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सामाजिक ताने-बाने पर चोट और बढ़ती सांप्रदायिकता पर कॉरपोरेट वर्ग चुप क्यों है

वर्तमान परिस्थितियों को लेकर कॉरपोरेट अग्रणियों के बीच पसरे विराट मौन में शायद ही कोई अपवाद मिले. यह बात अब शीशे की तरफ साफ हो गई है कि मौजूदा निज़ाम में कॉरपोरेट समूहों और हिंदुत्व वर्चस्ववादी ताकतों की जुगलबंदी नए मुकाम पर पहुंची है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

सेलेब्रिटी खिलाड़ी और अभिनेताओं के बीच एक विचित्र समानता दिखाई देती है. अपने खेल के मैदान से परे या अपनी रील जिंदगी से परे वह शायद ही कभी बोलते दिखाई देते हैं. ऐसा नहीं कि वह विज्ञापनों में अवतरित नहीं होते और न ही तरह तरह के रंगारंग कार्यक्रमों में पूरी चमक-दमक के बीच अपनी हाजिरी नहीं लगाते, लेकिन इससे परे वह मौन ही ओढ़े रहते हैं.

पता नहीं उनके आंखों पर कैसी पट्टी पड़ी रहती है कि अपनी आस्था के चलते मासूमों की सड़कों पर की जा ही भीड़ हत्या, अपनी मर्जी से प्रेम करने वाले जोड़ों पर समाजी और सियासी ताकतों के हमले या सार्वजनिक मंचों से अल्पसंख्यकों के जनसंहार के किए जाने वाले आह्वान, कुछ भी उन्हें दिखाई नहीं देता, न सुनाई देता है.

कॉरपोरेट अग्रणी भी गुणात्मक तौर पर इससे भिन्न नहीं होते.

ऐसा लग सकता है कि तमाम चिल्लाहटों और कराहों को सुनते हुए उनकी भी चेतना भी वैसे ही बोथर हो जाती है, वह भी जब बोलते हैं मुनाफे-घाटे की बात या बादशाह और उसके वज़ीरों की सलामती या उनकी बरकत से आगे नहीं जाते.

उनकी स्क्रिप्ट आगे शायद ही बढ़ती है.

लाजिम है कि पिछले दिनों जब हिंदुस्तान की सबसे बड़ी बायोफार्मास्यूटिकल्स कंपनी की संस्थापक मोहतरमा किरण मजूमदार शॉ ने स्क्रिप्ट से हटकर कुछ बात कही, तब लगा कि एक नई ताज़ी बयार बही है.

दरअसल, उन्होंने मुल्क में बढ़ते तथा बढ़ाए जा रहे धार्मिक बंटवारे का मुद्दा उठाया और साफ-साफ कहा कि आईटीबीटी अर्थात इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और बायोटेक्नोलॉजी क्षेत्र में भारत की ग्लोबल लीडरशिप पर उसके विपरीत प्रभाव होंगे. अपने ट्वीट में उन्होंने इस बात की दुहाई भी दी कि कर्नाटक में साझा संस्कृति की जो विरासत है, उससे यह प्रतिकूल होगा.

कोई यह कह सकता है कि उनका वक्तव्य बहुत सामान्य था, उन्होंने अपनी बात को आर्थिक आवरण में लपेटा, बात जो भी हो, लेकिन सुनकर अच्छा लगा कि कम से कम उन्होंने साहस तो जुटाया.

बताया जा रहा है कि पहले हिजाब विवाद, फिर हलाल विवाद और अब कर्नाटक के मंदिरों के आसपास गैर हिंदू व्यापारियों को काम करने से की जा रही मनाही आदि के चलते वह क्षुब्ध थीं और उन्हें लगा कि उन्हें अपना मौन तोड़ना चाहिए.

