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द्रमुक ने फ्रीबीज़ याचिका को लेकर पूछा- क्या कॉरपोरेट्स की ऋण माफ़ी तोहफ़ा नहीं

तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने सुप्रीम कोर्ट में दर्ज ‘मुफ्त सुविधाओं’ (फ्रीबीज़) से संबंधित याचिका में पक्षकार बनने का आग्रह करते हुए नरेंद्र मोदी सरकार के शुरुआती तीन सालों में अडानी समूह के 72,000 करोड़ रुपये के क़र्ज़ माफ़ करने की बात कही है.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन. (फोटो: पीटीआई)

चेन्नई: तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि ‘मुफ्त सुविधाओं’ (फ्रीबीज़) से संबंधित याचिका राजनीति से प्रेरित है.

रिपोर्ट के अनुसार, द्रमुक ने सवाल किया कि क्या भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार द्वारा कॉरपोरेट के ऋण माफ किया जाना उन कंपनियों के लिए मुफ्त तोहफे की तरह नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट में दर्ज इस याचिका में पक्षकार बनने का आग्रह करते हुए द्रमुक ने नरेंद्र मोदी सरकार के शुरुआती तीन सालों में अडानी समूह के 72,000 करोड़ रुपये के कर्ज माफ़ करने की बात कही है.

शनिवार को शीर्ष अदालत में दिए गए उनके आवेदन में कहा गया है, ‘बीते पांच वर्षों में बैंकों द्वारा 9.92 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बट्टे खाते में डाला गया, जिसमें से 7.27 लाख करोड़ रुपये अकेले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का है. क्या यह कॉरपोरेट्स के लिए फ्रीबीज़ नहीं है?’

चुनाव के दौरान मुफ्त सुविधाओं का वादा करने के लिए राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाले वकील और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की याचिका का विरोध करते हुए द्रमुक ने कहा कि उन्होंने सिर्फ समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों को ‘फ्रीबीज़’ के वादे किए जाने की बात की है, लेकिन ‘कॉरपोरेट्स को मिलने वाली बड़ी कर्ज माफियों और टैक्स में दी जाने वाली छूट का कोई जिक्र नहीं किया है.’

पार्टी ने यह भी कहा है कि याचिका ‘राजनीति से प्रेरित’ है, क्योंकि याचिकाकर्ता ने उस समय यह जनहित याचिका दायर की थी, जब पंजाब में विधानसभा चुनाव होने थे. पार्टी ने कहा कि याचिकाकर्ता जिस दल से संबंध रखते हैं वह दल भी पंजाब में चुनाव लड़ रहा था.

द्रमुक ने आरोप लगाया कि वर्तमान याचिका में कोई दम नहीं है और इसे पंजाब में एक अन्य प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल के साथ राजनीतिक ‘हिसाब-किताब’ बराबर करने के लिए दायर किया गया है.

पार्टी ने संविधान के भाग चार में बताए गए कल्याणकारी उपायों के लिए ‘मुफ्त सुविधा या फ्रीबीज़’ शब्द के प्रयोग पर कड़ी आपत्ति जताई है. द्रमुक ने कहा, ‘यदि याचिकाकर्ता सरकारी खजाने पर बोझ से चिंतित है, तो याचिकाकर्ता को समान रूप से संपन्न कॉरपोरेट्स और धनवान व्यक्तियों को दी जाने वाली कर छूट और ऋण माफी की भी परवाह होती. हालांकि, याचिकाकर्ता इन छूटों, जो कल्याणकारी उपायों पर खर्च किए गए बजट का 3-4 गुना हैं, को लेकर अनजान नजर आते है.’

पार्टी ने तर्क दिया कि कल्याणकारी योजनाओं को ‘मुफ्त सुविधाओं’ के तौर पर नहीं देखा जा सकता क्योंकि वे कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए एक मजबूत उत्प्रेरक के रूप में काम करती हैं.

तमिलनाडु अपनी नए तरह की कल्याणकारी योजनाओं के लिए जाना जाता है, जिसमें आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को टेलीविजन, साइकिल और लैपटॉप बांटना शामिल है. अपने आवेदन में द्रमुक ने याचिकाकर्ता से जवाब मांगा है कि जब कॉरपोरेट्स को बड़े कर में छूट देना जारी है, तब ऐसे में गरीबों और दलितों के लिए भोजन, शिक्षा और यात्रा सब्सिडी जैसे कल्याणकारी उपायों को रोकने की इच्छा रखने का क्या औचित्य है.

द्रमुक का कहना है कि कल्याणकारी योजना को ‘मुफ्त सुविधा’ के रूप में वर्गीकृत करने के लिए लागू किए जाने वाले मानदंड इतने कठोर नहीं हो सकते कि सरकार द्वारा अपने नागरिकों को प्रदान की जाने वाली प्रत्येक सेवा को ‘मुफ्त सुविधाएं’ की संज्ञा दी जाए.

द्रमुक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन द्वारा पेश दलीलों में कहा गया है, ‘यदि इस तरह का अर्थ लागू किया जाता है, तो यह शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा जैसी सभी सरकारी सुविधाओं को मुफ्त सेवा की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देगा.’

