कविता में जनतंत्र: ‘क्या लोकतांत्रिक संवेदनशीलता सुधारवादी है या क्रांतिकारी?’

प्रोफेसर अपूर्वानंद की किताब 'कविता में जनतंत्र' की प्रस्तावना में प्रताप भानु मेहता लिखते हैं कि हमें ऐसे कवि की आवश्यकता है जो लोकतंत्र की चमक को पकड़ सके, जो केवल अंधकार का आह्वान न करे, बल्कि नया प्रकाश भी फैलाए.

/
(आवरण साभार: राजकमल प्रकाशन/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

प्रताप भानु मेहता का यह लेख दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद की हालिया किताब ‘कविता में जनतंत्र’ की प्रस्तावना से लिया गया है. यह किताब जिन निबंधों से मिलकर बनी है, वह पिछले बरस लोक सभा चुनावों के दौरान ‘द वायर हिंदी’ में  सिलसिलेवार प्रकाशित हुए थे. 

भारत की शासन व्यवस्था औपचारिक तौर पर उदारवादी संवैधानिक लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध है. उदारवादी संवैधानिकता के कुछ मूलभूत तत्व होते हैं: व्यक्तियों की मूलभूत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए व्यक्तिगत अधिकारों का सुदृढ़ीकरण; सभी नागरिकों की औपचारिक राजनीतिक समानता की पुष्टि; संस्थागत नियंत्रण और संतुलन का निर्माण; सरकार की शक्ति पर औपचारिक रूप से परिभाषित सीमाएं; और ऐसे संस्थानों और प्रथाओं का संरक्षण जो नागरिकों को राजनीतिक एजेंसी का प्रयोग करने और राजनीतिक औचित्य के अभ्यास में संलग्न होने की अनुमति देते हैं. ये सभी घटक मिलकर लोकतांत्रिक ताने-बाने को बनाते हैं और एक-दूसरे को सुदृढ़ करते हैं. यदि इनमें से एक भी घटक हटा दिया जाए — चाहे वह स्वतंत्रता हो, समानता, सत्ता का संस्थागत बंटवारा हो, या राजनीतिक एजेंसी का अभ्यास — तो पूरी संरचना ढह जाती है.

लोकतंत्र का मतलब एक प्रकार की सरकार भी है जो जनसमर्थन से बनाई जाती है, ताकि सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण संभव हो सके. लोकतंत्र मूल रूप से एक नैतिक संबंध है.

जनतंत्र, प्रजातंत्र, लोकतंत्र: ये शब्द किस प्रकार की व्यवस्था का बोध कराते हैं? क्या इनका अर्थ केवल एक शासन पद्वति तक सीमित रहेगा? या फिर ये शब्द एक नई तरह की नैतिकता का बोध कराते हैं? एक ऐसी नैतिकता जिसका अपना वजूद है. यह नैतिकता न तो किसी परंपरा से जुडी है, न ही इसका परंपरागत धर्म से कोई वास्ता है? इसकी सत्ता स्वयं स्थापित है.

अपने सबसे बुनियादी रूप, चुनावों में भी लोकतंत्र अद्वितीय मूल्यों को समाहित करता है. यह सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण के प्रति प्रतिबद्धता की मांग करता है. इसलिए, यह अहिंसा और शक्ति के शमन के प्रति एक गहरी प्रतिबद्धता से उत्पन्न होता है. लोकतंत्र वह संस्थागत रूप है जो शांति को सुलभ बनाता है. इस प्रकार किसी भी प्रकार की हिंसा लोकतंत्र के नैतिक स्वरूप का उल्लंघन करती है.

मतदान का सरल कार्य गहरे नैतिक अर्थों को दर्शाता है. हमारे अत्यंत श्रेणीबद्ध समाजों में यह एकमात्र क्षण होता है जब हम वास्तव में समान होते हैं: हर वोट का मूल्य किसी अन्य वोट के बराबर होता है. ‘बहुमत’ का शासन एकमात्र चयन प्रणाली है (लॉटरी के अलावा) जो राजनीतिक समानता के अनुकूल है. मतदान गुप्त होता है, यह इस बात का नैतिक संकेत है कि हमें स्वतंत्र कर्ता के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए. हमें बिना किसी भय के अपने मन बनाने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए.

