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आखिर कैसे शुरू हुई थी धरती पर जीवन की कहानी…

एक अनुमान के अनुसार कहा जाता है कि धरती की उम्र साढ़े चार सौ करोड़ साल है, लेकिन यहां जीवन की शुरुआत कैसे, कितने समय में हुई और कहां से हुई, इसकी भी कई कहानियां हैं.

(फोटो साभार: नासा)

हम अक्सर ये सोचते हैं कि क्या इस विशाल ब्रह्मांड में और कहीं जीवन है? अगर है तो क्या वहां के जीव हम जैसे ही दिखते होंगे? क्या उनसे संपर्क करना मुमकिन होगा? मेरे विचार से यह बहुत कठिन सवाल हैं- हो सकता है इनका जवाब हमें बहुत समय तक न मिले, शायद कभी न मिले. पर यहां मैं हमारी पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कब हुई, इस बारे में बात करना चाहता हूं.

धरती की उम्र कुछ 450 करोड़ साल के आसपास अनुमानित है. कहते हैं कि मानवीय मस्तिष्क समय और अंतरिक्ष की विशालता की कल्पना करने में संघर्ष करता है. इन 450 करोड़ साल में जीवन की शुरुआत कब हुई? अगर जीवन की शुरुआत तक पहुंचना ‘आसान’ था, तो पृथ्वी की स्थापना के जल्दी बाद ही जीवन शुरू हुआ होगा. लेकिन अगर जीवन की शुरुआत तक पहुंचने का सफर कठिन रहा होगा, तो पृथ्वी पर जीवन शुरू होने मे काफी समय लगा होगा.

आज हम जानते हैं कि जीवन की शुरुआत लगभग 400 करोड़ साल पहले हुई थी. यह कहां हुई थी, इसको लेकर वैज्ञानिकों के पास अलग धारणाएं हैं, पर उनमें से एक प्रबल धारणा कहती है कि जीवन की शुरुआत समुद्र की सतह पर हुई थी.

हमारे ये अनुमान कहते हैं कि जीवन तक पहुंचने का सफर धरती पर जल्दी ही कर लिया गया. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि पृथ्वी के बनने के बाद बहुत समय तक हमारे गृह की सतह पर उथल-पुथल चलती रही. इस दौरान, गरम पिघली धातु और हवाएं बहती रही. ऐसे वातावरण मे कार्बन पर आधारित जीवन का पनपना असंभव था.

जब पृथ्वी का तापमान गिरा, जीवन की शुरुआत तभी संभव थी. ऐसा सोचे तो लगता है कि जीवन का उद्भव ‘आसान’ होता है. और अगर वो धरती पर आसान रहा है, तो ब्रह्मांड में और जगह भी आसान रहा होगा. मेरे विचार से ऐसा सोचना ठीक है. पर उसके बाद जो धरती पर हुआ, उससे यह सवाल थोड़ा पेचीदा हो जाता है.

पहले जीव जो धरती पर आए, उन्हें अंग्रेजी में प्रोकैरेयोट (Prokaryote) कहा जाता है. इन जीवों में न्यूक्लियस (Nucleus) यानी केंद्रक नहीं होता, और हमारी कोशिकाओं के मुकाबले मे यह बहुत सरल होते हैं.

बैक्टीरिया (Bacteria) प्रोकैरेयोट किस्म के होते हैं. यह बैक्टीरिया वही हैं जिन्हें मारने के लिए हम एंटीबायोटिक (antibiotic) खाते हैं. जब जीवन का अविष्कार धरती पर हुआ, तो दो तरह के प्रोकैरेयोट सामने आए. एक का नाम बैक्टीरिया है और दूसरे का आर्किया (Archaea).

यह दो किस्म की कोशिकाएं सरल होती हैं और 400 करोड़ साल पहले धरती पर आकर इन्हीं दोनों का धरती पर बोलबाला रहा. ऐसा लगभग 200 करोड़ साल तक चला. इतने लंबे अंतराल के बाद एक आर्किया ने एक बैक्टीरिया को अपने अंदर समा लिया. यह घटना कब और कैसे हुई, इस पर आज भी अनुसंधान जारी है और इस प्रसंग की बारीकियां हम आज नहीं जानते हैं.

पर इस एक घटना ने धरती पर जीवन का रुख बदल दिया. आर्किया के अंदर बैक्टीरिया जाने से एक यूकेरियोट (Eukaryote) कोशिका पैदा हुई. हम अपने आसपास जितनी प्रजातियां देखते हैं- पेड़ , पौधे, जानवर, पक्षी और हम स्वयं- सभी उस यूकेरियोट कोशिका की नतीजा हैं.

आर्किया के अंदर जाने वाला बैक्टीरिया क्रमागत उन्नति के एक प्रक्रिया के बाद एक कोशिका का वह केंद्र बन गया, जहां कोशिका की ऊर्जा का उत्पादन होता है. ऐसा होना धरती पर जीवन के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण कदम था. ऐसा माना जाता है कि इस एक घटना से एक कोशिका जितनी ऊर्जा थी वह बहुत बढ़ गई, और उसी कारण से मनुष्यों जैसे जटिल जीवों का धरती पर आना संभव हुआ.

पर ऐसा होने में 200 करोड़ साल क्यों लगे? इस सवाल का कोई सरल जवाब नहीं है. क्या अगर ब्रह्मांड में कहीं और जीवन है तो क्या वहां भी ऐसा होने मे इतना ही समय लगा होगा? या, क्या ऐसा वहां हुआ भी होगा?

दरअसल हम नहीं जानते की धरती पर जीवन की इस अत्यंत महत्वपूर्ण घटना किन परिस्थितियों में हुई. ऐसा होने मे कितना योगदान 200 करोड़ के विशाल अंतराल का है और कितना एक बहुत भाग्यशाली घटना का है, यह रहस्य खुलने मे अभी कुछ और समय लगेगा.

पृथ्वी पर जीवन शुरू होने का एक और किस्सा

लगभग 6.5 करोड़ साल पहले मेक्सिको में एक उल्का पिंड आ गिरा. उसके गिरने से धरती पर जो प्रलय आई, उससे जो तबाही हुई, उसका एक शिकार डाइनोसॉर भी थे. नतीजा यह हुआ कि डाइनोसॉर धरती से लुप्त हो गए. उनके लुप्त होने से धरती पर दबदबा बनाए रखने वाली एक प्रजाति गायब हो गई. इसी कारण और प्रजातियों को मौका मिला कि वह अपना प्रभाव जमा सकें.

यह इसी हादसे के कारण हुआ कि मनुष्यों की पूर्वज प्रजातियां फल-फूल पाईं और परिणामस्वरूप कुछ 6.5 करोड़ साल बाद हम धरती पर एक प्रभुत्व वाली प्रजाति हैं. यदि 6.5 करोड़ साल पहले वह उल्का पिंड धरती पर न गिरा होता- तो मेरे ख़याल से धरती पर जीवन की कहानी कुछ और ही होती.

(लेखक आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर हैं.)