भारत

बजट से पहले कार्यकर्ताओं ने कहा- सामाजिक सुरक्षा उपायों पर ख़र्च बढ़ाने की ज़रूरत

प्रगतिशील नागरिक समाज संगठनों, सामाजिक आंदोलनों, शिक्षाविदों और अन्य विशेषज्ञों के एक मंच जन सरोकार ने आगामी केंद्रीय बजट से पहले नरेगा, खाद्य सुरक्षा, पेंशन, कृषि, बैंकिंग और वित्त, जेंडर, पर्यावरण जैसे क्षेत्रों को लेकर अपनी अपेक्षाएं और मांगें जारी की हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: आगामी केंद्रीय बजट (2022-2023) से पहले नीति समर्थन, संसदीय जवाबदेही और सामाजिक आंदोलनों और प्रगतिशील राजनीतिक दलों के बीच तालमेल बनाने के लिए एक राष्ट्रीय मंच जन सरोकार ने वित्त मंत्री के नाम अपनी अपेक्षाओं और मांगों पर को जारी किया है.

प्रगतिशील नागरिक समाज संगठनों, सामाजिक आंदोलनों, जन संगठनों, शिक्षाविदों और अन्य विशेषज्ञों के इस नेटवर्क ने एक पत्र में कुछ प्रमुख क्षेत्रों जैसे नरेगा, खाद्य सुरक्षा, पेंशन, कृषि, बैंकिंग और वित्त, दलित और आदिवासी कल्याण, विशेष रूप से सक्षम लोगों, जेंडर और पर्यावरण को लेकर विस्तार से बात की है.

महामारी का प्रभाव

बयान में कहा गया है कि भारत में महामारी से पहले भी आर्थिक विकास में गिरावट देखी जा रही थी, हालांकि, भारतीय समाज के सबसे कमजोर वर्गों को इसके प्रतिकूल प्रभावों का खामियाजा भुगतना पड़ा है.

बयान में ऑक्सफैम और वर्ल्ड इनक्वॉलिटी लैब की हालिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए देश में बढ़ती आय और धन असमानता पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही बढ़ती बेरोजगारी, गरीबी और घरेलू आय में गिरावट की बात की गई है.

आगे कहा गया है, ‘दुनियाभर में सरकारों ने कोविड के दौरान और बाद में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ी राशि खर्च की है- ऋण माफ कर दिए गए हैं, बट्टे खाते में डाले गए ऋणों पर ब्याज, और नागरिकों को कोविड, बेरोजगारी और स्वास्थ्य में सुधार के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भत्ते और सामाजिक सुरक्षा उपाय प्रदान किए गए हैं. इसकी तुलना में भारत ने बहुत कम खर्च किया है.’

जनसरोकार का कहना है कि बेरोजगारी दर बढ़ने के साथ, घरेलू आय घट रही है, बढ़ती असमानता और गरीबी बढ़ रही है. केंद्रीय बजट 2021-22 में स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, पेंशन और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में समग्र कमी जैसे क्षेत्रों के लिए बजटीय आवंटन में बहुत कम या कोई बदलाव नहीं देखा गया है और महामारी ने केवल यह प्रदर्शित किया है कि सामाजिक सुरक्षा उपायों पर खर्च बढ़ाने की अधिक आवश्यकता है.

सरकार के उपाय कारगर नहीं

बयान में कहा गया है कि महामारी से पहले ही आर्थिक विकास गिरावट पर था, हालांकि, एमएसएमई, कृषि क्षेत्र, ग्राम और कुटीर उद्योग जैसे क्षेत्रों को भी बहुत नुकसान हुआ है, सरकार 75 वर्षों से अर्जित किए  सार्वजनिक संपत्ति को राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन और केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) के निजीकरण के माध्यम से संसाधनों,सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्ति और सार्वजनिक सेवाओं को बेचना जारी रखा है.  सार्वजनिक क्षेत्र को खत्म करने और सार्वजनिक संपत्तियों के मौद्रीकरण का अर्थ है हमारे राष्ट्रीय आर्थिक हितों, हमारी आर्थिक स्वतंत्रता, और संप्रभुता को अंतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी और कॉरपोरेट संस्थाओं के हितों के अधीन करना.

