रचनाकार का समय: ‘अंधेरों की जेब में रोशनी के दस्तावेज़ों का समय है यह’

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा था कि साहित्य समाज का दर्पण है. यह बड़ा दिलचस्प वाक्य है. सुनकर अच्छा भी लगता है. बोलने वाले इस पर तालियां भी पिटवा ले जाते हैं.‌ लेकिन यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो समकालीन हिंदी व्यंग्य के दर्पण में कुछ दिखता क्यों नहीं, यह दर्पण दोनों तरफ से काला क्यों है? रचनाकार का समय में पढ़िए व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी को.

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ज्ञान चतुर्वेदी. (फोटो साभार: फेसबुक/Art print By Mambo)

आज का दौर व्यंग्य का है भी और नहीं भी है. आज के जटिल समय को व्याख्यायित करने, समझने और लिखने के लिए व्यंग्य सबसे सटीक हथियार होना था. आज की कविता और कहानी की भाषा और शैली में व्यंग्य खुलकर है परंतु आज के व्यंग्य से व्यंग्य गायब है या बहुत शिथिल हुआ है. यह कैसी उलटबांसी है कि जब व्यंग्य सबसे जरूरी है तब ही हमारा व्यंग्यकार खूब लिखते हुए भी व्यंग्य से उदासीन-सा बैठा है. ऐसा क्यों हो रहा है, हम समझने की कोशिश करेंगे.

व्यंग्य का काम होता है रोशनी की शिनाख्त. यह काम वो अंधेरों की पड़ताल द्वारा करता है, विसंगतियों के अंधेरे जो समाज के कोने-कोने में व्याप्त हैं. ‌आज यही काम बहुत कठिन हो गया है, अंधेरे पकड़ नहीं आते, रोशनी समझ नहीं आती. बड़ा जटिल समय है यह कि जहां जगमग तो बहुत है परंतु अंधेरे और उजाले के बीच फ़र्क करना  कठिन होता जा रहा है.‌ नाम रोशनी है, पर उससे पैदा हुआ उजाला ऐसा मायावी है जो अंधेरे बढ़ाता है. इस तरह के में अंधेरों की पड़ताल और रोशनी की शिनाख्त, दोनों ही कठिन काम बन गए है. अंधेरे अब और चालाक हो गए हैं. वे चमकीले चेहरे ओढ़कर घूमते हैं. अंधेरों ने रोशनी का आइडेंटिटी कार्ड भी हथिया लिया है. अब अंधेरों के पास रोशनी के सारे दस्तावेज हैं. अब कौन अंधेरा, कौन उजाला – कैसे तय हो? रोशनी की शिनाख्त कैसे हो?

शिनाख्त करो भी तो कोई मानने को राज़ी नहीं. यह उजालों के लिए खराब समय है, व्यंग्य के लिए भी बेहद कठिन कि वह उजालों के प्रतिबद्ध होता है. असहिष्णुता के अंधेरों ने अपने नाम बदल लिए हैं. अंधेरों के सर पर अब परंपरा, धर्म, संप्रदाय और राष्ट्रीयता के रोशन झंडे रखे हुए हैं; अगर इन पर व्यंग्य लिखा तो आरोप आएगा कि तुम रोशनी के खिलाफ़ हो. अंधेरे ने अपने दरवाजे  पर रोशनी की नेमप्लेट लगा ली है. अंधेरों के खिलाफ़ लिखना कठिन हो गया है. यह अभी और कठिन होता जाएगा.

पिछली शताब्दी के अंधेरे इतने शातिर नहीं थे. अंधेरे, अंधेरे जैसे ही दिखते थे.‌ उनको अंधेरे के रूप में ही पहचाना जा सकता था.‌ विसंगतियों की पहचान में कोई भ्रम नहीं था. इस तरह देखें तो व्यंग्य लिखना जटिल न था. इक्कीसवीं शताब्दी आते-आते अंधेरों ने शिनाख्त बदल ली. अब वे रोशनी का भेस धर के सामने खड़े हैं. उनका दावा है कि वे ही असल रोशनी हैं.

