दिल्ली चुनाव: गांधीनगर सीट पर आप, कांग्रेस और भाजपा में किसका पलड़ा भारी?

एशिया के कपड़ों का सबसे बड़ा मार्केट कहा जाने वाला पूर्वी दिल्ली का गांधीनगर व्यापारियों का इलाका है. गांधीनगर सीट लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ रही है. साल 1993 में भाजपा ने यह सीट जीती थी जिसके बाद लगातार चार बार कांग्रेस नेता अरविंदर सिंह लवली ने यहां से जीत दर्ज की. हालांकि साल 2015 में आम आदमी पार्टी की लहर में कांग्रेस का यह किला भी ढह गया.

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गांधीनगर मार्केट. (फोटो: द वायर)

एशिया के कपड़ों का सबसे बड़ा मार्केट कहा जाने वाला पूर्वी दिल्ली का गांधीनगर व्यापारियों का इलाका है. गांधीनगर सीट लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ रही है. साल 1993 में भाजपा ने यह सीट जीती थी जिसके बाद लगातार चार बार कांग्रेस नेता अरविंदर सिंह लवली ने यहां से जीत दर्ज की. हालांकि साल 2015 में आम आदमी पार्टी की लहर में कांग्रेस का यह किला भी ढह गया.

गांधीनगर मार्केट. (फोटो: द वायर)
गांधीनगर मार्केट. (फोटो: द वायर)

नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा चुनाव में पूर्वी दिल्ली का गांधीनगर विधानसभा क्षेत्र कारोबारियों का गढ़ है क्योंकि इसे एशिया के कपड़ों के सबसे बड़े मार्केट में से एक माना जाता है. इसलिए यहां पर बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों के साथ सीलिंग और जीएसटी जैसे मुद्दे भी मायने रखते हैं और वे लोगों के मतदान को प्रभावित करने की भी क्षमता रखते हैं.

गांधीनगर को लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है. साल 1993 में भाजपा ने यह सीट जीती थी जिसके बाद लगातार चार बार कांग्रेस नेता अरविंदर सिंह लवली यहां से जीतते रहे हैं. हालांकि, साल 2015 में 70 में से 67 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी की लहर में कांग्रेस का यह किला भी ढह गया और अनिल बाजपेयी विधायक बन गए.

2015 में बाजपेयी को 45 फीसदी वोट मिले थे और उनके बाद 38 फीसदी वोटों के साथ भाजपा के जितेंद्र चौधरी दूसरे स्थान पर थे. दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमिटी का अध्यक्ष बनाए जाने के कारण कांग्रेस ने सुरेंद्र प्रकाश शर्मा को टिकट दिया था जो कि तीसरे स्थान पर आए थे.

लोकसभा चुनावों से ठीक पहले आप का दामन छोड़ते हुए बाजपेयी भाजपा में शामिल हो गए थे. इसके बाद दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष रामनिवास गोयल ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था. इस बार बाजपेयी भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं.

वहीं, आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से आए नवीन चौधरी उर्फ दीपू को टिकट दिया है. हालांकि, पिछली बार की तरह इस बार भी आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल के चेहरे और पिछले पांच साल में बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर चुनाव लड़ रही है.

कांग्रेस ने एक बार फिर ये दांव अपने पुराने नेता अरविंदर सिंह लवली पर खेला है. साल 2017 में हुए दिल्ली नगर निगम चुनाव से पहले लवली, भाजपा में शामिल हो गए थे. हालांकि, अपनी गलती का एहसास करते हुए एक साल बाद ही उन्होंने कांग्रेस में वापसी की थी.

गांधीनगर विधानसभा क्षेत्र में आजाद नगर या राजगढ़ कॉलोनी जैसे इलाके पंजाबी-सिख बहुल हैं. कैलाश नगर और धर्मपुरा का इलाका दलित समुदाय बहुलता वाला है तो शास्त्री पार्क, बुलंद मस्जिद, ओल्ड सीलमपुर और सीलमपुर गांव का क्षेत्र मुस्लिम बहुल है.

