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उत्तर प्रदेश: गैंगस्टर विकास दुबे के कथित एनकाउंटर मामले में यूपी पुलिस को क्लीन चिट मिली

कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे और उसके साथियों की कथित मुठभेड़ की जांच कर रहे पूर्व जज बीएस चौहान की अगुवाई वाले आयोग ने राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. बताया गया है कि आयोग को यूपी पुलिस के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला और पुलिस के दावों को चुनौती देने के लिए कोई भी गवाह सामने नहीं आया.

विकास दुबे के कथित एनकाउंटर की जगह और पुलिस काफिले की दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी. (फोटो: पीटीआई)

विकास दुबे के कथित एनकाउंटर की जगह और पुलिस काफिले की दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी. (फोटो: पीटीआई)

लखनऊ: कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे और उसके पांच साथियों की कथित मुठभेड़ में मौत की जांच कर रहे आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को सबूतों के अभाव में क्लीन चिट दे दी है.

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बीएस चौहान की अगुवाई में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व जज शशिकांत अग्रवाल और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक केएल गुप्ता की सदस्यता वाले आयोग ने आठ महीने के बाद गत सोमवार को राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की.

आयोग के सदस्य केएल गुप्ता ने समाचार एजेंसी पीटीआई भाषा को बताया, ‘हां, आयोग ने सोमवार को राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है. इसकी एक प्रति उच्चतम न्यायालय को भी भेजी जाएगी. हालांकि उन्होंने रिपोर्ट की सामग्री के बारे में कुछ प्रकट करने से मना कर दिया.

गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि वे इस सिलसिले में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते. सूत्रों के मुताबिक जांच आयोग को पुलिस के खिलाफ कोई भी सबूत नहीं मिला है.


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एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘समाचार पत्रों तथा अन्य मीडिया माध्यमों में विज्ञापन दिए जाने के बावजूद पुलिस के दावों को चुनौती देने के लिए कोई भी गवाह सामने नहीं आया. इसके अलावा मीडिया से जुड़ा कोई व्यक्ति भी बयान दर्ज कराने के लिए सामने नहीं आया.’

अफसर ने बताया कि पुलिस के बयान का समर्थन करने के लिए गवाह मौजूद थे.

ज्ञात हो कि कानपुर के चौबेपुर थाना क्षेत्र स्थित बिकरू गांव में पिछले साल दो/तीन जुलाई की दरमियानी रात को विकास दुबे को गिरफ्तार करने गई पुलिस टीम पर उसके गुर्गों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी. अगले ही दिन पुलिस ने दुबे के दो साथियों प्रकाश पांडे और अतुल दुबे को कथित मुठभेड़ में मार गिराया था.

उसके बाद आठ जुलाई को 50,000 रुपये के इनामी और विकास दुबे का साथी अमर दुबे भी हमीरपुर जिले के मौदहा क्षेत्र में पुलिस के साथ एक कथित मुठभेड़ में मारा गया था.

पुलिस की इस कार्यवाही के सिलसिले में नौ जुलाई को प्रवीण दुबे उर्फ बउआ और प्रभात उर्फ कार्तिकेय क्रमशः इटावा और कानपुर जिलों में हुई पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे.

पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने विकास दुबे को नौ जुलाई को मध्यप्रदेश के उज्जैन में गिरफ्तार किया था. अगली सुबह कानपुर लाते वक्त रास्ते में हुई कथित मुठभेड़ में विकास दुबे भी मारा गया था.

गौरतलब है कि विकास दुबे तथा उसके पांच अन्य साथियों की कथित पुलिस मुठभेड़ में मौत के मामले में उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिकाएं दाखिल की गई थीं. न्यायालय ने राज्य सरकार के इन मुठभेड़ की जांच के लिए आयोग गठित करने के फैसले पर मुहर लगाई थी.


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हालांकि इसके बाद अगस्त महीने में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में इस जांच समिति के सदस्यों के राजनीतिक और पुलिस प्रशासन में पारिवारिक संबंधों का हवाला देते हुए समिति का पुनर्गठन की मांग की गई थी.

याचिका में कहा गया था कि यहां हितों के टकराव की स्थिति है और जांच प्रभावित किए जाने की संभावना है.

इससे पहले द वायर  ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि विकास दुबे एनकाउंटर में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जांच समिति के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान के भाई भाजपा विधायक हैं और समधी भाजपा सांसद हैं.

वहीं समिति के अन्य सदस्य पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता कानपुर जोन के आईजी के संबंधी हैं. ऐसी स्थिति में हितों के टकराव की संभावना के कयास लगाए जा रहे हैं.