जन सरोकार के सदस्यों का सुझाव है कि इसके बजाय सरकार अलग-अलग और अधिक न्यायसंगत तरीकों से संसाधन जुटा सकती है.

जैसे बयान सबसे पहले कहता है, ‘अर्थव्यवस्था में वास्तविक संसाधन वर्तमान में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं: महत्वपूर्ण अप्रयुक्त क्षमता और बिना बिके खाद्यान्न भंडार है, ताकि बड़ा सरकारी खर्च, भले ही बिना किसी अतिरिक्त कर के वित्तपोषित हो.’

लेकिन उनके अनुसार ‘सिर्फ एक राजकोषीय घाटा, इन अप्रयुक्त संसाधनों का उपयोग बिना किसी मुद्रास्फीति के कारण ही करेगा; लेकिन यह अनावश्यक रूप से सरकार पर दावों के रूप में धन को निजी हाथों में डाल देगा. यह वह है जो सरकारी खर्च के बराबर वित्तीय संसाधन जुटाना रोकता है और वित्तीय संसाधन जुटाने की भी काफी गुंजाइश है.’

जन सरोकार समाधान के तौर पर कहता है कि दो प्रकार के कराधान के माध्यम से वित्तीय संसाधन जुटाना सबसे अच्छा तरीका है.

उसके अनुसार, शीर्ष 1 प्रतिशत आबादी के पास कुल निजी संपत्ति का 40 प्रतिशत हिस्सा यानी लगभग 300 लाख करोड़ रुपये हैं, इसलिए इस पर 2 प्रतिशत संपत्ति कर से भी 6 लाख करोड़ रुपये प्राप्त हों सकेंगे. लेकिन किसी भी संपत्ति कर को एक विरासत कर के साथ पूरक किया जाना चाहिए, अन्यथा धनी कराधान से बचने के लिए केवल अपनी संपत्ति को संतानों के बीच बांटेंगे.

बयान कहता है कि यदि जनसंख्या के सबसे धनी 1 प्रतिशत द्वारा केवल 5 प्रतिशत संपत्ति को हर साल संतान को हस्तांतरित किया जाता है, तो एक तिहाई (33 1/3 प्रतिशत) का विरासत कर 5 लाख करोड़ रुपये होगा. इस प्रकार अकेले इन दो करों से प्रति वर्ष 11 लाख करोड़ रुपये प्राप्त होंगे. यह कराधान चरणबद्ध तरीके से लगाया जा सकता है.

इस प्रकार, जनसरोकार ने अपने बयान में संभावित सामाजिक सुरक्षा खर्च को निधि मुहैया कराने के लिए सरकार को एक वैकल्पिक मॉडल दिया है.

केंद्रीय बजट 2022-2023 से अपेक्षाएं

इस संदर्भ में बयान में कहा गया है किीान मांगों से उनका मकसद सरकार का ध्यान अल्पसंख्यक के बजाय बड़े बहुमत के हित की ओर स्थानांतरित करना है- ताकि केंद्रीय बजट भारत के हर नागरिक की आकांक्षा को पूरा कर सके.

नरेगा

रोजगार गारंटी के लिए पीपुल्स एक्शन की रिपोर्ट का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2021-22 में काम करने वाले समान परिवारों के लिए 100 दिनों का रोजगार (जो कानून द्वारा अनिवार्य है) प्रदान करने के लिए कम से कम 64 लाख करोड़ की आवश्यकता होगी.