उदार नैतिकता और लोकतांत्रिक नैतिकता की आवश्यक शर्तें एक-दूसरे से मेल खाती हैं. उदाहरण के लिए, किसी लोकतंत्र का स्वतंत्र और निष्पक्ष होना आवश्यक है, इसके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघ की स्वतंत्रता और संगठित होने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. ये भी उदारवाद की आवश्यक शर्तें हैं. चुनावों के प्रति प्रतिबद्धता के अन्य नैतिक अर्थ भी हैं. इसका मतलब है कि सरकार के सभी अधिकार अस्थायी होते हैं. यह इस संभावना पर आधारित है कि आज हारने वाला दृष्टिकोण कल जीत सकता है. इसमें उन नीतियों के अधीन रहने की संभावना शामिल है, जिनसे आप सहमत नहीं हो सकते.

चुनाव जैसी सरल प्रक्रिया भी गहरे नैतिक मूल्यों की मांग करती है: समानता के प्रति प्रतिबद्धता, अहिंसा, हमारे साथी नागरिकों की बौद्धिक स्वतंत्रता का सम्मान, उनके अधिकारों का सम्मान, और उन दृष्टिकोणों के साथ जीने की प्रस्तुति जिनसे हम शायद सहमत न हों . चुनाव केवल चुनाव नहीं होते. अगर हम यह समझ सकें कि चुनाव का क्या तात्पर्य है, तो हमारे पास पहले से ही एक स्पष्ट नैतिक दिशा-निर्देश होगा. लेकिन लोकतंत्र केवल चुनावों की नैतिकता से अधिक है.

यह दुनिया में होने का एक तरीका है.(It is a way of being in the world.) प्रोफेसर अपूर्वानंद द्वारा किया गया शक्तिशाली, प्रतिभाशाली, संवेदनशील और समयानुकूल meditation इस बात को समझाता है कि लोकतंत्र दुनिया में होने का एक तरीका है. यह दुनिया में होने का एक तरीका है जिसके केंद्र में मानव गरिमा का सम्मान और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की अवध्यता है. लोकतंत्र के युग की शुरुआत में, एलेक्सिस डी. टॉकविल ने लोकतंत्र और कविता के बीच संबंध पर ध्यान किया. उन्होंने लिखा…

‘मुझे विश्वास है कि अंततः लोकतंत्र मानव की कल्पना को बाहरी वस्तुओं से हटाकर केवल मनुष्य पर केंद्रित कर देता है. लोकतांत्रिक राष्ट्र कुछ समय के लिए प्रकृति की कृतियों पर विचार कर सकते हैं, लेकिन वास्तविकता में वे केवल अपने आप की समीक्षा से ही प्रेरित होते हैं. यहां, और केवल यहां, इन राष्ट्रों में कविता के सच्चे स्रोत पाए जाते हैं… एक लोकतांत्रिक समाज में कविता पुरानी परंपराओं की यादों या दंतकथाओं से पोषित नहीं होगी. ये सभी साधन कवि के लिए विफल हो जाते हैं; लेकिन मनुष्य शेष रहता है, और कवि को इससे अधिक किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं होती. मानवजाति की नियति, मनुष्य स्वयं, अपने देश और युग से परे, प्रकृति और ईश्वर के सामने खड़ा होता है, अपनी भावनाओं, अपने संदेहों, अपनी दुर्लभ समृद्धियों और अकल्पनीय दुखों के साथ, यही इन राष्ट्रों में कविता का प्रमुख, यदि एकमात्र नहीं तो, विषय बन जाएगा.’

