लाइन पार: शक्तिशालियों द्वारा शक्तिहीनों के अनवरत शोषण की गाथा

पुस्तक समीक्षा: ज्यां द्रेज और लुक लेरुथ द्वारा 'लाइन पार' में पालनपुर के माध्यम से भारत का शब्द चित्रांकन अलग और हटकर है. इतना ही अनोखा कि इससे पहले हमने भारत के किसी पालनपुर को इस तरह न तो देखा हो और न ही पढ़ा हो. वह भी तब, जब इस उपन्यास की फुर्ती से बदलती दृश्यात्मकता पाठक को अपने साथ दौड़ाए रखती हो और सुस्ताने का मौका नहीं देती हो.

(फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन)

एक शोध के सिलसिले में मुरादाबाद और चंदौसी के बीच (निकट बरेली) जरगांव के किनारे बसे एक छोटे से गांव ‘पालनपुर’ में एक वर्ष रहने के दौरान ज्यां द्रेज द्वारा लिखी डायरी में उपन्यास की संभावना देखने का श्रेय उनके मित्र लुक लेरुथ को जाना चाहिए. लेरूथ ने ही अंग्रेजी में ‘रंबल इन ए विलेज‘ नाम से इसे प्रकाशित करवाया. और अभी हाल ही में इस तेज-गति उपन्यास को अंग्रेजी से हिंदी में अनूदित करने का श्रमसाध्य कार्य अनुवादक अभिषेक श्रीवास्तव ने किया है, जो अब लाइन पार के नाम से आया है.

इसका लिखा जाना, इसे उपन्यास की शक्ल दिया जाना और इसे अनूदित किया जाना कतई आसान नहीं था. ये इसके विस्तृत फैलाव और इसके कथानक में उपस्थित कई मुड़ाव और घुमाव में बार-बार भटकते और उससे बाहर निकलते हुए, उनकी याद बनाए रखने या कहें उन्हें पकड़े रहने के क्रम में उनके छूटते जाने में महसूस होता है.

इस उपन्यास में युवा बैंकर अनिल सिंह हैं जो अपने मृत ज़मींदार चाचा (जिनकी हत्या हुई है) का एकमात्र वारिस होने की वजह से विरासत में मिली उनकी संपदा को हासिल कर उसका निष्पादन करने के लिए लंदन से पालनपुर भारत आए हैं. भारत आने के लिए उन पर उनकी प्रेमिका ने दबाव बनाया है. भारत आए अनिल सिंह के पास जो दो महंगे और शानदार कैमरे हैं और उन कैमरों में जरूरत के मुताबिक बदल-बदलकर लगाने के लिए उनके पास कुछ तरह के लेंस हैं, जिनका तकनीकी विवरण फोटो खींचने से पहले वे हर बार देते हैं.

इन लेंसों को उन्नीसवीं सदी से बीसवीं सदी के बीच (1869 से 1984) के उस भारत को, जो इस उपन्यास में मौजूद है, को देखतीं उन दो आंखों की तरह देखा जा सकता है जिनके पास गजब का ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ है.

कथानक में प्रारंभ से अंत तक एक मुख्य चरित्र की तरह मौजूद और अनिल के बैग से बार-बार बाहर आकर फोटो खींचते कैमरे भी इस उपन्यास के पाठक की आंखों को कैमरे में बदलने में देर नहीं लगाते. कुछ देर में पाठक की आंखें कैमरों की तरह व्यवहार करने लगती हैं जिसके चलते उपन्यास का हर चरित्र, घटनाक्रम, खेत-घर, पालनपुर से होकर गुजरने वाली रेलवे लाइनें और चरित्रों के बीच के आपसी हिंसक-षड्यंत्र भरे, अमानुषिक-संवाद तथा शोषण के परंपरागत सुने-पहचाने प्रकार- यह सब उसके लिए पढ़े जाने से अधिक देखे जाते दृश्य में बदल जाते हैं. लगता है जैसे ज्यां द्रेज ने इसे अपनी आंखों से अधिक कैमरों से देखा है और उसे ज़िंदगी के अंधेरे भरे स्टूडियो में फोटो पेपर पर उतारा (लिखा) है.

