सत्ताधीश राजा बनकर लोकतंत्र को राजशाही में क्यों बदलना चाहते हैं?

कई जनप्रतिनिधि ख़ुद को 'द ग्रेट किंग आफ इंडिया' में बदलने के लिए, जितनी जल्दी संभव हो, पुरातन के पुनरुत्थान के अपने महत्वाकांक्षी चक्र को पूरा कर लेना और देशवासियों के नागरिक बनने की प्रक्रिया को उलटकर उन्हें प्रजा बना देना चाहते हैं. पर राजाओं का राज इतना ही अच्छा होता तो लोकतंत्र की ज़रूरत क्यों महसूस होती?

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

इस देश में लोकतंत्र के सात दशक पूरे हो चुके हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उसके समकाल को ‘अमृत काल’ कहना कम से कम इस अर्थ में बहुत सार्थक लगता है कि इन दशकों में इस लोकतंत्र की जान ले लेने और जान न ली जा सके तो उसके अंग-भंगकर लूला-लंगड़ा, अंधा या काना बना देने की नाना कोशिशों के बावजूद देशवासी जब भी मौका पाते, उसे सजाने-संवारने में लग जाते रहे हैं. अब तक किसी भी मौके पर उन्होंने अपवादस्वरूप भी उसमें अपना विश्वास संदिग्ध होने का कोई संकेत नहीं दिया है.

लेकिन इधर कुछ लोगों को (जिनमें कई चुनकर आए सत्ताधीश भी शामिल हैं और जो इस तंत्र को सारी उपलब्धियों को ऊपर ही ऊपर लोक लेने के तंत्र में बदल देना चाहते हैं) उन राजाओं और बादशाहों से बहुत प्यार उमड़ आया है, जिनके शासन से आजिज आकर हमने उन्हें इतिहास के कूड़ेदान में डाला और संविधान का शासन स्वीकार किया.

उनके इस ‘प्यार’ को देखकर समझना कठिन नहीं है कि संविधान के अब तक के शासन को वे अब तक कैसे ‘सहते’ रहे हैं और क्यों मौका हाथ आते ही राजाओं व बादशाहों में भी अपना-पराया ढूंढने और हिंदू-मुसलमान करने लग गए हैं. क्यों चाहते हैं कि उन राजाओं व बादशाहों द्वारा अपने राज्य या साम्राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए दीन-धर्म को परे झटककर लड़ी गई लड़ाइयों को हिंदुओं व मुसलमानों या उनके धर्मों की लड़ाइयों में बदल दिया जाए और क्यों इस लिहाज से उन्हें शिवाजी और औरंगजेब के बीच हुए टकरावों का चुनाव अपने लिए सबसे मुफीद नजर आ रहा है?

क्यों अपने इस मकसद के लिए वे हिंदुओं व मुसलमानों के अहसासों को न छेड़ने की जनकवि अदम गोंडवी की दशकों पहले दी गई इस चेतावनी की भी न सिर्फ अनसुनी किए दे रहे बल्कि अनसुनी का भरपूर मजा लेने की सीमा तक जा पहुंचे हैं:

हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए,
अपनी कुरसी के लिए जज़्बात को मत छेड़िए.
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है,
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए.

क्या आश्चर्य कि यह मजा लेते हुए कई जनप्रतिनिधि नामधारी महानुभाव अपनी वह तृष्णा भी नहीं छिपा पा रहे, जिसके तहत वे खुद को ‘द ग्रेट किंग आफ इंडिया’ में बदलने के लिए समय के चक्र को पूरे 360 अंश घुमाकर, जितनी जल्दी संभव हो, पुरातन के पुनरुत्थान के अपने महत्वाकांक्षी चक्र को पूरा कर लेना और देशवासियों के नागरिक बनने की प्रक्रिया को उलटकर उन्हें प्रजा बना देना चाहते हैं.

दफ्न है जो बात

सोचिए जरा कि इस तृष्णा के अलावा और क्या कारण हो सकता है, जिसके चलते वे उन सारे बेहतर जीवन मूल्यों को, जिन्हें हमने हूण, शक, मंगोल, हिंदू और मुसलमान से अब तक की अपनी यात्रा में अर्जित किया है, सायास दफ्न कर देने में लगे हुए हैं और ‘दफ्न है जो बात’, उससे गड़े मुर्दे उखाड़ने की तर्ज पर उलझते और उलझाते जा रहे हैं.

क्यों उन्हें लगता है कि वे ऐसा करके देश के साथ दशक से ज्यादा पुराने लोकतंत्र में पहले मतपेटियों, फिर ईवीएम से निकलने वाले ‘राजाओं’ के अभ्यस्त बन गए देश को फिर से रानियों के जाए राजाओं के राज के प्रति आकर्षित कर लेंगे और याद नहीं रहने देंगे कि उनके कुराज ने ही उसे व्यक्तियों के बजाय संविधान के शासन का मार्ग अपनाने को ‘प्रेरित’ किया था.