उन्होंने कहा कि याचिका खारिज किए जाने योग्य है. उन्होंने इसे राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों पर हमला करार देते हुए कहा कि यह इस देश के ताने-बाने को समाजवादी देश से पूंजीवादी देश में बदलने का प्रयास है.

द्रमुक का कहना है कि भारत का एक समाजवादी अर्थव्यवस्था के तौर पर मतलब है कि हमें समाज के सबसे कमजोर वर्ग के फायदे के लिए योजनाओं को जारी रखते हुए लोक कल्याण को प्राथमिकता देने की जरूरत है. पार्टी ने कहा, ‘वेलफेयर खर्च को मुफ्त की संस्कृति कहना त्रुटिपूर्ण विश्लेषण है क्योंकि सालों से इन योजनाओं से मिले व्यापक सामाजिक लाभ इन पर हुए खर्च से कहीं अधिक हैं.’

इस मामले की एक सुनवाई में सीजेआई एनवी रमना ने कहा था कि ‘तर्कहीन फ्रीबीज़’ एक गंभीर आर्थिक समस्या है और चुनावों के समय में ‘फ्रीबी बजट’ सामान्य बजट से कहीं ऊपर चला जाता है. पीठ ने इस बारे में निर्वाचन आयोग को दिशानिर्देश तैयार करने का आदेश दिया था, जिसके जवाब में आयोग ने कहा था कि किसी समुचित कानून न होने की स्थिति में यह राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता में आने पर मुफ्त सुविधाएं देने के वादों को विनियमित नहीं कर सकता.

द्रमुक से पहले आम आदमी पार्टी ने भी शीर्ष अदालत के समक्ष पक्षकार बनने का समान आवेदन दायर किया है.

द्रमुक ने अपने आवेदन में उसके द्वारा चलाई जा रही मिडडे मील, कृषि क्षेत्र को मुफ्त बिजली, अंतरजातीय विवाह पर 5000 रुपये देने जैसी इसकी कई कल्याणकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इनके चलने से तमिलनाडु गरीब राज्य नहीं बन गया है, बल्कि इससे विकास में मदद मिली है और आय की असमानता का बड़ा अंतर कम हुआ है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, याचिकाकर्ता द्रमुक के संगठन सचिव आरएस भारती ने कहा कि द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा का मूल समाज के पिछड़े, अति पिछड़े और अन्य सभी उत्पीड़ित वर्गों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान है.

लगभग एक सदी पहले ‘जस्टिस पार्टी’ के दिनों से द्रविड़ आंदोलन की उत्पत्ति और उदय का का जिक्र करते हुए भारती ने  कहा कि हाशिए पर पहुंच गए और पिछड़े लोगों के लिए शिक्षा के द्वार खोलना जस्टिस पार्टी (जेपी) के दिग्गज त्यागरयार (1852-1925) द्वारा इस दिशा में उठाया गया पहला कदम था. जेपी नेता ने स्कूली छात्रों को शिक्षा, किताबें और दोपहर का भोजन निःशुल्क उपलब्ध कराया.

उन्होंने कहा, ‘इसने छात्रों को स्कूलों में जाने के लिए प्रोत्साहित किया. आप इस तरह की पहल को एक ‘मुफ्त सुविधा’ कैसे बता सकते हैं? इस तरह की पहल समय के साथ विकसित हुई है. मध्याह्न भोजन की योजना अंततः एक पौष्टिक भोजन कार्यक्रम के रूप में विकसित हुई. अब, मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने स्कूली छात्रों के लिए जलपान योजना शुरू की है.’

उन्होंने कहा कि केवल ऐसी योजनाओं ने सामाजिक बाधाओं को तोड़ा है और पिछड़े वर्गों और अन्य लोगों तक शिक्षा के मार्ग खोले हैं, जो कभी लोगों के एक छोटे से वर्ग के लिए उपलब्ध थे.

भारती ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री के. कामराज के समय में एसएसएलसी स्तर तक शिक्षा नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाती थी. उन्होंने कहा कि जब द्रमुक के संस्थापक सीएन अन्नादुरई ने पदभार ग्रहण किया, तो उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि यह महाविद्यालय पूर्व के स्तर तक बिना किसी शुल्क के छात्रों के लिए उपलब्ध रहे.

उन्होंने कहा, ‘जब कलैग्नार (दिवंगत मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि) मुख्यमंत्री बने तो इसे स्नातक स्तर तक बढ़ा दिया गया. इससे यह सुनिश्चित हुआ कि समाज के पिछड़े वर्गों और उत्पीड़ित वर्गों के छात्र शिक्षा प्राप्त करें.’

उन्होंने कहा, ‘मुख्यमंत्री स्टालिन द्वारा छात्राओं के लिए घोषित 1,000 रुपये की सहायता योजना को ही लें, यह महिला सशक्तिकरण है, यह सामाजिक न्याय के प्रतीक पेरियार ईवी रामासामी का सपना था और द्रविड़ विचारधारा का आधार है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)