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तेलंगाना: दलित के खेत में छोड़ा जा रहा है पूरे गांव का गंदा पानी, प्रशासन ने कहा- कुछ नहीं कर सकते

तेलंगाना के जयशंकर भूपालपल्ली ज़िले के इडलापल्ली गांव में गुर्रम लिंगैया का खेत है. गांव में लगभग 500 घर हैं, जिनसे निकलने वाले गंदे पानी का रुख़ उनके खेत की ओर मोड़ दिया गया है. आरोप है कि प्रशासन ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि जल निकासी की मूल प्रस्तावित योजना में नाले के रास्ते में गांव की देवी का मंदिर आ रहा था.

(प्रतीकात्मक फोटो: नंदू कुमार/अनस्प्लैश)

नई दिल्ली: तेलंगाना के जयशंकर भूपालपल्ली जिले में एक दलित किसान के खेत में लंबे समय से उसके पूरे गांव का गंदा पानी (सीवेज) छोड़े जाने का मामला सामने आया है.

समस्या के समाधान के लिए उन्होंने अधिकारियों से अनुरोध करते हुए कई याचिकाएं लगाईं, लेकिन समस्या का निवारण नहीं हुआ.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, समस्या का समाधान करने के बजाय अधिकारियों का कहना है कि यह ‘काम (जल निकासी) संपन्न हो चुका है, इसे बदल नहीं सकते’. अब इस समस्या के समाधान के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है.

मल्हारराव मंडल के इडलापल्ली गांव में जमीन के मालिक गुर्रम लिंगैया के बेटे गुर्रम अशोक के मुताबिक, मूल प्रस्तावित योजना का मकसद 400-500 घरों से अपशिष्ट जल ले जाने वाली मुख्य पाइप लाइन (नाले) को पास के एक जल निकाय की ओर मोड़ना था और गांव के उस हिस्से, जहां दलित रहते हैं, की लाइन बीच रास्ते में मुख्य पाइप लाइन से जोड़ दी जाती.

अशोक के मुताबिक, ‘रास्ते में गांव की देवी के एक छोटे मंदिर का हवाला देते हुए इसका मार्ग बदल दिया गया, जबकि तथ्य यह था कि जल निकासी हेतु निर्मित नाले का मार्ग मंदिर के किनारे से गुजरता था और मंदिर को छूता तक नहीं. वे नहीं चाहते थे कि हमारे जल की निकासी मुख्य लाइन में हो, इसलिए नहर को हमारी कॉलोनी से होते हुए हमारे खेत में मोड़ दिया.’

हालांकि, लिंगैया ने नाले के निर्माण के दौरान कई शिकायतें की थीं कि इससे उनकी एक एकड़ जमीन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, लेकिन उनकी चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया गया.

अशोक इसके लिए गांव के सरपंच को जिम्मेदार ठहराते हैं और इसे वे ‘जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की मदद से जान-बूझकर किया गया भेदभाव’ करार देते हैं. सरपंच भी स्वयं दलित हैं, लेकिन एक प्रतिद्वंदी उप-जाति से हैं.

वास्तव में यह समस्या सिर्फ लिंगैया की कृषि भूमि को ही प्रभावित नहीं करती है, बल्कि उनकी जमीन से सटे दूसरे खेतों पर भी असर डालती है. जिनमें से ज्यादातर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ी जातियों के किसानों के हैं. लिंगैया ने स्थानीय अतिरिक्त कलेक्टर (स्थानीय निकाय) को भी इसके बारे में बताया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ.

दूसरी तरफ, खेत का दौरा करने वाले अतिरिक्त कलेक्टर टीएस दिवाकर ने कहा कि चूंकि सीवेज के लिए प्राकृतिक ढाल लिंगैया के भूखंड की ओर था, इसलिए इसे वहीं कर दिया गया.

उन्होंने जोर देकर कहा कि इसके पीछे कोई भी ‘दुर्भावनापूर्ण या भेदभावपूर्ण मकसद’ नहीं था, लेकिन साथ ही कहा कि नाले का रुख फिर से मोड़ने पर बहुत खर्च आएगा.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक दिवाकर ने कहा, ‘उनके खेत में गंदा पानी पहुंचने से ठीक पहले मैंने जिला प्रशासन की ओर से डायवर्जन (मोड़) का निर्माण कराने का वादा किया था, लेकिन गंदगी/दुर्गंध का हवाला देते हुए वे इसके लिए तैयार नहीं हैं.’

हालांकि, दूसरी ओर अशोक का कहना है कि सीवेज के प्रवाह के लिए गांव के चारों ओर करीब आठ जल निकायों में आठ प्राकृतिक ढाल हैं, जिनमें से कोई भी उनके उस भूखंड के करीब नहीं है जहां सीवेज का रुख मोड़ दिया गया है.

अशोक कहते हैं, ‘हमारे विरोध के बावजूद डायवर्जन किया गया है. अन्यथा, वे कैसे गांव के सीवेज को निजी जमीन में बहाए जाने की योजना बना सकते हैं?’