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लिम्पियाधुरा, लिपुलेख, कालापानी देश के अभिन्न अंग, भारत क्षेत्र में निर्माण रोके: नेपाल

बीते दिसंबर महीने में उत्तराखंड में एक चुनावी रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई उस घोषणा के बाद भारत और नेपाल के बीच सीमा का मुद्दा गर्मा गया है, जिसमें उन्होंने लिपुलेख क्षेत्र में सड़क विस्तार करने की बात कही थी. नेपाल लिपुलेख को अपना हिस्सा बताता रहा है.

दीवार पर बनी नेपाल के झंडे की तस्वीर. (प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

काठमांडू/नई दिल्ली: नेपाल सरकार ने रविवार को एक बार फिर दोहराया कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी देश के ‘अभिन्न अंग’ हैं और भारत से अपील की कि क्षेत्र में सभी निर्माण गतिविधियां बंद कर दे. साथ ही कहा कि वह कूटनीतिक माध्यम के जरिये सीमा मुद्दे को सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है.

काठमांडू में भारतीय दूतावास द्वारा एक बयान जारी करने के एक दिन बाद यह टिप्पणी आई है. बीते 15 जनवरी को भारतीय दूतावास ने कहा था कि नेपाल के साथ सीमा को लेकर भारत का रुख ‘सर्वविदित, सुसंगत है और स्पष्ट है. इस बारे में नेपाल की सरकार को बता दिया गया है.’

नेपाल सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया, ‘हमारा मत है कि स्थापित अंतर सरकारी तंत्र और माध्यम वार्ता के लिए सबसे उपयुक्त हैं.’

इसने कहा, ‘हमारे करीबी एवं मैत्रीपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों की भावना के अनुरूप लंबित सीमा मुद्दों का समाधान किया जा सकता है.’

संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ज्ञानेंद्र बहादुर कर्की ने रविवार को कहा कि नेपाल सरकार ‘इस तथ्य को लेकर दृढ़ और स्पष्ट है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्र नेपाल का अभिन्न अंग हैं.’

नेपाल सरकार के प्रवक्ता कर्की ने कहा, ‘नेपाल की सरकार भारत सरकार से अपील करती है कि वह नेपाली क्षेत्र से होकर गुजरने वाली सड़कों का निर्माण एवं विस्तार जैसे सभी एकतरफा कदम रोक दे.’

मंत्री ने कहा कि नेपाल की सरकार ‘दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का समाधान ऐतिहासिक संधि, समझौते, दस्तावेजों और मानचित्र और नेपाल तथा भारत के बीच निकट एवं दोस्ताना संबंधों के मुताबिक करने के लिए प्रतिबद्ध है.’

लिपुलेख (उत्तराखंड) में भारत द्वारा सड़क निर्माण के खिलाफ नेपाल में प्रदर्शन के बीच उनकी यह टिप्पणी आई है.

सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस ने बीते 14 जनवरी को एक बयान जारी किया था, जिसमें उसने लिपुलेख होकर सड़क के निर्माण का विरोध किया था.

बता दें कि 30 दिसंबर 2021 को उत्तराखंड के हलद्वानी में एक चुनावी रैली के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि उनकी सरकार लिपुलेख तक सड़क बना चुकी है और इसका विस्तार और आगे तक किया जा रहा है.

सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस ने बीते 14 जनवरी को कहा था कि लिपुलेख में सड़क निर्माण जारी रखने का भारत का कदम आपत्तिजनक है.

पार्टी ने कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को नेपाली क्षेत्र बताने का अपना रुख दोहराते हुए भारत से कालापानी क्षेत्र में तैनात अपने सैनिकों को तुरंत वापस बुलाने और ऐतिहासिक तथ्यों व साक्ष्यों के आधार पर उच्चस्तरीय बातचीत के माध्यम से सीमा विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करने का आग्रह किया था.

पार्टी ने कहा था कि नेपाल और भारत के बीच सीमा विवाद को 1816 की सुगौली संधि के आधार पर सुलझाया जाना चाहिए.

नेपाली अधिकारियों के मुताबिक, सुगौली संधि के अनुसार महाकाली नदी के पश्चिम का क्षेत्र नेपाल का है.

वहीं, पिछले साल नवंबर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में कहा था कि धारचूला होकर लिपुलेख दर्रे से मानसरोवर तक की सड़क के बारे में नेपाल में गलतफहमी पैदा करने का प्रयास किया गया था.

रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने भी यह दावा किया था कि तीर्थयात्री जल्द ही वाहन से कैलाश-मानसरोवर की यात्रा कर सकेंगे, क्योंकि केंद्र द्वारा घाटियाबागर से लिपुलेख तक की सीमा सड़क को पक्की सड़क में बदलने के लिए 60 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं.

सिंह ने पिछले महीने दोहराया था कि लिपुलेख के जरिये मानसरोवर तक के मार्ग को क्लियर कर दिया गया है.

लिपुलेख दर्रा, उत्तराखंड में कालापानी के पास एक सुदूर पश्चिमी स्थान है, जो नेपाल और भारत के बीच का सीमा क्षेत्र है.

भारत और नेपाल दोनों कालापानी को अपने क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा होने का दावा करते हैं. भारत उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के हिस्से के रूप में और नेपाल धारचूला जिले के हिस्से के रूप में इसे अपना क्षेत्र मानता है.

बता दें कि भारत द्वारा आठ मई 2020 को उत्तराखंड में लिपुलख दर्रे को धारचूला से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण 80 किलोमीटर लंबी सड़क को खोलने के बाद दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हो गए थे.

नेपाल ने यह कहते हुए इस सड़क के उद्घाटन का विरोध किया कि यह सड़क उसके क्षेत्र से होकर गुजरती है. इसके कुछ दिनों बाद नेपाल ने एक नया नक्शा पेश किया, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को उसके क्षेत्रों में दर्शाया गया, जिस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी.

हालांकि, जून 2020 में नेपाल की संसद ने देश के नए राजनीतिक नक्शे को मंजूरी दे दी थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)