पालनपुर के माध्यम से ज्यां द्रेज और लुक लेरुथ का खींचा भारत का यह शब्द चित्रांकन अलग और हटकर है. इतना ही अनोखा कि इससे पहले हमने भारत के किसी पालनपुर को इस तरह न तो देखा हो और न ही पढ़ा हो. वह भी तब, जब इस उपन्यास की फुर्ती से बदलती दृश्यात्मकता पाठक को अपने साथ दौड़ाए रखती हो और इसके बावजूद कि उसमें स्पष्टता से बहुत कुछ छूटता भी जाता हो, उसे सुस्ताने का मौका नहीं देती हो.

कल्पना कीजिए तब एक दृश्य का दूसरे दृश्य से, एक चरित्र का दूसरे चरित्र से, एक घटना का दूसरी घटना से जुड़ाव बना रह पाना कितना कठिन होता है. मगर इस प्रक्रिया में ही कई बार पाठक के भीतर अधिकतर सुप्त, कभी-कभार जागने और ‘चकरा जाने वाली’ स्वभाविक गुणवत्ता का भी परिक्षण और कुछ उत्थान होता जाता है. भले ही इसके कथानक में प्रारंभ से ही ‘किंतु-परंतु’ नामक दरारें दिखाई देने लगती हों मगर इसमें जो समाज-रस है, जिसे समाज खुद को चरखी में पेरकर खुद निकालता है, वह उन सूराखों को स्वत: भरता जाता है और आप स्वयं को विचार से अधिक उस दैनिक व्यवहार के आंगन में खड़ा पाते हैं जहां वह सब विभिन्न रूपों और समय में स्वभाविक रूप से घटता है जिसे हम लाइन पार में पढ़ रहे होते हैं.

ज्यां द्रेज ने इस उपन्यास के उल्लेख में अपने वक्तव्य में राग दरबारी को याद किया है. अनुमान लगाया जा सकता है पालनपुर को देखे जाते समय कैमरे के पीछे टिकी उनकी और बाद में इसे डायरी की शक्ल में बांचते लुक लेरुथ की निगाह भी ‘रागदरबारीय’ निगाह रही है. तभी उनके देखे-गढ़े पात्र एक-दूसरे से अधिक रोचक होने की होड़ लगाते और एक दूसरे को गच्चा देते और एक-दूसरे से गच्चा खाते दिखते हैं.

लंदन से आकर अनिल उस वकील से मिलता है जिसने उसे भारत आने के लिए पत्र भेजा था. आश्चर्य की तरह वह अनिल के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता जिससे उसकी हर वक्त हर किसी को लूट-खसोट के लिए तैयार बैठे खूसट वकील या अपने क्लाइंट को डराकर उसे ब्लैकमेल करने वाले वकील की छवि बनती हो. जबकि भारतीय समाज के वकीलों को लेकर ‘रागदरबारीय-अनुभव’ कड़वे हैं जिसकी पाठक कल्पना भी करने लगता है, उस पर से अनिल प्रवासी भारतीय बैंकर है जिनके बारे में आम भारतीय धारणा होती है कि उनके पास विदेश में कमाई बहुत दौलत होती है जिसे लुटाने में वे कोई संकोच नहीं करते और अपने देश में समाज-सुधार उनका प्रिय शगल होता.

यहां तक कि अनिल उस पर इतना विश्वास करता है कि पालनपुर से लंदन वापस जाते समय वह चाचा का घर बेचकर मिले रुपये, सोना आदि पालनपुर में स्कूल चलाने के लिए, ट्रस्ट के माध्यम से, वकील के ही सुपुर्द कर जाता है. लाइन पार का पाठक सोचता रह जाता है कि वह अनिल की जगह होता तो सब बेच-बाचकर और सब इकट्ठा कर चला जाता. संशय उठ सकता है कि वकील ने छोड़ी हुई धनराशि हर माह स्मिता तक पहुंचाई होगी भी या नहीं?

पर नहीं पहुंचाई होती तो अपने पत्र में जीतन राम ने इसका जिक्र अवश्य किया होता. ‘दरकते जाते विश्वास में भी कहीं विश्वास दरकने से मना कर देता है’. क्या करें हम ‘धन-मन-तन’ से बेईमान ही इतने हैं कि इन बातों पर विश्वास नहीं होता और भारत में ऐसी जगह पर, ऐसे वकील के दुनिया में होने पर तो विश्वास होता ही नहीं.

