वर्चस्व की संरचना के बारे में ग्राम्शी ने लिखा था कि वह प्रत्यक्ष से ज्यादा अप्रत्यक्ष तरीक़े से काम करती है. शासक समूह अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए हमेशा प्रत्यक्ष बल प्रयोग ही करे, यह ज़रूरी नहीं है. यह काम सांस्कृतिक और बौद्धिक जगहों पर वर्चस्व के रास्ते नियंत्रण करके अधिक सुभीते से और अधिक कारगर रूप में किया सकता है. विश्वविद्यालय ऐसी ही जगहें हैं.
ज्ञान के उत्पादन की जगह के रूप में हमारे विश्वविद्यालय तमाम सार्वजनिक विमर्शों को आकार देने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. समाज में किस विचारधारा को वैधता मिलेगी, किसे नहीं, यह भी विश्वविद्यालय परिसरों में ही तय हो जाता है. ऐसे में जब शैक्षणिक नेतृत्व को योग्यता, संस्थागत परंपराओं और नियम-कायदों के आधार पर नहीं बल्कि वैचारिक अनुरूपता या निष्क्रियता के आधार पर तय किया जाता है तो वह एक प्रशासनिक निर्णय नहीं होता. उस निर्णय को बौद्धिक केंद्रों पर विचारधारात्मक नियंत्रण या वर्चस्व को सुनिश्चित करने की एक व्यापक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए.
दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष पद पर हाल में हुई नियुक्ति ने गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं. इसे किसी के निजी मसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और न ही जिस व्यक्ति की नियुक्ति हुई है, उसकी आलोचना के रूप में. यह हमारे शैक्षणिक संस्थानों के भीतर हो रहे व्यापक संरचनात्मक और वैचारिक बदलावों से जुड़ा मसला है. ज्ञात हो, अध्यक्ष पद के लिए वरिष्ठता की लंबे समय से चली आ रही परंपरा के बावजूद इस बार हिंदी विभाग के सबसे वरिष्ठ सदस्य को दरकिनार करने का निर्णय लिया गया. वे ख़ुद अपने एक सार्वजनिक पत्र में बतलाते हैं कि कैसे पिछले एक वर्ष से यह एक मानी हुई बात हो गई थी कि उन्हें उनका वाजिब हक नहीं दिया जाएगा. यह विश्वविद्यालयों के प्रशासन के तौर-तरीके में एक गहरे बदलाव की सूचना है. जो अकादमिक समुदाय से एक सामूहिक चिंतन की मांग करती है.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पिछले दस साल में हुई नियुक्तों पर काफ़ी विवाद रहा है. नियुक्ति और पदोन्नति में वरिष्ठता की यह अनदेखी अनजाने ही नहीं है. यह फेवरिटिज़म का साधारण मामला नहीं है बल्कि अपूर्वानंद जैसे बुद्धिजीवियों के स्वतंत्र और आलोचनात्मक विचारों के प्रति सत्ताधारी वर्चस्वशाली विचारधारा की एक तीखी प्रतिक्रिया है. यह प्रश्न करने वाले विद्वानों का हक छीनकर उन लोगों को पुरस्कारस्वरूप थमाने की प्रशासनिक कोशिश को भी दिखलाता है जो या तो सत्ताधारी विचारधारा के अनुरूप हैं या फिर किसी भी तरह से उसके लिए खतरा नहीं हैं. अकादमिक साख और नियम-कायदों पर विचारधारा को प्राथमिकता देने की यह नई राह विश्वविद्यालयों की आलोचनात्मक प्रकृति पर कौन से दूरगामी असर डाल सकती है, उन पर विचार करना जरूरी है.