हालांकि बयान में कहा गया है कि नरेगा संघर्ष मोर्चा के एक अध्ययन से पता चलता है कि सक्रिय जॉब कार्ड वाले सभी परिवारों को 100 दिन का रोजगार देने के लिए 3.63 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी. (एक जॉब कार्ड को सक्रिय कहा जाता है यदि परिवार ने पिछले 3 वर्षों में कम से कम एक बार नरेगा के तहत काम किया हो)

जन सरोकार सदस्यों का यह भी कहना है कि प्रत्येक वित्तीय वर्ष में तीसरी तिमाही से ही नरेगा के लिए निधि समाप्त हो जाती है.

उन्होंने कहा, ‘नतीजतन, काम धीमा हो जाता है और वेतन भुगतान में देरी बढ़ जाती है. … वित्त वर्ष 2021-22 की पहली छमाही के भीतर, खजाने में कोई पैसा नहीं बचा था और 21 राज्यों ने नकारात्मक शुद्ध शेष दिखाया. हम वेतन के समय पर वितरण और धन में वृद्धि की मांग करते हैं.’

बयान में यह मांग भी की गई है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के लिए मजदूरी दर के नए सूचकांक पर अधिनियम- ग्रामीण (सीपीआई-आर), कम से कम नरेगा मजदूरी दर को राज्यों में न्यूनतम मजदूरी के बराबर किया जाए.

खाद्य सुरक्षा

बयान में कहा गया है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को सार्वभौम बनाया जाना चाहिए ताकि हर उस व्यक्ति को सब्सिडी वाला राशन दिया जा सके जो इसकी मांग करता है.

मांग की गई है कि सबसे पहले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत कोटा को 2022 के लिए जनसंख्या अनुमानों के आधार पर सभी कमजोर व्यक्तियों, विशेष रूप से प्रवासी श्रमिकों, बेघर, यौनकर्मियों, ट्रांस लोगों और सभी कमजोर समुदायों को शामिल करने के लिए बिना राशन कार्ड के तत्काल बढ़ाया जाए.

इसके साथ मांग की गई है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर इनकी खरीद करते समय बाजरा और अन्य पौष्टिक वस्तुएं जैसे दालें और तेल प्रदान करने के लिए पीडीएस का विस्तार करें, जिससे जहां संभव हो स्थानीय किसानों से उनकी आजीविका को समर्थन और विविध स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहन मिले.

इसके साथ ही आईसीडीएस के तहत गर्म पका हुआ भोजन और निजी ठेकेदारों के बजाय ग्राम सभाओं या पंचायतों द्वारा प्रदान और प्रबंधित मध्याह्न भोजन को तुरंत पुनर्जीवित किया जाना चाहिए और भोजन में अंडे और पोषक तत्वों से भरपूर आहार (बाजरा सहित) को शामिल किया जाना चाहिए.

इसके अलावा आखिर में मांग की गई है कि मातृत्व अधिकार को सार्वभौमिक और बिना शर्त बनाया जाए और एनएफएसए के प्रावधानों के अनुसार लाभ की राशि को बढ़ाकर कम से कम 6,000 रुपये प्रति शिशु किया जाए.

पेंशन

बयान में मांग की गई है कि पेंशन कवरेज का आदर्श रूप से सभी गैर-आयकर भुगतान करने वाले बुजुर्गों को शामिल करने के लिए विस्तार करना चाहिए जिससे उम्र-प्रेरित समस्याओं का प्रबंधन करने के लिए वो सक्षम हों.

जन सरोकार के अनुसार, कम से कम, कार्यक्रम को उन सभी परिवारों तक विस्तारित करने की आवश्यकता है जिनके पास सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) द्वारा उल्लिखित सात में से आर्थिक कल्याण का एक भी मानदंड नहीं है.

बयान कहता है कि वर्तमान में, इसकी 3 योजनाओं के माध्यम से कार्यक्रम 3 करोड़ (33 मिलियन) व्यक्तियों को सेवा प्रदान करता है. यदि एसईसीसी का उपयोग सभी लाभार्थियों के लिए किया जाता है, न कि केवल विधवाओं के लिए तो कार्यक्रम में सेवा देने वाले लोगों की संख्या 10.9 करोड़ (109 मिलियन) परिवारों में बुजुर्गों, विधवाओं और विकलांगों तक बढ़ाई जा सकती है, जो विभिन्न स्तरों के अभाव का सामना कर रहे हैं.

