एएनआई बनाम विकीपीडिया केस सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अदालतें गैग ऑर्डर नहीं दे सकतीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को मीडिया संगठनों के खिलाफ़ गैग ऑर्डर जारी नहीं करने चाहिए और इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायिक आदेश की निष्पक्ष आलोचना को अदालत की अवमानना ​​नहीं माना जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: संतोषी मरकाम/द वायर)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (17 मार्च) को कहा कि अदालतों को मीडिया संगठनों के खिलाफ़ किसी तरह की पाबंदी या रोक के आदेश (gag orders) जारी नहीं करने चाहिए और इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायिक आदेश की निष्पक्ष आलोचना को अदालत की अवमानना ​​नहीं माना जा सकता.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी दिल्ली उच्च न्यायालय के उस निर्देश पर चिंता व्यक्त करते हुए की, जिसमें विकीपीडिया को 36 घंटे के भीतर वह पृष्ठ हटाने को कहा गया था, जो समाचार एजेंसी एशियन न्यूज इंटरनेशनल (एएनआई) द्वारा विकीपीडिया के खिलाफ दायर 2 करोड़ रुपये के लंबित मानहानि के मुकदमे से संबंधित था.

पीठ ने कहा, ‘अदालतों को सोशल मीडिया पर उनके आदेशों के खिलाफ की गई कुछ टिप्पणियों के बारे में क्यों संवेदनशील होना चाहिए?’

अदालत ने टिप्पणी की कि यह विडंबना है कि खुद एक मीडिया इकाई होने के बावजूद एएनआई सूचना प्रसारित करने वाले एक अन्य प्लेटफॉर्म के खिलाफ गैग ऑर्डर की मांग कर रहा है.

पीठ ने पिछले साल अक्टूबर में दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर भी सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि विकीपीडिया द्वारा न्यायिक आदेश की आलोचना करना ‘अदालती कार्यवाही में हस्तक्षेप’ है.

अदालत ने कहा, ‘कभी-कभी कोई कहता है कि आप यहां पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर बैठे हैं या आप उचित सुनवाई नहीं कर रहे हैं. लोग कुछ भी कहते हैं और हमें उसे सहन करना पड़ता है.’

विकीपीडिया द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दिए जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने मामले में हस्तक्षेप किया था.

ज्ञात हो कि अपने मानहानि मुकदमे में एएनआई ने विकीपीडिया को अपने मंच पर समाचार एजेंसी के पेज के बारे में कथित रूप से अपमानजनक सामग्री प्रकाशित करने से रोकने की मांग की है. इसने यह भी मांग की है कि सामग्री को हटा दिया जाए. समाचार एजेंसी ने विकीपीडिया से 2 करोड़ रुपये का हर्जाना भी मांगा है.

विकीपीडिया के पेज पर कहा गया है कि एएनआई की इस बात के लिए आलोचना की गई है कि यह मौजूदा केंद्र सरकार के लिए प्रोपगैंडा का साधन बन रही है, फर्जी समाचार वेबसाइटों के विशाल नेटवर्क से सामग्री वितरित कर रही है और घटनाओं की गलत रिपोर्टिंग कर रही है.

‘अदालतों को नाराज़ होने के बजाय कानूनी सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए’

पीठ ने कहा, ‘अदालतें गैग ऑर्डर पारित नहीं कर सकतीं. किसी के खिलाफ आपराधिक अवमानना के तहत कार्रवाई की जा सकती है, नोटिस जारी किया जाएगा और दूसरा पक्ष अवमानना ​​को खत्म करने का विकल्प चुन सकता है. लेकिन किसी को कुछ हटाने के लिए कहना सिर्फ इसलिए ठीक नहीं है क्योंकि अदालत ने जो कहा या किया है उसकी कुछ आलोचना हो रही है.’

अदालत ने कहा कि न्यायाधीश स्वयं अक्सर सार्वजनिक जांच और आलोचनात्मक टिप्पणियों का विषय होते हैं, लेकिन नाराज होने के बजाय अदालतों को कानूनी सिद्धांतों के आधार पर निर्णय देना चाहिए.

पीठ ने कहा, ‘हम न्यायाधीश हैं, फिर भी हमारे बारे में बहुत कुछ कहा जाता है. कोई कहता है कि हम पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. यह उनकी राय है, लेकिन हम कानून के आधार पर निर्णय लेते हैं.’