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बॉम्बे हाईकोर्ट ने जवान की आत्महत्या मामले में पत्रकार के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर रद्द की

साल 2017 में पत्रकार पूनम अग्रवाल ने एक स्टिंग ऑपरेशन किया था, जिसमें लांस नायक रॉय मैथ्यू सेना में जारी सहायक सिस्टम पर सवाल उठाते नज़र आए थे. इसके बाद जवान ने आत्महत्या कर ली थी. सेना ने पत्रकार के ख़िलाफ़ ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्‍ट और आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज कराया था.

पत्रकार पूनम अग्रवाल. (फोटो साभार: फेसबुक)

पत्रकार पूनम अग्रवाल. (फोटो साभार: फेसबुक)

मुंबईः बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेना के एक जवान को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में वेबसाइट ‘द क्विंट’ की एसोसिएट एडिटर पूनम अग्रवाल के ख़िलाफ़ दायर एफआईआर रद्द कर दी है.

पूनम ने एक स्टिंग वीडियो के लिए इस जवान का इंटरव्यू लिया था. आरोप था कि आर्मी कैंप के वरिष्ठ अधिकारी अपने सहायकों से नौकरों जैसा काम लेते हैं, जबकि सेना की ओर से 19 जनवरी 2017 को जारी सर्कुलर में इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका था.

स्टिंग ऑपरेशन का यह वीडियो फरवरी 2017 में वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया था. पूनम ने पूर्व सैन्य अधिकारी और कारगिल युद्ध के नायक दीपचंद सिंह की मदद से यह स्टिंग ऑपरेशन किया था.

इस स्टिंग में लांस नायक रॉय मैथ्यू सेना में जारी सहायक सिस्टम पर सवाल उठाते हुए नज़र आए थे. वीडियो में तमाम सहायकों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर उत्पीड़न का आरोप लगाया था.

इसके बाद 7 मार्च 2017 को लांस नायक रॉय मैथ्यू ने महाराष्ट्र में नासिक के देवलाली कैंटोनमेंट की बैरक में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. तब जवान को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में सेना ने पूनम अग्रवाल और दीपचंद के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराई थी.

दोनों के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना), 451 (आपराधिक रूप से प्रवेश करना), 500 (मानहानि) और 34 (साझा मंशा) के तहत मामला दर्ज किया गया था.

सुनवाई के दौरान जस्टिस वी. मोरे और जस्टिस भारती हरीश डांगरे की पीठ ने स्टिंग ऑपरेशन से जुड़े वीडियो और रॉ फुटेज की समीक्षा की और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इन्होंने (पूनम और दीपचंद) कोई अपराध नहीं किया है.

याचिका पर 29 अगस्त को सुनवाई करते हुए इसी पीठ ने आईपीसी की धारा 306 के तहत आरोपों पर संदेह जताया था.

पीठ ने कहा, ‘मृतक ने आरोपियों की वजह से नहीं अपने वरिष्ठों की वजह से आत्महत्या की थी, जिन्होंने उसे डांटा था.’

अदालत ने हैरानी जताई कि ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत उनके ख़िलाफ़ कैसे आरोप लगाए जा सकते हैं. इसके जवाब में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने अदालत को बताया कि स्टिंग ऑपरेशन अत्यधिक प्रतिबंधित सैन्य शिविर में किया गया था.

इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूनम और दीपचंद को अग्रिम जमानत दे दी थी. जस्टिस रेवती मोहिते देरे ने गिरफ्तारी पूर्व जमानत की याचिका को मंजूरी देते हुए कहा था, ‘क्लिप देखने के बाद ऐसा लगता है कि स्टिंग ऑपरेशन का उद्देश्य यह दिखाना है कि सेना में सहायकों से वरिष्ठ अधिकारियों के कुत्तों को घुमाना, बच्चों को स्कूल ले जाने, अधिकारियों की पत्नियों को पार्लर और शॉपिंग ले जाने सहित अन्य काम कराए जाते हैं.’

अदालत ने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए कि इस स्टिंग ऑपरेशन को प्रतिबंधित क्षेत्र में किया गया, इससे स्वतः ही ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट की धारा तीन और धारा सात के प्रावधान लागू नहीं होते. प्रथमदृष्टया अपराध हुआ ही नहीं इसलिए जमानत को मंजूरी दी गई थी.

पूनम अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी, जिसमें पत्रकारों के ख़िलाफ़ ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट की याचिका के लिए दिशानिर्देश मांगे गए थे और साथ ही सहायक प्रणाली में सुधार के दिशानिर्देश की भी मांग की गई थी, जो लंबित है.