जैसे कि उम्मीद की जा सकती है कि असहमति के इस स्वर के लिए ही वे दक्षिणपंथी ट्रोल्स का निशाना बनीं, अलबत्ता उनके समर्थन में भी तमाम आवाज़ें उठीं, लेकिन गौरतलब था कि इस सूची में कॉरपोरेट समुदाय के किसी अग्रणी का नाम नहीं था, भले वह शॉ के साथ नियमित बात करते हों या उनके साथ अन्य व्यापारिक आदि संबंध भी हों.

कॉरपोरेट अग्रणियों के बीच फैले इस विराट मौन में शायद ही कोई अपवाद मिले. आप यह भी कह सकते हैं कि आज के वक्त़ के लिए उनका मूलमंत्र बना है ‘बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो.’

शायद अग्रणी राहुल बजाज- जो कुछ माह पहले ही दिवंगत हुए- के जीवन की शायद आखिरी सार्वजनिक उपस्थिति (क्योंकि उसके कुछ माह बाद ही कोरोना महामारी के चलते ऐसे सभी कार्यक्रमों पर पाबंदी लगी थी) को हम याद कर सकते हैं, जिस दौरान जनाब अमित शाह के वक्तव्य के बाद सभागार में बैठे राहुल बजाज ने उठकर उनसे कुछ तीखे सवाल पूछे थे.

सवालों का फोकस भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं, महात्मा गांधी के हत्यारे का महिमामंडन, उद्याोग जगत में व्याप्त डर की भावना आदि पर था. गौरतलब था कि सभागार में बैठ कॉरपोरेट जगत के तमाम सम्राटों और अग्रणियों में से किसी ने भी खड़े होकर राहुल बजाज की बातों का समर्थन नहीं किया था, गोया वह किसी दूसरे ग्रह की बात कर रहे हों.

आप व्यापक संवैधानिक मुददों और सामाजिक समस्याओं की बात ही छोड़ दें, कॉरपोरेट अग्रणियों की यह निष्क्रियता/अधीनता/दब्बूपन अपने निजी मामलों में भी दिखता है.

अभी पिछले साल की ही बात है जब सत्ताधारी पार्टी के करीबी एक पत्रिका ने इंफोसिस जैसी देश की अग्रणी ब्लू चिप कंपनी पर तरह-तरह के आरोप लगाए थे, यहां तक कि उसे ‘एंटी नेशनल’ तक कह दिया था और कहा था कि वह ‘नक्सलवादियों, टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की मददगार है.

वजह महज इतनी ही थी कि भारत सरकार के लिए उपरोक्त कंपनी ने तैयार किए इनकम टैक्स पोर्टल, जिसका संचालन वही कर रही थी, इसमें लगातार कुछ तकनीकी दिक्कतें आ रही थीं. महज इसी बात पर राष्ट्र्रीय स्वयंसेवक संघ की करीबी कही जाने वाली उपरोक्त पत्रिका ने यह हमला बोला था.

यही वह वक्त़ था कि टाटा समूह तथा देश के कई अग्रणी बिजनेस प्रतिष्ठानों पर केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्राी पीयूष गोयल ने सीआईआई की एक सभा में ऐसे ही अनर्गल आरोप लगाए थे. उन्हें कहा गया था कि वह ‘राष्ट्रीय हितों के लिए अधिक कर नहीं रहे हैं.

दोनों ही मामलों में बाद का घटनाक्रम आंखें खोलने वाला था. इस तथ्य के बावजूद कि यह आरोप बेबुनियाद थे, दोनों कंपनियों में से किसी ने भी कोई आधिकारिक प्रतिवाद नहीं किया. चूंकि किसी भी पार्टी की तरफ से कोई प्रतिवाद नहीं हुआ, मामला वहीं दफन हो गया.

‘हम दो, हमारे दो’

आप यह कह सकते हैं कि कॉरपोरेट समूहों का यह मौन इस वजह से दिखाई देता है क्योंकि सरकार ‘डंडा और प्रलोभन’ की नीति पर बखूबी चलती है. अपने करीबी उद्योगसमूहों, जो सरकार की भाषा बोलने के लिए तैयार हों, पर विशेष अनुग्रह दिखाना, उनके कर्जे माफ कर देना, वहीं असहमति रखने वाले उद्योगसमूहों या उनके मालिकानों पर तमाम सरकारी एजेंसियों के मार्फत- फिर चाहे इनकम टैक्स हो, ईडी हो या सीबीआई- कोई कार्रवाई शुरू करना.

