प्रेम में पेड़ होना: प्रकृति और मानवीय प्रेम का मिलन

जसिंता करेकेट्टा का 'प्रेम में पेड़ होना' काव्य संग्रह ज़ोर देता है कि समाज को इस सोच से बाहर निकलना होगा कि सिर्फ़ कुछ ही लोग 'पेड़' बनेंगे और बाकी उसकी छांव लेंगे. प्रेम में साझेदारी और समानता का भाव होना चाहिए- कोई हमेशा देने वाला और कोई हमेशा लेने वाला न हो.

जसिंता केरकेट्टा (दाएं) और उनका काव्य संग्रह. (फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन/फेसबुक)

जब जानते हैं कि सब छूट जाएगा, फिर भी हम चेष्टा क्यों करते हैं? शायद यही जीवन का रहस्य और सुंदर विडंबना है. हम जानते हैं कि सब कुछ अस्थायी है, फिर भी हम प्रेम करते हैं, सपने देखते हैं, संघर्ष करते हैं. शायद इसलिए कि प्रयास ही हमारे अस्तित्व का प्रमाण है. हो सकता है, हमें अंत से ज़्यादा सफर की परवाह हो. शायद हम छूटने के डर से जीना नहीं छोड़ सकते, क्योंकि जीने का अर्थ ही उसकी चेष्टा में है.

हांं, प्रेम में कभी-कभी हम पेड़ बन जाते हैं- बस खड़े रहते हैं, प्रतीक्षा में, जड़ें गहरी होती रहती हैं, शाखाएं फैलती रहती हैं, लेकिन जिसको छाया देते हैं, वो शायद यह सब महसूस भी नहीं करता. पेड़ बनने का दुख भी अजीब होता है- न हिल सकते हैं, न शिकायत कर सकते हैं, बस अपने ही भीतर मौसम बदलते देखते हैं या महसूस करते हैं. शायद सच्ची चाहत भी एक पेड़ के समान है- जिसकी जड़ें गहरी हैं, पर शाखाएं हवा के साथ हिलती रहती हैं, कभी उम्मीद में, कभी बेबस होकर. पेड़ बनने का एक सौंदर्य भी है- वो अपनी जगह पर अडिग रहता है, चाहे कोई छांव में रुके या ना रुके, चाहे कोई उसके पास लौटे या नहीं.

एक सच्चे प्रेम की तक़दीर है कि वह चाहे जितने भी बदलते मौसम देखे, फिर भी अपनी जगह पर अडिग रहे. उसने पतझड़ में बिखरने, बारिश में निखरने, और धूप में छाया को तरसने का भाग्य स्वीकारा है, उसमें एक गहरी सुंदरता निहित है.

‘प्रेम में पेड़ होना’ जसिंता करेकेट्टा की काव्यात्मक कृति है, जो प्रेम को स्थायित्व, धैर्य और प्रकृति के तत्वों से जोड़कर देखने का प्रयास करती है. यह पुस्तक प्रेम को प्रतीक्षा, जड़ों की गहराई और छांव देने की क्षमता के रूप में देखती है, जहांं प्रेम सिर्फ पाने का नहीं, बल्कि देने का नाम बन जाता है (अपना सर्वत्र न्योछावर करना). लेकिन क्या प्रेम में सिर्फ स्थिरता और सहनशीलता होती है, या फिर उसमें आवेग, अस्थिरता, संघर्ष और परिवर्तनशीलता भी शामिल हैं?

जसिंता की शैली में एक लयबद्धता और भावनात्मक गहराई है, जो प्रेम को न केवल एक विचार बल्कि एक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करती है.

वह लिखती हैं:-

‘प्रेम में पेड़ होना…
अपनी जड़ों में धूप को समेटे रखना,
अपनी शाखाओं में चिड़ियों का बसेरा देना,
अपने पत्तों से किसी के आंसुओं को सुखा देना. ‘

इस तरह की अभिव्यक्ति प्रेम को केवल एक मानसिक स्थिति नहीं, बल्कि एक जीवंत, प्रकृति से जुड़ा अनुभव बना देती है. यह काव्य संग्रह प्रकृति और प्रेम को गहराई से जोड़ता है, जो इसे विशिष्ट बनाता है. हालांकि भाषा अत्यधिक काव्यात्मक है, जो पदकों को बांधे रखती है परंतु प्रेम को हर स्थिति में ‘पेड़’ के प्रतीक से जोड़ने की कोशिश में यह संग्रह विचारों के विस्तार को सीमित कर देता है. यदि लेखिका प्रेम को अन्य प्रतीकों, जैसे ‘जल’, ‘पौधा’ या ‘लता’ से भी जोड़ती, तो विचारधारा अधिक व्यापक हो सकती थी.

इस काव्य संग्रह में प्रेम को मुख्यतः तीन पहलुओं में देखा गया है:

धैर्य और प्रतीक्षा – प्रेम एक पेड़ की तरह है, जो बिना किसी उम्मीद के सिर्फ देता है.