इस अर्थ में लोकतंत्र मानवता पर केंद्रित है. ऐसा कोई कारण, कोई धर्म, कोई ईश्वर, कोई सौंदर्यबोध नहीं है जिसके लिए मानवता की बलि दी जा सके. लोकतंत्र हमें उन ईश्वरों का अनुसरण करने, उन सुखों का आनंद लेने और उन चुनौतियों का सामना करने की स्वतंत्रता देता है, जो हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती हैं. लेकिन लोकतंत्र की कविता, उसका नैतिक केंद्र, पूरी सच्चाई के साथ मानवता ही है. चूंकि लोकतंत्र दुनिया में होने का एक तरीका है, इसे एक व्याकरण, कविता, नैतिक मनोविज्ञान, सौंदर्यबोध, और अंत में विश्वास की भी आवश्यकता होती है.

हर बार जब हम किसी लोकतांत्रिक मूल्य को सीमित करते हैं, तो हम मूल रूप से दुनिया पर अपने विश्वास की कमी को व्यक्त करते हैं. हर बार जब हम किसी की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं, तो हम संकेत देते हैं कि हम उस पर भरोसा नहीं करते. हर बार जब हम किसी की गरिमा या समान दर्जे से इनकार करते हैं, तो हम यही संकेत देते हैं कि हम उस पर भरोसा नहीं करते.

स्वतंत्रता के उल्लंघन या समानता से विचलन सिर्फ नैतिक अपराध नहीं हैं; ये उल्लंघन दुनिया के ताने-बाने को चीर देते हैं. वास्तव में यह कहने का एक तरीका है कि हम अपने साथी नागरिकों पर भरोसा नहीं कर सकते. यही कारण है कि किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता या व्यक्ति की गरिमा पर हमला हमारे विश्व के साथ संबंध को तोड़ देता है. यह केवल एक नियम का उल्लंघन नहीं है, यह दिल तोड़ने वाला भी है.

यह संग्रह इस दिल टूटने पर एक गहन meditation है. भारत जैसे समाज में, जो गहरे स्तर पर पदानुक्रमित, गरीब और दमनकारी है, ऐसा दिल टूटना एक रोज़ का अनुभव है. वास्तव में, यह इतना सर्वव्यापी है कि हम अपनी वास्तविकताओं का सामना करने से बचते हैं. हम लोकतंत्र की औपचारिकताओं को तभी निभा पाते हैं जब हम अपने चारों ओर की दुनिया के साथ लगभग एक हृदयहीन संबंध विकसित कर लेते हैं.

यह हृदयहीनता जानबूझकर क्रूर होने के अर्थ में नहीं है, बल्कि यह एक सूक्ष्म अर्थ में हृदयहीन है. हम ध्यान देना बंद कर देते हैं. हम सहानुभूति व्यक्त करना बंद कर देते हैं. हम अपने आस-पास होने वाली दैनिक गरिमा के उल्लंघनों को नोटिस करना बंद कर देते हैं. हम अपने समाज द्वारा किए गए न्याय के बहुत ही मामूली प्रयासों को भी विफल कर देते हैं. ऐसा इसलिए है कि लोकतांत्रिक विश्वासघात का भूत इतना प्रबल होता है कि हम इससे निपटने के लिए एक प्रकार की अस्वीकृति का सहारा लेते हैं. हम जो कुछ अपनी आंखों के सामने देख रहे होते हैं, उसे देखने से इनकार कर देते हैं.

यह पुस्तक हमें लोकतंत्र में दिल टूटने का कविता के माध्यम से आभास कराती हैं आधुनिक कविता की कुछ बेहतरीन आवाज़ों—जैसे धूमिल, रघुवीर सहाय, विजयदेव नारायण साही, महमूद दरवेश, श्रीकांत वर्मा, कुंवर नारायण, नागार्जुन, ज्ञानेंद्रपति, ओमप्रकाश वाल्मीकि, जसिंता केरकेट्टा और अन्य—की गहरी व्याख्याओं के माध्यम से अपूर्वानंद हमें वह देखने पर मजबूर करते हैं जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं.

