नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति का पद दूसरी बार संभालने के ठीक दो सप्ताह बाद, 4 फरवरी को डोनाल्ड ट्रंप ने ग़ाज़ा के लिए अपनी योजना घोषित कर दुनिया को चौंका दिया. ट्रंप ने इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान इस योजना की घोषणा की. उनके अनुसार यह बेहद सरल उपाय था. उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि लोगों को ग़ाज़ा वापस जाना चाहिए. वे वापस क्यों जाना चाहेंगे? वो जगह नरक बन गई है.‘
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने फ़िलिस्तीनी लोगों के सदियों पुराने घर को मलबे में बदलने में इज़रायल की मदद की थी, और अब वो उन्हें बता रहा है कि वापस लौटना उनके हित में नहीं है. इसके बजाय, ट्रंप के अनुसार, ‘लड़ाई का अंत होने के बाद ग़ाज़ा को इज़रायल द्वारा संयुक्त राष्ट्र अमेरिका को सौंप दिया जाएगा,’ जबकि फ़िलिस्तीनियों को ‘इस क्षेत्र में नए और आधुनिक घरों में पहले से ही कहीं अधिक सुरक्षित तथा अधिक सुंदर समुदायों में बसाया जा चुका होगा.’
ग़ाज़ा को संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के स्वामित्व वाले ‘मध्य पूर्व के रिवेरा’ के रूप में पुनर्विकसित किया जाना था. दुनिया भर के लोग, जिनके पास पैसे हैं, यहां संपत्ति ख़रीद सकते हैं और इसके शानदार समुद्र और स्फूर्तिदायक हवा का आनंद ले सकते हैं. इस भूमि के मूल निवासियों को छोड़कर यहां सभी का स्वागत किया जाएगा.
ट्रंप ने यह नहीं बताया कि यह किस अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत किया जाना था, कैसे एक सरकार एक संप्रभु लोगों की भूमि को किसी तीसरी शक्ति को ‘सौंप’ सकती है, या इस पुनर्निर्माण के ख़र्चे कौन उठाएगा.
ट्रंप की योजना अप्रत्याशित और निर्दयी थी, जातीय नरसंहार के बराबर थी. संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के कई क़रीबी सहयोगियों ने भी सार्वजनिक रूप से इसे अस्वीकार कर दिया और इसकी निंदा की. हालांकि, वैश्विक आक्रोश के बीच एक महत्वपूर्ण देश था जो पूरी तरह से ख़ामोश था. ग़ाज़ा से सभी फ़िलिस्तीनियों को निकालने और इसकी जगह वहां एक रियल-एस्टेट का स्वर्ग बनाने की ट्रंप की निर्दयी, तिरस्कारपूर्ण योजना को लेकर भारत सरकार ने न तो चिंता व्यक्त की और न ही निंदा में एक शब्द भी कहा.
मोदी शासन के सबसे गंभीर नैतिक और राजनीतिक अपराधों की सूची में सबसे ऊपर ग़ाज़ा में फ़िलिस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ भीषण युद्ध और जातीय नरसंहार का मौन समर्थन होगा.
ग़ाज़ा पर ट्रंप की घोषणा के बाद नेतन्याहू ने नए जोश में इज़रायल के चैनल 14 के साथ एक साक्षात्कार में कहा कि फ़िलिस्तीनियों को अपने देश के बजाय सऊदी अरब में एक राज्य स्थापित करना चाहिए – जिसे वर्तमान इज़रायल, ग़ाज़ा और वेस्ट बैंक को मिलाकर बनाया जाना है. उन्होंने फ़िलिस्तीनी राज्य को ‘इज़रायल की सुरक्षा के लिए ख़तरा‘ बताया. ग़ाज़ा के बारे में बोलते हुए ट्रंप के भीतर कतई करुणा नहीं था, न ही अंतरराष्ट्रीय क़ानून के प्रति कोई सम्मान. उन्होंने एक रियल एस्टेट व्यापारी की तरह सोचा, जो वह हैं ही.
बाद में फ़ॉक्स न्यूज़ के साथ एक साक्षात्कार में पूछे जाने पर कि क्या उनकी योजना के तहत गाज़ा में फ़िलिस्तीनियों को लौटने का अधिकार होगा, ट्रंप ने जवाब दिया, ‘नहीं, वे नहीं लौट सकते क्योंकि उनके पास बहुत बेहतर आवास होंगे.’ इसके बजाय, नव विकसित ग़ाज़ा में होटल, कार्यालय भवन और घर होंगे.
यह योजना ट्रंप की कल्पना नहीं थी. यूके स्थित चैनल द मिडिल ईस्ट आई ने बताया कि ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर कम से कम एक साल से ऐसी ही योजना की वकालत कर रहे थे.
