बंगनामा: जब बच्चों के इम्तिहान के लिए पिता दफ़्तरों से छुट्टी लेते थे

उत्तर और दक्षिण बंगाल के ज़िलों में काम करते हुए मैंने पाया कि फ़रवरी-मार्च के महीनों में सरकारी कर्मचारी बच्चों की परीक्षाओं के समय दफ़्तर से छुट्टी लिया करते थे. बंगाली समाज में शिक्षा की महत्ता और प्रतिष्ठा की वजह से ही बच्चों की परीक्षाओं का इतना अधिक महत्व है.

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(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

सुबह-सुबह मेरे मेज़ पर एक फ़ाइल आई. खोल कर देखा तो दफ़्तर के कई अफ़सरों के आकस्मिक तथा अर्जित अवकाश के आवेदन पत्र थे. अचानक अवकाश चाहने वालों की भीड़ को देखकर मैं थोड़ा चकित हुआ.

फरवरी 1992 का दूसरा सप्ताह था और मुझे कॉनटाई, यानी कांथी, सबडिवीज़न के सबडिवीज़नल ऑफिसर (एसडीओ) के पद पर काम करते हुए छह महीने हो चुके थे. दो वर्ष लंबे प्रशिक्षण के बाद, जिसमें नौ महीने का ज़िला प्रशिक्षण शामिल था, यह मेरी पहली तैनाती थी. काम-काज के संबंध में मैं अब भी नई चीजें सीख रहा था. साथ ही आए दिन अपने लिए इस नए राज्य, बंगाल, जो अब आजीवन मेरी कर्मभूमि बन रहा था, और यहां के लोगों के बारे में- उनके रहन-सहन, आचार-विचार, सोच तथा संवेदनशीलता के बारे में- भी नई बातें जान रहा था.

अवकाश चाहने वालों में दफ़्तर के एक डिप्टी कलेक्टर भी थे. मैंने उन्हें बुलवाया और पूछा, ‘बोलुन तो, की ब्यापार. देखचि हठात् अनेक जोन ऐक शोंगे छूटि नीते चाय? आपनीयो एक सप्ताह थाकबेन ना (ज़रा बताइए, मामला क्या है. देख रहा हूं कि यकायक कई लोग एक साथ छुट्टी लेना चाहते हैं? आप भी सप्ताह भर नहीं रहेंगे?).’ ‘बाच्चा देर पोरीक्खा आरोंभो होच्चे, सार (बच्चों की परीक्षा आरंभ हो रही है, सर),’

उन्होंने इतनी सहजता से उत्तर दिया जैसे यह एक स्वतः सिद्ध सर्व-ज्ञात सत्य हो. पूछने पर पता चला कि उनकी बिटिया पांचवी कक्षा में पढ़ती है और परीक्षा के दिनों उसे पढ़ाना तथा उसका विशेष ख़्याल रखना ज़रूरी है इसलिए वो हर साल बच्ची की परीक्षा के दौरान छुट्टी लेते हैं. सुनकर मैं अवाक रह गया. फिर आवेदन पत्रों पर नज़र दौड़ाई तो देखा कि अधिकतर कर्मचारियों ने बच्चों की परीक्षा ही छुट्टी का कारण बताया है. एक अफ़सर ने तो एक महीने के अर्जित अवकाश के लिए आवेदन किया था क्योंकि उनका पुत्र दसवीं की परीक्षा देने वाला था.

आने वाले वर्षों में जैसे जैसे उत्तर और दक्षिण बंगाल के ज़िलों में मुझे काम करने का अवसर मिला मैंने देखा कि फरवरी-मार्च के माहों में सरकारी कर्मचारियों में बच्चों के स्कूल की परीक्षाओं के समय अवकाश लेना एक प्रतिरूप बन गया था. शुरुआत में मुझे यह अत्यंत अटपटा लगता था क्योंकि यह मेरे निजी अनुभव से बिलकुल भिन्न था. मैंने अपनी मां को मेरे नियमित पढ़ाई न कर कहानी की किताबों और उपन्यासों में खोए रहने के लिए कभी-कभी विचलित होते देखा था, परंतु मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे पिता जी के मन में मेरी दसवीं कक्षा की परीक्षा के लिए भी छुट्टी लेने का ख़्याल कभी नहीं आया होगा. और न ही मैंने अपने आस-पास किसी सहपाठी या मित्र के अभिभावक को ऐसा करते देखा था.