पर पालनपुर में भी कमज़ोर मगर कुछ अच्छे लोग अनिल को मिलते हैं. पालनपुर पहुंचने से पहले ही अनिल की मुलाकात तीन लोगों से होती है जिनमें से एक ट्रेन के सफर में मिला कैप्टन है, जो आगे बार-बार लगभग ट्रेन की हर यात्रा में उसे मिलता है, जिसकी बातें बड़ी दिलचस्प और सूत्रात्मक होती हैं. दूसरा बाबू है, जो दलित है और जिसकी मां उसके चाचा की हत्या के जुर्म में थाने में बंद है. जिसका उसके चाचा द्वारा किया गया यौन शोषण पूरे पालनपुर में प्रचारित है. तीसरा शख्स केबीएस है जो जिसे जानते हुए लगता है जैसे अपने थाने, जेल और जिले का वही एकमात्र पुलिस अधिकारी है, और इस पूरे उपन्यास में वह हर जगह अंधेरगर्दी करता नज़र आता है और जो पालनपुर में ज़मींदार के गुर्गे भूपाल सिंह का बेटा है. जो अपने बाप की ही तरह है. जिससे बस नफ़रत ही की जा सकती है.

मात्र इतने से ही इस उपन्यास के सघनता भरे उलझाव और तीव्रता का अनुमान लगाया जा सकता है. पर भारत की एक और एक-सी लगती कहानी की तरह जिसके सरीखे चरित्र और कथानक हमें देश के कोने-कोने में मिल जाएंगे को, को पहचानने और पढ़ने के क्रम में पालनपुर में आई रेल के इंजन की तरह आपको दौड़ना पड़ेगा.

इस उपन्यास में खेती-मजदूरी के काम में खपे अन्याय के शिकार बहुसंख्य दलित परिवार हैं मगर दलित शब्द का उपयोग इस उपन्यास में न के बराबर हुआ है. फिर उसका उपयोग समाज में भी लेखों, व्याख्यानों और शासकीय आदेशों के अलावा कहां होता है? अत: हकीकत की तरह इस उपन्यास के पात्र भी सीधे जातिसूचक शब्द का खुलकर और बार-बार उपयोग करते हैं.

जिसमें वह जातिसूचक शब्द जिसके उपयोग पर हर बार प्रतिरोधी ‘हंगामा’ खड़ा होता है. शायद इस जातिसूचक शब्द के आपराधिक उपयोग पर आपत्ति लेने वालों में से किसी ने अभी इसे पढ़ा नहीं. ‘दुखी’ उसी जाति से आती है. पालनपुर में डल रही रेल लाइन का काम देखने आए अंग्रेज अफसर के सामने नाचने और उसके साथ सोने के लिए जमींदार के कहने पर मुखिया की पत्नी के द्वारा नीच जाति की होने के आधार पर उसका चयन किया जाता है.

हालाकि इस विमर्श के दौरान शक्तिशाली वर्ग की एक ऐसी स्त्री का भी जिक्र आता है जिसके पति का देहांत हो चुका है और जिसके बारे में सुना जाता है कि वह धन के लिए बहक जाती है, मगर उसे अधिक उम्र की ढली हुई और कुरूप हो चुकी मानकर छोड़ दिया जाता है. यदि वह युवा होती और दुखी पालनपुर में नहीं होती तो शायद ‘दुखी’ की जगह दांव उस पर लगाया जाता. पितृसत्ता को अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए जब किसी स्त्री के अनैतिक उपयोग की आवश्यकता होती है वह वृहद समाज के भीतर से सबसे पहले उसके कमजोर हिस्से से स्त्री ढूंढता है. और उसके न मिलने पर किसी भी वर्ग की स्त्री को अपना शिकार बनाने से नहीं चूकता.

ज्यां द्रेज बताते हैं कि हेमिंग और दुखी के ‘पालनपुर-स्वीकृत’ मिलन के परिणाम स्वरूप उस सरीखे एंगलो इंडियन जॉर्ज का जन्म होता है जिस जैसे एंगलो इंडियन अंग्रेजों की शादी कहीं न हो पाने की वजह से उनका विवाह रेल के इंजन से कर दिया जाता था. फिर वे रेल के इंजन के साथ ही उसका एक-एक पुर्जा पहचानते पत्नी और परिवार की तरह उसकी देखभाल करते हुए ब्रिटिश राज के समर्पित आज्ञाकारियों की तरह अपना जीवन बिता देते थे. पहले अधिकतर ट्रेन ड्राइवर एंगलो इंडियन ही पाए जाते थे.

