हिंसा के प्रति राज्य की सहनशीलता की नीति के कारण हिंसा की संस्कृति का समाज में विस्तार कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है. कश्मीरी विद्यार्थियों, व्यापारियों पर हमलों पर राष्ट्रीय चुप्पी से पता चलता है कि चूंकि मान लिया गया है कि वे पूरे भारतीय नहीं हैं, उन पर हिंसा की जा सकती है. हम किसी न किसी तरह, किसी समुदाय, व्यक्तियों पर अभारतीयता का आरोप लगा सकते हैं और उन्हें मार सकते हैं.
दिल्ली विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम निर्माण ज्ञान और हिंदुत्ववादी विचारधारा की रस्साकशी बन गया है. जेंडर, जाति, भेदभाव और विश्व इतिहास जैसे विषयों को हटाने का दबाव बढ़ रहा है. इससे अकादमिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की बौद्धिक गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. इसी विषय पर पढ़ें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का लेख.
ईसाइयों के ख़िलाफ़ अभियान पिछले सालों में तेज़ होता चला जा रहा है. भारत की कुल जनसंख्या के मात्र 2.3% ईसाई हैं. पिछले कई दशकों से भारत की आबादी में उनका हिस्सा लगभग यही रहा है. फिर धर्मांतरण से ईसाइयों की जनसंख्या में विस्फोटक बढ़ोत्तरी का ख़तरा क्यों सबको वास्तविक जान पड़ता है?
नीतीश कुमार द्वारा की गई असभ्यता के पक्ष में दलीलें दी जा रही हैं कि मुख्यमंत्री को महिला विरोधी नहीं कहा जा सकता और न मुसलमान विरोधी क्योंकि इन दोनों के हित के लिए उन्होंने कई काम किए हैं. तो क्या इसका यह अर्थ समझें कि अगर आपने मेरी कोई मदद की है तो मैं आपको अपने साथ बदतमीज़ी करने का हक़ दे दूं?
अमेरिका में जिस एक पहचान का अपराधीकरण कर दिया गया है, वह है मुसलमान पहचान. उसे पूरी तरह क़बूल करना किसी भी राजनेता के लिए आसान नहीं. लेकिन ज़ोहरान ममदानी ने यह मुश्किल काम कर दिखाया.
पिछले 11 वर्षों से देश के लगभग हर शिक्षा संस्थान में बौद्धिक गतिविधियों पर प्रशासन का नियंत्रण सख़्त होता जा रहा है. पाठ्यक्रमों के मामले में अब विभाग आज़ाद नहीं हैं. कोई गोष्ठी आयोजित नहीं की जा सकती. मात्र ‘राष्ट्रवादी’ विषयों और वक्ताओं को अब जगह दी जाती है. विश्वविद्यालय बौद्धिक मूर्च्छा में बस सांस ले रहे हैं. उनके जीवित होने का भ्रम है.
पिछले दो दशकों में देश भर के शैक्षणिक परिसरों में हुई हिंसा में अधिकतर एबीवीपी के सदस्य क्यों शामिल पाए जाते हैं? इस छात्र संगठन को इस सवाल से जूझना चाहिए कि विचार के परिसर में उसने हिंसा को क्यों चुना है?
भारत सरकार ने विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने यहां आने की इजाज़त दी है. बिना स्वतंत्रता के शिक्षा और ज्ञान का सृजन असंभव है. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में अब जिस तरह के नियंत्रण लागू किए जा रहे हैं, उसके बाद वहां के विश्वविद्यालयों का आकर्षण ख़त्म हो रहा है. क्या भारत में इन विदेशी विश्वविद्यालयों को यह स्वतंत्रता मिलेगी?
सैयदा हमीद के मन में असम की बहुत ख़ूबसूरत यादें हैं. लेकिन आज अचानक उन्हें अहसास कराया जा रहा है कि वे औरत हैं और मुसलमान हैं. उनकी तकलीफ़ कौन महसूस करना चाहता है?
हिंदू समाज में घृणा पहले भी थी लेकिन 2014 में हमने सारे संकोच को तोड़ दिया जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार किया गया. भारत घृणा और हिंसा की राह पर चल निकला. स्वाधीनता दिवस के दिन इस घृणा का मुख्य प्रवक्ता अपना पुराना, आज़माया हुआ रिकॉर्ड बजा रहा था. क्या उसे सुनकर हमें वितृष्णा होती है?
कर्नाटक की घटना दिल दहलाने वाली है. क्या हिंदू समाज घृणा में इस हद तक आत्मघाती हो चुका है कि अपने बच्चों की बलि देने को तैयार है अगर उससे मुसलमानों को और पीड़ित करने का एक बहाना मिल सके?
5 अगस्त, 2019 के बाद का कश्मीर भारत के लिए आईना है. उसके बाद भारत का तेज़ गति से कश्मीरीकरण हुआ है. नागरिकों के अधिकारों का अपहरण, राज्यपालों का उपद्रव, संघीय सरकार की मनमानी.
न्यायालय और सड़क की भीड़ में भेद मिट जाना चिंता का विषय है. यह एक नई राष्ट्रवादी स्वतःस्फूर्तता का जन्म है. नेहरू प्लेस की भीड़ संगठित नहीं थी. वे लोग बजरंग दल के सदस्य शायद नहीं थे. लेकिन जैसे ही अदालत ग़ज़ा के लिए सहानुभूति की बात सुनते ही बिफर पड़ी, यह भीड़ फ़िलिस्तीन का झंडा देखते ही भड़क उठी.
इन दिनों भाजपा की संघीय सरकार त्रिभाषा सूत्र को लेकर बहुत गंभीर दिखाई दे रही है. उसकी चिंता यह है कि बच्चे अधिक से अधिक भाषा सीख पाएं. लेकिन किसी भी शोध से सिद्ध नहीं हुआ है कि तीन भाषाएं पहले दर्जे से ही सिखाई जानी चाहिए.
संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता के होने के बावजूद भारत में धीरे-धीरे भेदभावपूर्ण क़ानून बन रहे हैं. गोमांस खाने और उसकी ख़रीद बिक्री पर रोक संबंधी क़ानून कई राज्यों में लागू हैं. पिछले वर्षों में कई ऐसे क़ानून बन चुके हैं जो मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ हैं. धर्मांतरण से जुड़े हुए क़ानून मुसलमानों और ईसाइयों पर ही लागू किए जाते हैं. इसी तरह नागरिकता के क़ानून में संशोधन का क़ानून भी पारित हो गया.