27 जनवरी को गांधीनगर में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की रैली हुई. इस दौरान वहां पर बड़ी संख्या में लोग जुटे और आम जनता में उनके लिए उत्साह भी दिखा. ऑटो और ई-रिक्शा वाले बड़ी संख्या में आम आदमी पार्टी के समर्थन में थे.

गांधीनगर में रैली करते अरविंद केजरीवाल. (फोटो: द वायर)
गांधीनगर में रैली करते अरविंद केजरीवाल. (फोटो: द वायर)

वहीं, उसी दिन वहां भाजपा की एक सभा हुई जिसमें पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय अनिल बाजपेयी के लिए वोट मांगने के लिए आए. हालांकि, कांग्रेस का कोई नेता वहां नहीं दिखा.

गांधीनगर के लोग आम आदमी पार्टी के कामों से संतुष्ट नजर आए. उन्होंने माना कि केजरीवाल सरकार ने बिजली, पानी, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसे मुद्दों पर किए गए अपने वादों को पूरा किया है. हालांकि, वहां पर सड़कों और नालियों की हालत पर जनता ने आक्रोश भी जताया.

स्थानीय निवासी अनिल कहते हैं, ‘यहां पर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच लड़ाई है. भाजपा का यहां पर कोई माहौल नहीं है.’

वहीं, आशा देवी ने कहा, ‘गरीब आदमी को कोई नहीं समझता है चाहे वह आम आदमी पार्टी हो, भाजपा हो या कांग्रेस. अरविंद केजरीवाल ने बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर काम किया है. उन्होंने जो किया है वह जनता के सामने है.’

गांधीनगर में स्पेयर पार्ट्स की दुकान चलाने वाले बृजपाल सिंह कहते हैं, ‘पहले मेरा बिजली बिल 1700-1800 आता था लेकिन अब नहीं आता. पानी का बिल भी कम हो गया है. केजरीवाल ने अपने वारे पूरे किए हैं. सरकार केजरीवाल की बननी चाहिए लेकिन हमारे यहां अरविंदर सिंह लवली का माहौल है.’

एक अन्य व्यापारी मोहम्मद शाहिद ने कहा, ’73 सालों में केजरीवाल पहला ऐसा नेता है जो अपने विकास पर वोट मांग रहा है. इसे न तो हिंदू-मुस्लिम से मतलब है और न ही इसे किसी मजहब से मतलब है. बीजेपी वाले तो कहेंगे क्योंकि उन्हें विरोध करना है.’

वहीं, व्यापारी मनोज गुप्ता ने कहा, ‘दिल्ली में आम आदमी पार्टी के जीतने के चांस ज्यादा हैं क्योंकि उनमें राजनीति कम है. वे अन्य दलों की तरह बंटवारे की बात कर रहे हैं. केजरीवाल ने अच्छे काम किए हैं. मोदी और शाह भी अच्छे हैं लेकिन दिल्ली के लिए सबसे बढ़िया केजरीवाल सरकार ही है. केंद्र सरकार कई मामलों में उन्हें काम नहीं करने देती है. अगर केजरीवाल कुछ अच्छा काम करना चाहते हैं तो उन्हें करने देना चाहिए.’

एक अन्य व्यापारी लोकेश गोरावा कहते हैं, ‘इस चुनाव में केजरीवाल के जीतने की उम्मीद है क्योंकि उन्होंने यहां बहुत काम किया है. मोदी जी देश का देख रहे हैं लेकिन केजरीवाल ने दिल्ली में अच्छा काम किया है. उनके हाथ में जितना था उतना किया. सीमित शक्तियों के कारण कई काम नहीं कर सके.’