यह संग्रह और लेखन उस दुख और दर्द को सामने लाता है जिसे हम एक समाज के रूप में नज़रअंदाज़ करने के आदी हो गए हैं — लोकतंत्र के भीतर छिपे हुए, किनारे कर दिए गए समूहों की पीड़ा और उनकी आवाज़ें जिन्हें हम सुनना नहीं चाहते.

इस संग्रह की शुरुआत रघुवीर सहाय की एक कविता से होती है, जो लोकतंत्र के वादे और उसके भव्य गर्व को प्रकट करती है: ‘किसी भी व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनने का अधिकार है‘ लोकतंत्र की विशिष्ट गरिमा यह है कि कोई भी प्रधानमंत्री बनने का दावा कर सकता है.

एलेक्सिस डी. टॉकविल के शब्दों का उपयोग करें तो, ‘कोई कहां जा रहा है, यह इस बात से अधिक महत्त्वपूर्ण है कि वह कहां से आया है.’ लेकिन यह केवल एक महान भ्रम बनकर रह जाता है. हम जानते हैं कि यह यथार्थ रूप से सच नहीं है: राजनीतिक सत्ता का दावा हमेशा अन्य प्रकार के विशेषाधिकारों—जैसे संबंध, धन, व्यक्तिगत करिश्मा, सामाजिक स्थिति आदि—के माध्यम से किया जाता है.

निस्संदेह, कई आधुनिक लोकतंत्रों ने उस प्रकार की गतिशीलता को जन्म दिया है: बहुत ही मामूली सामाजिक पृष्ठभूमि वाले पुरुष (अधिकतर पुरुष) उच्चतम पद तक पहुंचे हैं. इस सीमित अर्थ में लोकतंत्र सामाजिक पहचान के बोझ से मुक्त करता प्रतीत होता है. लेकिन क्या यह सभी के लिए ऐसा करता है? एक लोकतंत्र आंशिक रूप से प्रतिनिधित्व द्वारा निर्मित होता है: जो प्रतिनिधि और शासक हम चुनते हैं, वे हमारे होते हैं. वे हमें प्रतिबिंबित करते हैं. वे कुछ हद तक वैधता प्राप्त करते हैं क्योंकि हम स्वयं को, या शायद अपने पराये हुए स्वरूप को उनमें देखते हैं.

लेकिन कभी-कभी लोकतंत्र कुछ समूहों को अदृश्य भी बना सकता है. लोकतंत्र में ‘कोई भी प्रधानमंत्री बन सकता है’ का गर्व अचानक इस विचार से टूट जाता है: क्या ऐसे समूह और समुदाय हैं जिन्हें हम प्रतिनिधि के रूप में सहन नहीं करेंगे, प्रधानमंत्री बनने की तो बात ही छोड़ दें?

§

प्रतिनिधित्व का प्रश्न लोकतंत्र के उस धोखे की ओर एक मार्ग बन जाता है, जिसमें वह अल्पसंख्यकों को हाशिए पर रखकर अपने वादे को तोड़ता है. अल्पसंख्यक अपने चेहरों को प्रतिनिधियों के चेहरों में नहीं देख सकते.

यदि मुसलमानों को शंका का विषय बना दिया जाता है, इस हद तक कि उन्हें प्रतिनिधि स्थानों में अदृश्य बना दिया जाता है, तो यह लोकतंत्र उनका कैसे हो सकता है? यहां एक सूक्ष्म भेद किया जाना चाहिए जो इस अन्याय को देखने में मदद करता है. प्रतिनिधित्व के एक दृष्टिकोण के अनुसार, मुझे अपने प्रतिनिधि में अपना चेहरा देखना चाहिए. प्रतिनिधि सभा को राष्ट्र का प्रतिबिंब होना चाहिए. इसे समाज के उन सभी सामाजिक विभाजनों को प्रतिबिंबित करना चाहिए, जो जाति या धर्म से चिह्नित हैं. लेकिन यहां एक और धारणा है जो प्रतिनिधित्व के बजाय भेदभाव पर केंद्रित है.