समर्पण और त्याग – प्रेम अपनी छाया में सबको शरण देता है, लेकिन खुद कुछ मांगता नहीं. खुद को निस्वार्थ समर्पित करता है.

सहनशीलता – प्रेम हर तूफान को झेलता है, लेकिन अपनी जगह स्थिर रहता है.

हालांकि, ये तीनों पहलू प्रेम का एक महत्वपूर्ण पक्ष दिखाते हैं, लेकिन प्रेम की अस्थिरता, बेचैनी और द्वंद्व पर चर्चा नहीं करते. इन तीनों पहलुओं में प्रेम को जिस सरल भाव और शैली के साथ प्रस्तुत किया गया है वह पाठक को एक सीमा में बांधता भी है और लांघने को मजबूर भी करता है. प्रेम में सिर्फ स्थिरता नहीं, परिवर्तनशीलता भी अनुभव करनी चाहिए. प्रेम किसी पेड़ की तरह अडिग होने से ज्यादा किसी पौधे की तरह बढ़ने और विकसित होने की प्रक्रिया भी हो सकता है. प्रेम सिर्फ देने का नहीं, बल्कि लेने और स्वीकृति का भी विषय हो सकता है.

यह संग्रह प्रेम को बहुत आदर्शवादी देखता है, जबकि प्रेम में मानवीय कमजोरियां, आकांक्षाएं और असुरक्षाएं भी निहित हैं. इस संग्रह में प्रेम एकतरफ़ा प्रतीक्षा और त्याग के रूप में अधिक दिखाया गया है, जो इसे अधूरा बना सकता है.

एक जगह वह लिखती हैं:

‘पेड़ प्रेम करना जानते हैं.
वे अपनी जड़ें गहरी रखते हैं,
लेकिन किसी को पकड़कर नहीं रखते. ‘

यह विचार प्रेम के निस्वार्थ स्वरूप को दर्शाता है, लेकिन प्रेम में कभी-कभी पकड़कर रखने, बांधने और मोह में पड़ने का भी स्थान होता है. प्रेम को एक संतुलन की तरह देखा जाना चाहिए- न सिर्फ जड़ों की गहराई, बल्कि शाखाओं की फैलाव और हवाओं के साथ उसके संवाद को भी स्वीकार करना चाहिए.

यह कविता संग्रह उन पाठकों को बेहद पसंदीदा लगेगा, जो प्रेम को एक शांत, स्थायी और समर्पणमय अनुभव मानते हैं. लेकिन जो पाठक प्रेम की जटिलताओं, विरोधाभासों और संघर्षों को तलाश रहे हैं या उन्माद भरे प्रेम-संगीत को पढ़ना चाहते हैं, उन्हें यह किताब थोड़ी अधूरी लग सकती है. इसमें प्रेम की तीव्रता, अधूरी इच्छाएं, आकस्मिकता और अस्थिरता को बहुत कम जगह दी गई है.

यह संग्रह सबाल्टर्न और फेमिनिस्ट ज्ञान मीमांसा की सोच से प्रेरित है कि हम ‘पेड़’ को सिर्फ़ त्याग का प्रतीक नहीं, बल्कि बड़े सामाजिक भेदों को उजागर करता देखें. यह पितृसत्ता, जाति, वर्ग और लिंग आधारित असमानताओं को भी दर्शाता है. चाहे पितृसत्ता हो या जाति संघर्ष यहांं  ‘पेड़’ को रूपक समझना होगा. समाज में स्त्री को हमेशा ‘पेड़’ यानी छांव देने वाली, सहनशील और त्याग की मूर्ति बना दिया, जिसे त्याग करना होगा, सहना होगा, इंतज़ार करना होगा. जसिंता ने बड़ी ख़ूबसूरती इस समझ को पिरोया है.

उनकी कविता उस समाज के दुख और दुविधा को दर्शाती है जो हाशिए पर है, जहां आज भी दलित औरतें दूसरों के घरों में काम करती हैं, दूसरों के बच्चों को पालती हैं, लेकिन खुद के लिए कोई सुरक्षा नहीं. जहां गरीब किसान अन्न उगाते हैं, पर खुद भूखे रहते हैं. जहां मज़दूर, शहरों को खड़ा करते हैं, लेकिन उनके पास खुद रहने को घर नहीं है.

जसिंता का काव्य संग्रह ज़ोर देता है कि समाज को इस सोच से बाहर निकलना होगा कि सिर्फ़ कुछ ही लोग ‘पेड़’ बनेंगे और बाकी उसकी छांव लेंगे. प्रेम में साझेदारी और समानता का भाव होना चाहिए-दोनों को एक-दूसरे के लिए छांव बनना चाहिए. समाज में भी सबको बराबरी का हक़ मिलना चाहिए- कोई हमेशा देने वाला और कोई हमेशा लेने वाला न हो.

(लेखक डीयू के ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) में पढ़ाती हैं. )