लाइन पार के कई चरित्रों में से कुछ के बारे में ये अति-संक्षिप्त पंक्तियां हैं, जिन्हें उदारतापूर्वक प्रवेशिका के रूप में स्वीकार किया जा सकता है. इसके विस्तृत-वितान से पूर्ण परिचय तो इसे पूरी तरह पढ़कर ही किया जा सकता है. जैसे पाठक का अनिल के चाचा के घर में बंधे बकरे, बाबू की बकरी और रोशन को जबरदस्ती लोन में दी गईं उन तीन बीमार कमज़ोर बकरियों से परिचय आवश्यक है, जो लाइन पार के इस कथानक में चरित्रों की तरह ध्यान खीचती हैं. इसी तरह, उन सूराखों का भी जो अनिल चाचा के घर की दीवारों में हैं जिनसे लोग झांककर देखते हैं और अनिल जिन्हें बार-बार बंद करता है. अनिल को एक दिन के लिए खेत में मजदूरी करते देखना भी उतना ही रोचक है, जितना बाबू का अपनी बकरी को आखिर में मजेदारी से बेच देना.

दलितों के लिए भारतीय गांव नर्क जैसे रहे हैं इस कथन की पुष्टि इस उपन्यास में होती है. ये कैसी भारतीय शक्तिशाली निगाह है जो दलितों को, शक्तिहीनों को मनुष्य नहीं मानती बल्कि जब उसका मन होता है वह उन्हें खूटे पर बांध लेती है, लाठियों के दम पर उसे हांक लेती है और अपने हत्यारे मनोरंजन का हिस्सा बना लेती है. गांव में बमुश्किल दो जून की रोटी जुटा पाता-खाता कमज़ोर उससे बर्दाश्त नहीं होता. उसका पक्का बनता मकान और उसके खेत में खड़ी फसल उससे बर्दाश्त नहीं होती. उसके पंजे सरेआम उनकी स्त्रियों को दबोचने के लिए कसमसाते रहते हैं. संविधान अब भी उनकी रक्षा कर पाने में सक्षम नहीं है.

लाइन पार में भी शक्तिशाली, शक्तिहीनों की स्त्रियों को उनके घरों में घुसकर दबोचने, उनके घरों में उलीचकर तालाब का पानी भर देने, जर्जर स्कूल को उनके बच्चों के लिए उचित बताने और अपने वर्गीय भाई-बंधु को दलितों से दूर रहने, उनके साथ न उठने-बैठने की हिदायत देने में नहीं हिचकते. गांव में उनके लिए अब भी दलित बच्चों के टूटते-गिरते-ढहते स्कूल के पुनर्निर्माण से अधिक आवश्यक और पहले मंदिर और उनके घरों तक जाती सड़क का निर्माण है.

लाइन पार शक्तिशालियों द्वारा शक्तिहीनों के अनवरत शोषण की गाथा है, जिसके विरुद्ध विरोध के कुछ समझदार सूत्र हमें इस रफ्तार भरे उपन्यास के अंत में मिलते हैं.

विगत और गत में तेज आवाजाही करता जो कालखंड इस उपन्यास में लिया गया है उस काल में शक्तिशालियों और शक्तिहीनों के बीच बंटा भारतीय समाज कैसा रहा है और अब भी कैसा है, वह कितना बदला है और अब भी कितना बिगड़ा हुआ है. पतन और निरंतर क्षरण की शिकार होती श्रेष्ठताबोध की अतिरुग्ण मानसिकता से ग्रस्त मगर उसकी अधीनता स्वीकार किए उसके हाथों में खेलती ‘शक्ति’ के मोटे-मोटे बही-खाते उसके किए अन्याय से किस कदर भरते जाते रहे हैं, उसे इस उपन्यास में परखा जा सकता है. ज्यां द्रेज और लुक लेरुथ के लाइन पार के विस्तृत-विहंगम संसार को जानने के लिए लाइन पार करना आवश्यक है.

(लेखक कवि, सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक हैं.)