मणिपुर के मुख्यमंत्री ने मिज़ोरम के सीएम से कहा- राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करें

मणिपुर में जातीय हिंसा से प्रभावित कुकी जनजाति के साथ एकजुटता दिखाने के लिए राजधानी आइज़ोल में आयोजित एक रैली में मिज़ोरम के मुख्यमंत्री ज़ोरामथांगा ने भाग लिया था. मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने इसमें भाग लेने वालों द्वारा उनके ख़िलाफ़ अपमानजनक नारे लगाने के तरीके को असभ्य क़रार दिया.

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एन. बीरेन सिंह. (फोटो साभार: ट्विटर/@NBirenSingh)

मणिपुर में जातीय हिंसा से प्रभावित कुकी जनजाति के साथ एकजुटता दिखाने के लिए राजधानी आइज़ोल में आयोजित एक रैली में मिज़ोरम के मुख्यमंत्री ज़ोरामथांगा ने भाग लिया था. मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने इसमें भाग लेने वालों द्वारा उनके ख़िलाफ़ अपमानजनक नारे लगाने के तरीके को असभ्य क़रार दिया.

एन. बीरेन सिंह. (फोटो साभार: ट्विटर/@NBirenSingh)

नई दिल्ली: जातीय हिंसा से प्रभावित मणिपुर में कुकी जनजाति के साथ एकजुटता दिखाने के लिए आयोजित एक रैली में मिजोरम के मुख्यमंत्री ज़ोरामथांगा के भाग लेने के एक दिन बाद मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने उनसे दूसरे राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने को कहा है.

मिज़ोरम सरकार मणिपुर से विस्थापित लगभग 13,000 कुकी-ज़ो जनजाति के लोगों को आश्रय दे रही है, जो 3 मई को राज्य में झड़पें शुरू होने के बाद से भाग कर वहां चले गए थे. मिज़ो जनजाति का कुकी-ज़ो और म्यांमार के चिन जनजाति के लोगों के साथ एक मजबूत संबंध है.

म्यांमार से आए 31,000 से अधिक चिन शरणार्थियों को भी मिजोरम में शरण दी जा रही है. म्यांमार की सेना और वहां के प्रतिरोध समूहों और जातीय विद्रोही समूहों के बीच भीषण लड़ाई के बाद वे म्यांमार से भाग आए थे.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के अवसर पर एक कार्यक्रम में एन. बीरेन सिंह ने कहा, ‘तनाव तब शुरू हुआ जब राज्य सरकार ने मादक पदार्थ के धंधे में लगे गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की. मणिपुर सरकार राज्य में रहने वाले कुकी समुदाय के खिलाफ नहीं है.’

कुकी समुदाय के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों ने मुख्यमंत्री पर उनके समुदाय के हित के खिलाफ काम करने का आरोप लगाते रहे हैं, जो राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में बहुसंख्यक हैं, जबकि घाटी क्षेत्र में मेईतेई बहुसंख्यक हैं. पिछले लगभग तीन महीने जारी जातीय संघर्ष में यही दोनों समुदाय आमने-सामने हैं.

सिंह ने कहा कि उनकी सरकार मणिपुर में होने वाली सभी घटनाओं पर नजर रख रही है और उन लोगों को चेतावनी दी है, जो ‘मणिपुर की अखंडता को नष्ट करने की कोशिश’ कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि लड़ाई सरकार और उन तत्वों के बीच है, जो राज्य में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में खलल डालना चाहते हैं. उन्होंने मिजोरम की राजधानी आइजोल में ज़ोरामथांगा के साथ रैली में भाग लेने वालों द्वारा उनके खिलाफ अपमानजनक नारे लगाने के तरीके को असभ्य करार दिया.

सिंह ने कहा, ‘मैं मिजोरम के मुख्यमंत्री (ज़ोरामथांगा) से दूसरे राज्य के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करने की अपील करता हूं.’

उन्होंने यूरोपीय संसद की आलोचना की, जिसने बीते 13 जुलाई को एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें भारतीय अधिकारियों से मणिपुर में हिंसा को रोकने और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए सभी उपाय करने की अपील की गई थी.

सिंह ने कहा कि राज्य सरकार अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने के लिए प्रतिबद्ध है और कुकी समुदाय की अलग प्रशासन की मांग को खारिज कर दिया.

बता दें कि बीते 25 जुलाई को मिजोरम के मुख्यमंत्री ज़ोरामथांगा ने मणिपुर के मिज़ो बहुल क्षेत्रों को शामिल कर ‘ग्रेटर मिज़ोरम’ बनाने की वकालत की थी. उन्होंने कहा था कि मणिपुर में मिज़ो लोगों को जबरदस्ती के बजाय संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार कदम उठाना चाहिए.

मालूम हो कि मणिपुर में बीते 3 मई को जातीय हिंसा बहुसंख्यक मेईतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति (एसटी) के दर्जे की मांग के कारण भड़की थी, जिसे पहाड़ी जनजातियां अपने अधिकारों पर अतिक्रमण के रूप में देखती हैं.

इस​ हिंसा के बाद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सहित प्रदर्शनकारी कुकी विधायकों और आदिवासी संगठन अलग प्रशासन की मांग कर रहे हैं.

यह मुद्दा तब फिर उभर गया था, जब मणिपुर हाईकोर्ट ने बीते 27 मार्च को राज्य की भाजपा नेतृत्व वाली एन. बीरेन सिंह सरकार को निर्देश दिया था कि वह मेईतेई समुदाय को एसटी में शामिल करने के संबंध में केंद्र को एक सिफारिश सौंपे.

मणिपुर में मेईतेई समुदाय आबादी का लगभग 53 प्रतिशत है और ज्यादातर इंफाल घाटी में रहते हैं. आदिवासी, जिनमें नगा और कुकी शामिल हैं, आबादी का 40 प्रतिशत हिस्सा हैं और ज्यादातर पहाड़ी जिलों में रहते हैं, जो घाटी इलाके के चारों ओर स्थित हैं.

एसटी का दर्जा मिलने से मेईतेई सार्वजनिक नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के हकदार होंगे और उन्हें वन भूमि तक पहुंच प्राप्त होगी. लेकिन राज्य के मौजूदा आदिवासी समुदायों को डर है कि इससे उनके लिए उपलब्ध आरक्षण कम हो जाएगा और सदियों से वे जिन जमीनों पर रहते आए हैं, वे खतरे में पड़ जाएंगी.