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कर्नाटक: शिक्षा के ‘भगवाकरण’ के विरोध में कई विद्वानों-लेखकों का सरकारी निकायों से इस्तीफ़ा

राज्य सरकार द्वारा गठित एक समिति ने हाल ही में कक्षा 6 से 10 तक की सामाजिक विज्ञान और कक्षा 1 से 10 तक की कन्नड़ भाषा की पाठ्यपुस्तकों में संशोधन करते हिए भगत सिंह, टीपू सुल्तान, पेरियार आदि से संबंधित अध्यायों को कथित तौर पर पाठ्यक्रम से हटाया या संक्षिप्त कर दिया है. वहीं, दसवीं की एक किताब में संघ संस्थापक केबी हेडगेवार का एक भाषण शामिल किया गया है.

कर्नाटक के प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा मंत्री बीसी नागेश. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: कर्नाटक के कई विद्वानों और शिक्षाविदों ने राज्य सरकार की समितियों और निकायों से इस्तीफा देकर राज्य में चल रहे शिक्षा के ‘भगवाकरण’ का विरोध किया है.

कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सत्ता में आने के बाद सामाजिक विज्ञान और भाषा की पाठ्यपुस्तकों की जांच करने के लिए 2020 में रोहित चक्रतीर्थ की अध्यक्षता में एक संशोधन समिति गठित की गई थी, उस समिति ने हाल ही में कक्षा 6 से 10 तक की सामाजिक विज्ञान और कक्ष 1 से 10 तक की कन्नड़ भाषा की पाठ्यपुस्तकों में संशोधन किया है.

इसके तहत क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह, मैसूर शासक टीपू सुल्तान, लिंगायत समाज सुधारक बसवन्ना, द्रविड़ आंदोलन के अग्रणी पेरियार और सुधारक नारायण गुरु के अध्यायों को कथित तौर पर पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है या उन्हें बहुत छोटा या संक्षिप्त कर दिया गया है. कन्नड़ कवि कुवेम्पु से संबंधित तथ्यों को भी कथित रूप से तोड़ा-मरोड़ा गया है.

इस बीच, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के एक भाषण को कक्षा 10 की संशोधित पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया है.

द हिंदू के मुताबिक, राष्ट्रकवि डॉ. जीएस शिवरुद्रप्पा प्रतिष्ठान के अध्यक्ष रहे लेखक एसजी सिद्दारमैया, एचएस राघवेंद्र राव, नटराज बुडालू और चंद्रशेखर नांगली ने सोमवार को मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई को पत्र लिखकर अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया.

उनके पत्र में कहा गया है, ‘राज्य के शिक्षा, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में हालिया असंवैधानिक हमले और दबाव ने हमें चिंतित कर दिया है. सरकार की चुप्पी और उन लोगों पर कार्रवाई करने में ढिलाई बरतना, जो खुले तौर पर सांप्रदायिक घृणा फैलाकर राज्य और संघीय ढांचे को कमजोर कर रहे हैं, ने हमें चिंतित और डरा दिया है.’

सिद्दारमैया ने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री बीसी नागेश को भी पत्र लिखा है और अपनी कविता ‘मनेगलसदा हुदुगी’ को कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में शामिल करने संबंधी अनुमति वापस ले ली है.

इससे पहले, दो प्रतिष्ठित लेखकों- देवनूरा महादेव और जी रामकृष्ण- ने भी पाठ्यपुस्तकों में उनका लेखन शामिल करने के लिए दी गई अनुमति वापस ले ली थी.

रिपोर्ट के अनुसार, हम्पा नागराजैया ने भी राष्ट्रकवि कुवेम्पु प्रतिष्ठान के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और कहा कि सरकार चक्रतीर्थ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही, जबकि उन्होंने कुवेम्पु और राज्य गीत के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की है.

बोम्मई को लिखे नागराजैया के पत्र में लिखा है, ‘चूंकि सरकार ने न केवल कुवेम्पु और राष्ट्रगान को बदनाम करने वाले लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, बल्कि उन्हें आधिकारिक समिति का सदस्य बनाया, इससे लोगों में गलत संदेश जाता है.’

वहीं, शिक्षाविद वीपी निरंजनाराध्या ने भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर अपने काम के लिए राज्य सरकार से सम्मान लेने से इनकार कर दिया.

द हिंदू के मुताबिक, उन्हें मिले आमंत्रण के जवाब में उन्होंने कहा, ‘राज्य सरकार ने शिक्षा का सांप्रदायिकरण व भगवाकरण किया है और इस प्रक्रिया में किसी भी संवैधानिक मूल्यों और शिक्षा नीति का पालन नहीं किया गया है. चूंकि यह अभ्यास और जिस कार्यक्रम में मुझे आमंत्रित किया गया है, दोनों का नेतृत्व शिक्षा मंत्री करते हैं, इसलिए मैं संवैधानिक मूल्यों के साथ खड़ा हूं और इसका (सम्मान) बहिष्कार करता हूं.’

कई छात्र समूहों ने भी बदलावों का विरोध किया है और आगे विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाई है.