परंतु पश्चिम बंगाल में मैंने पाया कि बच्चों की परीक्षा का बिगुल बजना अभिभावकों के लिए मानो आपातकाल की सूचना होती है. खुश चेहरों से मुस्कान को अलग ठेल गांभीर्य जगह बना लेती है. भृकुटियां तन जाती हैं और आंखों में रह-रहकर चिंता तैरने लगती है. इस तरह का सबसे प्रचंड परिवर्तन मां-बाप में दसवीं और बारहवीं बोर्ड की परीक्षाओं के समय प्रकट होता था और अभी भी होता है.

इसमें क़तई संदेह नहीं कि बंगाली समाज में शिक्षा की महत्ता और प्रतिष्ठा ने ही बच्चों की परीक्षाओं को अत्याधिक महत्व देने की इस प्रवृत्ति को भी पनपाया और बढ़ाया है. इसलिए न तो यह बात अचंभे की है कि पश्चिम बंगाल के त्योहारों के कैलेंडर में सरस्वती पूजा की एक ख़ास जगह है, और न ही यह कि इतने उत्साह और उमंग के साथ यह पूजा किसी और राज्य में नहीं मनाई जाती है. अन्य पूर्वी राज्यों में- बिहार, ओडिशा और असम में भी, यह बंगाल से ही प्रसारित हुई है. दक्षिण में भी सरस्वती पूजा मनाई जाती है लेकिन इतने व्यापक स्तर पर नहीं. अन्य राज्यों में यह वसंत पंचमी का उत्सव कहलाता है.

चूंकि इस राज्य में बड़े पैमाने पर पाश्चात्य शिक्षा का सर्वप्रथम प्रसार हुआ तथा नए शैक्षिक, प्रशासनिक और वाणिज्यिक संस्थानों का गठन हुआ, दीर्घ काल से ही यहां के लोग शिक्षा को सफलता की पहली सीढ़ी मानने लगे हैं. इसी वजह से पश्चिम बंगाल में मां-बाप के लिए बच्चों की पढ़ाई सर्वोपरि है, चाहे वह किसी भी तबके के हों. शायद हर राज्य में ही स्कूल की पढ़ाई की गुणवत्ता पर से लोगों का विश्वास कम हो गया है क्योंकि अब अधिकतर राज्यों में बच्चों का ट्यूशन पढ़ना आम हो गया है, निचली क्लासों में भी.

लेकिन मैंने पैंतीस वर्ष पहले भी ज़िला प्रशिक्षण के समय उत्तर 24 परगना के कांचियारा ग्राम में एक खपरैल के तले बरामदे पर एक युवक को गरीब किसानों और दिहाड़ी मज़दूरों के छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते देखा था. उनमें से ज़्यादातर बच्चे तीसरी या चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे और हर मास उस नवयुवक को हर अभिभावक से 15 रुपये फीस मिलती थी. उस दिन खपरैल के नीचे ज़मीन पर बैठकर पढ़ते बच्चों का वह दृश्य मेरे मन में बंगाली समाज में शिक्षा की भूख का रूपक बनकर गंथ गया था.

मैं जब स्कूल में था तब छोटे बच्चे कम ही ट्यूशन पढ़ते थे. नौवीं और दसवीं कक्षा में जो आगे विज्ञान पढ़ना चाहते थे वह बच्चे अक्सर ट्यूशन का सहारा लेते थे. परंतु जो गणित और विज्ञान के विषयों में मेरी तरह भुसकोल विद्यार्थी थे तथा जिन्होंने आगे ‘आर्ट्स’ पढ़ने का मन बना लिया था उनके लिए ट्यूशन का कोई मायने नहीं था. आजकल मोटे बस्तों के नीचे दबे नन्हे-मुन्ने बच्चों का भी ट्यूशन पढ़ना शायद हर जगह एक सामान्य बात हो गई है जो हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था एवं समाज के बारे में शायद काफ़ी कुछ बताती है. लेकिन एक अनूठा अभ्यास है जिसे मैंने कलकत्ता महानगरी में व्यापकता से प्रचलित पाया है.

आमतौर से छोटे बच्चों को स्कूल पहुंचाने और वापस लाने का दायित्व विभिन्न कारणों से कई मां-बाप खुद निभाते हैं, उन स्कूलों में भी जहां स्कूली बसों की व्यवस्था हैं. 2005 के बाद कलकत्ता में स्थानांतरित होने के पश्चात में मैंने देखा कि कई बड़े स्कूलों में, विशेष रूप से कन्याओं के स्कूलों में, बच्चों को उनकी मां सुबह आठ बजे से पहले पहुंचाने और छुट्टी की घंटी बजने के बाद वापस ले जाने का काम करती हैं.

