ज़्यादातर लोगों ने मोदी सरकार से नए पर्यावरण क़ानून को वापस लेने की मांग की है: दस्तावेज़

प्रस्तावित पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना में जिन विवादास्पद संशोधनों का प्रस्ताव किया गया है, उनमें कुछ उद्योगों को सार्वजनिक सुनवाई से छूट देना, उद्योगों को सालाना दो अनुपालन रिपोर्ट्स के बजाय एक रिपोर्ट देने की अनुमति देना और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में लंबे समय के लिए खनन परियोजनाओं को मंज़ूरी देने जैसे प्रावधान शामिल हैं.

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(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

प्रस्तावित पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना में जिन विवादास्पद संशोधनों का प्रस्ताव किया गया है, उनमें कुछ उद्योगों को सार्वजनिक सुनवाई से छूट देना, उद्योगों को सालाना दो अनुपालन रिपोर्ट्स के बजाय एक रिपोर्ट देने की अनुमति देना और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में लंबे समय के लिए खनन परियोजनाओं को मंज़ूरी देने जैसे प्रावधान शामिल हैं.

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)
(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: मोदी सरकार की विवादित पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2020 (ईआईए नोटिफिकेशन) के संबंध में सौंपी गईं ज्यादातर टिप्पणियों में लोगों ने मांग की है कि पर्यावरण की बेहतरी के लिए सरकार जल्द से जल्द इस अधिसूचना को वापस ले.

उन्होंने कहा है कि यह पर्यावरण को व्यापक स्तर पर नुकसान पहुंचाने वाली अधिसूचना है और सरकार को कोविड-19 महामारी का फायदा उठाकर इस तरह के नियम नहीं बनाने चाहिए.

सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून, 2005 के तहत प्राप्त किए गए और द वायर  द्वारा देखे गए दस्तावेजों से ये जानकारी सामने आई है.

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 23 मार्च 2020 को पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2020 का ड्राफ्ट जारी किया था और यह 11 अप्रैल को भारत के राजपत्र में प्रकाशित हुआ था.

दस्तावेजों से पता चलता है कि अधिसूचना प्रकाशित होने के सिर्फ 10 दिन के भीतर यानी कि 20 अप्रैल तक मंत्रालय को कुल 1,190 ईमेल प्राप्त हुए थे, जिसमें से 46 ईमेल में लोगों ने सुझाव दिया था और बाकी के 1,144 ईमेल में अधिसूचना को तत्काल वापस लेने की मांग की गई है.

चूंकि जनता द्वारा आपत्तियां या सुझाव देने की आखिरी तारीख 30 जून काफी नजदीक आ गई है, इसलिए एक बार फिर से ईआईए नोटिफिकेशन, 2020 काफी चर्चा में है और लोग मांग कर रहे हैं कि कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए इस समयसीमा को बढ़ाई जानी चाहिए.

पर्यावरण मंत्रालय के दस्तावेजों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि बहुत बड़ी संख्या में इस अधिसूचना के खिलाफ लोगों ने टिप्पणी दी है और इसे खारिज करने की मांग की है.

मंत्रालय के वैज्ञानिक (सी) जेडी मार्कस नाइट ने अधिसूचना जारी होने के 10 दिनों के भीतर ही बड़े अधिकारियों के सामने स्थिति साफ कर दी थी जनता की राय है कि इसे वापस ले लिया जाए.

22 अप्रैल की एक फाइल नोटिंग के मुताबिक उन्होंने कहा, ‘ड्राफ्ट ईआईए नोटिफिकेशन, 2020 परिवेश (पर्यावरण मंत्रालय का पोर्टल) पर 11 मार्च 2020 को अपलोड किया गया था. इस बीच हमें ढेरों ईमेल/टिप्पणियां प्राप्त हुई हैं, जिसमें ज्यादातर लोगों की राय है कि ड्राफ्ट ईआईए नोटिफिकेशन 2020 पर रोक लगाई जाए.’

उन्होंने आगे कहा, ‘इस मामले पर निदेशक (एसकेपी) के साथ विचार किया गया है और ये सुझाव दिया गया कि जनता की मौजूदा राय को बड़े अधिकारियों के सामने पेश किया जाए.’ इसके बाद उन्होंने ये जानकारी आगे बढ़ा दी.

पर्यावरण मंत्रालय के साइंटिस्ट ‘एफ’ शरथ कुमार पल्लेर्ला ने अधिसूचना के संबंध में प्राप्त हुईं टिप्पणियों का विवरण देते हुए कहा कि 20 अप्रैल तक सिर्फ ईमेल के जरिये 1,190 पत्र प्राप्त हुए हैं जिसमें 95 फीसदी से ज्यादा पत्रों में प्रस्तावित अधिसूचना वापस लेने की मांग की गई है.