अंधेरों ने नाम बदल लिए हैं- विकास, वैश्वीकरण, बाज़ार, धर्म, परंपरा, संप्रदाय, राष्ट्र गौरव, जाति गौरव, और ऐसे ही अनेक आदरणीय नाम. अंधकार को प्रकाश का नाम दे देना इस सदी की सबसे बड़ी चालाकी है, और त्रासदी  भी. व्यंग्य में अगर इन अंधेरों को तुम अंधेरा कहोगे तो वे तुमको दकियानूसी और विकास विरोधी कह सकते हैं.

साहित्य (खासतौर पर व्यंग्य) का काम कठिन हो गया है क्योंकि रोशनी की शिनाख्त के साथ ऐसी व्यापक छेड़छाड़ पहले कभी नहीं हुई, पहले इस तरह कभी दिशाभ्रम को ही दिशा ज्ञान नहीं माना गया था. अब इस सदी का मनुष्य आगे बढ़ते-बढ़ते अचानक ही पीछे की दिशा में मुड़ गया है. वह पीछे लौट रहा है और इसी को आगे बढ़ना कह रहा है. राष्ट्रवाद कबीलाई सोच में बदल गया है. हम पहले से ज़्यादा असहिष्णु हुए हैं. सांप्रदायिक होने को हम वर्तमान की अनिवार्य नियति मानने लगे हैं. जब ‘वे ‘ऐसे हैं तो ‘हम’ भी ऐसे ही न हों- यह हमारी मूर्खता कहलाएगी. जीवन मूल्यों के बुनियादी अर्थ बदलने की कोशिश युद्धस्तर पर चल रही है.

अंधेरों पर रोशनी के तमगे चस्पां हैं. कहने को रोशनी बहुत है पर अंधेरे और भी घने हो गए हैं. तो यह कैसी रोशनी है जो अंधेरा फैला रही है? सच यह है कि यह सदी अंधेरे में खड़े होकर रोशनी पर तकरीरों की सदी बनती जा रही है. वे शातिर लोग ही रोशनी का संकल्प ले रहे हैं जो इन अंधेरों के लिए ज़िम्मेदार हैं. चैनल दर चैनल, मंच दर मंच और सभा दर सभा रोशनी पर बहसबाजी है.‌ अंधेरे बहस कर रहे हैं कि रोशनी की परिभाषा क्या हो? वे लोग रोशनी को अंधेरों से बहस करने का कोई मौका देने को राज़ी नहीं, कहते हैं कि उस तरह की रोशनी का समय अब ख़त्म हुआ,  विचार की मौत हो चुकी है. अब अंधेरे प्रकाश को ट्रोल कर रहे हैं और प्रकाश भागा-भागा फिर रहा है. अब अंधेरों के खिलाफ़ लिखा तो उसे रोशनी के खिलाफ़ लिखा हुआ मान लिया जाएगा. अंधेरे को अंधेरा कहो तो वे सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया और सड़क पर खदेड़ सकते हैं कि तुम रोशनी को जानते ही कितना हो?

पर इस समय का व्यंग्य कर क्या रहा है? साहित्य का पाठक इधर रचे गए अधिकांश व्यंग्य पढ़कर दिग्भ्रमित है कि इसमें समकाल की तस्वीर क्यों नहीं दिखती? व्यंग्यकार अपनी रचनाओं में इस जटिल समय को आधा-अधूरा ही क्यों पकड़ रहे हैं? तो सवाल यह भी उठता है कि आज का व्यंग्यकार स्वयं ही अंधेरे और उजाले के बीच के फ़र्क को ठीक से समझ भी पा रहा है या नहीं? जो नहीं समझ पा रहा तो क्यों? उसकी तमन्ना है भी यह सब समझने की या नहीं? या उसके पास वह दृष्टि ही नहीं जो इस तेज़ी से बदलते समय को ठीक से देख-समझ सके?

