छोटा-सा रायपुर था, पर तालाब बड़े-बड़े थे. बड़े ही नहीं, इतने थे कि ये कभी तालाबों के शहर के नाम से जाना जाता था. इन तालाबों का वर्तमान खराब है, भविष्य खतरे में है पर इतिहास के पन्नों में तालाब ही तालाब छलकते मिलेंगे.
दुखद ये है कि छलकते तालाबों से ज़्यादा छलकता इंसानी लालच एक के बाद एक तालाबों को निगलता चला गया. लालची निगाहें अब टिकी हैं तालाबों के राजा पर, सबसे पुराने तालाब पर, सबसे बूढ़े तालाब पर. किसी दिन ये बूढ़ा तालाब इस रायपुर शहर से अपना पुराना आकार-प्रकार मांगे तो शहर शर्म से पानी-पानी हो जाए!
पर शहर के पास इतना पानी कहां… डूबने के लिए इसी तालाब के पास आना पड़ेगा.
बूढ़ा तालाब को आज से करीब छह सौ साल पहले कलचुरि राजा त्रिभुवन ने 1402 में खुदवाया था. बाद में 1460 के आस-पास इसके घाट का निर्माण हुआ. धीरे-धीरे इस तालाब के करीब नए निर्माण होते चले गए.
आज इस बूढ़ा तालाब का नाम विवेकानंद सरोवर है, स्वामी विवेकानंद की बड़ी-सी प्रतिमा तालाब के बगीचे में स्थापित है.
इसे विवेकानंद सरोवर नाम दिए जाने के पीछे भी एक इतिहास है, कहानी है. इसे बताने के पहले ये बताता चलूं कि तालाब का जो बगीचा है, वह तालाब के काफी अंदर मध्य में स्थित है. इसके प्रवेश का रास्ता पुरानी बस्ती के सामने है. कभी इस बगीचे को तालाब के टापू के नाम से जाना जाता था. यह टापूनुमा बगीचा तालाब में चार चांद लगाता है. बारिश के दिनों में बरखा की बूंदें यहां झूमती नृत्य करती-सी नज़र आती हैं.
बूढ़ा तालाब से गुज़रते हुए जब लोग विवेकानंद की विशाल मूर्त्ति देखते हैं तो जिज्ञासा होती है इस तालाब से स्वामी विवेकानंद का क्या संबंध है?
दरअसल बूढ़ा तालाब खुदवाने के बाद आगे चलकर इस तालाब के पड़ोस में लोगों को बसाया गया और इस मोहल्ले का नाम हुआ बूढ़ापारा. सन 1877 में स्वामी विवेकानंद अपने पिता विश्वनाथ दत्त के साथ रायपुर आए थे और दो बरस बूढ़ापारा के डे भवन में रहे थे, जिसके मालिक थे बड़े रईस भूतनाथ डे. कहते हैं कि विवेकानंद विदर्भ तक ट्रेन से, और फिर बैलगाड़ी से रायपुर पहुंचे थे.
स्वामी विवेकानंद के पिता भूतनाथ डे के मित्र थे. ऐसा बताया जाता है कि स्वामी विवेकानंद की तबियत कलकत्ता में ख़राब रहती थी और रायपुर में उन्हें स्वस्थ्य लाभ हुआ था. डे भवन से कुछ ही दूरी पर स्थित इस बूढ़ा तालाब में विवेकानंद स्नान करने जाते थे, इसलिए इस तालाब को स्वामी विवेकानंद के नाम पर विवेकानंद सरोवर रखा गया. सन 1877 में पैदा हुए भूतनाथ डे के सुपुत्र हरिनाथ डे गवर्नमेंट स्कूल रायपुर से पढ़ने के बाद आगे की शिक्षा बंगाल और फिर कैंब्रिज से लेते हैं, और दो दर्ज़न से ज़्यादा भाषाओं के ज्ञाता और दर्जनों पुस्तकों के लेखक के तौर पर देश भर में प्रतिष्ठित होते हैं.
बूढ़ापारा के नजदीक पंडित रविशंकर शुक्ल का निवास है. इसके बाद उनके सुपुत्र विद्याचरण यहां रहे. सन 1933 में गांधीजी जब रायपुर आए तो बूढ़ापारा के शुक्ल निवास में ही रुके थे.
इसी बूढ़ापारा में सन 1922 में अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन को लेकर रविशंकर शुक्ल जी को गिरफ़्तार किया गया था. इस मोहल्ले में आंदोलन की रणनीति बनती थी. शुक्ल जी की गिरफ्तारी को लेकर कोतवाली में प्रदर्शन होता है जिसके नेतृत्वकारी थे, माधव राव सप्रे और वामन राव लाखे. उनकी गिरफ्तारी के ख़िलाफ़ अगले दिन रैली भी हुई थी, जिसमें पंडित माखन लाल चतुर्वेदी ने बहुत जोशीला भाषण दिया था.
इस बूढ़ापारा की आंखों के तारे थे क्रांतिकारी सुधीर मुखर्जी, यानी सुधीर दादा. बूढ़ापारा में दादा के साथ अक्सर लोग, भले वे कांग्रेसी हों या जनसंघी, चबूतरे पर अड्डेबाज़ी करते देखे जाते. दादा आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुए, सजा भुगते, और देश आज़ाद होने पर मेहनतकश वर्ग के लिए अपनी ज़िंदगी कुर्बान कर दी.
बूढ़ापारा के अन्य चर्चित निवासी हैं, जगन्नाथ राव जो लड़कियों की शिक्षा को लेकर 14 एकड़ ज़मीन दान देते हैं और लड़कियों के लिए प्रदेश का सबसे बड़ा स्कूल खुलवाते हैं. उस स्कूल का उद्घाटन साल 1951 में पुरुषोत्तम दास टंडन करते हैं. इसके बाद बूढ़ापारा साहित्यकार विनोद शंकर शुक्ल का घर बना.
600 साल पुराने बूढ़ा तालाब और उसके किनारे बसे बूढ़ापारा का स्वभाव बड़े मॉल, नया रायपुर, अपार्टमेंट आने के बावजूद नहीं धुंधला पड़ा है. यह रायपुर की प्रतिनिधि बस्ती है.
(अपूर्व गर्ग रायपुर में निवास करते हैं.)