राजाओं और बादशाहों का राज इतना ही अच्छा होता तो उसको लोकतंत्र की भला जरूरत भी क्यों महसूस होती? वह तो इसीलिए महसूस हुई कि राजाओं व बादशाहों का सारा तकिया उनकी सेना की सुदृढ़ता और खजाने की संपन्नता पर हुआ करता था. इसीलिए ऋग्वेद में कहा गया है: यो व: सेनानी र्महतो गणस्य राजा व्रातस्य प्रथमो बभूव. (पहला राजा बड़े गणसेनापति समूह का हुआ.)

ये महानुभाव जानते हैं कि नये धार्मिक व सांप्रदायिक उद्वेलन व विभाजन पैदा किए बिना वे देश को राजाओं, महाराजाओं या बादशाहों के दौर में वापस नहीं ले जा सकते, इसलिए अपने पुराने अभ्यास के अनुसार राजाओं व बादशाहों को भी (इस सामान्य अवधारणा के विरुद्ध कि उनके वक्त, प्रजापालन के उनके स्वर्णिम दौर में भी, प्रजा जनों की इच्छाओं व आकांक्षाओं का कोई खास मतलब नहीं होता था और प्रजा महज आज्ञापालन के लिए हुआ करती थी) धार्मिक व सांप्रदायिक आधार पर विभाजित कर उनके जयकारे लगा रहे हैं.

उनमें कोई उनके ‘अपने’ धर्म या संप्रदाय का है तो उसके सौ क्या हजार ख़ून माफ करके भी उसे नायक बना रहे हैं और दूसरे धर्म या संप्रदाय का है तो गुणों की खान रहा हो तो भी खलनायक.

विडंबना यह कि इधर इसको लेकर कुछ इस तरह शोर मचाया जा रहा है जैसे यही आज की सबसे बड़ी जरूरत हो और राजाओं व बादशाहों के नायकत्व या खलनायकत्व की बाबत तुरंत फैसला नहीं किया गया, तो कहर बरप जाएगा.

सच्चाई यह है कि जितना अनर्थ देशवासियों को इस पचड़े में उलझाने से हो रहा है, वही यह जताने के लिए काफी है कि उलझाने वाले अपने उद्देश्य में सफल हो गए तो हमारे वर्तमान से जुड़े उन प्रश्नों का क्या होगा, जिन्हें अभी से नेपथ्य में डालने का कोई प्रयत्न वे उठा नहीं रख रहे और अतीत के उन ‘प्रश्नों’ से जूझे जा रहे हैं, जो वास्तव में प्रश्न ही नहीं हैं.

इन महानुभावों में शामिल संघ परिवारी तो अपने स्पष्टवादी पितृपुरुषों में से एक नानाजी देशमुख के इस कथन से भी कोई सबक नहीं ले रहे कि इस देश की लोकतांत्रिक यात्रा अब इतनी लंबी हो चुकी है कि उसके अभ्यस्त देशवासी राजतंत्र यानी राजे-महाराजाओं/ बादशाहों के युग में लौटकर किसी रानी के पेट से जन्मे व्यक्ति की तो क्या, ईवीएम से जन्मे जनप्रतिनिधि की भी राजा बनने की हिमाकत स्वीकार नहीं करने वाले.

वह राजा राम का राज्य हो, सम्राट अशोक का या अकबर का और कितना भी आदर्श क्यों न बताया जाता हो, अब उनका अभीष्ट नहीं है क्योंकि उन्हें मालूम है कि राजा कितना भी अच्छा हो, राजा ही होता है और जनप्रतिनिधि कितना भी बुरा हो, राजा से बेहतर होता है.

नेपाल में भी ‘राजा आओ’!

नानाजी देशमुख तो यहां तक कहते थे कि चूंकि अब रानियों के पेट से जन्म लेने वाले सारे राजाओं का राज बेस्वाद हो चुका है, देशवासी एक दिन उन्हें भी सबक सिखाकर ही मानेंगे, जो देश के लोकतंत्र को भी राजतंत्र का लबादा ओढ़ाने के फेर में हैं.

फिर भी, न सिर्फ हमारे देश बल्कि पड़ोसी देश नेपाल में भी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की विफलता या उसके प्रति असंतोष के नाम पर कई हल्कों में राजशाही की फिर से बहाली की कवायदें की जा रही हैं और कवायदें करने वाले इतने आशान्वित हैं कि इसकी मांग के लिए रैलियां व पूर्व राजा का स्वागत कर रहे और ‘राजा आओ, देश बचाओ’ के नारों से वातावरण को गुंजा रहे हैं. इन रैलियों में वे देश के राष्ट्रध्वज का इस्तेमाल कर रहे और राजशाही वाला राष्ट्रगान भी गा रहे हैं.

पिछले दिनों एक रैली में ‘नारायणहिटी खाली गर, हाम्रो राजा आउँदै छन्’ जैसा नारा भी उछाला गया, जिसका अर्थ है : नारायणहिटी (रॉयल पैलेस, जिसमें राजा रहते थे और 2008 में राजशाही के खात्मे के बाद जिसमें गणतंत्र स्मारक व संग्रहालय बना दिया गया था.) ख़ाली करो, हमारे राजा आ रहे हैं.