पत्थर की आंख कितनी भी खूबसूरत हो, उसमें दृष्टि नहीं होती. व्यंग्य रचना का भी यही सिद्धांत है- जीवन को लेकर स्पष्ट दृष्टि न हो तो व्यंग्य बस पत्थर की आंख बनकर रह जाता है; रचना, भाषा और शैली में सुंदर दिखती है पर उसमें व्यंग्य नहीं होता. व्यंग्यकार अब उसी पुराने तरीक़े से आज की विसंगतियों पर कुछ नहीं लिख सकेगा. वह लिख भी नहीं पा रहा.

मैंने कभी लिखा था कि समकालीन व्यंग्य का दर्पण दोनों तरफ से काला है. महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की हजारों बार उद्धरत उक्ति है कि साहित्य समाज का दर्पण है. यह बड़ा कैची (catchy) सा वाक्य है, साहित्यिक महफिलों में इसे कहीं भी निरापद ढंग से बोला जा सकता है. सुनकर अच्छा भी लगता है. बोलने वाले इस पर तालियां भी पिटवा ले जाते हैं.‌ आज से लगभग अठारह साल पहले मैंने इसी मेटाफॉर का सहारा लेकर समकालीन व्यंग्य पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए लिखा था कि यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो समकालीन हिंदी व्यंग्य के दर्पण में कुछ दिखता क्यों नहीं, यह दर्पण दोनों तरफ से काला क्यों है?

मैंने यह भी पूछा था कि इसे काला किसने किया है? ये कौन नासमझ हैं जो हिंदी व्यंग्य में घुस आए हैं? हमने क्यों इन्हें व्यंग्यकार मान लिया? हम समझते क्यों नहीं कि काले दर्पण वाले ये लोग व्यंग्य के विशुद्ध व्यापारी हैं. इनको परवाह नहीं कि दर्पण में जब अंधेरा-ही-अंधेरा दिखेगा तो उसकी पहचान ख़त्म हो जाएगी.‌

उस लेख में दर्पण के रूपक से मैंने कुछ ऐसे ही असहज करने वाले सवाल उठाए थे. लेख विष्णु नागर जी ने नव दुनिया, दिल्ली में छापा था. इस लेख के छपने के बाद कुछ मित्र गलतफ़हमी में पड़े, बहुत से तिलमिलाए भी. मुझे यहां-वहां खदेड़ा भी गया कि ऐसा लिखकर मैं तो पूरे समकालीन व्यंग्य को ही खारिज़ कर रहा हूं. अच्छा लिखने वालों को गलतफ़हमी हुई कि मैं इसमें उनको भी शामिल कर रहा हूं.

बहरहाल.‌ बात, आई गई हो गई. दर्पण वही रहा, पोतने वाले पोतते रहे -स्थिति वही रही, सवाल वही रहे; लोग ठाठ से उसी तरह का व्यंग्य न केवल लिखते रहे, चर्चित भी हुए. मेरे उठाए सवाल अरण्यरोदन बनकर रह गए. रोशनी के वाहक अंधेरे ढोने में लगे रहे. मेरे वे सवाल आज और भी बड़े होकर सामने खड़े हैं.

उत्तर तलाशने का समय आ गया है. इन उत्तरों के लिए हमें अपने ही गिरेबान में झांकना होगा जो कोई नहीं चाहता.‌ आज के व्यंग्य में समकालीन समाज के अंतर्विरोध और अवगुंठन, चुनौतियां और पलायन, टुच्चई और बढ़प्पन उस तरह नहीं दिखते. इसीलिए यह कुछ लोगों के बीच का वाग्विलास बनकर रह गया है- छोटे-छोटे अख़बारी कारणों, और सोशल मीडिया ग्रुप्स में सीमित. हम लाख दावा करें कि हम विसंगतियों पर करारा प्रहार कर रहे हैं, हमने फलाने कॉलम में कितना ज़ोरदार लिखा है और सोशल मीडिया पर कैसी वाह-वाह मची हुई है परंतु कड़वा सच यही है कि यह सब हमारी नादान चालाकियां हैं, बस. विसंगतियों को ज्यों का त्यों लिख देने से साहित्य नहीं बन जाता. जो  दिखे उसे दर्पण जैसा उतार देने से कविता नहीं बन जाती, न कहानी, न व्यंग्य; इसी बिंदु पर साहित्य दर्पण से अलग हो जाता है.