हम जीएमआर समूह को याद कर सकते हैं – जो एक वक्त एयरपोर्ट ऑपरेटर समूहों में नंबर एक था, जो सबसे अधिक लाभकारी मुंबई एयरपोर्ट का भी संचालन करता था. गौरतलब है कि इन्हीं वजहों से इस एयरपोर्ट के ऑपरेशन को किसी अन्य समूह को बेचने में उसकी कोई रुचि नहीं थी, दूसरी तरफ अडानी समूह इस एयरपोर्ट का संचालन करना चाह रहा था और उसे खरीदना चाह रहा था.

बाद का वास्तविक घटनाक्रम किस तरह आगे बढ़ा यह ठीक से मीडिया में नहीं आ पाया, लेकिन अपने तमाम विरोध के बावजूद अचानक जीएमआर समूह ने इस एयरपोर्ट को अडानी समूह को बेच दिया.

सभी जानते हैं कि हर बड़े कॉरपोरेट समूह के कारोबार में कहीं न कहीं अपारदर्शिता होती ही है, मुमकिन है उन्हीं की तरफ इशारा होने के बाद जीएमआर समूह इस हस्तांतरण के लिए तैयार हुआ हो.

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने संसद के पटल पर सरकार पर हमला करते हुए इशारों इशारों में यही बात कही थी कि किस तरह मौजूदा सरकार ‘हम दो और हमारे दो’ की नीति पर चलती है, जिसमें इशारा सत्ताधारी समूह के दो अग्रणी नेताओं पर और सरकार के लिए प्रिय दो कॉरपोरेट खानदानों की तरफ था.

वर्ष 2000 के आसपास उद्योग जगत में नामालूम समझे जा रहे अडानी समूह की महज दो दशकों की यात्रा काबिलेगौर है, जहां आलम है कि वह दुनिया की अग्रणी दस कंपनियों की कतार में अभी खड़ा है.

इस कहानी पर कभी विशेष फोकस बनाकर लोग लिखेंगे ही, लेकिन फिलवक्त इतनी ही ख़बर सुन लें कि अभी पिछले ही सप्ताह ख़बर आई थी कि स्टेट बैंक आफ इंडिया ने नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए- जो अब अडानी एयरपोर्ट है- 12,270 करोड़ का कर्ज माफ कर दिया.

सबसे ताकतवर और सबसे बड़े जनतंत्र का फर्क

दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र में कॉरपोरेट सम्राटों का मौन या उनकी अधीनता की तुलना हम दुनिया के सबसे ताकतवर जनतंत्र के कॉरपोरेट समूहों के व्यवहार के साथ करके देखें तो एक फर्क नज़र आता है.

हम याद कर सकते हैं कि जिन दिनों ट्रंप सत्तासीन हुए और उन्होंने अपनी श्वेत वर्चस्ववादी नीतियों को आगे बढ़ाना शुरू किया, तब किस तरह कई कॉरपोरेट समूहों ने अपने स्तर पर उनका विरोध किया.

मिसाल के तौर पर अपने शुरुआती महीनों में ही उन्होंने चुनिंदा मुस्लिम बहुल देशों से प्रवास (इमिग्रेशन) पर अचानक पाबंदी लगा थी, जिसके चलते न केवल दुनिया के तमाम एयरपोर्ट पर हाहाकार मच गया, हजारों लोग जहां-तहां फंसे दिखाई दिए.

कई कॉरपोरेट समूहों ने- और उनकी संख्या नगण्य नहीं थी- इस ‘अन्यायपूर्ण आदेश’ को चुनौती दी. एयरबीएनबी (Airbnb) जिसने पाबंदी के चलते प्रभावित लोगों के लिए मुफ्त आवास का प्रबंधन किया तो गूगल कंपनी ने इमिग्रेंट अधिकारों के लिए सक्रिय संगठनों की सहायता के लिए तत्काल एक फंड का ऐलान किया.