चैनल ने फरवरी 2024 में कुशनर के कथन को दर्ज किया कि ‘ग़ाज़ा की तटीय संपत्ति … बहुत मूल्यवान हो सकती है.’ कुशनर ने आगे कहा, ‘वहां थोड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है, लेकिन मुझे लगता है कि इज़रायल के दृष्टिकोण से, मैं लोगों को वहां से हटाने और फिर उसे साफ़ करने की पूरी कोशिश करूंगा.’ राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान कुशनर उनके पश्चिम एशिया मामलों के सलाहकार थे.

ट्रंप के इस जातीय नरसंहार की योजना का सबसे तीखा और आक्रामक विरोध फ़िलिस्तीनी लोगों की ओर से हुआ. ग़ाज़ा निवासी मोइन मोहसेन ने सीबीएस न्यूज़ के संवाददाताओं से कहा, ‘हमें विस्थापित करने का निर्णय लिया गया है. हम इसे पूरी तरह से अस्वीकार करते हैं.’
फ्रांस ने ग़ाज़ा की फ़िलिस्तीनी आबादी के किसी भी तरह के जबरन विस्थापन के विरोध में एक सार्वजनिक बयान जारी किया. बयान में कहा गया कि इससे ‘अंतरराष्ट्रीय क़ानून का गंभीर उल्लंघन’ होगा और ‘फ़िलिस्तीनियों की वैध आकांक्षाओं पर हमला होगा.’ यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा कि फ़िलिस्तीनियों को ‘घर जाने की अनुमति दी जानी चाहिए. उन्हें पुनर्निर्माण की अनुमति दी जानी चाहिए, और हमें दो-राज्य समाधान की दिशा में आगे बढ़कर उनको बसाने में मदद करनी चाहिए.’
भारत की शर्मनाक चुप्पी
लेकिन भारत चुप रहा. एक समय के गौरवशाली लोकतंत्र, दुनिया भर के उत्पीड़ित लोगों की आवाज़ – जिसमें फ़िलिस्तीनी भी शामिल हैं – के लिए यह कितनी शर्मनाक स्थिति है. गांधी और नेहरू, टैगोर और अंबेडकर, मौलाना आज़ाद और भगत सिंह की भूमि के लिए यह पतन कितना शर्मनाक है.
भारत ने न सिर्फ़ अपनी दोषपूर्ण चुप्पी से ही इज़रायली सेना द्वारा फ़िलिस्तीनी लोगों के विनाश को बढ़ावा दिया है. बल्कि उसने इज़रायल को घातक आग्नेयास्त्रों की आपूर्ति की अनुमति देकर और उन्हें सुविधाजनक बनाकर भी ऐसा किया है, जिनमें से कई का इस्तेमाल ग़ाज़ा के विनाश में किया गया.
पिछले साल सितंबर में 12 सजग भारतीयों ने, जिनमें एक मैं भी था, भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की, जिसमें इज़रायल को भारतीय सहायता – विशेष रूप से सैन्य उपकरणों सहित उसकी सैन्य सहायता को तत्काल निलंबित करने की मांग की गई थी. अन्य याचिकाकर्ताओं में पूर्व राजनयिक अशोक कुमार शर्मा और देब मुखर्जी, शांति कार्यकर्ता अचिन वनायक, विकास अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज, संगीतकार टी एम कृष्णा, सेवानिवृत्त सिविल सेवक मीना गुप्ता और अधिकार कार्यकर्ता निखिल डे शामिल थे. हमारे वकील प्रशांत भूषण थे.
हमारी याचिका में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) के 26 जनवरी 2024 के उस निर्णय की ओर ध्यान आकर्षित किया गया, जिसमें इज़रायल द्वारा फ़िलिस्तीनी लोगों पर किए जा रहे सभी हत्याओं और विनाश को तत्काल रोकने का आदेश दिया गया है. भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और संधियों से बंधा हुआ है – जैसे कि 1948 का जिनेवा कन्वेंशन, जिस पर उसने हस्ताक्षर किया है – जो उसे युद्ध अपराधों के दोषी देशों को सैन्य हथियार नहीं देने के लिए बाध्य करता है, क्योंकि ऐसे किसी भी हथियार निर्यात का उपयोग अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के गंभीर उल्लंघन में किया जा सकता है. संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने भी इज़रायल को हथियार और गोला-बारूद के हस्तांतरण के ख़िलाफ़ चेतावनी देते हुए एक बयान जारी किया है, जो ‘मानव अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानूनों का गंभीर उल्लंघन हो सकता है और अंतरराष्ट्रीय अपराधों में राज्य की मिलीभगत का जोखिम हो सकता है, जिसमें संभवतः नरसंहार भी शामिल है.’
हमारी याचिका में आईसीजे के 19 जुलाई 2024 के निर्णय का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया था कि इज़रायल फ़िलिस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा करता है और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन करता है. क़ब्ज़े वाले क्षेत्र में इज़रायल की उपस्थिति को ग़ैरक़ानूनी है. हमने बताया कि ‘भारत इज़रायल को कोई भी सैन्य उपकरण या हथियार निर्यात नहीं कर सकता है, क्योंकि इस बात का गंभीर ख़तरा है कि इन हथियारों का इस्तेमाल युद्ध अपराध करने के लिए किया जा सकता है.’
