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हिंदी भाषा विवाद: नई शिक्षा नीति के संशोधित मसौदे पर दो सदस्यों ने जताई आपत्ति

नई शिक्षा नीति के मसौदे में त्रिभाषा फार्मूले को लेकर उठे विवाद के बीच सोमवार को मसौदा नीति का संशोधित प्रारूप जारी किया गया, जिसमें ग़ैर-हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी अनिवार्य किए जाने का उल्लेख नहीं है.

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प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स

नई दिल्ली: नई शिक्षा नीति के मसौदे में त्रिभाषा फार्मूले को लेकर उठे विवाद के बीच सोमवार को मसौदा नीति का संशोधित प्रारूप जारी किया गया, जिसमें गैर हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी अनिवार्य किए जाने का उल्लेख नहीं है.

तमिलनाडु में द्रमुक और अन्य दलों ने नई शिक्षा नीति के मसौदे में त्रिभाषा फार्मूले का विरोध किया था और आरोप लगाया था कि यह हिन्दी भाषा थोपने जैसा है.

बहरहाल, नई शिक्षा नीति के संशोधित मसौदे में कहा गया है कि जो छात्र पढ़ाई जाने वाली तीन भाषाओं में से एक या अधिक भाषा बदलना चाहते हैं, वे ग्रेड 6 या ग्रेड 7 में ऐसा कर सकते हैं, जब वे तीन भाषाओं (एक भाषा साहित्य के स्तर पर) में माध्यमिक स्कूल के दौरान बोर्ड परीक्षा में अपनी दक्षता प्रदर्शित कर पाते हैं.

नई शिक्षा नीति बनाने के लिए सरकार ने वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक हिन्दी को लेकर मसौदे में हुए बदलाव का समिति के दो सदस्यों ने विरोध किया है.

मालूम हो कि पहले के मसौदे में समिति ने गैर हिन्दी प्रदेशों में हिन्दी की शिक्षा को अनिवार्य बनाने का सुझाव दिया था. इस मुद्दे पर तमिलनाडु में द्रमुक सहित कई अन्य दलों ने भारी विरोध शुरू कर दिया था.

द्रमुक के राज्यसभा सांसद तिरुचि शिवा और मक्कल नीधि मैयम नेता कमल हासन ने इसे लेकर विरोध जाहिर किया है. तिरूचि शिवा ने केंद्र सरकार को आगाह करते हुए कहा था कि हिन्दी को तमिलनाडु में लागू करने की कोशिश कर केंद्र सरकार आग से खेलने का काम कर रही है.

वहीं, कमल हसन ने कहा था कि उन्होंने कई हिन्दी फिल्मों में अभिनय किया है और उनके विचार से, हिन्दी भाषा को किसी पर भी थोपा नहीं जाना चाहिए.

इन राजनीतिक विरोधों के बाद कस्तूरीरंगन के कहने पर मानव संसाधन और विकास मंत्रालय ने संशोधित प्रारूप जारी किया, जिस पर समिति के दो सदस्यों ने आपत्ति जताई है. समिति में कुल 11 सदस्य हैं.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार आपत्ति जताने वाले ये सदस्य राम शंकर कुरील (मध्य प्रदेश के बाबा साहेब आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति) और केएम त्रिपाठी (यूपी बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष) हैं.

अख़बार के अनुसार मसौदे में बदलाव के बारे में समिति सदस्यों को सूचित करते हुए मंत्रालय द्वारा एक ईमेल भेजा गया था. बताया गया कि इस मेल के जवाब में कुरील ने इस कदम को दुर्भाग्यपूर्ण बताया, वहीं त्रिपाठी का कहना था कि ये बदलाव समिति के सदस्यों से राय लिए बिना किए गए.

अख़बार द्वारा संपर्क किए जाने पर त्रिपाठी ने इस बारे में बात करने से इनकार कर दिया, वहीं कुरील ने कहा, ‘समिति द्वारा मानव संसाधन और विकास मंत्री को 31 मई को नई शिक्षा नीति रिपोर्ट की प्रति सौंप दी गई थी. मैं उस रिपोर्ट के साथ हूं. तीन-भाषी फॉर्मूला राष्ट्रीय एकता के पक्ष में है.’ उन्होंने इसके अलावा कोई टिप्पणी करने से इनकार किया.

इससे पहले रविवार को स्कूलों में त्रिभाषा फार्मूले संबंधी नई शिक्षा नीति के मसौदे पर उठे विवाद के बीच केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने स्पष्ट किया था कि सरकार अपनी नीति के तहत सभी भारतीय भाषाओं के विकास के लिए प्रतिबद्ध है और किसी प्रदेश पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी.

उन्होंने कहा था, ‘हमें नई शिक्षा नीति का मसौदा प्राप्त हुआ है, यह रिपोर्ट है. इस पर लोगों एवं विभिन्न पक्षकारों की राय ली जायेगी, उसके बाद ही कुछ होगा. कहीं न कहीं लोगों को गलतफहमी हुई है.’

इससे पहले माकपा और भाकपा ने शिक्षा नीति में तीन भाषाओं के फार्मूले का विरोध करते हुये इसे केंद्र सरकार की घातक पहल बताया था.

भाकपा की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि सरकार तीन भाषा फार्मूले के नाम पर हिन्दी थोपने की कोशिश कर रही है. पार्टी ने कहा कि सरकार की यह पहल सिर्फ शिक्षा के लिये नहीं है बल्कि इसके पीछे सरकार का मकसद है कि किस प्रकार से सांस्कृतिक राष्ट्रवादी एजेंडे के हिस्से के रूप में हिन्दी को थोपना है.

इससे पहले माकपा पोलित ब्यूरो ने भी सरकार की इस कोशिश का विरोध करते हुये कहा था कि सरकार को किसी एक भाषा को बढ़ावा देने के बजाय सभी भाषाओं को समान रूप से संरक्षण देना चाहिये.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)