क्या हम उस प्रकार का लोकतंत्र हैं, जहां कुछ उम्मीदवारों का चयन केवल इसलिए नहीं किया जाएगा क्योंकि वे कौन हैं, उनकी पहचान के कारण? क्या लोगों को केवल उनके ‘चेहरों’ के आधार पर हाशिए पर रखा जा रहा है, या जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार चतुराई से कहा था, ‘उनके पहनावे के कारण?’

मैं खुद इस दूसरे प्रकार के अन्याय को प्राथमिकता देता हूं. केवल पहचान के आधार पर लोगों को बाहर करना लोकतंत्र द्वारा किए जाने वाले सबसे बुरे पापों में से एक है. नहीं, हमारे लोकतंत्र में हर कोई प्रधानमंत्री नहीं बन सकता. लेकिन यह मांग करना कि मैं अपना चेहरा प्रतिनिधि सभा में देखूं — जहां मेरा चेहरा किसी पहचान के अनुसार परिभाषित है — भी पहचान की राजनीति का महिमामंडन करना है. आदर्श लोकतंत्र में, जहां मेरा अपना चेहरा भी स्थिर नहीं है, इसे कैसे दर्शाया जा सकता है?

यह विचार कि प्रतिनिधित्व को समाज का प्रतिबिंब होना चाहिए, अक्सर कुछ विभाजनों और पहचानों को विशेषाधिकार देता है. ये पहचानें लोगों के निजी और सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं. इनका ध्यान रखा जाना चाहिए, खासकर यदि ये पहचान बहिष्कार का आधार बनती हैं. लेकिन अंततः लोकतंत्र का रोमांटिक वादा यह है कि यह राजनीति को इन पहचानों के बोझ से मुक्त करता है और एक पूर्ण व्यक्तित्व को विकसित होने देता है. पहचान हमारी व्यक्तित्व का एक पहलू हो सकती है, लेकिन राजनीति का उद्देश्य हमारी पहचान का प्रतिबिंब नहीं है.

यह पुस्तक हमें लोकतंत्र में दिल टूटने की कविता के रास्ते ले जाती है. ‘प्रधानमंत्री बनने का अधिकार किसके पास है?’;यह प्रश्न केवल इस बात का प्रारंभिक संकेत है कि हम अपने जीवन के तरीकों पर गहरे और महत्त्वपूर्ण प्रश्न कैसे उठा सकते हैं. हमें और क्या चाहिए कि हम सच में लोकतांत्रिक बन सकें?

एक सुंदर चिंतन द्वारा अपूर्वानंद यह सवाल उठाते हैं:

कभी-कभी लोकतांत्रिक ऊर्जा भारी प्रतीत होती है. संख्याओं का खेल व्यक्ति को एक छोटे से अस्तित्व में समेट देता है जो अक्सर उस बड़े समूह में खो जाता है जिसका वह हिस्सा होता है. ऐसे हालात में, क्या मतदान से पीछे हटना, एकांत में अपने शांति के कार्य को फिर से प्राप्त करना, नैतिक और राजनीतिक एजेंसी का एक रूप हो सकता है?

एक अन्य चिंतन में वे लोकतंत्र के केंद्र में एक रहस्य को सामने रखते हैं. ‘घृणा की राजनीति कैसे आकर्षक हो जाती है?’ घृणा से भरी हुई एक ‘जनतांत्रिक’ धारा इतने लोगों को कैसे जुटा लेती है? घृणा कैसे सौंदर्य की दृष्टि से आकर्षक बन सकती है?

एक और चिंतन में वे राजनीतिक एजेंसी की भौतिक स्थितियों पर विचार करते हैं. ‘अत्यधिक भौतिक अभाव की स्थितियों में लोकतांत्रिक रूप से जीने का क्या अर्थ है?’ लोकतंत्र, जो स्वतंत्रता का वादा करता है, इतनी बड़ी संख्या में लोगों को बुनियादी जरूरतों की जिंदगी में कैसे बाँध देता है? आखिरकार स्वतंत्रता के विपरीत आवश्यकता होती है. ऐसी परिस्थितियों में हम गरिमा और एजेंसी कैसे खोज सकते हैं?

