यूपी: हाईकोर्ट ने गोहत्या मामले में दो लोगों की हिरासत रद्द की, कहा- रासुका लगाने की कोई वजह नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोहत्या मामले में शामली के रहने वाले आरोपी दो व्यक्तियों की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनते हुए कहा कि कथित घटना के संबंध में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका), 1980 के तहत जारी हिरासत आदेश अवैध है, क्योंकि इस घटना से किसी तरह की क़ानून व्यवस्था या सार्वजनिक शांति भंग नहीं हुई; न ही इसका असर सांप्रदायिक सौहार्द पर पड़ा. ऐसे में रासुका के तहत हिरासत का आदेश सही नहीं है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

नई दिल्ली:  गो-हत्या से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), 1980 के तहत जारी हिरासत आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने पाया कि यह कथित घटना किसी सार्वजनिक स्थान पर नहीं, बल्कि एक घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी और इसे लेकर कोई हिंसा या कानून व्यवस्था की स्थिति सामने नहीं आई, ऐसे में रासुका लगाना सही नहीं है.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा, ‘कथित घटना, जिसमें एक गाय को मारा गया था, की वजह से न तो कोई हिंसा हुई, न ही सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बिगड़ी, और न ही सांप्रदायिक सौहार्द में कोई खलल पड़ा; जबकि रासुका के तहत हिरासत में लेने के लिए इन चीज़ों का होना ज़रूरी है.’

उल्लेखनीय है कि शामली के रहने वाले इशम उर्फ़ इसम और समीर की तरफ़ से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) रिट याचिकाओं को मंज़ूर करते हुए जस्टिस राजीव मिश्रा और जस्टिस अजय कुमार की बेंच ने निर्देश दिया कि उन्हें तुरंत हिरासत से रिहा किया जाए.

इस संबंधमें हाईकोर्ट ने 26 मई को अपने फैसले में शामली के ज़िला मजिस्ट्रेट (डीएम) के हिरासत के आदेश को, साथ ही राज्य सरकार द्वारा बाद में जारी किए गए पुष्टि आदेश को भी रद्द कर दिया.

इस मामले में याचिकाकर्ता के वकील ने हिरासत आदेश को इस आधार पर चुनौती दी थी कि याचिकाकर्ताओं का कथित कृत्य उनके घर की चारदीवारी के बाहर नहीं हुआ था, और इसलिए यह  ‘सार्वजनिक व्यवस्था भंग’ की श्रेणी में नहीं आता.

यह भी प्रस्तुत किया गया कि प्रतिवादी राज्य प्राधिकारियों द्वारा दायर किए गए जवाबी हलफनामे में ऐसा कुछ नहीं कहा गया था कि याचिकाकर्ता के कृत्य के कारण कोई सांप्रदायिक हिंसा हुई हो, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक शांति भंग हुई हो अथवा किसी व्यक्ति को कोई चोट पहुंची हो.

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि आरोपित घटना चहारदीवारी के भीतर हुई थी और इसके कारण न कोई सांप्रदायिक हिंसा हुई, न सार्वजनिक शांति और व्यवस्था में कोई बाधा उत्पन्न हुई. इससे सांप्रदायिक सौहार्द में भी कोई खलल पड़ा. इसलिए यह रासुका का मामला नहीं है.

अदालत ने यह भी कहा, ‘उपरोक्त चर्चा को देखते हुए यह निष्कर्ष निकलता है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत पारित हिरासत आदेश को न तो कानून की दृष्टि से और न ही तथ्यों के आधार पर सही ठहराया जा सकता है. अतः, यह आदेश इस अदालत द्वारा रद्द किए जाने योग्य है.’

मामले के तथ्यों के अनुसार, शामली के डीएम ने याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ ‘उत्तर प्रदेश गोहत्या निवारण अधिनियम, 1955’ के तहत दर्ज एफआईआर के आधार पर रासुका के तहत हिरासत का आदेश पारित किया था.

हिरासत के आधारों के अनुसार, पुलिस को 23 अप्रैल, 2025 को कुछ लोगों द्वारा गोहत्या किए जाने के संबंध में सूचना मिली थी. घर के अंदर जांच करने पर पुलिस को एक कटा हुआ सिर, पैर, खाल और मांस बरामद हुआ. पशु चिकित्सक द्वारा वैज्ञानिक जांच किए जाने पर बरामद मांस की पहचान ‘बीफ़’ (गाय के मांस) के रूप में हुई. शेष सामग्री की पहचान बछड़े के अवशेषों के रूप में की गई.

यह दावा किया गया कि चूंकि हिंदू समुदाय की भावनाएं आहत हुई थीं, इसलिए आम जनता में असंतोष और तनाव का माहौल देखा गया, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा.

अधिकृत अधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद जिलाधिकारी ने 7 जुलाई, 2025 को आदेश जारी किया, जिसमें निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ताओं को 12 महीने के लिए हिरासत में रखा जाए. राज्य सरकार ने 19 अगस्त को इस आदेश की पुष्टि भी कर दी थी.