भारत

पिछले पांच सालों में सिर्फ चार गोकुल ग्राम बनाए गए, 14 फीसदी पशुओं को ही मिला हेल्थ कार्ड

मोदी सरकार के दावे और उनकी ज़मीनी हकीकत पर विशेष सीरीज: गोकुल ग्राम योजना देसी गायों के संरक्षण, देसी गायों के नस्लों के विकास, दुग्ध उत्पादन बढ़ाने, पशु उत्पाद की बिक्री आदि समेत कई लक्ष्यों के लिए शुरू की गई थी.

फोटो: पीटीआई

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भाजपा के नेतृत्व वाली मौजूदा केंद्र सरकार गायों के संरक्षण के लिए एक योजना बनाती है और गोकुल ग्राम बनाने का लक्ष्य तय करती है तो कायदे से पांच साल में कितने गोकुल ग्राम बन जाने चाहिए थे? 20, 50, 100, 200. लेकिन, पांच साल में सरकार ने सिर्फ चार गोकुल ग्राम बनाए. अब ये गोकुल ग्राम है क्या, इसकी जानकारी आगे साझा करेंगे.

फिलहाल, थोडा फ्लैशबैक में जाकर उस ऐतिहासिक भाषण को याद कीजिए. दो अप्रैल 2014 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में दिए अपने चुनावी भाषण में पिंक रिवोल्यूशन (गुलाबी क्रांति) का मुद्दा उठाया था और इसी बहाने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को कठघरे में खड़ा किया था, तब देश को उम्मीद थी कि अब भारत की गायों के भी अच्छे दिन आ जाएंगे.

लोगों को यह भी यकीन हो चला था कि जो भारत बीफ एक्सपोर्ट में दुनिया के नंबर वन देशों में गिना जाता है, उस भारत में अब बीफ एक्सपोर्ट में कमी आएगी. ये अलग बात है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भाजपा के सत्ता में आने के बाद से भारत बीफ एक्सपोर्ट के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ता गया.

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बहरहाल, तकरीबन पांच साल पहले की बात को याद रखते हुए आज की स्थिति पर चर्चा करते है. मौजूदा केंद्र सरकार की ऐसी कौन-सी योजना है, जिसके बारे में आप सुधी पाठक नहीं जानते? शायद ऐसी कोई योजना नहीं है, जिसका नाम आपने नहीं सुना होगा.

जाहिर है, जब एक-एक योजना के विज्ञापन पर सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही हो तो आपको मजबूरन नाम तो सुनना ही पड़ेगा. जैसे जनधन, उज्ज्वला, स्वच्छ भारत, स्किल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, मुद्रा लोन. ये ऐसे नाम हैं, जिससे कई सारे भारतीय परिचित हैं.

लेकिन, इस अध्याय में हम एक ऐसी योजना पर चर्चा करेंगे, जिसका नाम सुन कर आपको गूगल की मदद लेनी होगी, यह जानने के लिए कि आख़िर यह योजना लॉन्च कब हुई, क्यों हुई, किसने की और आपको यह भी आश्चर्य होगा कि आख़िर इसका विज्ञापन क्यों नहीं दिखता.

इस योजना का नाम है, राष्ट्रीय गोकुल मिशन. जुलाई 2014 में ही कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने राष्ट्रीय गोकुल मिशन लॉन्च किया था. इस योजना की तकनीकी बारीकियां और विस्तृत जानकारी के साथ ही हम आपको इसकी वस्तुस्थिति से भी अवगत करा रहे हैं.

पांच साल, 835 करोड़ रुपये, 4 गोकुल ग्राम

यह योजना देसी गायों के संरक्षण, देसी गायों की नस्लों के विकास, दुग्ध उत्पादन बढ़ाने, पशु उत्पाद की बिक्री आदि समेत कई लक्ष्यों के लिए शुरू की गई थी.

26 नवंबर 2018 को सूचना का अधिकार कानून के तहत कृषि मंत्रालय के अधीन पशुपालन विभाग ने जो सूचना उपलब्ध कराई है, उसके मुताबिक, मंत्रालय की तरफ से इस मिशन के लिए पिछले पांच साल में तकरीबन 835 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके है.

वित्त वर्ष 2014-15 में 159.4 करोड़ रुपये, 2015-16 में 81.77 करोड़ रुपये, 2016-17 में 104.5 करोड़ रुपये, 2017-18 में 190 करोड़ रुपये और 2018-19 में 301.5 करोड़ रुपये जारी किए गए.

अब सवाल है कि तकरीबन 800 करोड़ रुपये से काम क्या हुआ? क्या देश में कोई ठोस गो-नीति बन सकी, जिससे प्रधानमंत्री मोदी  का सपना (पिंक रिवोल्यूशन के ख़िलाफ़) पूरा हो सके? तो इसका भी जवाब इसी दस्तावेज़ में है. सूचना का अधिकार कानून के तहत जानकारी दी गई कि 26 नवंबर 2018 तक पूरे देश में सिर्फ चार गोकुल ग्राम बनाए जा सके है.

ये चार गोकुल ग्राम वाराणसी, मथुरा, पटियाला और थतवाड़े (पुणे) में बनाए गए हैं. वैसे तो इस मिशन को जब लॉन्च किया गया था तब 13 राज्यों में पीपीपी मॉडल के तहत 20 गोकुल ग्राम बनाने की बात की गई थी और इसके लिए 197.67 करोड़ रुपये का बजट भी रखा गया था. इसमें से 68 करोड़ रुपये जारी भी कर दिए गए थे, लेकिन 26 नवंबर 2018 तक सिर्फ ऊपर दिए गए चार स्थानों पर ही गोकुल ग्राम का निर्माण हो पाया था.

