नई दिल्ली: जनजातीय सुरक्षा मंच (जेएसएम) के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ज्ञापन सौंपकर उन आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जे से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव की मांग की है, जिन्होंने अन्य धर्म अपना लिया है.
जनजातीय सुरक्षा मंच, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) समर्थित वनवासी कल्याण आश्रम से संबद्ध एक आदिवासी संगठन है. यह संगठन पूरे देश में धर्मांतरित आदिवासियों- मुख्य रूप से ईसाई धर्म अपनाने वालों की डि-लिस्टिंग की मांग करता रहा है.
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, संगठन ने आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी और संवैधानिक सुरक्षा उपायों की मांग की है. इसकी प्रमुख मांगों में लोकुर समिति द्वारा निर्धारित मानदंडों के आधार पर ‘अनुसूचित जनजाति’ की वैधानिक परिभाषा तय करना, संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में संशोधन या स्पष्टीकरण करना और आदिवासी रीति-रिवाजों और परंपराओं के संरक्षण के लिए विशेष कदम उठाना शामिल हैं.
दिल्ली में शुक्रवार (29 मई) को आयोजित एक प्रेस वार्ता में जेएसएम के पदाधिकारियों ने संगठन की पुरानी मांग दोहराते हुए कहा कि जो आदिवासी धर्मांतरण के बाद अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था, रीति-रिवाज और जीवन-पद्धति छोड़ चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजातियों के लिए निर्धारित आरक्षण और अन्य लाभ नहीं मिलने चाहिए.
धर्मांतरण बढ़ने का दावा
वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने बताया कि यह ज्ञापन प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों को सौंपा गया है. उन्होंने कहा, ‘हमें आश्वासन मिला है कि न्याय किया जाएगा.’
सत्येंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि आदिवासी समुदायों में धार्मिक धर्मांतरण काफी बढ़ा है और यह सामाजिक तथा राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बन गया है.
जेएसएम के प्रतिनिधियों के अनुसार, 2011 की जनगणना में दर्ज लगभग 12 करोड़ आदिवासी आबादी में से अनुमानतः 1.5 करोड़ से 2 करोड़ लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया है.
जेएसएम के राष्ट्रीय सह-संयोजक राजकिशोर हांसदा ने कहा कि प्रधानमंत्री के साथ हुई चर्चा में ‘आदिवासी कल्याण से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक मुद्दों’ पर विशेष रूप से बात हुई.
संगठन के सूत्रों के अनुसार, प्रतिनिधिमंडल ने अनुसूचित जातियों (एससी) पर लागू व्यवस्था जैसी व्यवस्था अनुसूचित जनजातियों के लिए भी लागू करने की मांग की है. उनका कहना है कि यदि कोई आदिवासी अपनी पारंपरिक जनजातीय मान्यताओं और प्रथाओं को त्यागकर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसे अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना जाना चाहिए.
संगठन का दावा है कि इस प्रकार की व्यवस्था की सिफारिश 1969 में संयुक्त संसदीय समिति द्वारा की गई थी और सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों में भी इस दृष्टिकोण को समर्थन मिला है.
जेएसएम ने सरकार से इस पूरे मुद्दे को अनुसूचित जनजातियों के राष्ट्रीय आयोग (एनसीएसटी) के पास विस्तृत अध्ययन और जांच के लिए भेजने की मांग की है.
संगठन ने स्पष्ट किया कि उसकी मांगें किसी धर्म विशेष के विरोध में नहीं हैं. उसका कहना है कि यदि सरकार आर्थिक रूप से कमजोर धर्मांतरित लोगों को सहायता देना चाहती है, तो इसके लिए अलग कल्याणकारी व्यवस्था बनाई जा सकती है, लेकिन अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित कोटे का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए.