यह जानते हुए कि उन्हें ऐसे कदमों का खामियाजा भुगतना पड़ेगा, कॉरपोरेट समूहों के एक हिस्से ने इस बात को महसूस किया कि उन्हें इस मसले पर बोलना ही चाहिए. ऐसा नहीं था कि कुछ ही समय पहले बोइंग जैसे विशाल कॉरपोरेट समूह को व्यापार समझौतों के पक्ष में अपनी बात रखने के लिए- जो बात राष्ट्रपति ट्रंप के एजेंडा के खिलाफ थी- किस तरह शेयरों की कीमतों में गिरावट झेलनी पड़ी थी, इस घटना से वह वाकिफ नही थे.

क्या इस फर्क का महज इस आधार पर स्पष्टीकरण दिया जा सकता है कि यहां संस्थाओं को खोखला किया जा रहा है- जो पहले से ही बहुत मजबूत नहीं थी- और किस तरह सत्ताधारी पार्टी ने इन संस्थाओं का बेतहाशा इस्तेमाल करके अपने राजनीतिक विरोधियों पर किस तरह नकेल डालने की कोशिश की है.

शायद इसे यूं भी समझा जा सकता है कि ‘विकसित समाजों के बरअक्स जहां मुक्त बाजार का चिंतन और उदारवाद साथ-साथ आगे बढ़ा है, विकासशील मुल्कों में आर्थिक हित सांस्कृतिक सोपानक्रम और हिंदू वर्चस्ववाद को बनाए रखने में अन्तगुंथित होते हैं.’ [As opposed to advanced societies where freemarket thinking and liberalism have gone hand in hand, economic interests are interlocked with interest in the maintenance of cultural hierarchies and the Hindu supremacies that the lynchings claim to defend.]

वैसे यह मौजूदा परिदृश्य का एक चिंताजनक पहलू है कि न्यायपालिका जो अभी तक वंचितों और शोषितों के लिए उम्मीद की एक किरण बन कर उपस्थित थी, उसकी भी भूमिका ऐसे कई मामलों में अपेक्षा के अनुरूप नहीं दिखती है.

जितने लंबे समय से चुनावी बॉन्ड का मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय के सामने पड़ा रहा (जिसे उठाने की बात कुछ दिन पहले ही मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने की है), जिसमें कॉरपोरेट समूहों द्वारा राजनीतिक पार्टियों को दिए जा रहे चंदे में व्याप्त अपारदर्शिता पर फोकस था; जिस तरह देश के एक राज्य जम्मू कश्मीर को रातोंरात दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांट दिया गया; जितने दिनों से बंदी प्रत्यक्षीकरण के मामले सर्वोच्च न्यायालय के सामने लंबित रहे हैं, ऐसे कई मुद्दे हैं जिससे संकेत मिल सकते हैं.

मालूम हो कि अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद अमेरिकी न्यायपालिका ने अपने कई फैसलों से राष्ट्र्रपति ट्रंप को काफी बेचैन कर दिया था.

आखिर माजरा क्या है?

कॉरपोरेट समूहों का जनाब मोदी के प्रति सम्मोहन एनडीए सरकार- जो विगत लगभग आठ साल से चल रही है- से पहले का है.

हम याद कर सकते हैं कि इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई के शुरुआती सालों में जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सफल सरकार चल रही थी, उन दिनों में भी कई कॉरपोरेट समूहों के अग्रणी गुजरात में आयोजित ‘वाइब्रेंट गुजरात समिट’ में भाग लेने जाते थे, जिनका आयोजन राज्य सरकार करती थी.

ऐसे ही सम्मेलनों में इन्हीं में से अगुआ उद्योगपतियों ने मोदी के प्रधानमंत्री बनने की कामना की थी, ऐलान किया था.