हालांकि, रेडीमेड कपड़ों के थोक विक्रेता विवेक मित्तल केजरीवाल के काम से संतुष्ट नजर नहीं आते हैं. वे कहते हैं,  ‘यह सब कहने की बातें हैं कि स्कूलों में काम किया है, पानी पर काम किया है लेकिन आप सड़कों की हालत देखिए कितने गड्ढे हैं, दुर्घटनाएं होती हैं. दिल्ली तो बहुत पीछे चली गई है. इससे अच्छी तो शीला दीक्षित की सरकार थी. अगर मनोज तिवारी भी फ्री में सुविधाएं देने की बात करेंगे तो हम उनका भी विरोध करेंगे. फ्री की राजनीति करने वाले देश को पीछे ले जा रहे हैं.’

वहीं, दिल्ली भाजपा युवा मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष मनीष सिसोदिया केजरीवाल सरकार पर हमला बोलते हुए कहते हैं, ‘लोग दिल्ली को लंदन-पैरिस बनाने की बात करते हैं लेकिन भाजपा दिल्ली को दिल्ली बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है. मोदी जी ने जैसे कहा है कि हम जहां झुग्गी वहीं मकान और आयुष्मान योजना को लेकर आगे बढ़ेंगे. 15 साल कांग्रेस की सरकार रही और पांच साल आम आदमी पार्टी की सरकार रही लेकिन अभी भी यहां की सड़कों की हालत खराब है. केवल बिजली-पानी को मुफ्त को दिल्ली को वर्ल्ड क्लास नहीं बनाया जा सकता है.’

राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव लड़ने के आरोपों से इनकार करते हुए वे कहते हैं कि अनुच्छेद 370 जैसे राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर हम आगे नहीं बढ़ रहे हैं. ये मुद्दे तो पहले से ही जनता के दिमाग में हैं क्योंकि हम जितना कहते हैं उससे ज्यादा काम करते हैं. दूसरी पार्टियां जितना बोलती हैं उससे बहुत कम काम करती हैं. हम दिल्ली के मुद्दों पर चुनाव लड़ेंगे. स्कूलों की बिल्डिंगें बनाने से शिक्षा पर काम नहीं होगा बल्कि शिक्षा पर काम करना पड़ेगा.

(फोटो: द वायर)
(फोटो: द वायर)

व्यापारी वर्ग की बहुलता वाले इस इलाके में सीलिंग का मुद्दा बड़ा मुद्दा बना था. हजारों परिवारों की रोजी-रोटी पर संकट खड़ा करने के साथ सीलिंग के कारण आसपास के गरीब वर्ग की नौकरियों पर भी काफी असर पड़ा था. वहीं, जीएसटी आने के बाद कारोबारियों को परेशानी का सामना करना पड़ा और इससे कारोबार पर भी असर पड़ा.

थोक कपड़ों की दुकान सेल पॉइंट के दुकानदार ने कहा, ‘जीएसटी आने से पहले लोन नहीं मिलता था लेकिन अब बैंक लोन आम दुकानदारों को भी देने लगी हैं. हालांकि, सीए को रखने से भार तो पड़ता है. नियम से चलने में कोई दिक्कत नहीं है. हमें जो दिक्कतें आती हैं सीए उसमें मदद करते हैं. धीरे-धीरे लोग समझ जाएंगे तो दिक्कत खत्म हो जाएगी. वहीं, अचानक से सीलिंग करने से दिक्कत होती है. ये सब काम करने से पहले समय से नोटिस दी जानी चाहिए.’

एक अन्य व्यापारी विवेक मित्तल ने कहा, ‘जीएसटी का कोई असर नहीं है. सही काम करने वालों को कोई दिक्कत नहीं है, गलत काम करने वालों को दिक्कत आएगी. जीएसटी आने के बाद व्यापार बढ़ा है, कम नहीं हुआ है.’

वहीं सीलिंग के मुद्दे पर वे कहते हैं कि इससे फर्क तो पड़ा है. सरकार ने पहले दूसरी जगह जाने के लिए नोटिस दिया था लेकिन लोगों ने वहां भी जगह ले ली और यहां से गए भी नहीं. इसमें अफसरशाही को ज्यादा तवज्जो मिलने से दिक्कतें आई हैं. सीलिंग के आते हैं और रिश्वत लेते हैं. उससे काफी असुविधा हुई है.