साथ ही इन्हें मुद्रास्फीति के लिए अनुक्रमित किया जाना चाहिए और वेतन दरों जैसे नियमित संशोधनों से गुजरना चाहिए.

बयान कहता है कि बुजुर्गों, विकलांगों और विधवाओं के लिए प्रावधान वित्तीय उपलब्धता का मामला नहीं हो सकता है, क्योंकि यह सम्मान के जीवन के अधिकार का मामला है. एनएसएपी 2021 -2022 (आरई) के लिए केंद्रीय बजट 9200 करोड़ है. यदि संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 41 की भावना को ऐसे लोगों के लिए सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करके बनाए रखा जाना है, सकल घरेलू उत्पाद के 0.45 प्रतिशत के वर्तमान अल्प आवंटन से सकल घरेलू उत्पाद के कम से कम 1.45 प्रतिशत तक परिव्यय को पर्याप्त रूप से बढ़ाया जाना चाहिए.

कृषि और संबद्ध क्षेत्र

कार्यकर्ताओं ने लिखा है कि ऋण से मुक्ति प्रदान करें. 5 एकड़ से कम के किसानों के लिए ऋण माफी, काश्तकार किसानों, महिला किसानों और कृषि और संबद्ध क्षेत्र की गतिविधियों को करने वाले ग्रामीण श्रमिकों को नकद हस्तांतरण योजनाओं के तहत सहायता उपलब्ध करवाए जाएं.

बयान कहता है कि इसके अलावा छोटे और सीमांत किसानों, महिला किसानों और भूमिहीन श्रमिकों को खेत पर टिकाऊ खेती से संबंधित कार्यों और कार्यों को मनरेगा निवेश के लिए योग्य बनाकर मनरेगा सहायता प्रदान करें.  किसानों (किसानों, डेयरी और पोल्ट्री किसानों, और मछुआरे श्रमिकों) को आवश्यक इनपुट और सेवाएं उपलब्ध कराने में सार्वजनिक क्षेत्र को शामिल करें ताकि एक लाभकारी और टिकाऊ व्यवसाय बनाया जा सके, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, कृषि विज्ञान के अभ्यास का समर्थन किया जा सके.

जन सरोकार का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के कार्यान्वयन के लिए धन उपलब्ध, विकेंद्रीकृत भंडारण और विपणन के लिए सहायता प्रदान करके कृषि और संबंधित क्षेत्र की गतिविधियों का समर्थन करने के लिए सार्वजनिक खरीद को बोर्ड भर में योग्य बनाया जाए. इसके  साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों को पारिस्थितिक और आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए सामाजिक सहकारी समितियों और छोटे ग्रामीण गैर-कृषि व्यवसायों का समर्थन किया जाए.

सामाजिक कार्यकर्तों की यह मांग भी है कि सभी कृषि-पारिस्थितिकी क्षेत्रों में वाटरशेड विकास, बाढ़ नियंत्रण और जलवायु अनुकूलन के लिए सार्वजनिक निवेश के लिए आवंटन का विस्तार करें. आरक्षित मूल्य संवर्धन गतिविधियों के लिए छोटे व्यवसाय के लिए एगमार्क प्रमाणीकरण की आवश्यकता है. कृषि और ग्रामीण गैर-कृषि क्षेत्रों का समर्थन करने के लिए एसएयू, आईसीएआर, सीएसआईआर, नाबार्ड और सिडबी के माध्यम से अनुसंधान का विस्तार करने के लिए सार्वजनिक निवेश बढ़ाएं.