हिंदी विभाग का यह ताजातरीन मसला विश्वविद्यालय प्रशासन की प्रकृति में आए एक मूलभूत बदलाव की सूचना देता है. यह सहकारिता से नियंत्रण की तरफ़ एक यात्रा है. विश्वविद्यालय पारंपरिक रूप से स्वायत्त स्थानों के रूप में कार्य करते रहे हैं. जहां निर्णय बौद्धिक योग्यता और संस्थागत नियम-कायदों को ध्यान में रखकर होते हैं. अध्यक्ष जैसे पदों पर नियुक्ति में वरिष्ठता का सिद्धांत केवल नौकरशाही की औपचारिकता भर नहीं है. यह प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ़ शिक्षकों को प्राप्त एक सुरक्षा है जैसा कि अपूर्वानंद ख़ुद भी लिखते हैं. यह सुनिश्चित करती है कि विश्वविद्यालय पक्षपात और राजनीतिक संरक्षण के क्षेत्र न बन जाएं. ऐसे में, जब इस मानदंड की अवहेलना की गई है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अब हमारे शिक्षण संस्थानों में अध्यक्ष जैसे नेतृत्व के पदों के लिए योग्यता का निर्धारण कौन से मानदंड करने लगे हैं? क्या हम उस वक्त के गवाह बन रहे हैं जब जवाबदेही-मुक्त केंद्रीकृत नियंत्रण के पक्ष में विश्वविद्यालय की परम्परागत सहकारिता का क्षरण हो रहा है?
यह सच है कि यह कोई पहला उदाहरण नहीं हैं जहां प्रक्रियात्मक नैतिकता से समझौता किया गया है. पिछले एक दशक में हमने एक पैटर्न देखा है जहां प्रायः सभी संस्थागत निर्णय – नियुक्तियों से लेकर पाठ्यक्रम के पुनर्गठन तक – अकादमिक प्रतिबद्धता के बजाय विचारधारा से निर्देशित हुए हैं. इसके बावजूद यह पहला मसला है कि जब इतनी उद्दंडता से प्रशासन ने विभाग के किसी वरिष्ठतम् सदस्य को दरकिनार करते हुए किसी कनिष्ठ सदस्य को उनका पद दे दिया हो. अकादमिक संसार में यह एक शिक्षक की बौद्धिक सक्रियता पर की गई प्रशासनिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है. एक अकादमिक व्यक्ति के रूप में वह लगातार महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर मुखर रूप से लिखते और बोलते रहे हैं. इस संदर्भ में यह निर्णय विश्वविद्यालयों की बौद्धिक संस्कृति को नियंत्रित और क्षतिग्रस्त करने की एक व्यापक प्रशासनिक कार्यवाही का हिस्सा दिखता है.
भारत अब भी एक लोकतंत्र ही है. यहां विश्वविद्यालय का कार्य ‘आधिकारिक विचारधारा’ का प्रचार या संरक्षण करना नहीं है. एक स्वस्थ विश्वविद्यालयी परिसर आलोचनात्मक चिंतन और बौद्धिक बहस को बढ़ावा देने का काम करता है. इसे भूलते हुए इस तरह के निर्णय लेना साफ़ तौर पर विश्वविद्यालय प्रशासन और वर्चस्व की विचारधारा के बीच बढ़ते तादात्म्य की साक्षी देता है. अपनी स्वायत्तता, मूल प्रकृति या सम्मान की चिंता किए बिना विश्वविद्यालय प्रशासन इस परिसर को विचारधारात्मक अनुरूपता पैदा करने के स्थान के तौर पर देख रहा है.
प्रशासन का यह नैतिक अवमूल्यन विभागीय नियुक्तियों से लेकर पाठ्यक्रमों के संशोधन, शोध विषयों के चुनाव और सक्रिय छात्रों को पीएचडी के चयन में बाहर कर देने की प्रवृत्ति में भी स्पष्ट है. विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता धीरे-धीरे एक ऐसे मॉडल द्वारा प्रतिस्थापित की जा रही है जहां ज्ञान का उत्पादन राजनीतिक विचारों के अधीन है. विभागों के प्रमुखों की नियुक्ति, जो कभी एक अकादमिक निर्णय हुआ करती थी, अब इन बड़ी वैचारिक लड़ाइयों का प्रतिबिंब है. यह अपेक्षा करना कि शिक्षाविदों को प्रशासनिक पदों पर अपने वैध अधिकार को सुरक्षित करने के लिए भी वर्चस्वशाली राजनीतिक आख्यान के साथ कदमताल करना चाहिए, उच्च शिक्षा के मूल आदर्श के विपरीत है. विश्वविद्यालय असहमति, बहस और बहुलता के सुरक्षित क्षेत्र हैं – किसी एक वैचारिक ढांचे के प्रति निष्ठा के नहीं.
दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन की इस अनुचित कार्यवाही ने अकादमिक प्रशासन में हो रहे जिस मूलभूत संरचनात्मक बदलाव की ओर हमारा ध्यान खींचा है, वह केवल एक विश्वविद्यालय या एक घटना के बारे में नहीं है. पूरे भारत में, हमने इसे विभागीय नियुक्तियों, राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित पाठ्यक्रम परिवर्तनों और स्वतंत्र विचारकों को दरकिनार करने वाले प्रशासनिक निर्णयों जैसे बढ़ते हस्तक्षेप के उदाहरणों में देखा है. पैटर्न स्पष्ट है- शिक्षण संस्थानों को आधिकारिक विचारधारा से समायोजित करने के लिए तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है. परस्पर प्रतिस्पर्धी और स्वतंत्र बौद्धिक विचारों के सुरक्षित स्थान के रूप में उनकी भूमिका को बड़े व्यवस्थित रूप से नष्ट किया जा रहा है. आने वाले वक्त में इसका शैक्षणिक स्वतंत्रता और उत्कृष्टता पर भयावह प्रभाव देखने को मिलेगा.
अब विश्वविद्यालय के इस निर्णय से और भी अधिक भय और आत्म-सेंसरशिप का माहौल बनेगा. विभाग के युवा सदस्य, जो कभी स्वतंत्र रूप से आलोचनात्मक चर्चा में शामिल भी हो सकते थे, अब स्वतंत्र रूप से अपने विचार व्यक्त करने में संकोच करेंगे. डर और दहशत की यह प्रक्रिया नाटकीय रूप से नहीं बल्कि ऐसे ही छोटे और क्रमिक बदलावों के माध्यम से आगे बढ़ती है. पदोन्नति से इनकार, प्रशासनिक भूमिकाओं से बहिष्कार और नियुक्ति में छंटनी आदि असहमति को व्यवस्थित रूप से हतोत्साहित करने के औजार बन चुके हैं. इसलिए, मसला केवल एक नियुक्ति से जुड़ा नहीं है बल्कि शैक्षणिक संस्कृति में किए जा रहे धीमे परिवर्तन से संबद्ध है. क्या होगा जब विश्वविद्यालय स्वतंत्र विचारों के स्थान नहीं रह जाएंगे? जब अकादमिक संस्थाओं के भीतरी निर्णय अकादमिक जगत के बाहर के विचारों से तय होने लगेंगे तो बौद्धिक समुदाय क्या विचारों का सृजन और परिष्कार उसी तरह कर सकेगा? या फिर यह बौद्धिकता का इस देश में यह अंत होगा? यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो उच्च शिक्षा के आगामी भविष्य को लेकर चिंतित करते हैं. यह शैक्षणिक समुदाय के लिए चिंतन का क्षण होना चाहिए, इससे पहले कि और भी देर हो जाए.
दिल्ली विश्वविद्यालय की यह वर्तमान घटना मौन असहमति से अधिक की मांग करती है. यह उन शिक्षाविदों से सामूहिक प्रतिक्रिया की मांग करती है जो निष्पक्षता, बौद्धिक स्वायत्तता और शैक्षणिक स्वतंत्रता के मूलभूत मूल्यों में विश्वास जताते रहे हैं. विश्वविद्यालय कॉरपोरेटसंस्थाएं नहीं हैं जहां बिना जवाबदेही के सत्ता का प्रयोग किया जा सके. वे विश्वास, संवाद और प्रशासन की साझा भागीदारी पर आधारित संस्थाएं हैं.