दिलचस्प तथ्य ये है कि ख़ुद राष्ट्रीय गोकुल मिशन के दस्तावेज़ बताते हैं कि 2012-13 में देशभर में 45 मिलियन देसी नस्ल के (4.5 करोड़) दुधारू पशु हैं, जो 59 मिलियन टन दूध देते हैं. हालांकि, जुलाई 2018 तक ये आंकड़ा 90 मिलियन यानी 9 करोड़ हो गया.

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आरटीआई के तहत प्राप्त की गई जानकारी.

ज़ाहिर है, इसमें गाय और भैंस दोनों की गणना शामिल होगी. गोकुल ग्राम की स्थापना की एक अनिवार्य शर्त ये है कि 60 फीसदी गायें दुधारू और 40 फीसदी गायें बिना दूध देने वाली, बीमार और बूढ़ी होनी चाहिए.

तो यहां समझने वाली बात ये है कि चार गोकुल ग्राम में कितनी ऐसी गायों को आश्रय दिया गया होगा?

वैसे इस मिशन में यह भी प्रावधान है कि गोपालन संघ को सरकारी सहायता दी जाएगी यानी गोशाला चलाने वाली संस्थाओं को भी सरकारी पैसा दिए जाने की बात इस मिशन में है.

लेकिन, गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा चलाई जा रही गोशालाओं की हालत क्या है, वहां बीमार व बूढ़ी गायों की कैसी देखभाल होती है, इसका नमूना जयपुर की गोशाला में मरती गायों की ख़बर के ज़रिये देखने को मिल जाती है.

बहरहाल, इसी आरटीआई में यह भी पूछा गया था कि अब तक देश भर में कितने कामधेनु ब्रीडिंग सेंटर (प्रजनक केंद्र) स्थापित हुए हैं?

इसके जवाब में पशुपालन विभाग का कहना है कि राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत अभी तक सिर्फ एक कामधेनु ब्रीडिंग सेंटर, आंध्र प्रदेश के नेल्लोर ज़िले में बनाया गया है और मध्य प्रदेश के होशांगाबाद में अभी एक सेंटर का काम जारी है.

दरअसल, ये कामधेनु सेंटर देसी नस्ल की गायों के प्रजनन व विकास का काम करने के लिए बनाए जा रहे हैं. हर एक सेंटर पर 1000 गायों को रखा जाएगा. इसके अलावा, देश के 10 अन्य स्थानों पर आईवीएफ लैबोरेट्रीज़ बनाई गई हैं.

नौ करोड़ पशु, 1.3 करोड़ को मिला हेल्थ कार्ड

31 जुलाई 2018 तक राष्ट्रीय गोकुल मिशन की प्रगति रिपोर्ट बताती है कि देशभर के 90 मिलियन यानी नौ करोड़ दुधारू पशुओं में से सिर्फ 1.31 करोड़ पशुओं को हेल्थ कार्ड (नकुल स्वास्थ्य पत्र) दिए गए हैं.

सभी नौ करोड़ दुधारू पशुओं को 2020-2021 तक हेल्थ कार्ड देने का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन जब चार साल में सिर्फ 13 से 14 फीसदी पशुओं को हेल्थ कार्ड दिया जा सका है तो क्या सौ फीसदी लक्ष्य 2021 तक पूर्ण हो सकता है?

इसके अलावा, सभी पशुओं का रजिस्ट्रेशन करके एक नेशनल डेटाबेस भी बनाए जाने की बात इस मिशन में है. 90 करोड़ दुधारू पशुओं समेत सभी पशुओं का रजिस्ट्रेशन कराए जाने की योजना है.

लेकिन, जुलाई 2018 तक सिर्फ 12647471 (1.26 करोड़) पशुओं का ही रजिस्ट्रेशन हो सका है. क्या सभी पशुओं का रजिस्ट्रेशन 2021 तक संभव हो पाएगा, ये एक बहुत बड़ा सवाल है, जिसका जवाब हर गो-भक्त को, गोरक्षकों को सरकार से पूछना चाहिए.

गाय निश्चित तौर पर भारतीय समाज और भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है. लेकिन, पशुधन को लेकर कोई भी सरकार अब तक ठोस नीति नहीं बना सकी है. अलबत्ता, गाय को राजनीति का केंद्र बनाकर देश का माहौल ज़रूर संवेदनशील बनाया जाता रहा है.

केंद्रीय नेतृत्व के बयानों/विचारों को आधार बनाकर समाज का एक तबका ख़ुद को गोरक्षक बनाकर इस तरह पेश करता रहा है, जिससे समाज में दूरियां और नफ़रत का माहौल बनता है. असल गोरक्षक तो वहीं होता है, जो सरकार से उपरोक्त योजनाओं की हिसाब मांगता.

सरकार से पूछता कि जो गाय करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी का ज़रिया बन सकती थी, उसे आख़िर क्यों नफ़रत भरी राजनीति का माध्यम बना दिया गया?

(मोदी सरकार की प्रमुख योजनाओं का मूल्यांकन करती किताब वादा-फ़रामोशी का अंश विशेष अनुमति के साथ प्रकाशित. आरटीआई से मिली जानकारी के आधार पर यह किताब संजॉय बासु, नीरज कुमार और शशि शेखर ने लिखी है.)

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