हमने रिपोर्टों और सार्वजनिक दस्तावेज़ों का भी हवाला दिया, जिससे पता चलता है कि भारतीय अधिकारियों ने ग़ाज़ा युद्ध शुरू होने के बाद – और यहां तक कि इज़रायल द्वारा संभावित नरसंहार पर आईसीजे के फ़ैसले के बाद भी, इज़रायल को गोला-बारूद के निर्यात के लिए एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी सहित विभिन्न कंपनियों को लाइसेंस दिए थे. हमने इस बात को रेखांकित किया कि 2019 और 2023 के बीच, हैदराबाद स्थित अडानी-एलबिट एडवांस्ड सिस्टम्स इंडिया ने बीस से अधिक हर्मीस 900 सैन्य ड्रोन के लिए एयरो-स्ट्रक्चर और सबसिस्टम का निर्माण किया और इज़रायल को निर्यात किया. यह कंपनी इज़रायल की सबसे बड़ी हथियार निर्माता कंपनी, एलबिट सिस्टम्स और भारतीय कंपनी अडानी समूह का एक संयुक्त उद्यम है, जिसमें अडानी की नियंत्रक हिस्सेदारी है. अडानी समूह के प्रमुख गौतम अडानी मोदी के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों के लिए जाने जाते हैं. अडानी-एलबिट द्वारा बनाए गए हर्मीस ड्रोन जैसे ड्रोन का इस्तेमाल ग़ाज़ा में इज़रायली सेना द्वारा बड़े पैमाने पर किया गया है.
सर्वोच्च न्यायालय ने हमारी याचिका ख़ारिज कर दी.
उस समय के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि देश के विदेशी मामलों से संबंधित विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार और न्याय क्षेत्र केवल भारत सरकार के पास है. सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई राहत देने के लिए, उसे इज़रायल के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों के संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना होगा, जो एक स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र है, जो भारतीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र के अधीन नहीं है.
अल जज़ीरा ने इज़रायल के पश्चिमी सहयोगियों के कपटपूर्ण रवैये की ओर इशारा किया है, जो देश को हथियारों के निर्यात को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अपनी ज़िम्मेदारियों से भी बच रहे हैं. मैक्रॉ ने पुष्टि की कि फ्रांस ने 2019 और 2023 के बीच इज़रायल को हथियार नहीं भेजे, और आख़िरी बार उसने 1998 में उसे हथियार भेजे थे. उन्होंने इज़रायल को हथियार देना बंद करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, और कहा कि ‘फ्रांस कोई हथियार नहीं भेज रहा है.’
लेकिन फ्रांस इज़रायल को हथियार बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले घटकों की आपूर्ति करता है.
2019 और 2023 के बीच इज़रायल के हथियार आयात में जर्मनी का 30 प्रतिशत योगदान था, जिसमें फ्रिगेट और टॉरपीडो शामिल थे. 2022 की तुलना में 2023 में इसका योगदान दस गुना अधिक हो गया. जर्मन सरकार के एक आधिकारिक प्रवक्ता ने घोषणा की, ‘इज़रायल के ख़िलाफ़ हथियार निर्यात को लेकर जर्मनी का कोई बहिष्कार नहीं है.’
यूके सरकार ने अपनी संसद को आश्वासन दिया कि ‘यूके सरकार द्वारा 4 दिसंबर 2023 के बाद से इज़रायल को कोई भी घातक या अन्य सैन्य उपकरण उपलब्ध नहीं कराया गया है.’ लेकिन आधिकारिक डेटा से पता चलता है कि इसने 7 अक्टूबर 2023 और 31 मई 2024 के बीच इज़रायल को भेजे जाने वाले सैन्य और ग़ैर-सैन्य सामानों के लिए 108 लाइसेंसों को मंज़ूरी दी है.
नवंबर में, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की सीनेट ने स्वतंत्र सीनेटर बर्नी सैंडर्स द्वारा इज़रायल के साथ 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर के हथियार सौदे को रोकने के लिए पेश किए गए प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया, जिसे पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन द्वारा अनुमोदित किया गया था. कनाडा ने घोषणा किया कि वह इज़रायल को हथियारों की आपूर्ति रोक रहा है, लेकिन कार्यकर्ताओं का आरोप है कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के माध्यम से कनाडा से इज़रायल को हथियारों का निर्यात जारी है.
जब भारत फ़िलिस्तीन के साथ था
भारत ने स्वतंत्रता संग्राम के वर्षों के दौरान और उसके बाद के दशकों में फ़िलिस्तीनी लोगों के साथ अपनी मित्रता निभाई और उनके लिए अटूट समर्थन जताया. मोहनदास करमचंद गांधी ने फ़िलिस्तीन के विभाजन का विरोध किया था कि फ़िलिस्तीनियों को यूरोपीय लोगों के अपराधों की क़ीमत नहीं चुकानी चाहिए.