एक अन्य कविता लोकतांत्रिक साहस की कमी की ओर संकेत करती है. ‘क्या लोकतंत्र, विशेष रूप से उदार लोकतंत्र, हमें कानूनी स्वतंत्रताएं प्रदान करता है? लेकिन कितने लोग इस स्वतंत्रता का साहसपूर्वक प्रयोग करते हैं?’

एक आदर्श लोकतंत्र में जो भावना हमें महसूस नहीं होनी चाहिए, वह है ‘भय’; जैसा कि इतिहासकार एलन काहन ने अपनी उदारवाद की अद्भुत इतिहास में लिखा है, ‘मानव गरिमा और भय से मुक्ति के बीच गहरा संबंध है.’ भय के स्रोत बदल सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र को सभी का सामना करना पड़ता है: हमें भय से स्वतंत्रता की आवश्यकता है, अधिनायकवादी सरकार से, गरीबी से, धार्मिक कट्टरवाद से, राष्ट्रवाद की सामूहिकता से.

लेकिन अक्सर, कवि हमें याद दिलाते हैं, ‘हम भय में जीने में अधिक सहज होते हैं.’ सबसे शक्तिशाली और विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति भी सत्ता या कट्टरता को चुनौती देने के लिए थोड़ा सा नागरिक साहस नहीं जुटा पाते. कोई भी लोकतंत्र न्यूनतम नागरिक साहस के बिना जीवित नहीं रह सकता.

एक और कविता, जो अधिक विवादास्पद है, यह इंगित करती है कि ‘पूंजीवाद लोकतंत्र के लिए खतरा है’, कि वास्तविक स्वतंत्रता के लिए पूंजीवाद का अंत आवश्यक होगा. पूंजीवाद की इस आलोचना में बहुत कुछ है, विशेष रूप से अगर यह अनियंत्रित हो तो यह मानव संभावनाओं को कुचल सकता है. लेकिन लोकतंत्र के लिए चुनौती यह है कि यह बात सभी मौजूदा समाजवादों के मामले में और भी अधिक सच रही है.

सच तो यह है कि बाजार स्वतंत्रता को सक्षम भी कर सकते हैं और इसे खतरे में डाल भी सकते हैं. राज्य भी स्वतंत्रता को सक्षम कर सकता है और इसे खतरे में डाल सकता है. एक लोकतांत्रिक नैतिकता को दोनों खतरों से संघर्ष करना पड़ता है. यह आधुनिक लोकतंत्र की त्रासदी है कि इसे अभी तक सही उत्तर नहीं मिला है. लेकिन पूंजीवाद की कट्टर आलोचना कभी-कभी बाजारों की मुक्तिकारी शक्ति को कम आंक सकती है.

‘क्या लोकतंत्र को तब क्रांति की आवश्यकता होती है’ जैसा कि एक कविता सुझाव देती है? क्रांति का इतिहास उत्साहजनक नहीं है. एक स्तर पर, क्रांति हमें उस दुनिया की कल्पना करने की अनुमति देती है जिसे हमने सामूहिक रूप से अपनी एजेंसी के माध्यम से बनाया है, एक ऐसी दुनिया जिसमें कुछ लोग बहुतों पर शक्ति का प्रयोग नहीं करते. लेकिन दूसरी ओर, क्रांति का इतिहास हिंसा का इतिहास है. ‘क्या वह हिंसा आधुनिक समाज की संरचनात्मक हिंसा से बेहतर परिणाम लाती है?’

यह वह स्थान नहीं है जहां इस प्रश्न को सुलझाया जा सकता है, लेकिन प्रोफेसर अपूर्वानंद की उत्कृष्टता का यह प्रमाण है कि उनका यह चिंतन इस प्रश्न को सतह पर लाता है: ‘क्या लोकतांत्रिक संवेदनशीलता सुधारवादी है या क्रांतिकारी?’