दर्पण की सीमा है कि वह दृश्य को दिखलाता भर है. साहित्य भी वही दिखाता है पर अलग तरह से.‌ व्यंग्य के दर्पण में यही दृश्य और भी अलग ढंग से दिखता है. व्यंग्य उस दृश्य के अनदेखे पहलू सामने लाकर उसे संपूर्णता में समझाता है. इसी अनदेखे की शिनाख्त साहित्य है. यही व्यंग्य है.‌ व्यंग्य के दर्पण में पाठक उस सच को भी देख पाये जो उसे सीधे-सीधे नहीं दिख रहा, तभी व्यंग्य, व्यंग्य बनेगा. जो दिख रहा है और जो असल में है, उसकी समझ पैदा करना ही व्यंग्य का अभीष्ट है. व्यंग्य पढ़कर पाठक समझ सके कि रोशनी में कितने निचाट अंधेरे छुपे हैं- यही व्यंग्य लेखन की सार्थकता कहलाएगी.

जो रोशनी की शिनाख्त दे, वही व्यंग्य है. और व्यंग्य रोशनी के बारे में बयानबाजी भर नहीं है. ‌सच्चा व्यंग्य बयानबाजी से परे की चीज है. हर बयान को एक गहन अनुभव में बदल देने की कला ही व्यंग्य है. व्यंग्य सामाजिक यथार्थ की रिपोर्टिंग मात्र नहीं करता, वह काम तो पत्रकार पहले ही बेहतर ढंग से कर रहे हैं. व्यंग्य पत्रकारिता से अलग चीज़ है. यथार्थ, कल्पना और संवेदना की रासायनिक क्रिया से जो अद्भुत रसायन बनता है, वह व्यंग्य है. साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, वो आतिशी शीशा और सूक्ष्मदर्शी यंत्र भी है.‌

तो फाइनली समकालीन व्यंग्य लेखन का दर्पण दोनों तरफ़ से काला है या नहीं? है भी, नहीं भी है. आज के समय में कुछ तो सचमुच के व्यंग्यकार हैं तो बहुत से तथाकथित व्यंग्यकार भी हैं- कहने को व्यंग्य दोनों ही रच रहे हैं. ‌तथाकथितों का बढ़-चढ़कर दावा रहता है कि उनके दर्पण में सब कुछ साफ-साफ दिखता है- देखो न, वो रही विसंगति और वो देखो कि मैंने विसंगति पर कैसी चोट की है! इन्होंने ख़ुद ही अपना दर्पण दोनों तरफ़ से काला किया है पर ये मानते नहीं कि उनका दर्पण काला है. वे चाहते हैं कि हम इसी काले दर्पण में झांकें, देखकर वाह-वाही करें, तालियां मारें; उसमें कुछ दिखे या न दिखे! आप इनको क्या बोलेंगे?

मैं कहूंगा कि ये लोग बहुत भोले लोग हैं या बहुत शातिर या फिर परम भ्रमित. कहने को तो ऐसे तथाकथित रचनाकार हर विधा में होते हैं परंतु समकालीन व्यंग्य में ये लोग ही मुख्य धारा बन बैठे हैं. ऐसी स्थिति में अच्छा रच रहे जेनुइन व्यंग्यकार कहां जाएं? हिंदी में आज भी कुछ बहुत अच्छा व्यंग्य लिखा जा रहा है; परसाई के बाद व्यंग्य की धरती वीरों से उस तरह सूनी नहीं हुई है जैसा कि ये तथाकथित बतलाया करते हैं. जेनुइन व्यंग्यकारों को हतोत्साहित करने के बड़े इंतजाम हैं इन व्यंग्यबाजों के पास. व्यंग्य के नाम पर ये खुद विशुद्ध सपाटबयानी करते हैं, व्यंग्य के नाम पर अजीबो-गरीब सा रचते हैं और उसको ही असली व्यंग्य साबित करने के लिए व्यंग्यशास्त्र की सारी परिभाषाएं नए सिरे से गढ़ने पर आमादा हैं. ये नहीं चाहते कि अच्छा व्यंग्य चर्चित हो. ये चाहते हैं कि हम उसी दर्पण के गुण गायें जिसे इन्होंने काला कर रखा है. ये गोष्ठियों, पुरस्कार समितियों और परसाई के नाम के सोंटे घुमाकर, अललटप्पू फतवेबाजी के ब्रश से व्यंग्य के दर्पण को नित्य और काला पोत रहे हैं. ये परसाई के नाम को गंडासे की भांति गोष्ठी-गोष्ठी घुमाते हैं और हर गोष्ठी के बाद यह गिनते हैं कि आज हमने कितने जेनुइन व्यंग्यकारों का सर कलम किया?