अल्बर्ट आइंस्टीन ने जून 1947 में, भारत के स्वतंत्र होने से ठीक दो महीने पहले, जवाहरलाल नेहरू को चार पन्नों का एक पत्र लिखा था. (संयोग से, इस भौतिक वैज्ञानिक ने इज़रायल के दूसरे राष्ट्रपति बनने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था.) आइंस्टीन ने भारत की संविधान सभा की प्रशंसा की, जिसने अभी-अभी अस्पृश्यता को समाप्त किया था. उन्होंने लिखा, ‘दुनिया का ध्यान अब मनुष्यों के एक अन्य समूह की समस्या पर केंद्रित है, जो अछूतों की तरह सदियों से उत्पीड़न और भेदभाव का शिकार रहे हैं’ – वो है यहूदी. आइंस्टीन ने नेहरू से यहूदी राज्य की स्थापना के लिए भारतीय समर्थन का आग्रह किया.
नेहरू ने अपने जवाब में यहूदियों के प्रति गहरी सहानुभूति व्यक्त की. लेकिन उन्होंने कहा, ‘यहूदियों के प्रति हमारी पूरी सहानुभूति के साथ हमें यह महसूस करना चाहिए कि अरबों के अधिकार और भविष्य इस प्रश्न में शामिल हैं.’ उन्होंने आइंस्टीन के यहूदी राज्य के विचार का समर्थन करने के अनुरोध को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया.
नेहरू अक्सर फ़िलिस्तीनी लोगों द्वारा झेले जा रहे अन्याय के ख़िलाफ़ बोलते थे और संयुक्त राष्ट्र तथा गुटनिरपेक्ष आंदोलन सहित अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसा करते थे. भारत फ़िलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को फ़िलिस्तीन के वैध प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देने वाला पहला ग़ैर-अरब देश बना और इसे दिल्ली में एक कार्यालय खोलने की अनुमति दी गई. 1988 में फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता देने वाले देशों की पहली क़तार में भारत भी शामिल था. पीएलओ नेता यासर अराफ़ात भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी बहन मानते थे और उनके अंतिम संस्कार में वो फूट-फूट कर रोए. ये संबंध उनके पुत्र और तत्काल उत्तराधिकारी राजीव गांधी के साथ भी जारी रहा और अराफ़ात उनके अंतिम संस्कार में भी उपस्थित थे.
इज़रायल की तरफ़ बढ़ता झुकाव
नेहरू, इंदिरा गांधी और उनके बेटे सभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिग्गज थे. लेकिन 1990 के दशक में, कांग्रेसी प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व वाली सरकार के समय भारत सरकार का झुकाव इज़रायल की तरफ़ होने लगा.
2000 के दशक के शुरुआत में, भारतीय जनता पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में कूटनीतिक बदलाव पूरा हो गया था. ऐसे समय में जब अराफ़ात पश्चिमी तट के रामल्लाह में अपने कार्यालय में वस्तुतः क़ैद थे, वाजपेयी ने कट्टरपंथी इज़रायली प्रधानमंत्री एरियल शेरोन को भारत की राजकीय यात्रा के लिए आमंत्रित करना उचित समझा. भारत के लिए रवाना होने से पहले शेरोन ने अराफ़ात के ख़ात्मे के अपने आह्वान को दोहराया था.
2004 से 2014 के बीच मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार के दौरान भी नई दिल्ली की तेल अवीव के साथ निकटता बनी रही. पत्रकार जॉन चेरियन ने फ्रंटलाइन के लिए एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि ‘अरब की सड़कों पर यह धारणा थी कि नई दिल्ली आतंकवाद का इस्तेमाल करके इज़रायल का वास्तविक सहयोगी बन गया है.‘

2006 में मोदी की इज़रायल यात्रा को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव कहा जा सकता है, जब वे गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री थे. यह वह समय था जब 2002 में गुजरात में मुसलमानों की सामूहिक हत्याओं को बढ़ावा देने के आरोपों के कारण मोदी को अधिकांश पश्चिमी देशों द्वारा वीज़ा देने से इनकार किया जा रहा था. इज़रायल ने उनका भव्य स्वागत करने का फ़ैसला किया और मोदी के प्रबल इस्लामोफ़ोबिया के सुर में सुर मिलाया. इज़रायल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मोदी की भाजपा के मूल संगठन और जिस संगठन से उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया, के द्वारा एडॉल्फ हिटलर की अत्यधिक प्रशंसा किए जाने को भी नजरअंदाज़ कर देना उचित समझा.
जब मोदी 2017 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में फिर से इज़रायल लौटे, तो नेतन्याहू और पूरा इज़रायली मंत्रिमंडल उनका स्वागत करने के लिए आया था, और उन्हें वह सम्मान दिया गया जो आमतौर पर देश के सबसे विशिष्ट अतिथियों, जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति और पोप को दिया जाता है.