बैंकिंग व वित्त

जन सरोकार का कहना है कि सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण के लिए बैंकिंग कानूनों में संशोधन के प्रस्ताव को वापस लिया जाए. अधिक शाखाएं खोलकर और कर्मचारियों की संख्या को दोगुना किया जाए. साथ ही कहा गया है कि आवश्यक कार्यों की आउटसोर्सिंग बंद की जाए क्योंकि लाखों कर्मचारी बिना किसी नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और आरक्षण के अनुबंध प्रणाली में हैं.

इसके साथ ही कानून के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कर्मचारी निदेशकों की नियुक्ति करें। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) को बंद करें और रिकवरी के लिए कड़े कानून बनाएं. स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को मजबूत बनाया जाए और महिलाओं के लिए अलग बैंक बनें.

जन सरोकार की मांग है कि 11 लाख व्यापार प्रतिनिधियों को बैंक कर्मचारियों के रूप में और ग्राहक सेवा बिंदुओं को शाखाओं के रूप में परिवर्तित किया जाए. निम्न और मध्यम आय वाले ग्राहकों के लिए बैंक शुल्क हटाया जाए.

इसके अलावा, एलआईसी इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (आईपीओ) को रोका जाए  क्योंकि एलआईसी का स्वामित्व पॉलिसीधारकों के पास है, जिन्हें बोनस के रूप में लाभ का 95% मिलता है और जिन्होंने पूंजी में 95 करोड़ रुपये और सॉल्वेंसी मार्जिन में 1,86,000 करोड़ रुपये का योगदान दिया है.

दलित और आदिवासी

बयान में सवाल उठाया गया है कि केंद्रीय वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में प्रतिबद्ध दायित्व के केंद्रीय हिस्से के रूप में अगले 6 वर्षों के लिए अनुसूचित जाति के 4 करोड़ (40 मिलियन) छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति (पीएमएस) के लिए 35,219 करोड़ रुपये की वृद्धि की बात कही, लेकिन पिछले साल अनुसूचित जाति के लिए बजट आवंटन वित्त वर्ष 2021-22 में केवल 3,415.62 करोड़ रुपये था और अनुसूचित जनजातियों के लिए  वित्त वर्ष 2021-22 बीई में 1993 करोड़ है जो पूरे देश में पूरे एससी/एसटी छात्रों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए अनुपातहीन है.

मांग की गई है कि कम से कम  7000 करोड़ रुपये आवंटन हो.

इसके अलावा मांग है कि दलित महिलाओं के लिए विशिष्ट आवंटन प्रदान किया जाना चाहिए और दलित महिलाओं के लिए एक विशेष घटक योजना स्थापित की जानी चाहिए. दलित महिलाओं, पुरुषों, बच्चों, विकलांग लोगों और समलैंगिक और ट्रांस व्यक्तियों के खिलाफ अपराध को रोकने के लिए आवंटन बढ़ाया जाए.

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जाति-आधारित भेदभाव और हिंसा के शिकार किसी भी व्यक्ति को सुरक्षा देने के लिए स्पष्ट तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है. वर्तमान आवंटन पूरी तरह से अपर्याप्त है. ऐसे में मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित की जानी चाहिए और जाति और नस्ल आधारित अत्याचारों के पीड़ितों को अधिक मुआवजा दिया जाना चाहिए.

विशेष तौर पर सक्षम लोग

जन सरोकार कहता है कि विशेष तौर पर सक्षम व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करने सहित, विकलांग व्यक्तियों के सशक्तिकरण के लिए विभाग के आवंटन में वृद्धि हो. कार्यकर्ताओं ने समान विकलांगता पेंशन को न्यूनतम 3,500 किए जाने की बात कहते हुए इसे मूल्य सूचकांक से लिंक  करने; अक्षमताओं संबंधी लागतों को ध्यान में रखते हुए समान योजनाओं में अतिरिक्त 25 प्रतिशत देने और इस तरह के लोगों को अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) कार्ड देने की बात कही है.

