राजनीति

देश की आज़ादी से भी पुरानी हैं चुनावी हिंसा की जड़ें

चुनावी बातें: चुनाव में होने वाली हिंसा की नींव आज़ादी से पहले ही पड़ चुकी थी. झारखंड (तत्कालीन बिहार) में मार्च 1946 में हिंसक तत्वों ने संविधान सभा के प्रतिनिधि के चुनाव को भी स्वतंत्र व निष्पक्ष नहीं रहने दिया था.

India Violence Reuters

प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स

इस बार अभी तक पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य नक्सल पीड़ित इलाकों को छोड़कर कहीं से चुनावी हिंसा की कोई बड़ी खबर नहीं है, लेकिन देश में चुनावी हिंसा की बीमारी बहुत पुरानी है.

कई नेताओं ने ऐसी हिंसा की नींव उसकी आजादी के पहले ही डाल दी थी. नक्सलवाद पीड़ित झारखंड में आदिवासियों के नेता जयपाल सिंह मुंडा ने अपनी एक पुस्तक में दो मार्च, 1946 को घटित चुनावी हिंसा के एक ऐसे वाकये का जिक्र किया है.

इससे पता चलता है कि हिंसक तत्वों ने अपनी कार्रवाइयों से तब वहां संविधान सभा के प्रतिनिधि के चुनाव को भी स्वतंत्र व निष्पक्ष नहीं रहने दिया था.

तब झारखंड बिहार का हिस्सा था और जयपाल सिंह मुंडा उसके रांची-खूंटी क्षेत्र से संविधान सभा में प्रतिनिधित्व के लिए प्रत्याशी थे. आदिवासी महासभा उनके समर्थन में सक्रिय थी और कांग्रेस ने उनके खिलाफ अपने नेता पूर्णोचंद्र मित्रा को उतारा हुआ था.

कांग्रेस हर-हाल में यह चुनाव जीतना चाहती थी, लेकिन मुंडा का व्यापक प्रभाव उसके रास्ते का रोड़ा बना हुआ था और वह साम-दाम-दंड-भेद सब बरतकर, जैसे भी संभव हो, उसे खत्म करना चाहती थी.

इसके लिए उसने तपकरा क्षेत्र में एक आदिवासी नेता को ट्रक पर चढ़ाकर प्रचार शुरू किया तो आदिवासी महासभा के किसी कार्यकर्ता ने उसे चिढ़ाते हुए कह दिया कि प्रचार करना है तो ट्रक पर चढ़े क्यों घूम रहे हो? उतरकर धरती पर आओ और तब प्रचार करो.

यह बात उन कांग्रेसियों को इतनी बुरी लगी कि उन्होंने खूंटी जाकर खूब नमक मिर्च लगाकर अपने साथियों से उसका बयान किया. यहां तक कह डाला कि तपकरा में उन्हें बहुत मारा-पीटा गया है. फिर तो वहां से अनेक कांग्रेसी ट्रकों में भरकर और घातक हथियारों से लैस होकर तपकरा पहुंचे और जो भी जहां भी मिला, उसी को मारने पीटने लगे.

मुंडा के अनुसार कांग्रेसी और उनके मुस्टंडे बस एक ही सवाल पूछते-किसे वोट दोगे और जो भी आदिवासी महासभा का नाम ले लेता, उसकी शामत आ जाती!

हालत यह थी कि अनेक लोग घायल होकर चीख रहे थे लेकिन हमलावरों की फायरिंग रुकने का नाम नहीं ले रही थी. रात हो गई थी, इसलिए लोग समझ भी नहीं पा रहे थे कि वास्तव में क्या हो रहा है!

काफी देर बाद आदिवासियों ने समझा कि उन पर हमला हो गया है. तब वे अपने तीर और धनुषों के साथ ललकारते हुए मुकाबले को निकले और हमलावरों को भगाने में कामयाब हुए. इस हमले में सात आदिवासियों को जान से हाथ धोना पड़ा था जबकि 22 अन्य घायल हो गये थे.

झारखंड में आजादी की सुबह होने और नक्सलवाद के जन्म लेने से काफी पहले हुई इस पहली चुनावी हिंसा को आज भी शिद्दत से याद किया जाता है. तपकरा में उस में मारे गये सात लोगों का एक स्मारक भी बनाया गया है, जहां उन पर हुए हमले के दिन पुष्प अर्पित करके लोगों द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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