नई दिल्ली: ‘लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव तक सीमित नहीं होना चाहिए. यदि आम नागरिक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों पर नियंत्रण नहीं रख सकता, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाएगा.’ द वायर के संस्थापक संपादक और वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने यह बात डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘द लेंस’ की औपचारिक शुरुआत के मौके पर कही.
17 अप्रैल की शाम रायपुर प्रेस क्लब में ‘द लेंस’ की शुरुआत हुई, इस मौके पर एक चर्चा का आयोजन किया गया था, जिसमें बतौर वक्ता सिद्धार्थ वरदराजन के अलावा लेखिका और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी, और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रख्यात प्रोफेसर अपूर्वानंद शामिल हुए थे. चर्चा का विषय था- आज के प्रश्न और पत्रकारिता का उत्तर.
कार्यक्रम की शुरुआत गांधीवादी चिंतक और बीबीसी के पूर्व संपादक मधुकर उपाध्याय द्वारा तैयार की गई एक वीडियो स्टोरी से हुई, जिसमें महात्मा गांधी के चंपारण आंदोलन में महिलाओं की शिक्षा को लेकर किए गए प्रयासों को रेखांकित किया गया. यह स्टोरी द लेंस की पहली रिपोर्ट थी, जो महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर केंद्रित है.
द लेंस का दावा है कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित एक ऐसा डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म है, जिसकी प्राथमिकता जवाबदेही और जनहित से जुड़ी खबरों को सामने लाना है. इसके संस्थापक सदस्यों में वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग और सुदीप ठाकुर शामिल हैं.

किसने क्या कहा?
चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और मीडिया की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए. उन्होंने चंपारण में महिलाओं की शिक्षा पर बनी द लेंस की पहली रिपोर्ट की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह पत्रकारिता की जिम्मेदारी को समझते हुए ईमानदारी और साहस से काम करने का प्रतीक है. द लेंस ने जिस तरह से इस मंच को तैयार किया है, वह गंभीर पत्रकारिता को दर्शाता है.
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव तक सीमित नहीं होना चाहिए. यदि आम नागरिक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों पर नियंत्रण नहीं रख सकता, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाएगा. उन्होंने सवाल उठाया कि जब उच्च पदों पर बैठे लोग ही न्यायपालिका की आलोचना करने लगेंगे, तो स्वतंत्र न्याय प्रणाली की सुरक्षा कैसे होगी?
सिद्धार्थ वरदराजन ने सवाल किया कि क्या भारत केवल हिंदुओं का देश है? उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा मुस्लिम समुदाय पर दिए गए बयानों की आलोचना करते हुए कहा कि यह संविधान की शपथ का उल्लंघन है. उन्होंने धार्मिक ध्रुवीकरण और नफरत फैलाने वाले भाषणों को लेकर सरकार और मीडिया की भूमिका पर भी चिंता व्यक्त की.
आर्थिक नीतियों पर भी प्रहार करते हुए सिद्धार्थ वरदराजन ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में हो रहे पर्यावरणीय नुकसान और स्थानीय समुदायों के विस्थापन का मुद्दा उठाया. उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत के संसाधन केवल कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों के लिए हैं? उन्होंने अमेरिकी अदालत में गौतम अडानी के खिलाफ दर्ज केस का हवाला देते हुए पूछा कि भारत सरकार ने अब तक इस मामले की जांच क्यों नहीं की.
प्रो. अपूर्वानंद ने पत्रकारिता को विश्वविद्यालयों से अधिक जिम्मेदार संस्था बताते हुए कहा कि ‘अगर एक शोधकर्ता गलती करता है, तो वह बाद में ठीक हो सकती है, लेकिन पत्रकार की एक गलती हजारों लोगों को प्रभावित कर सकती है.”
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने द लेंस के महिला-सशक्तिकरण विषय से शुरुआत करने को सराहा और कहा कि ‘देश में लोकतंत्रीकरण गहराई से हो रहा है — आज ओबीसी प्रधानमंत्री हैं, जनगणना और प्रतिनिधित्व की मांग आम राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रही है.” उन्होंने पत्रकारिता से सतह के नीचे छिपी सच्चाइयों को उजागर करने की अपेक्षा जताई.
कार्यक्रम का संचालन डॉ. विक्रम सिंघल ने किया, जबकि द लेंस के वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग ने मंच से यह संकल्प दोहराया कि ‘हम संविधान के मूल्यों से डिगेंगे नहीं और पत्रकारिता के न्यायकारी स्वरूप को बनाए रखेंगे.’
‘द लेंस’ की अवधारणा कब और किस सोच के साथ विकसित हुई?
इस नए डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म के पीछे की सोच को समझने के लिए द वायर हिंदी ने द लेंस के संस्थापक सदस्यों में से एक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सुदीप ठाकुर से बातचीत की.
सुदीप ने बताया, ‘हम लोग कुछ महीने से इस पर विचार कर रहे थे. मुझे और मेरे साथियों को लग रहा था कि तीन-सवा तीन दशक पहले जिस तरह से हमने पत्रकारिता की शुरुआत की थी, उस तरह की पत्रकारिता का स्पेस कम हो रहा है. संस्थान बढ़ रहे हैं, तकनीक बढ़ रही है लेकिन पत्रकारिता… फिर हमें लगा कि एक छोटा प्लेटफॉर्म ही लाया जाए, जिसके ज़रिये हम अच्छी स्टोरी कर सकें.’
किन विषयों को प्राथमिकता देगा द लेंस?
सुदीप बताते हैं, ‘तकनीक ने कम से कम इतना तो कर दिया है कि हम कहीं से कहीं सीमित संसाधन में संपर्क कर सकते हैं. हमारी कोशिश यह है कि ऐसी स्टोरी जो या तो मेनस्ट्रीम मीडिया से ग़ायब हैं या उस रूप में नहीं है, जिस रूप में असल में होना चाहिए. ऐसी स्टोरी को सामने लाने की हमारी कोशिश होगी. हमारे संसाधन सीमित हैं, इसलिए पूरे दिन की सभी खबरों को तो कवर नहीं कर सकते, उसमें चयन करना होगा.’
द लेंस की शुरुआत रायपुर में हुई है. सुदीप बताते हैं कि दिल्ली में भी ब्यूरो है. भविष्य में जरूरत के मुताबिक विस्तार भी किया जा सकता.
जब हमने यह जानना चाहा कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में एक स्वतंत्र प्लेटफॉर्म चलाना कितना कठिन हो सकता है तो सुदीप ने बताया, ‘एक चैलेंज तो है ही. हमारा भरोसा एक वैल्यू बेस्ड जर्नलिज्म में है. उन चुनौतियों से वाकिफ हैं कि किस-किस तरह की दिक्कतें आएंगी. लेकिन फिर भी मैं कहूंगा कि अगर हम अच्छी रिपोर्ट और विश्लेषण लेकर आते हैं तो उसकी गुंजाइश है, देश बहुत बड़ा है. अभी शुरू ही किया है, देखते हैं क्या होता है, जो होगा देखा जाएगा. हमें कौन सा एजेंडा जर्नलिज्म करना है. हम बस जर्नलिज्म करना चाहते हैं.’