उनका यह भी कहना है कि सभी विशेष तौर पर सक्षम लोगों के लिए प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में आय मानदंड को हटे, पुनर्वास सेवाओं में लगे विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों को क्लस्टर करने के प्रस्ताव को स्थगित किया जाए, सभी पात्र लोगों को जीवन और अन्य बीमा कवरेज मिलें, जिसमें सहायक उपकरणों और पुनर्वास आवश्यकताओं के लिए कवरेज शामिल हो, साथ ही मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए अधिक आवंटन किए जाएं।

छोटे और मध्यम पैमाने के उद्योग और शिल्प

जन सरोकार का कहना है कि विकेंद्रीकृत निर्माण और लघु उद्योगों के विस्तार के लिए आवंटन में पर्याप्त वृद्धि की जाए, स्थानीय पारिस्थितिक परिस्थितियों के अनुकूल और स्थानीय ज्ञान पर निर्माण और कार्यकर्ता सहकारी समितियों द्वारा संचालित छोटे या मध्यम स्तर के उद्यमों के माध्यम से उत्पादित किए जा सकने वाले वस्त्र, जूते, घरेलू सामान जैसे क्षेत्रों का आरक्षण बढ़े.

इसके साथ ही शिल्प (क्राफ्ट्स)  को बनाए रखने और पुनर्जीवित करने के लिए आवंटन में पर्याप्त वृद्धि की जाए, साथ ही हस्तनिर्मित उत्पादन और वस्तुओं पर जीएसटी और अन्य कराधान को हटाने और ऐसे उत्पादों के विपणन में सहायता दी जाए.

जेंडर

सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों ने कहा है कि राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) के तहत बढ़ा हुआ आवंटन मिले।

उनके अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा सहायता कार्यक्रम (ACBGA 2021) के तहत 2 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएं और ट्रांसजेंडर व्यक्ति शामिल हैं. कोरोना वायरस महामारी और लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के लिए बढ़ते खतरों को देखते हुए इस कार्यक्रम के लिए आवंटन में पर्याप्त वृद्धि की जानी चाहिए.

साथ ही, कर्ज में डूबी सभी महिलाओं को महामारी के दौरान कर्ज की मोहलत मिलनी चाहिए. दूसरा एमएफआई को विनियमित किया जाए और एमएफआई की ब्याज दरें सीमित हों.

जन सरोकार चाहता है कि जेंडर बजट के भाग ए में योजनाओं के आवंटन में वृद्धि हो. महिलाओं के खिलाफ हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच विशेष रूप से विशेष रूप से महिलाओं की सुरक्षा और इससे संबंधित योजनाओं के लिए योजनाओं का आवंटन बढ़ाया जाए, साथ ही ट्रांसपर्सन बजट को जेंडर बजट स्टेटमेंट में शामिल किया जाए.

पर्यावरण

बयान में कहा गया है, ‘यह देखते हुए कि पर्यावरण की सुरक्षा अर्थव्यवस्था सहित सभी मानव जीवन के आधार पर है, बजट का कम से कम 4% पर्यावरण क्षेत्र को आवंटित किया जाना चाहिए (वर्तमान में यह 1% से काफी नीचे है). इसमें विभिन्न प्रकार के प्रदूषण को कम करने और समाप्त करने के लिए बहुत अधिक आवंटन शामिल होना चाहिए, पारिस्थितिक तंत्र और उनके आसपास जैव विविधता के संरक्षण के लिए समुदायों को समर्थन, विकेंद्रीकृत और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों के लिए प्रोत्साहन, और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील उत्पादों के साथ बेकार और जहरीले उत्पादों को बदलना शामिल होना चाहिए.’

आगे कहा गया है कि सरकार और अन्य एजेंसियों द्वारा पर्यावरण कानूनों, नीतियों और मानदंडों के अनुपालन की निगरानी के लिए संवैधानिक रूप से अनिवार्य पर्यावरण आयुक्त के कार्यालय की स्थापना हो.

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