फ़िलिस्तीन के खिलाफ़ भारत में झूठा प्रचार
अगर मैं केवल फ़िलिस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ इज़रायली राज्य के नरसंहार अपराधों को बढ़ावा देने में भारतीय राज्य की मिलीभगत के बारे में बोल रहा होता, तब भी यह काफ़ी दुख की बात होती. लेकिन मैं कई भारतीय लोगों के बारे में भी बोल रहा हूं, जिन्होंने हिंदुत्व की विचारधारा से प्रभावित होकर न केवल ग़ाज़ा में इज़रायल के युद्ध का समर्थन किया है, बल्कि तबाह हो चुके फ़िलिस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ नफरत और फर्ज़ी प्रचार में भी ख़ुशी-ख़ुशी योगदान दिया है.
इज़रायली युद्ध के साथ ही फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ ऑनलाइन फर्ज़ी ख़बरों की सुनामी भी आई. कई जांचकर्ताओं ने पुष्टि की है कि इस सामग्री का एक बड़ा हिस्सा – शायद इसका सबसे बड़ा हिस्सा – भारतीयों द्वारा बनाया गया था.
एक विश्वसनीय भारतीय तथ्य-जांचकर्ता बूम ने पाया कि ऑनलाइन नफरत के मूल स्रोत अक्सर एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर सत्यापित भारतीय उपयोगकर्ता थे. ये प्रोफ़ाइल भारत में स्थित लोगों के थे या उन्होंने अपने विवरण में भारतीय ध्वज का उपयोग किया था. बूम ने बताया कि ‘फ़िलिस्तीन को नकारात्मक रूप से लक्षित किया जा रहा था, या इज़रायल का समर्थन किया जा रहा था‘, और इन उपयोगकर्ताओं द्वारा प्रसारित किए गए फर्ज़ी वीडियो मूल रूप से ‘फ़िलिस्तीनियों को क्रूर दिखाने‘ के लिए बनाए गए थे. उदाहरण के लिए, छह मिलियन से ज़्यादा बार देखे गए एक वीडियो में एक फ़िलिस्तीनी लड़ाके को दर्जनों सेक्स ग़ुलामों के साथ ‘दिखाया गया’; यह वास्तव में यरुशलम के एक स्कूल ट्रिप का वीडियो था. एक और फर्ज़ी वीडियो में हमास द्वारा एक बच्चे के अपहरण का सुझाव दिया गया था. ऐसे वीडियो अक्सर हिंसक संदेशों के साथ होते थे. एक भारतीय अकाउंट, जो सेवानिवृत्त भारतीय सैनिक होने का दावा करता है, ने कहा, ‘इज़रायल को चाहिए कि वह फ़िलिस्तीन को इस ग्रह से ख़त्म कर दे.’
मोहम्मद ज़ुबैर, जो ऑल्ट न्यूज़ के साथ काम करते हैं और शायद भारत के सबसे बहादुर और सबसे सम्मानित तथ्य-जांचकर्ता हैं, उनका भी यही अवलोकन है. वे भारत में घृणित सामग्री और फर्ज़ी ख़बरों के तथ्यों की जांच करने की दिशा में पूरी तरह से समर्पित हैं और उन्हें पता है कि किस स्तर पर प्रोपगेंडा फैलाया जा रहा है. 8 अक्टूबर 2023 के बाद भारतीय सोशल मीडिया पर ग़लत सूचनाओं की बाढ़ ने उन्हें स्तब्ध कर दिया.
ज़ुबैर ने द अटलांटिक को बताया, ‘इस बार ग़लत सूचनाओं का स्तर भयानक और अकल्पनीय था. मैक्सिकन ड्रग कार्टेल द्वारा सिर क़लम करने का एक भयावह वीडियो इज़रायली नागरिकों पर हमला बताकर साझा किया गया था. इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके बेटे की नौ साल पुरानी तस्वीर, जो तस्वीर उनकी सैन्य सेवा के लिए रवाना होने से पहले ली गई थी, को नेता द्वारा अपने बच्चों को युद्ध में भेजने के रूप में चित्रित किया गया था. महामारी लॉकडाउन से बचने के लिए जॉर्डन में आयोजित अंतिम संस्कार के फुटेज को ग़लत तरीक़े से ग़ाज़ा में फ़िलिस्तीनियों की मौत के रूप में प्रस्तुत किया गया था.‘
और इस प्रकार मैं इस निबंध के उस हिस्से की तरफ़ आता हूं जो व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए सबसे कठिन कार्य है: उन भारतीयों को आईना दिखाना, जिन्होंने फ़िलीस्तीनी लोगों के विरुद्ध इज़रायल के युद्ध का उत्साहपूर्वक जश्न मनाया है, और उन्हें यह दिखाना है कि यह युद्ध वास्तव में क्या है.