23 अप्रैल 2020 को उन्होंने लिखा, ‘यह बताया जाता है कि 20 अप्रैल 2020 तक मेल आईडी [email protected] पर लगभग 1,190 ई-मेल प्राप्त हुए हैं, जिसमें से 46 पत्रों में अधिसूचना को लेकर सुझाव दिए गए हैं और बाकी के 1,144 ईमेल में कोविड-19 महामारी को ध्यान में रखते हुए इसे वापस लेने की मांग की गई है.’

शरथ कुमार ने सभी पत्रों या टिप्पणियों के सार कुछ इस तरह पेश किया:

वैश्विक आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के बीच मंत्रालय ने जनता द्वारा टिप्पणी प्राप्त करने के लिए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है. यह कदम हमें आपकी प्राथमिकताओं को लेकर काफी चिंतित करता है. जब यह नोटिफिकेशन जारी किया गया था तब अमेरिका, यूरोप और भारत पहले से ही आर्थिक सुस्ती और सार्वजनिक तंत्र पर पड़ रहे भारी दबाव जैसी चिंताजनक स्थिति का सामना कर रहे थे.

इसके बाद भारत समेत कई देश लॉकडाउन में चले गए, जिसके कारण कठोर प्रतिबंध लगाए गए और सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई. आज भी कई सारे कार्यालय बंद हैं और लोग अपने घरों से काम कर रहे हैं. ये प्रतिबंध अनिश्चित समय के लिए हो सकते हैं और यह स्पष्ट नहीं है कि कब से सामान्य जनजीवन पटरी पर लौट पाएगा.

वैश्विक महामारी के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का अभी तक आकलन नहीं किया जा सका है. इस समय शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लोग सिर्फ भोजन, रोजगार, आय और मानसिक एवं भौतिक स्वास्थ्य से जूझ रहे हैं.

जैसा कि आपने शायद ये महसूस किया होगा कि लॉकडाउन के दौरान विभिन्न गतिविधियां बंद करने के कारण कई बड़े शहरों की वायु गुणवत्ता में सुधार आया है और नदियां पहले की तुलना में साफ और निर्बाध बह रही हैं. यह दर्शाता है कि रासायनिक जहर से हमारी हवा और पानी को बचाने के नाम पर औद्योगिक और मानवीय क्रियाकलापों को रेगुलेट करने के लिए आपके द्वारा स्थापित सिस्टम फेल हुआ है.

खबरों से हमें ये भी पता चलता है कि मंत्रालय अभी भी ज्यादा खनन, ज्यादा उद्योगों, बड़े निर्माण कार्यों और अधिक हाईवे बनाने की मंजूरी दे रहा है. यह सब हमारे जंगलों को बर्बाद कर देगा, जल संसाधनों को प्रदूषित करेगा, ज्यादा भूमि, सार्वजनिक स्थानों और तटीय क्षेत्रों का अधिग्रहण होगा. आप ईआईए नोटिफिकेशन और अन्य पर्यावरण कानूनों का इस्तेमाल कर ये सब कर रहे हैं.

फिर भी कई प्रभावित लोगों को लिए ईआईए रेगुलेशन एकमात्र जरिया है जो ये सुनिश्चित करता है कि प्रोजेक्ट डेवलपर परियोजना के डिजाइन और इससे पड़ने वाले प्रभावों का खुलासा करें और इसके चलते इन्हें परियोजना से पड़ने वाले प्रभाव को कम करना होता है और सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है.

अब आप ईआईए नोटिफिकेशन में ऐसे समय में प्रतिगामी बदलाव कर रहे हैं जब हम आपके द्वारा मांगी गई सार्वजनिक टिप्पणी पर अपनी राय नहीं दे सकते हैं. क्या यह लोकतांत्रिक है? क्या यह सही है? क्या यह मानवीय भी है कि जब हम कोरोना वायरस से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं, लॉकडाउन के दौरान लाखों लोग पीड़ित हैं और इस दौरान हमें हमारे पर्यावरणीय भविष्य को लेकर और चिंतित किया जाए?

हम नागरिक जनहित में मांग करते हैं कि पर्यावरण मंत्रालय तत्काल प्रभाव से ड्राफ्ट ईआईए अधिसूचना, 2020 को वापस ले.

