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यूपी: पुलिस हिरासत में मारपीट का वायरल वीडियो सहारनपुर का ही है, पीड़ितों के परिजनों ने पुष्टि की

शनिवार 11 जून को सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया था, जिसमें पुलिस हिरासत में कुछ युवकों को बेरहमी से पीटे जाते हुए देखा जा सकता था. दावा किया गया कि वीडियो सहारनपुर जिले के कोतवाली थाने का है. हालांकि, पुलिस लगातार इन दावों को ख़ारिज करती रही लेकिन अब वीडियो में दिख रहे लोगों के परिजन सामने आए हैं और कह रहे हैं कि वीडियो सहारनपुर का ही है.

वायरल वीडियो का स्क्रीनशॉट जिसमें पुलिस हिरासत में युवकों को पीटा जा रहा है.

नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं द्वारा पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ टिप्पणियों के विरोध में उत्तर प्रदेश में 10 जून को हुए प्रदर्शनों को लेकर गिरफ्तारी और अन्य पुलिस कार्रवाई का दौर जारी है.

शनिवार 11 जून को सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया था जिसे खूब शेयर किया गया. इसमें पुलिस हिरासत में कुछ युवकों को बेरहमी से पीटे जाते हुए देखा जा सकता है.

शुरुआत में तो वीडियो के स्थान का पता नहीं चल सका कि उक्त घटना कहां की है, लेकिन दावा किया गया कि वीडियो सहारनपुर जिले के कोतवाली थाने का है.

एनडीटीवी के सौरभ शुक्ला की जांच के मुताबिक, वीडियो में दिख रहे लोगों के परिजनों का कहना है कि वीडियो वाकई सहारनपुर का है. और वे जोर देकर कहते हैं कि उनके रिश्तेदारों को हिरासत में प्रताड़ित किया गया, जैसा कि वीडियो में देखा जा सकता है. हालांकि, पुलिस लगातार इन दावों को खारिज कर रही है.

हिरासत में पीटे जाने वालों में से एक की पहचान सहारनपुर के पीरगली निवासी मोहम्मद अली के रूप में हुई है.

अली की मां ने उन्हें वीडियो में पहचान लिया और एनडीटीवी को बताया कि उसे हिरासत में प्रताड़ित किया गया और मारा-पीटा गया. उन्होंने कहा, ‘उसे उपद्रवी कहा जा रहा है. उसके हाथ (पिटाई से) सूज गए हैं.’

वीडियो में एक अन्य व्यक्ति मोहम्मद सैफ हैं. एनडीटीवी ने उनके परिवार के हवाले से ऐसा दावा किया है.

सैफ की बहन ने चैनल को बताया, ‘जब हम उससे जेल में मिले, हमने देखा कि उसके हाथ सूजे हुए थे और उसके पैरों में चोट के निशान थे. उन्हें पानी और इलाज भी नहीं दिया जा रहा है.’

द वायर से बात करते हुए सहारनपुर के पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार ने कहा, ‘जिस स्टेशन पर हिरासत में हिंसा हुई थी, उसके स्थान का पता लगाया जा रहा है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हम पुष्टि कर रहे हैं कि यह सहारनपुर में हुआ या मुरादाबाद में?’

मीडिया को दिए अपने बयान में एसपी कुमार ने इस बात से साफ इनकार किया है कि वीडियो सहारनपुर में शूट किया गया था.

वायरल वीडियो इस शनिवार को ट्विटर पर सामने आया था और इसे उत्तर प्रदेश के देवरिया से भाजपा विधायक शलभ त्रिपाठी ने शेयर किया था.

‘देशद्रोहियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई’

विधायक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्व मीडिया सलाहकार त्रिपाठी ने अपने पोस्ट में पुलिस की कार्रवाई को प्रदर्शनकारियों को ‘रिटर्न गिफ्ट’ बताया था.

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने त्रिपाठी के बयान की निंदा की थी. तृणमूल कांग्रेस के साकेत गोखले द्वारा उनके और संबंधित पुलिस थाने के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत की गई थी. शिकायत की स्थिति ज्ञात नहीं है.

द वायर ने शलभ त्रिपाठी से संपर्क किया और उनसे उनके द्वारा शेयर किए गए वीडियो के बारे में और उसके बाद मानवाधिकार आयोग से उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग के बारे में पूछा.

