेंगी, तो इसके गंभीर नतीजे भुगतने पड़ेंगे.

उन्होंने कहा कि यह बांग्लादेश युद्ध का एक अधूरा अध्याय साबित होगा. उनकी आखिरी चंद पंक्तियां थीं, ‘जब कोबरा की पूंछ को काट दिया जाता है, तब उसका फन दस गुना ज्यादा जहरीला हो जाता है.’

यह ख़त प्रधानमंत्री की मेज पर एक दिन देर से पहुंचा.

सशांक एस. बनर्जी 1971-72 के दौरान भारतीय मिशन में राजनयिक के तौर पर तैनात थे. अन्य किताबों के अलावा वे इंडिया, मुजीबुर्रहमान, बांग्लादेश लिबरेशन एंड पाकिस्तान : अ पॉलिटिकल ट्रीटीज के भी लेखक हैं, जिसका प्रकाशन, 2011 में अमेरिका में हुआ. उन्हें अक्टूबर 2013 में उन्हें बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना द्वारा बांग्लादेश के राजकीय सम्मान ‘फ्रेंड ऑफ बांग्लादेश लिबरेशन वॉर’ से सम्मानित किया गया है.

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