अगर हम वास्तव में इन मूल्यों को संरक्षित रखना चाहते हैं तो यह अनिवार्य है कि हम इस हो रहे संरचनात्मक परिवर्तन को पहचानें और इस पर एक सुसंगत प्रतिक्रिया व्यक्त करें. यह मसला कुछ व्यक्तियों या उनकी व्यक्तिगत शिकायतों का नहीं है. यहां चिंता यह सुनिश्चित करने की होनी चाहिए कि प्रशासनिक विवेक या विचारधारात्मक विरोध से बचने की आड़ में शिक्षा के आधारभूत सिद्धांतों को नष्ट न किया जाए. दोहराना जरूरी है कि यहां जोखिम में सिर्फ़ एक नियुक्ति या पदोन्नति नहीं है, बल्कि हमारे विश्वविद्यालयों का मूल स्वभाव है.
यदि विश्वविद्यालयों को शिक्षा की वास्तविक जगह के रूप में काम करना है तो इन संरचनागत बदलावों का विरोध किए बिना वह संभव न होगा. विश्वविद्यालय को एक बुद्धि के क्षेत्र के रूप में अपनी स्वायत्तता को पुनः प्राप्त करना ही होगा. यह वैचारिक विविधता को सुरक्षित रखने के लिए एक गहरी प्रतिबद्धता के साथ ही संभव है. यह सुनिश्चित करते हुए कि शिक्षक और छात्र बिना किसी डर के परस्पर विरोधी दृष्टिकोण रख सकें और संवाद कर सकें. विभागाध्यक्ष जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया विचारधारात्मक गेटकीपिंग का साधन नहीं होनी चाहिए. ऐसा चलता रहा तो विश्वविद्यालय का बौद्धिक समुदाय एक नीरस नौकरशाही में तब्दील हो जाएगा.
यह उस व्यक्ति की आलोचना नहीं है जिसे नियुक्त किया गया है. प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ख़ुद बतलाते हैं कि उनकी जिस सहकर्मी की नियुक्ति हुई है वे स्वयं भी बड़े गरिमापूर्ण ढंग से अपनी नियुक्ति को जायज नहीं मानतीं. ऐसे में, यहां चिंता किसी एक व्यक्ति के बारे में नहीं है, बल्कि संस्थागत मानदंडों को दरकिनार करने के व्यापक और दूरगामी निहितार्थों के बारे में है. मुद्दा यहां शैक्षणिक सिद्धांतों का इसके ज़रिये होने वाला क्षरण है. मुद्दा उचित प्रक्रिया को दरकिनार करने की विश्वविद्यालय प्रशासन की अविवेकशीलता है. सबसे जरूरी मुद्दा इस मसले पर एक व्यापक बौद्धिक प्रतिरोध की अपरिहार्यता है.
ग्राम्शी हमें याद दिलाते हैं कि वर्चस्व कभी भी पूर्ण नहीं होता. यह हमेशा विवादित ही रहता है. यह अब भी न्याय के मसलों पर छात्र समुदाय और शिक्षकों की प्रतिबद्धता और सक्रियता के उदाहरण से दिखता है. आज भी विश्वविद्यालयों में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्होंने तमाम वैचारिक नियंत्रण और विचारधारात्मक दबावों के बावजूद विश्वविद्यालय को बौद्धिक प्रतिरोध के स्थल के रूप में क़ायम रखा हुआ है. ऐसे में, अकादमिक समुदाय की यह जिम्मेदारी है कि वह न केवल ऐसे निर्णयों की आलोचना करे बल्कि इनके ज़रिये सेंध लगा रहे संरचनात्मक परिवर्तनों का भी सक्रिय रूप से विरोध करे. ऐसे निर्णयों के प्रति मौन स्वीकृति निष्पक्षता, स्वायत्तता और लोकतांत्रिक संस्थानों के रूप में विश्वविद्यालयों की भूमिका को कमजोर करेगी. यह विश्वविद्यालय के रास्ते शुरू होने वाली वैचारिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की तमाम लड़ाइयों को उनके शुरू होने से पहले ही हार जाना होगा.
(लेखक अहमदाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं.)