प्रमुख मानवाधिकार और मानवीय संगठनों ने हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमलों के मद्देनज़र इज़रायल के सैन्य हमले को नरसंहार और मानवता के ख़िलाफ़ अपराध बताया है. उदाहरण के लिए, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बताया है कि कैसे इज़रायल ने ग़ाज़ा में फ़िलिस्तीनियों पर बेशर्मी से बार-बार हमला किया और उनके जीवन के नरक बना दिया, ऐसा करते हुए उसे किसी प्रकार के दंड का कोई भय नहीं था. इज़रायल ने ‘नरसंहार करने वाले कृत्यों को अंजाम देना जारी रखा है, ग़ाज़ा में फ़िलिस्तीनियों को होने वाले अपूरणीय क्षति के बारे में पूरी तरह से जानते हुए, विनाशकारी मानवीय स्थिति के बारे में अनगिनत चेतावनियों और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) के क़ानूनी रूप से बाध्यकारी निर्णयों की बेशर्मी से अवहेलना की है, जिसमें इज़रायल को ग़ाज़ा में नागरिकों को मानवीय सहायता पहुंचाने के तत्काल उपाय करने का आदेश दिया गया था.’
एमनेस्टी इंटरनेशनल की महासचिव एग्नेस कैलामार्ड ने गवाही दी है कि ‘इज़रायल ने जेनोसाइड कन्वेंशन के तहत निषिद्ध कृत्यों को अंजाम दिया है, जिसका ख़ास उद्देश्य ग़ाज़ा में फ़िलिस्तीनियों के अस्तित्व को समाप्त करना है. इन कृत्यों में हत्याएं, गंभीर शारीरिक या मानसिक नुक़सान पहुंचाना और ग़ाज़ा में फ़िलिस्तीनियों पर जानबूझकर ऐसी जीवन स्थितियों को थोपना शामिल है, जो उनके शारीरिक विनाश का कारण बन सकती हैं. महीने दर महीने, इज़रायल ने ग़ाज़ा में फ़िलिस्तीनियों को एक ऐसा समूह माना जिसका न तो अपना कोई मानव अधिकार है और न ही सम्मान, जो धारणा इज़रायल के इस इरादे को दर्शाता है कि वह इनका अस्तित्व समाप्त कर देना चाहता है.’
सीजेआई के आदेश में कहा गया था कि इज़रायली अधिकारियों ने ‘जानबूझकर ग़ाज़ा में फ़िलिस्तीनियों के पूरे या आंशिक रूप से शारीरिक विनाश के लिए जीवन की ऐसी स्थितियां बनाईं,’ इसी आदेश का हवाला देते हुए ह्यूमन राइट्स वॉच ने निष्कर्ष निकाला है कि इज़रायली अधिकारियों ने मानवता के ख़िलाफ़ विनाश का अपराध किया है, यह अपराध अभी भी जारी है, और शुरू से ही इज़रायल के इरादे स्पष्ट थे. ह्यूमन राइट्स वॉच ने 9 अक्टूबर 2023 को इज़रायल के तत्कालीन रक्षा मंत्री योआव गैलेंट द्वारा दिए गए आदेश का उदाहरण दिया है, जिसमें ग़ाज़ा की ‘पूर्ण घेराबंदी‘ करने का आह्वान किया गया था. गैलेंट ने कहा, ‘बिजली नहीं होगी, भोजन नहीं होगा, पानी नहीं होगा, ईंधन नहीं होगा, सब कुछ बंद है.‘
ग़ाज़ा का स्याह सच
ऑक्सफ़ैम इंटरनेशनल ने बताया है कि पिछले दो दशकों में दुनिया में जो भी संघर्ष हुए हैं उसमें पहले 12 महीने की अवधि में ग़ाज़ा में इज़रायली सेना द्वारा जितनी अधिक संख्या में महिलाओं और बच्चों को मार दिया गया वैसा कोई और उदाहरण नहीं मिलता. 6000 से अधिक महिलाओं और 11,000 बच्चों की हत्या का अनुमान लगाया गया है. इससे पहले, 2004 से 2021 तक, किसी साल में किसी भी संघर्ष में मारी गई महिलाओं की सबसे अधिक संख्या इराक़ में द्वितीय खाड़ी युद्ध के दौरान थी, जब 2016 में 2600 से अधिक की मौत हो गई थी. ग़ाज़ा में ऑक्सफ़ैम के अनुमानित मृत्यु दर में लगभग 20,000 लोग शामिल नहीं हैं जो अज्ञात और लापता हैं या मलबे के नीचे दब गए हैं.
सितंबर 2024 के अंत में, दुनिया की अग्रणी चिकित्सा पत्रिकाओं में से एक, द लैंसेट ने अनुमान लगाया कि ग़ाज़ा में मौतों की वास्तविक संख्या 186,000 से अधिक थी. यह अनुमान भुखमरी और स्वास्थ्य देखभाल की कमी जैसी अप्रत्यक्ष मौतों को भी ध्यान में रखने के बाद लगाया गया था. इसने अनुमान लगाया कि 25,000 से ज़्यादा बच्चों ने या तो अपने माता-पिता को खो दिया है या अनाथ हो गए हैं, जिससे वे गहरे भावनात्मक संकट में हैं. ज़्यादातर बच्चे ‘चिंता और गंभीर शारीरिक चोटों से जूझ रहे थे, जिनमें से कई ने अपने अंग खो दिए हैं.’

