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मेघालय: अख़बार की संपादक पर फेसबुक पोस्ट के लिए हुई एफआईआर रद्द करने से अदालत का इनकार

द शिलॉन्ग टाइम्स की संपादक पैट्रीशिया मुखीम ने राज्य में ग़ैर-आदिवासी छात्रों पर हुए हमले को लेकर एक फेसबुक पोस्ट लिखी थी, जिसके लिए उन पर सांप्रदायिक तनाव भड़काने के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई थी.

Patricia mukhim facebook

पैट्रीशिया मुखीम. (फाइल फोटो: फेसबुक)

नई दिल्ली: मेघालय उच्च न्यायालय ने प्रदेश की वरिष्ठ पत्रकार पैट्रीशिया मुखीम की फेसबुक पोस्ट के खिलाफ पुलिस में दर्ज शिकायत रद्द करने से मना कर दिया है.

पद्मश्री से सम्मानित एवं द शिलॉन्ग टाइम्स समाचार पत्र की संपादक मुखीम की ओर से दायर याचिका का निपटारा करते हुए जस्टिस डब्ल्यू दिएंगदोह ने कहा कि इस मामले की जांच के लिए जांच एजेंसी को छूट दी जानी चाहिए ताकि कानून की उचित प्रक्रिया के अनुसार वह अपने निष्कर्ष पर पहुंचे.

उन्होंने 10 नवंबर को दिए अपने फैसले में कहा, ‘इसलिए अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने के लिए मुझे इस याचिका में कोई दम नहीं लगता है इसलिए इसे खारिज किया जाता है.’

द प्रिंट के मुताबिक जस्टिस दिएंगदोह ने कहा कि मुखीम का फेसबुक पोस्ट आदिवासी एवं गैर आदिवासी समुदायों के बीच सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली प्रवृत्ति का था.

गौरतलब है कि इस साल जुलाई में बास्केटबॉल कोर्ट में पांच लड़कों पर हमला हुआ था. हत्यारों का पता नहीं चलने के बाद मुखीम ने लावसोहतुन गांव के ‘दरबार’ (परिषद) पर फेसबुक के माध्यम से हमला बोला था. 

‘दरबार’ या ‘दोरबार शोन्ग’ खासी गांवों की प्रशासनिक इकाई है, जो पारंपरिक शासन चलाती है. इस घटना में कथित रूप से दो समूह- आदिवासी एवं गैर-आदिवासी- शामिल थे.

इस मामले में 11 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था और दो लोगों को गिरफ्तार किया गया था.

ग्राम परिषद ने सोशल मीडिया पर पोस्ट के लिए मुखीम के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी और आरोप लगाया था कि उनके बयान से सांप्रदायिक तनाव भड़का है और इससे सांप्रदायिक संघर्ष भी भड़क सकता है.

अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा था, ‘बास्केटबॉल खेल रहे कुछ गैर-आदिवासी युवाओं पर धारदार हथियार से हमला किया गया और वे अब अस्पताल में हैं, यह एक सरकार एवं पुलिस वाले राज्य में स्वीकार नहीं किया जा सकता है.’

हाईकोर्ट के फैसले के मुताबिक फेसबुक पोस्ट में आगे लिखा गया, ‘मेघालय में गैर-आदिवासियों पर इस तरह के हमले की निंदा की जानी चाहिए. इसमें से कई के पूर्वज दशकों से यहां पर रह रहे हैं, कुछ तो ब्रिटिश काल से ही यहां पर हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘और क्षेत्र के दोरबार शोन्ग के बारे में क्या? क्या उनकी आंखें और कान जमीन पर नहीं हैं? क्या वे अपने अधिकारक्षेत्र के आपराधिक तत्वों को नहीं जानते हैं? क्या उन्हें इसमें आगे नहीं आना चाहिए और उन हमलावरों की पहचान करनी चाहिए?’

इसके चलते बाद में उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए (धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने), 505 (किसी भी वर्ग या समुदाय को भकड़ाने के इरादे से बयान देना) और 499 (मानहानि) के तहत मामला दर्ज किया गया था.

हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में मुखीम ने मांग की थी कि उनके खिलाफ शिकायत और शुरू की गई कार्यवाही को रद्द कर दिया जाए.

उन्होंने दावा किया था कि उनका फेसबुक पोस्ट केवल पुलिस और दोरबार शोन्ग द्वारा मामले को संभालने के बारे में था. उन्होंने कहा कि उनका पोस्ट सद्भावना और सार्वजनिक हित में था.

हालांकि जस्टिस डब्ल्यू. दिएंगदोह ने कहा कि उन्होंने अपने पोस्ट में ‘आदिवासी एवं गैर-आदिवासी की सुरक्षा एवं अधिकारों की तुलना की है और उनका झुकाव एक तरफ रहा है. इसके चलते यह दो समुदायों के बीच सांप्रदायिक तनाव को भड़काने वाली प्रवृत्ति का है.’

पैट्रीशिया मुखीम ने कहा है कि वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी.

मालूम हो कि बीते साल एक अन्य मामले में मेघालय उच्च न्यायालय ने ‘द शिलॉन्ग टाइम्स’ अखबार की संपादक पैट्रीशिया मुखीम और प्रकाशक शोभा चौधरी को अवमानना के एक मामले में दोषी ठहराया था.

उच्च न्यायालय ने अखबार की संपादक एवं प्रकाशक पर दो-दो लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)