ज्ञान चतुर्वेदी की पुस्तकें. (साभार: संबंधित प्रकाशन)

इस तरह ये लोग विशुद्ध हुल्लड़बाजी के पैतरों से व्यंग्य का मंच हथियाने पर आमादा हैं. ये लोग परसाई के कीर्तन ऊंची आवाज़ में गाते हैं.‌ इन्होंने देश में परसाई कीर्तन मंडलियां बना रखी हैं. इनको न तो पता है, न ही ये पता करने की परवाह कि परसाई ने लिखा क्या था? न इन्होंने कभी परसाई को ठीक से पढ़ा, न किसी और पूर्वज को भी, परंतु व्यंग्य के पुश्तैनी मकान पर कब्ज़ा करने की ज़बरदस्त तमन्ना है इनकी. सब जगह ये परसाई-परसाई जपते हैं. ये मानते हैं कि परसाई को पढ़ने से ज्यादा माहात्म्य उनका नाम जपने में है. ये नहीं जानते कि परसाई ने क्या लिखा और अपने इस अज्ञान पर इनको गर्व भी है. परसाई के नाम का चंदन लगाकर ये व्यंग्य के बड़े वाले पंडे बन गए हैं.

इनको नहीं पता (या शायद पता हो) कि ये उस व्यंग्य का कितना नुकसान कर चुके हैं जो परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल, लतीफ घोंघी और शंकर पुणतांबेकर आदि के विपुल और विलक्षण लेखन के कारण विधा बनने की कगार पर ही था. इन्होंने बनने नहीं दिया. अपनी हरकतों से ये उस व्यंग्य को सपाटबयानी, दोहराव और वैचारिक दरिद्रता के कीचड़ में घसीट लाए हैं. अब इसी कीचड़ में अधकच्चे व्यंग्य संग्रहों के भव्य विमोचनों के कमल तैर रहे हैं और पोची किताबों पर प्रायोजित चर्चाओं और उनके बेशर्म हल्ले के बुलबुले फूट रहे हैं. कुछ तो गर्व से कहते भी हैं कि पढ़ने में समय खराब करेंगे तो खुद हम कब लिखेंगे!

रचनाएं सपाट बयान जैसी हों परंतु ठाठ से छपें, दुगने ठाठ से वे पुरस्कृत भी हों, सोशल मीडिया पर उनकी खासी वाह-वाही हो, विभिन्न अकादमियों, ट्रस्टों और लेखक गुटों पर ऐसों का कब्ज़ा हो जाए, बस; व्यंग्यबाणों को और क्या चाहिए! इसी के चलते समकालीन व्यंग्य मानो विट, ह्यूमर, व्यंजना और विचार की तरफ पीठ करके बैठ गया है और घनघोर अपठनीय और सतही बनता जा रहा है. ऐसा व्यंग्य अब येन-केन प्रकारेण छपने में ही अपना मोक्ष मान रहा है.

ऐसे समय में एक सार्थक व्यंग्यकार क्या करे?