ऑक्सफ़ैम इंटरनेशनल ने यह भी बताया है कि इज़रायली सेना ने जीवनयापन के लिए अपरिहार्य बुनियादी ढांचे को लगातार निशाना बनाया है. रिपोर्ट में कहा गया है, ‘नागरिकों को दर्जनों बार जबरन तथाकथित ‘सुरक्षित क्षेत्रों‘ में विस्थापित किया गया है, जो मानवीय दायित्वों को पूरा करने में विफल रहे हैं और उन पर नियमित रूप से बमबारी या हमला भी किया गया है.’ अक्टूबर 2024 की शुरुआत में, इज़रायल द्वारा ग़ाज़ा पर बमबारी शुरू होने के एक साल बाद, ऑक्सफ़ैम ने पाया कि नागरिक बुनियादी ढांचे को ‘या तो पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया था या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया गया था, जिसमें लगभग 68 प्रतिशत फ़सल भूमि और सड़कें शामिल थीं. 36 में से केवल 17 अस्पताल आंशिक रूप से कार्यशील रह गए हैं, और सभी ईंधन, चिकित्सा आपूर्ति और स्वच्छ पानी की कमी से पीड़ित हैं.’
मानवीय संगठन मेडेसिन सैन्स फ्रंटियर्स (MSF) ने दिसंबर 2024 में कहा कि इज़रायली बलों ने कई मौक़ों पर भोजन, पानी और चिकित्सा आपूर्ति जैसी आवश्यक वस्तुओं को ग़ाज़ा में प्रवेश करने से रोका है, और मानवीय सहायता को भी अवरुद्ध और अस्वीकार किया है तथा पहुंचने में देरी की है. एमएसएफ़ के महासचिव क्रिस्टोफर लॉकियर ने ग़ाज़ा का दौरा करने के बाद कहा, ‘ग़ाज़ा में लोग भयावह परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन कोई भी सुरक्षित नहीं है, कोई भी बख़्शा नहीं गया है, और इस बर्बाद तथा वीरान क्षेत्र से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है.’
संयुक्त राष्ट्र ने इज़रायली सेना द्वारा ग़ाज़ा के अस्पतालों को नष्ट करने के पैटर्न की ओर इशारा किया, जिसने इसकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को ‘लगभग पूरी तरह से समाप्ति के बिंदु’ पर पहुंचा दिया है. 7 अक्टूबर 2023 से 30 जून 2024 की अवधि को कवर करने वाली एक रिपोर्ट में पाया गया कि ‘ग़ाज़ा भर में 38 में से 22 अस्पताल निष्क्रिय हो गए हैं.’ हमलों के पैटर्न में ‘अस्पताल की इमारतों पर मिसाइल हमले, अस्पताल की सुविधाओं को नष्ट करना, नागरिकों पर गोलीबारी, घेराबंदी, साथ ही अस्पताल की इमारतों पर अस्थायी रूप से क़ब्ज़ा करना’ शामिल था.
द मिडिल ईस्ट आई ने बताया कि ग़ाज़ा में अल-शिफ़ा और कमाल अदवान अस्पतालों पर हमलों के दौरान, इज़रायली सेना ने पहले अस्पतालों के बाहर के इलाक़े में बमबारी की, फिर सभी प्रकार की आपूर्ति को रोक दिया, जनरेटर को निष्क्रिय कर दिया और अस्पताल के विभागों में आग लगा दी. फिर इज़रायली सैनिकों ने अस्पतालों पर धावा बोल दिया और बचे हुए कई कर्मचारियों और रोगियों को हिरासत में लेने से पहले लगभग नग्न होने के लिए मजबूर किया. ग़ाज़ा में अल-शिफ़ा अस्पताल के निदेशक डॉ. मोहम्मद अबू सलमिया को जान बचाने की कोशिश करने के लिए सात महीने की जेल हुई. अस्पताल के आर्थोपेडिक्स विभाग के प्रमुख डॉ. अदनान अल-बुर्श को कथित तौर पर इज़रायली हिरासत में यातना देकर मार दिया गया.
ऑक्सफ़ैम इंटरनेशनल ने निष्कर्ष निकाला, ‘इस युद्ध के विनाशकारी प्रभावों से उबरने में कई पीढ़ियां लग जाएंगी.’
आज भी फ़िलिस्तीनियों की पीड़ा अभी ख़त्म नहीं हुई है.
जनवरी 2025 के मध्य से ग़ाज़ा में कभी भी टूट जाने वाले दो महीने के युद्धविराम के दौरान, इज़रायली सेना ने वेस्ट बैंक, दूसरे क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्र में अपनी शत्रुता जारी रखी, घरों को ध्वस्त किया, लोगों को गिरफ़्तार किया और यहां तक कि उग्रवाद विरोधी अभियानों के बहाने नागरिकों को मार डाला. 18 मार्च को, रमज़ान के पवित्र महीने के मध्य में, इज़रायल ने एकतरफ़ा शत्रुता फिर से शुरू कर दी, ग़ाज़ा पर हवाई हमले किए जिसमें कथित तौर पर सैकड़ों फ़िलिस्तीनी मारे गए. हमलों और हताहतों की संख्या लगातार बढ़ रही है.