इस रैली में यह भी कहा गया कि देश की लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत चुनकर आई संघीय सरकार का खात्मा होना चाहिए क्योंकि इससे एक भ्रष्ट व्यवस्था मज़बूत हो रही है.

यह तब है जब लोकतंत्र को अपनाने से पहले नेपाल जिस हिंदू राजशाही को अपनाए हुए था और जिस हिंदू राष्ट्र का दु:स्वप्न देखने व दिखाने वालों से हमारा देश भी कुछ कम आक्रांत नहीं है, उसकी मूल आधार ‘मनुस्मृति’ तक राजाओं के राज के प्रति उनकी जितनी ‘सदाशयता’ नहीं रखती. उसके एक श्लोक में तो (कई महानुभाव जिसे प्रक्षिप्त बताकर उसका ‘बचाव’ किया करते हैं) यहां तक कहा गया है कि: दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः.दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपः. अर्थात : दस वधिकों (कसाइयों) के समान एक तेली, दस तेलियों के समान एक कलाल (मदिरा बेचने वाला, कलवार), दस कलवारों के समान एक वेशोपजीवी (कुटनी) तथा दस वेशोपजीवियों के समान एक राजा.

साफ है कि उस वक्त से ही राजा आमतौर पर जनश्रद्धा के पात्र नहीं रहे हैं- अपनी तमाम प्रजा वत्सलता और न्यायप्रियता के बावजूद. अकारण नहीं कि जिस प्राचीनता के पुनरुत्थान के लिए आजकल ‘अपने’ राजे-महाराजाओं/ बादशाहों की ‘स्तुति’ और परायों की निंदा का अभियान चलाया जा रहा है, उस काल के कई भारतीय मनीषी ‘कुपथी’ राजाओं से दान लेने तक की मनाही कर गए हैं. यह कहकर कि ऐसे राजा का दान स्वीकार करने से ब्राह्मणत्व तो नष्ट हो ही जाता है, अन्य दुष्परिणाम भी होते हैं. ऐसे राजा का दान स्वीकारना मदिरापान तथा विष के समान भयंकर होता है; इसलिए उसे स्वीकार करने की अपेक्षा अपने ही पुत्र का मांस खाना श्रेष्ठ है.

बात को वहां से इटली के पुनर्जागरण काल के प्रसिद्ध राजनयिक व दार्शनिक निकोलो मैकियावेली के वक्त तक खींच लाएं तो भी राजाओं के बारे में कोई अच्छी धारणा नहीं ही बनती. वे कहते हैं कि राजा को प्रजा के मन पर अपना सिक्का जमाने के लिए उदार, दयालु, कृपालु, सहृदय, धार्मिक, तथा साहसी होने का दिखावा करना चाहिए. उसमें ये गुण न हों, तो भी उसे इन सभी गुणों का स्वामी लगना चाहिए. उसे जाल से बचने के लिए लोमड़ी बनना चाहिए और भेड़ियों को परास्त करने के लिए शेर.

पांवों पर कुल्हाड़ी!

ऐसा प्रदर्शनप्रिय राजा भला क्योंकर जनप्रिय कहलाने का पात्र हो सकता है? अलबत्ता, हो सकता था, बशर्ते दुनिया यूनानी दार्शनिक प्लेटो के दार्शनिक राजा के सिद्धांत पर कुछ दूर चली होती और उसके मुताबिक शासन करने का अधिकार दार्शनिकों के पास ही होता, जिनके पास ज्ञान, बुद्धि और प्रशिक्षण होता है. दुनिया की यह यात्रा निस्संदेह जन्म या धन के आधार पर बनने वाले राजाओं से मुक्ति की दिशा में ले जाती.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो औरंगजेब और शिवाजी के चुने हुए अच्छे व बुरे फैसलों व टकरावों के आधार पर पाले खींचकर सामाजिक उद्वेलन व विभाजन पैदा करने का इसके सिवा और क्या उद्देश्य हो सकता है कि कुछ लोग इसके आधार पर सत्ता की अपनी प्रतिद्वंद्विता का मार्ग प्रशस्त कर लेना चाहते और खुद में उनका अक्स देखना चाहते हैं.

फिलहाल, उनसे यही कहा जा सकता है कि भाई, आप लोकतंत्र में रहकर राजशाही या बादशाही की मांग तो कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करके अपने पांवों पर लोकतंत्र के खात्मे की कुल्हाड़ी मार ली तो फिर से लोकतंत्र पाने के लिए सदियों लड़ने और उस लड़ाई की भारी कीमत चुकाने को मजबूर हो सकते हैं. इसलिए बेहतर होगा कि वे समय रहते किसी शायर की यह सीख मान लें: तू इन बुतों से न रख उम्मीद कोई, ये किसी का भला नहीं करते.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)