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चुनाव से पहले मुफ़्त उपहार देना ग़रीबों की मदद का अच्छा तरीका नहीं: अभिजीत बनर्जी

एक कार्यक्रम में बेरोज़गारी को लेकर नोबल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा है कि हमारी शिक्षा प्रणाली का प्रमुख उद्देश्य सरकारी नौकरी पाना है. हालांकि, लगभग 98 प्रतिशत उम्मीदवार इन नौकरियों को पाने में सफल नहीं होते हैं, जिससे बेरोज़गार युवाओं की संख्या में बढ़ोतरी होती है.

नोबेल विजेता भारतीय-अमेरिकी अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी. (फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: नोबल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा है कि चुनाव से पहले लोगों को रियायतें एवं मुफ्त उपहार देना गरीबों की मदद का सर्वश्रेष्ठ तरीका नहीं है और इसे अनुशासित करने की जरूरत है.

बनर्जी ने बीते शनिवार (5 नवंबर) को ‘अच्छा अर्थशास्त्र, खराब अर्थशास्त्र’ विषय पर आयोजित एक संगोष्ठी में विकासपरक अर्थशास्त्र, अर्थव्यवस्था के व्यावहारिक मॉडल, जीवनयापन का संकट, सामाजिक सुरक्षा और कीमतों एवं राहत उपायों के प्रतिकूल प्रभाव जैसे कई मुद्दों पर बात की. इस संगोष्ठी का संचालन अर्थशास्त्री एवं लेखक श्रायन भट्टाचार्य ने किया.

उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था और वर्तमान सामाजिक मुद्दों जिनसे भारत जूझ रहा है, जैसे मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के साथ-साथ राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त उपहार और इसके गरीबी पर प्रभाव के बारे में भी जानकारी साझा की.

बनर्जी ने चुनावों के समय दिए जाने वाले सरकारी तोहफों और रियायतों पर चिंता जताते हुए कहा कि इसे अनुशासित करना आवश्यक है.

उन्होंने कहा, ‘इससे बाहर निकलना अब कठिन है. पारंपरिक और असमानतापूर्ण तरीका कर्ज को बट्टे खाते में डालना था, क्योंकि सबसे बड़े कर्जदार सबसे गरीब नहीं होते. यही आसान तरीका था.’

उन्होंने कहा, ‘अमीरों पर कर लगाना अच्छा तरीका है. गरीबों की मदद के लिए चुनाव से पहले रियायतें देना सबसे अच्छे तरीके नहीं हैं. हमारे यहां बढ़ती हुई असमानता है और अमीरों पर कर लगाने के लिए एक सम्मोहक तर्क है. यह कोष केंद्र सरकार के पास जा सकता है जहां से इसका आगे (निचले तबकों में) वितरण हो सके.’

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, उन्होंने आगे कहा, ‘अगर हमारे पास राजनीतिक इच्छाशक्ति है तो एक समर्पित फंड इस समानता और पुनर्वितरण को कम करने का तरीका है.’

भारत में असमानता के वृद्धि के बारे में बोलते हुए बनर्जी ने कहा, ‘वास्तविक मजदूरी गिर रही है, छोटी कारों की मांग में गिरावट आ रही है, लक्जरी कारों की बिक्री बढ़ रही है. यूक्रेन-रूस संकट के मद्देनजर ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है. वैश्विक प्राथमिक वस्तुओं की मुद्रास्फीति (महंगाई) गरीबों को प्रभावित करने वाली है. हम असमानता बढ़ाने वाले क्षण में हैं.’

भारत में रोजगार संकट से संबंधित एक सवाल पर उन्होंने कहा कि सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ पहल का उद्देश्य आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करना है.

उन्होंने कहा, ‘हालांकि, चीन लगातार एक चुनौती पेश कर रहा है. हम चीन से नफरत करना पसंद कर सकते हैं, लेकिन इसकी एक कुशल आपूर्ति शृंखला है, जिसे निकट भविष्य में बदलना बहुत मुश्किल है. चीन को मैन्युफैक्चरिंग (निर्माण) क्षेत्र से हटाना मुश्किल होगा.’

बनर्जी ने बेरोजगारी के एक महत्वपूर्ण कारण पर भी प्रकाश डाला. उनके अनुसार, सम्मोहक और असाधारण ‘सरकारी नौकरी के सपने’ ने एक गंभीर समस्या खड़ी कर दी है.

उन्होंने तर्क दिया, ‘भारतीयों की एक बड़ी आबादी के लिए सरकारी नौकरी का सपना एक सम्मोहन है और इस वजह से प्रतिभाएं बेकार चली जाती हैं. हमारी शिक्षा प्रणाली का प्रमुख उद्देश्य सरकारी नौकरी पाना है. हालांकि, लगभग 98 प्रतिशत उम्मीदवार इन नौकरियों को पाने में सफल नहीं होते हैं, जिससे बेरोजगार युवाओं की संख्या में बढ़ोतरी होती है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)