इस बढ़ती हुई हिंसा के बीच फ़िलिस्तीनी साहस की कहानियां हम तक पहुंचती रहती हैं. 24 मार्च को, एक इज़रायली हवाई हमले में 23 वर्षीय फ़िलिस्तीनी पत्रकार होसम शबात की मौत हो गई. मारे जाने के कुछ घंटों बाद, उनकी टीम ने एक नोट साझा किया, जो उन्होंने अपनी मृत्यु की आशंका में लिखा था. इस नोट में उन्होंने ग़ाज़ा और उसके लोगों के ख़िलाफ़ युद्ध के दस्तावेज़ीकरण की भारी कठिनाइयों का वर्णन किया है. यह नोट एक अपील के साथ समाप्त होता है: ‘ग़ाज़ा के बारे में बोलना बंद न करें. दुनिया को नज़रअंदाज़ न करने दें. लड़ते रहें, हमारी कहानियां बताते रहें – जब तक कि फ़िलिस्तीन आज़ाद न हो जाए.’
मैं इस निबंध का समापन यरुशलम के हिब्रू विश्वविद्यालय में इतिहास के एसोसिएट प्रोफ़ेसर ली मोर्दकै के अंतरात्मा को झकझोर देने वाले शब्दों के साथ समाप्त करना चाहूंगा, जिन्होंने ‘इज़रायल-ग़ाज़ा युद्ध का गवाह’ शीर्षक से एक साहसी मोनोग्राफ़ लिखा है.
उन्होंने अपने लोगों को चेतावनी देते हुए कहा, ‘हमें इज़रायल के नरसंहार के बारे में सोचने के तरीक़े से अलग होने की ज़रूरत है – गैस चैंबर, मौत के शिविर और द्वितीय विश्व युद्ध.’ उन्होंने स्पष्ट किया कि एक राज्य नरसंहार करता है, जब वह ‘किसी समूह का जानबूझकर विनाश’ को सुनिश्चित करने के लिए संगठित तरीक़े से काम करता है.

मोर्दकै के दर्दनाक रिकॉर्ड में फ़िलिस्तीनियों के बारे में दिल दहलाने वाले और भयावह विवरण हैं, क्रूर नरसंहार के विवरण, जिसमें वृद्ध और विकलांग लोग और बच्चे भी शामिल हैं; यौन उत्पीड़न और अमानवीयकरण की व्यापकता; क़त्लेआम के साधन के रूप में भुखमरी का उपयोग; विजय के उत्साह में की गई लूटपाट, और भी बहुत कुछ. मैं भी वैसे ही निराश और भयभीत हूं जैसा मोर्दकै इज़रायल के लोगों के लिए करते हैं.
कुछ ही पीढ़ियों पहले, यहूदियों के ऊपर इतनी क्रूरता हुई थी कि वे लगभग विलुप्त हो गए थे. उस बर्बरता के जवाब में बना एक राज्य अब कैसे ऐसे कार्यों की अनुमति दे सकता है, उन्हें प्रोत्साहित कर सकता है जो उसे दूसरे असहाय लोगों के ख़िलाफ़ उसी नरसंहार के रास्ते पर ले जाए? अपने समुदाय के नरसंहार के कुछ ही दशकों बाद इज़रायली दूसरे लोगों का नरसंहार कैसे कर सकते हैं?
दिसंबर 2023 में ग़ाज़ा पर इज़रायली हवाई हमले में मारे गए एक फ़िलिस्तीनी कवि और शिक्षाविद रेफ़ात अलारीर ने अपनी कविता ‘आई एम यू’ में इज़रायली सैनिकों से इतिहास और मानवता की भावना की अपील की थी.
मैं सिर्फ़ तुम हूं.
मैं तुम्हारा भूतकाल हूं,
तुम्हारा वर्तमान और भविष्य.
मैं तुम्हारी तरह ही प्रयास करता हूं.
मैं तुम्हारी तरह ही लड़ता हूं.
मैं तुम्हारा विरोध करता हूं,
तुम्हारे विरोध करने की तरह ही विरोध करता हूं.
आगे वो लिखते हैं
तुम्हें बस अपनी आंखें बंद करनी हैं
(इन दिनों को देखकर
हमारे दिलों में अंधेरा छा जाता है.)
अपनी आंखें कसकर बंद करो
ताकि तुम अपने मन की आंखों से देख सको.
फिर आईने में देखो.
एक. दो.
मैं तुम हूं.
मैं तुम्हारा भूतकाल हूं.
और मुझे मार कर,
तुम ख़ुद को मार रहे हो.
इज़रायल के ग़ाज़ा युद्ध का समर्थन करने वाले हर भारतीय को अलारीर की इस बात पर ध्यान देना चाहिए: मैं तुम हूं. मैं सिर्फ़ तुम हूं.
इस लेख को लिखने के लिए ओमैर ख़ान ने शोध सहयोग किया है.
(लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फर इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फर भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था जे जुड़े हैं.)