हम तो यही कहेंगे कि निराश न होकर वह इस स्थिति को एक चुनौती के तौर पर ले. इस जटिल समय को गहराई से समझे, फिर व्यंग्य लिखे. वो परसाई या शरद जोशी की नकल में न लिखे. वे तो अपना लिख गए. वह उससे व्यंग्य लेखन का सौंदर्यशास्त्र सीखें, पर लिखें अपना ही. उनको उन जैसा ही न दोहरायें.‌ उनसे अलग लिखें. इक्कीसवीं सदी का व्यंग्य अलग होगा ही. आज के समय की अलग चुनौतियां ही इसे अलग बनाएंगी.‌ आज की वैचारिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां बीसवीं सदी से बहुत अलग हैं. इस समय को साहित्य के दर्पण में उतारना समकालीन व्यंग्य के लिए एक अलग तरह की बड़ी चुनौती है.

बीसवीं सदी के औजारों से आज के व्यंग्य को नहीं तराशा जा सकेगा. आज के व्यंग्यकार को अपने भाषिक और शैलीगत उन्हीं औजारों का पुनराविष्कार करना होगा. कुछ नए औजार बनाने होंगे. उन्हें परसाई के समय से आगे जाना ही होगा क्योंकि उसके समय की बहुत-सी चुनौतियां परसाई के समय से अलग हैं.

आज परसाई भी जीवित होते तो वैसा न लिखते रहते जैसा लिखकर वे बड़ा बने थे- वे अपने व्यंग्य के विषय, भाषा और चिंताएं बदल डालते. परसाई समय के साथ बदल गए होते ताकि इस समय को ठीक से पकड़ सकें. वे आज के समय में बहुत अलग हुए होते.‌ वे ख़ुद को इस तरह बदलते कि आज का समय उनके लेखन की मुट्ठी में आ जाए. पर हम हैं कि बदलने को राज़ी नहीं; हम चुटकुलेबाजी, सपाटबयानी, स्टेंड अप कामेडीनुमा व्यंग्य लिखने में ही बुरी तरह उलझे हुए हैं.

कविता और कथा ने तो बदले समय की चुनौती समझ ली है. वे अपनी विधाओं में निरंतर नए प्रयोग कर भी रहे हैं. परंपरागत कविता और कहानी में नई गढ़ंत के जरिये जो नई तरह की कविता और कथा इन दिनों आ रही है उसमें अपने समय को समझने की एक सार्थक कोशिश है. पर हमारा हिंदी व्यंग्य है कि उसी पुराने समय में ज़िद के साथ ठहरा हुआ है, वह अभी भी उसी पुराने व्यंग्य को दोहराना चाहता है.

वो यह भी चाहता है कि आज का कोई भी व्यंग्यकार परसाई से आगे बढ़ने का पाप न करे, लिख गए जो परसाई को लिखना था, अब तो बस उनको दोहराया जाना ही व्यंग्यकारों का अभीष्ट होना चाहिए वरना वो कृतघ्न है जो यह पाप करे. वह ख़ुद अपनी हर लेखकीय कमज़ोरी और अंधेरगर्दी को परसाई के पीछे छुपाता है. परसाई को समझे बिना ही वह परसाई की परंपरा का स्वघोषित झंडाबरदार बन गया है. उसकी इस दयनीय चालाकी ने इक्कीसवीं सदी के हिंदी व्यंग्य का बड़ा नुकसान किया है.

बहरहाल, अकबर इलाहाबादी के शेर को थोड़ा बदलकर कहें तो रंज हुक्काम को बहुत है मगर आराम के साथ– हिंदी व्यंग्य के हुक्काम व्यंग्य की इस स्थिति से रंज तो यहां-वहां ज़ाहिर करते हैं परंतु मज़े में हैं. इनके रहते हमारा हिंदी व्यंग्य भी तमाम व्यंग गोष्ठियों, मंचों, सोशल मीडिया समूहों और पुरस्कार समारोहों में बड़े मज़े में दिखाई देता है. सब व्यंग्यकार एक-दूसरे की पीठ थपथपा रहे हैं. हर तरफ़ वाह-वाह मची है. जिन कारणों से मंच की कविता का पतन हुआ वे सभी सामने दिख रहे हैं परंतु आखिरी समाचार मिलने तक हिंदी व्यंग्य की बस्ती में सभी मज़े में हैं. खुदा खैर करे.

(लेखक प्रख्यात व्यंग्यकार हैं.)

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