हम आशा करते हैं कि जब हम सभी कोविड आपातकाल का सामना कर रहे हैं, पर्यावरण मंत्रालय इस संकट से सीखेगी और ईआईए अधिसूचना में ऐसे संशोधन करेगी जो मौजूदा हानिकारक विकास को सही ठहराने के बजाय पर्यावरण की भूमिका को और मजबूत करेगा और सभी लोगों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेगा.

हालांकि लोगों की मांग के बावजूद मंत्रालय ने अधिसूचना को वापस लेने पर तो विचार नहीं किया लेकिन इस पर जनता द्वारा राय देने की समयसीमा को और बढ़ाने पर विचार-विमर्श जरूर किया गया था. लेकिन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने अपने ही अधिकारियों के प्रस्ताव खारिज किया और उतने दिन का समय नहीं दिया जितनी मांगी गई थी.

द वायर  ने अपनी पिछली रिपोर्ट में बताया था कि कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने इस नोटिफिकेशन पर लोगों की आपत्तियां या सुझाव प्राप्त करने के लिए 10 अगस्त, 2020 की तारीख निर्धारित करने की मांग की थी.

लेकिन जावड़ेकर ने एकतरफा फैसला लेते हुए इसे घटाकर 30 जून, 2020 कर दिया. केंद्रीय मंत्री ने इसके लिए कोई कारण नहीं बताया कि वे किस आधार पर ऐसा फैसला ले रहे हैं.

आरटीआई के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि मंत्रालय को हजारों की संख्या में ऐसे पत्र प्राप्त हुए थे जिसमें ये मांग की गई थी कि कोरोना महामारी के दौरान लोगों की मुश्किलों और इस अधिसूचना से व्यापक स्तर पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए जनता द्वारा जवाब सौंपने की समयसीमा बढ़ाई जाए.

EIA notification, 2020 by The Wire on Scribd

इस पर संज्ञान लेते हुए पर्यावरण मंत्रालय की संयुक्त सचिव गीता मेनन ने कहा कि लोगों की ये मांग जायज है और उन्होंने पूर्व में मंत्रालय द्वारा लोगों की राय लेने के संबंध में बढ़ाई गई समयसीमा की दलील देते हुए कहा कि इस मामले में भी ऐसा किया जाना चाहिए.

मेनन में प्रस्ताव रखा था कि ईआईए अधिसूचना प्रकाशित होने से 180 दिन यानी कि 23 सितंबर, 2020 तक की समयसीमा दी जानी चाहिए. हालांकि संयुक्त सचिव के इस प्रस्ताव को पर्यावरण सचिव सीके मिश्रा ने खारिज कर दिया.

मिश्रा ने कहा कि जनता द्वारा अधिसूचना पर टिप्पणी भेजने की आखिरी तारीख 10 अगस्त, 2020 निर्धारित की जानी चाहिए. सचिव के इस प्रस्ताव पर अन्य अधिकारियों ने भी सहमति जताई थी.

हालांकि जब ये मामला प्रकाश जावड़ेकर के पास पहुंचा तो उन्होंने अंतिम तारीख को घटाकर 30 जून 2020 कर दिया.

पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने इसे लेकर गहरी नाराजगी जाहिर की है. उन्होंने कहा है कि लॉकडाउन और कोरोना महमारी के चलते जनता की मजबूरियों का फायदा उठाकर सरकार इस तरह का पर्यावरण विरोधी कानून बनाना चाहती है.

प्रस्तावित पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2020 के जरिये सरकार साल 2006 की अधिसूचना में परिवर्तन करने जा रही है जिसके तहत विभिन्न परियोजनाओं को कार्य शुरू करने से पहले जांच से गुजरना पड़ता था और पर्यावरणीय मंजूरी लेनी होती थी.

इस ड्राफ्ट अधिसूचना में जिन विवादास्पद संशोधनों का प्रस्ताव किया गया है उनमें कुछ उद्योगों को सार्वजनिक सुनवाई (पब्लिक हीयरिंग) से छूट देना, उद्योगों को सालाना दो अनुपालन रिपोर्ट्स के बजाय एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने की इजाजत देना और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में लंबे समय के लिए खनन परियोजनाओं को मंजूरी देने जैसे प्रावधान शामिल हैं.

इस अधिसूचना के तहत उन परियोजनाओं की सूची और लंबी कर दी गई है जिन्हें सार्वजनिक जांच से छूट प्राप्त है, जैसे कि सिंचाई परियोजनाओं का आधुनिकीकरण, प्लांट कंस्ट्रक्शन, खनन गतिविधियां, अंतर्देशीय जलमार्ग, राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण आदि से संबंधित कार्यों को विभिन्न छूट मिली हुई है.