त्रिपाठी ने कहा, ‘जो भी कार्रवाई की जानी चाहिए, वह की जा रही है. पुलिस के भी मानवाधिकार हैं और उन लोगों के भी जिन्हें दंगाइयों और उपद्रवियों ने निशाना बनाया.’

द वायर ने पूछा कि क्या उनके वीडियो से यह आभास होता है कि वह पुलिस की बर्बरता का ‘जश्न’ मना रहे हैं?

उन्होंने कहा, ‘उपद्रवियों, दंगाइयों और देशद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने पर हर सच्चे भारतीय को खुश होना चाहिए. मैं उनके खिलाफ की गई कार्रवाई का जश्न मनाता रहूंगा.’

द वायर ने सहारनपुर में पुलिस हिरासत में प्रताड़ना दिखाने वाले वीडियो पर प्रतिक्रिया मांगने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस अरुण मिश्रा से संपर्क किया. उनकी प्रतिक्रिया मिलने पर इस रिपोर्ट में जोड़ी जायेगी.

बहरहाल, त्रिपाठी अकेले भाजपा नेता नहीं हैं जिन्होंने प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई का मुखरता से समर्थन किया है.

10 जून को विरोध प्रदर्शन के बाद आदित्यनाथ के मीडिया सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने ट्विटर पर लिखा, ‘याद रखें, हर शुक्रवार के बाद एक शनिवार जरूर आता है’. इस कथन के साथ उन्होंने एक इमारत को ध्वस्त करते हुए बुलडोजर की तस्वीर डाली.

सहारनपुर में बुलडोजर कार्रवाई

उत्तर प्रदेश पुलिस ने सहारनपुर से 80 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है और 10 जून के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में पूरे उत्तर प्रदेश में कुल 13 एफआईआर दर्ज की गई हैं.

विरोध के बाद से मामले में गिरफ्तार किए गए दो मुस्लिम आरोपियों, मुज़्ज़मिल और 17 वर्षीय अब्दुल वक़ीर, के घरों को विरोध के ठीक एक दिन बाद शनिवार, 11 जून को ध्वस्त कर दिया गया था.

पुलिस स्थानीय निकाय के अधिकारियों की एक टीम के साथ दो आरोपियों के घरों पर पहुंची और उनके घरों के कुछ हिस्सों को तोड़ दिया, जिनके बारे में उनका दावा है कि ये अवैध निर्माण हैं.

द वायर से बात करते हुए अब्दुल के भाई गुलबहार ने बताया कि उनके घर में क्या हुआ था.

गुलबहार ने कहा, ‘जब पुलिस आई तब घर पर सिर्फ महिलाएं थीं. पुलिस ने कहा, ‘अपने भाई को बुलाओ, वरना तुम्हारे घर के ऊपर बुलडोजर चला दिया जाएगा.’ उसे ले जाने के बाद पुलिस की और गाड़ियां मौके पर पहुंची, एक बुलडोजर आया और हमारे घर को गिरा दिया. उसे (अब्दुल) पुलिस के हवाले कर दिया गया, फिर बुलडोजर चलाने का क्या मतलब था?’

अब्दुल अपनी किशोरावस्था में है और अपने भाइयों में सबसे छोटा है. उनके परिवार ने कहा कि पुलिस ने उसे पकड़कर ले जाने या घर गिराए जाने के दौरान कोई नोटिस या दस्तावेज नहीं दिखाया.

इमारत की ऊपरी मंजिल, जहां परिवार रहता था, अब रहने योग्य नहीं है. उनके भाई ने बताया कि उनके घर में छोटे बच्चों समेत 15 लोग रहते हैं.

बता दें कि प्रयागराज में नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध करने वाली कार्यकर्ता आफरीन फातिमा का भी घर बुलडोजर चलाकर गिरा दिया गया था. कार्रवाई फातिमा के पिता और वेलफेयर पार्टी के नेता जावेद मोहम्मद को 10 जून की हिंसा में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा हिंसा के मुख्य साजिशकर्ता के रूप में नामजद करने के बाद की गई थी.

वहीं, पूर्व न्यायाधीशों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश में राज्य के दमन का स्वत: संज्ञान लेने का आग्रह किया है.

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.