विकास दुबे. (फोटो साभार: ट्विटर)

विकास दुबे. (फोटो साभार: ट्विटर)

इसी रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता वकील घनश्याम उपाध्याय ने जांच के लिए गठित जांच आयोग के अध्यक्ष शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश डॉ. बलबीर सिंह चौहान और दोनों अन्य सदस्यों के स्थान पर आयोग का पुनर्गठन की अर्जी दायर की थी.

हालांकि शीर्ष अदालत ने इससे इनकार करते हुए याचिका को ख़ारिज कर दिया था. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ता से सवाल किया था कि अगर किसी न्यायाधीश का रिश्तेदार राजनीतिक दल में है तो क्या इसे गैरकानूनी कृत्य माना जाएगा.

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ का कहना था कि ऐसे अनेक जज हैं, जिनके रिश्तेदार सांसद हैं.

पीठ ने उपाध्याय को फटकार लगाते हुए कहा था कि न्यायिक आयोग की अध्यक्षता करने वाले उसके किसी भी पूर्व जज पर मीडिया की खबरों के आधार पर आक्षेप नहीं लगाया जा सकता है.

पीठ ने कहा था, ‘ऐसे न्यायाधीश हैं जिनके पिता या भाई या रिश्तेदार सांसद हैं. क्या आप यह कहना चाहते हैं कि ये सभी न्यायाधीश दुराग्रह रखते हैं? यदि कोई रिश्तेदार किसी राजनीतिक दल में है तो क्या यह गैरकानूनी कृत्य है?’

इससे पहले 28 जुलाई 2020 को भी जांच आयोग के एक सदस्य और पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता को बदलने के लिए दायर आवेदन को खारिज करते हुए न्यायालय ने कहा था कि वह आयोग पर किसी तरह के आक्षेप लगाने की इजाजत याचिकाकर्ता को नहीं देगा.

याचिकाकर्ताओं घनश्याम उपाध्याय और अनूप प्रकाश अवस्थी ने आरोप लगाया था कि विकास दुबे एनकाउंटर को लेकर केएल गुप्ता ने पुलिस की दलीलों को सही माना था कि कहा था कि पुलिस की बातों पर यकीन किया जाना चाहिए.


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हालांकि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पक्षपात के आरोप वाले इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि गुप्ता की ईमानदारी पर उनके बयान के एक हिस्से को देखकर सवाल नहीं किया जा सकता है.

याचिका में गुप्ता के जिस बयान का जिक्र है वो कथित रूप से विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद मीडिया के साथ बातचीत में दिए गए थे.

मुठभेड़ की घटना के बाद 10 जुलाई 2020 को गुप्ता ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से कहा था, ‘पुलिस जो कह रही है वो हमें स्वीकार करना चाहिए. क्यों हम हमेशा नकारात्मक हो जाते हैं और पुलिस को गलत ठहराते हैं. एनकाउंटर नहीं किए जाते, वो हो जाते हैं.’

पीटीआई के मुताबिक, गुप्ता का कहना था कि दुबे के खिलाफ 60 से अधिक मामले थे. उन्होंने कहा, ‘वह कानून को जानता था और यह भी कि इसका दुरुपयोग कैसे किया जाता है. वह वर्षों से जेल से बाहर क्यों था? जेल से बाहर रहने का मतलब यह होगा कि वह अधिक अपराध करेगा.’

जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने घटनास्थल के दृश्य देखने के बाद मुठभेड़ के बारे में क्या महसूस किया, तो गुप्ता ने कहा, ‘दुर्घटनाएं असामान्य नहीं हैं. ऐसा हो जाता है. उन्हें उज्जैन से लाया जा रहा था और हो सकता है कि ड्राइवर थक गया हो. बरसात के मौसम में ऐसे हादसे होते हैं.’

इसके अलावा इंडिया टुडे के साथ एक टीवी डिबेट में भी गुप्ता ने कथित मुठभेड़ और सड़क दुर्घटना को लेकर दिए गए पुलिस के बयानों का समर्थन किया था. 

उनका कहना था, ‘आप संदेह के साथ शुरुआत कर रहे हैं. सारा ध्यान उसकी गाड़ी पर ही है. राष्ट्रीय राजमार्गों पर एसयूवी हर समय पलट जाती है. उसने यह सोचकर आत्मसमर्पण किया था कि उसे न्यायिक हिरासत मिलेगी, लेकिन इसकी कोई जरूरत नहीं थी. रिमांड के रूप में पुलिस के पास कोई मामला नहीं था. इसलिए यह स्वाभाविक है कि अगर उसने सोचा होगा कि यदि उसे पुलिस हिरासत में लेती है तो उसे मार दिया जाएगा, ऐसे में उसने भागने की कोशिश की होगी और इसी बीच गाड़ी पलट गई.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)