इसमें कोई विशेष बात नहीं है. लेकिन बात मुझे असाधारण तब लगने लगी जब मेरे दफ़्तर के रास्ते में पड़ने वाले एक बालिका विद्यालय के सामने प्रतिदिन एक ही दृश्य दिखने लगा. गेट के पास दोनों ओर तथा नज़दीक के एक बस स्टाप के विश्राम शेड के नीचे बार-बार वही महिलाएं, खड़ी या बैठी, बातचीत करती दिखती थीं. मैंने देखा कि सभी के पास धूप तथा बारिश से बचने के लिए एक छाता है और साथ में छोटा एक बैग जिससे अक्सर पानी की बोतल बाहर झांकती दिखती थी. पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि ये महिलाएं महानगरी के विभिन्न सुदूर पाड़ाओं, मुहल्लों, में रहती हैं जहां से, एक तो, आने जाने का भाड़ा बहुत है और, दूसरा, उन्हें बस, मेट्रो, ऑटो इत्यादि बदलकर आने या जाने में एक-डेढ़ घंटे से कम समय नहीं लगता है. इसलिए हर सुबह अपनी-अपनी बच्चियों को स्कूल पहुंचाकर वापस घर न जा कर यह सब स्कूल की छुट्टी तक रुककर अपनी कन्या को घर ले जाना पसंद करती हैं.

मेरे मन में इन महिलाओं के लिए बहुत सम्मान है क्योंकि इनके जैसी लगन और परिश्रम के उदाहरण कम मिलेंगे. कुछ दिनों बाद मुझे यह भी पता चला कि इस स्कूल के निकट कुछ घरों में रहने वाले लोगों ने अपने घर के सामने वाले कमरे को सुबह आठ बजे से दिन के दो बजे तक प्रतीक्षारत महिलाओं के लिए उपलब्ध कर दिया था, एक छोटी सी मासिक फ़ीस के एवज़ में. मकान मालिकों ने मौक़े का फ़ायदा तो उठाया परंतु कई महिलाओं को, जो उनका भाड़ा देने में सक्षम थीं, बैठने की जगह मिल गई. मुझे यह भी पता चला कि कलकत्ता के कई पुराने स्कूलों के आस पास भी यही चित्र दिखता है.

कभी-कभी कोई प्रयास जब हदों को लांघकर मीलों आगे बढ़ जाता है तो अविस्मरणीय बन जाता है. इस मायने में एक और दृश्य, जिसे भुलाना असंभव है, उन दिनों का है जब मैं पश्चिम मेदिनीपुर में ज़िला मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत था. वर्ष 2005 के मार्च की एक दोपहर. उच्च माध्यमिक, यानी कि बारहवीं बोर्ड, की परीक्षाएं चल रही थीं. सुबह की परीक्षा तभी समाप्त हुई थी और घंटे भर बाद दोपहर की परीक्षा आरंभ होने वाली थी. मिदनापुर शहर के एक बड़े विद्यालय के गेट के समक्ष इंतज़ार करते अभिभावकों और गेट से निकलते लड़कों के गुटों के समागम के कारण सड़क जाम हो गई और मेरी गाड़ी थम गई थी.

गाड़ी की खिड़की से मैंने सड़क के दूसरी ओर नज़र फेरी. एक विशाल आम के वृक्ष की छांव में परीक्षा हॉल से अभी-अभी निकलकर आया एक विद्यार्थी घास पर बिछी चादर पर बैठ कर प्रश्न-पत्र हाथ में लिए अपने पिता को कुछ बता रहा था. लड़के के सामने एक व्यंजनों की कटोरियों से सजी थाली थी जिसमें उसकी मां एक स्टोव पर चढ़ी कड़ाही से गर्म-गर्म फूली पूड़ियां, यानी लूची, छानकर डाल रही थीं. पहले सत्र की परीक्षा में पुत्र द्वारा खर्च की गई बुद्धि की पुनः पूर्ति के प्रति समर्पित माता-पिता की तपस्या को देख कर मेरा मन विह्वल हो उठा. तीव्र इच्छा हुई कि गाड़ी से उतरकर मैं उन्हें साष्टांग प्रणाम करूं परंतु दूर से ही उनका नतमस्तक अभिवादन कर मन मसोस कर रह गया. मेरी गाड़ी चल पड़ी थी, मुझे एक बैठक में जाना था.

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

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