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पेगासस जासूसी मामले को लेकर गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी

सुप्रीम कोर्ट ने बीते वर्ष अक्टूबर में सेवानिवृत्त न्यायाधीश आरवी रवींद्रन की अध्यक्षता में पेगासस स्पायवेयर के कथित दुरुपयोग की जांच के लिए एक समिति का गठन किया था. पत्रकारों, राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी के लिए स्पायवेयर के कथित इस्तेमाल की जांच के लिए इसका गठन किया गया था.

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: पत्रकारों, राजनेताओं और कार्यकर्ताओं की जासूसी करने के लिए पेगासस स्पायवेयर के कथित दुरुपयोग की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति ने करीब एक सप्ताह पहले अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. हिंदुस्तान टाइम्स ने अपनी खबर में यह जानकारी दी है.

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आरवी रवींद्रन की अध्यक्षता में समिति का गठन, द वायर  समेत मीडिया संगठनों के एक संघ द्वारा यह खुलासा करने के बाद किया गया था कि नरेंद्र मोदी सरकार अपने आलोचकों को निशाना बनाने के लिए स्पायवेयर का इस्तेमाल कर रही है.

रिपोर्ट की सामग्री गोपनीय रखी गई है. अदालत को अंतिम रिपोर्ट कई बार समय सीमा बढ़ाने के बाद सौंपी गई है.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट को अभी मामले की अगली सुनवाई की तारीख तय करना है. अखबार का कहना है कि मामला 12 अगस्त को सूचीबद्ध हो सकता है.

समिति का गठन करने वाली पीठ का हिस्सा रहे भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) एनवी रमना इसी महीने के अंत में (26 अगस्त) रिटायर होने वाले हैं.

अक्टूबर 2021 में समिति का गठन करते हुए सीजेआई रमना ने कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ लेकर सरकार जवाबदेही से बच नहीं सकती है. अदालत ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ चिंताओं के कारण एक विस्तृत हलफनामा दायर करने से केंद्र सरकार के इनकार की आलोचना भी की थी.

समिति में साइबर सुरक्षा और डिजिटल फोरेंसिक्स के प्रोफेसर और गुजरात के गांधीनगर में स्थित राष्ट्रीय फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय के डीन डॉ. नवीन कुमार चौधरी, केरल के अमृता विश्व विद्यापीठम में इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डॉ. प्रभारण पी. और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मुंबई में कंप्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग के संस्थान अध्यक्ष एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अश्विन अनिल गुमस्ते शामिल हैं.

पेगासस के कई कथित और पुष्ट लक्ष्यों (निशाना बने लोगों) को समिति के समक्ष पेश किया गया है. उनके उपकरणों का भी फोरेंसिक विश्लेषण किया गया है.

पेगासस के निश्चित लक्ष्यों में राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर, द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और एमके वेणु का नाम था, जबकि संभावित लक्ष्यों में विपक्षी नेता राहुल गांधी, अभिषेक बनर्जी और यहां तक कि कैबिनेट मंत्री अश्विनी वैष्णव और प्रहलाद सिंह पटेल भी शामिल थे.

द वायर  और उसके सहयोगियों ने कम से कम 174 व्यक्तियों के नामों का खुलासा किया, जो भारत और अन्य देशों में पेगासस के पुष्ट या संभावित लक्ष्य थे.

मालूम हो कि एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया कंसोर्टियम, जिसमें द वायर  भी शामिल था, ने जुलाई 2021 में ‘पेगासस प्रोजेक्ट’ के तहत यह खुलासा किया था कि इजरायल की एनएसओ ग्रुप कंपनी के पेगासस स्पायवेयर के जरिये दुनियाभर में नेता, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों के फोन कथित तौर पर हैक कर उनकी निगरानी की गई या फिर वे संभावित निशाने पर थे.

इस कड़ी में 18 जुलाई 2021 से द वायर  सहित विश्व के 17 मीडिया संगठनों ने 50,000 से ज्यादा लीक हुए मोबाइल नंबरों के डेटाबेस की जानकारियां प्रकाशित करनी शुरू की थी, जिनकी पेगासस स्पायवेयर के जरिये निगरानी की जा रही थी या वे संभावित सर्विलांस के दायरे में थे.

इस एक पड़ताल के मुताबिक, इजरायल की एक सर्विलांस तकनीक कंपनी एनएसओ ग्रुप के कई सरकारों के क्लाइंट्स की दिलचस्पी वाले ऐसे लोगों के हजारों टेलीफोन नंबरों की लीक हुई एक सूची में 300 सत्यापित भारतीय नंबर हैं, जिन्हें मंत्रियों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, न्यायपालिका से जुड़े लोगों, कारोबारियों, सरकारी अधिकारियों, अधिकार कार्यकर्ताओं आदि द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है.

यह खुलासा सामने आने के बाद देश और दुनियाभर में इसे लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था.

बता दें कि एनएसओ ग्रुप मिलिट्री ग्रेड के इस स्पायवेयर को सिर्फ सरकारों को ही बेचती हैं. भारत सरकार ने पेगासस की खरीद को लेकर न तो इनकार किया है और न ही इसकी पुष्टि की है.