इन गहन प्रश्नों की सूची लंबी और प्रभावशाली है. राजनीतिक प्रश्नों के अलावा अपूर्वानंद बार-बार लोकतंत्र को एक जीवन के रूप में देखते हैं. ‘क्या लोकतंत्र के लिए हमारी अपनी अधूरी स्थिति के प्रति आत्म-जागरूकता आवश्यक है?’ इस दृष्टिकोण से, हम अपने साथी नागरिकों को एक प्रकार से हमें पूरा करने के रूप में देखते हैं. यह हमारे अहंकार के लिए एक उपचार है.

लोकतंत्र किस प्रकार के सामाजिक सहयोग की आवश्यकता है? यह सामूहिकता के गुण की आवश्यकता नहीं है, जो हमेशा निजता को मिटाने की धमकी देता है. इसके बजाय, यह परस्पर सम्मान और एक-दूसरे के प्रति समान ध्यान की आवश्यकता है. इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आपको यह एहसास होगा कि ‘लोकतांत्रिक आत्मा’ कैसी दिखती है, अपनी सारी धड़कती लय में. यह आपको गहराई से बदल कर छोड़ देगा.

यह पुस्तक, असाधारण विचारों की एक शृंखला के माध्यम से हमें दिखाती है कि हमारे आसपास क्या है. यह हमारी राजनीति को छूती है, लेकिन यह उससे भी अधिक कठिन जगह पर पहुंचती है: ‘हमारी आत्माओं तक’. यह अस्थिरता पैदा करती है.

मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि इस पुस्तक में संकलित सभी कविताओं को पढ़ने से लोकतंत्र के प्रति एक निरंतर निराशा की भावना पैदा होती है. इस संग्रह में लगभग सभी कवि एक प्रकार से ‘धोखा खाए’ हुए प्रतीत होते हैं. कुछ गुस्से में हैं, कुछ नाराज़, कुछ गहराई से निराश. इन सभी में अन्याय की एक स्वाभाविक भावना है जो शक्तिशाली रूप से सामने आती है, वे शक्तिशाली रूप से लोकतंत्र के विवेक के रक्षक का कार्य करते हैं. लेकिन कविता और लोकतंत्र के बीच का रिश्ता केवल निराशा का नहीं होना चाहिए, केवल एक अधूरे वादे पर गुस्से का भाव भी नहीं. यह केवल अप्रयुक्त दोषों या गुणों की एक सूची नहीं होनी चाहिए.

लोकतंत्र की कविता को भी एक रोमांस की आवश्यकता है. इस संग्रह को पढ़ते समय यह विचार मेरे मन में आया कि भारत ने असाधारण कवियों को जन्म दिया है, जिन्होंने लोकतंत्र के विश्वासघात को दर्ज किया है. लेकिन वह अब भी अपने वॉल्ट व्हिटमैन की प्रतीक्षा कर रहा है — वह कवि जो पूरी महिमा और पूर्णता में यह व्यक्त कर सके कि लोकतांत्रिक संवेदनशीलता क्या है.

इनमें से कुछ कवि करीब आते हैं. लेकिन हमें ऐसे कवि की आवश्यकता है जो लोकतंत्र की चमक को पकड़ सके, जो केवल ‘अंधकार’ का आह्वान न करे, बल्कि ’नया प्रकाश’ भी फैलाए. लेकिन जो ये निबंध साबित करते हैं, वह यह है कि हिंदी भाषा के पास अब दुनिया के सबसे प्रमुख लोकतंत्र चिंतकों में से एक अपूर्वानंद के रूप में हैं. वे सारे शानदार रोमांस और साहस में लोकतंत्र का जीवंत स्वरूप हैं.

(साभार: राजकमल प्रकाशन)

(‘कविता में जनतंत्र’ श्रृंखला के सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.