एक अन्य व्यापारी मोहम्मद शाहिद ने कहा, ‘एशिया की बड़ी मार्केट होने के बावजूद हमारी हालत खराब है. बाजार में ग्राहक ही नहीं हैं. हमारा पूरा देश ही मंदी के दौर से गुजर रहा है.’

कारोबारी मनोज गुप्ता कहते हैं, ‘जीएसटी के कारण काम में बहुत फर्क पड़ा है. धंधा मंदा हुआ है. हम केजरीवाल और भाजपा से भी कहेंगे कि वे इसका कुछ करें. टैक्स लगाना अच्छी बात है लेकिन इतना ज्यादा नहीं लगाना चाहिए.’

वहीं, सीलिंग के मुद्दे पर वे कहते हैं कि हम लोग सरकार से सीलिंग पर रोक लगाने की मांग करते हैं. अगर हमें हटाया जाएगा तो हम कहां जाएंगे. हम किसी एक सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं. सभी सरकारें इसके लिए जिम्मेदार हैं.

स्थानीय निवासी विजय कुमार ने कहा, ‘आज से दस साल पहले इन फैक्ट्रीवालों को बवाना जाने के लिए कहा गया था लेकिन ये जाते नहीं है. ये कहते हैं रोजगार छिन जाएगा तो क्या वहां जाने वाले रोजगार नहीं छिनेगा.’

गांधीनगर मार्केट. (फोटो: द वायर)
गांधीनगर मार्केट. (फोटो: द वायर)

दिल्ली के चुनाव में शाहीन बाग के धरना प्रदर्शन को मुद्दा बनाए जाने पर गांधीनगर की राय बंटी हुई नजर आई है, जहां पर पिछले 45 से अधिक दिनों से नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ धरना प्रदर्शन हो रहा है.

स्थानीय निवासी विजय कुमार कहते हैं कि एनआरसी, एनपीआर, सीएए एक ही सिक्के के कई पहलू हैं. कांग्रेस के समय भी ये सब काम होते थे लेकिन किसी को पता नहीं चलता था. अब अपने वोट वैंक के लिए ये लोग अलग-अलग मुद्दे बना रहे हैं. राजनीतिक पार्टियां अपनी रोटियां सेंक रही हैं. विरोध करने वालों को पाकिस्तानी और आतंकवादी कहना गलत है.

विवेक मित्तल कहते हैं कि शाहीन बाग जैसे मुद्दे विपक्ष की साजिश है. विपक्ष के लोग हिंदू मुस्लिम कर रहे हैं. सरकार ने सही काम किया है. हम तो मोदी जी के पक्के भक्त हैं.

मोहम्मद शाहिद कहते हैं कि हमारी सरकार का ध्यान रोजगार पर नहीं है लेकिन वे रोज नोटबंदी, जीएसटी, सीएए, एनआरसी जैसे मुद्दे लाकर खड़े कर दे रहे हैं. अच्छे-खासे चलते चलाते देश पर टांग लगा दी है. आज पूरा देश सुलग रहा है, इससे कारोबार पर भी असर पड़ रहा है. मोदी जी पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं उन्हें 30-40 दिन से धरने पर बैठी महिलाओं से मिलना चाहिए और इस सीएए-एनआरसी को वापस लेना चाहिए. ये हमारे संविधान के खिलाफ है. लोगों को रोटी नसीब नहीं हो रही है लेकिन एनपीआर-एनआरसी में लगा दिया है.

वे कहते हैं कि इन्हें सत्ता का अहंकार हो गया है. वहां बैठी महिलाओं को कोई समर्थन नहीं है. कोई राजनीतिक दल उनसे मिलने नहीं जा रहा है. अगर वे कहेंगे कि कंरट लगा दीजिए तो इससे देश में और विवाद ही पैदा होगा.

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