‘गुजरात मॉडल’ के नाम पर राज्य में उन दिनों सत्तासीन मोदी सरकार द्वारा नवउदारवादी मॉडल का खुलेआम स्वीकार, गुजरात आकर निवेश करने के लिए उद्योगतियों को दिए जा रहे खुले निमंत्रण, वहां मौजूद ‘औद्योगिक शांति’ (जिसकी वजह राज्य में ट्रेड यूनियन गतिविधियों पर लगे तमाम अंकुश आदि थे) और वर्ष 2002 के दंगों के बाद गुजरात में निर्मित अत्यधिक ध्रुवीकृत समाज, यह ऐसे तमाम पहलू थे जो उद्योगपतियों को आकर्षित करते थे.

इसके बरअक्स उन दिनों केंद्र में सत्तासीन यूपीए सरकार, जिसने जनाक्रोश को देखते हुए कल्याणकारी नीतियों की तरफ पुनर्वापसी शुरू की थी, यहां तक उसने जमीन अधिग्रहण के बहाने जो बिल बनाया उसके चलते किसानों की जमीनें कॉरपोरेट समूहों को मिलना काफी दुश्वार हो गया था, बाज़ार शक्तियों को खुली छूट देने के बजाय उन पर नियंत्रण कायम करने की नीति यूपीए सरकार अपना रही थी, आदि ऐसे कई पहलू थे कि कॉरपोरेट समूहों के लिए मोदी मुक्तिदाता दिख रहे थे.

शायद सबसे अहम बात थी उद्योगपतियों के समक्ष एक अत्यधिक ध्रुवीक्रत समाज था, जहां व्यापक जनांदोलन की कोई गुंजाइश नही थी हम समझ सकते हैं कि पूंजी के रणनीतिकार इस संभावना को अच्छी तरह समझते हैं कि जैसे-जैसे उनकी नीतियों का असर बढ़ेगा, जिस तरह नवउदारवादी नीतियां जनता के बड़े हिस्से में दरिद्रीकरण, वंचना को बढ़ावा देंगी, तो भूख या जीवनयापन के बुनियादी मसलों पर जबरदस्त प्रदर्शन/जनांदोलन हो सकते हैं.

और यह भी सही है कि ‘न्यू इंडिया’ के नाम पर, देश को आगे बढ़ाना है कहते हुए उन्हें अधिक समय तक बहलाया-फुसलाया नही जा सकता.

पड़ोसी मुल्क श्रीलंका- जो कभी नवउदारवादी रास्ते का मॉडल समझा जाता था- का उदाहरण सभी के सामने है, जहां ऐसी ही नीतियों के चलते जनता में जबरदस्त हलचल हो रही है. सरकार के बने रहने पर संकट पैदा हो गया है.

यह बात अब शीशे की तरफ साफ हो गई है कि मौजूदा निजाम में कॉरपोरेट समूहों और हिंदुत्व वर्चस्ववादी ताकतों की जुगलबंदी नए मुकाम पर पहुंची है.

कॉरपोरेट समूहों को जहां बेतहाशा पैसे कमाने की छूट मिली है वहीं हिंदुत्व वर्चस्ववादी जमातों को ‘संस्कृति’ को फैलाने का जिम्मा दिया गया है, भले ही यह संस्कृति सत्तर साल से अधिक वक्त़ पहले उस वक्त़ नवस्वाधीन मुल्क द्वारा अपनाए संविधान के मूल सिद्धांतों और मूल्यों के खिलाफ पड़ती हो.

अंग्रेजी जुबां में एक मुहावरा चलता है, जिसकी जड़ें अरेबिक बताई जाती हैं कि Speech is silver, silence is golden, यानी बोलना अगर चांदी है, तो चुप्पी सोना है.

इस मुहावरे का असली निहितार्थ शायद देश के कॉरपोरेट सम्राट बखूबी समझते हैं.

(सुभाष गाताडे वामपंथी एक्टिविस्ट, लेखक और अनुवादक हैं.)