नई दिल्ली: भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने शनिवार (31 मई) को सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग में ब्लूमबर्ग और रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में हालिया भारत-पाकिस्तान संघर्ष को लेकर बातचीत की. यह भारत सरकार की ओर से इस सैन्य अभियान पर दी गई बेहद दुर्लभ और आधिकारिक जानकारी मानी जा रही है.
यहां जानें उनके बयानों की तीन प्रमुख बातें:
1. पहले दिन ही भारतीय वायुसेना ने लड़ाकू विमान खोए
जनरल अनिल चौहान ने पहली बार यह स्वीकार किया कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा शुरू किए गए सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पहली रात भारतीय वायुसेना के कुछ लड़ाकू विमान नष्ट हो गए थे. उन्होंने इन ‘प्रारंभिक नुकसानों’ के लिए रणनीतिक (टैक्टिकल) चूक को जिम्मेदार ठहराया. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि कितने विमान गिरे थे.
उन्होंने पाकिस्तान के उस दावे को ‘पूरी तरह ग़लत’ कहा, जिसमें छह भारतीय फाइटर जेट्स को मार गिराने की बात कही गई थी. जनरल चौहान ने ज़ोर दिया कि संख्या नहीं, बल्कि यह समझना ज़रूरी है कि ये नुकसान क्यों हुए और उनसे कैसे सबक लिया गया.
2. नुकसान के बाद वायुसेना ने दो दिन तक अपने सभी लड़ाकू विमान नहीं उड़ाए
इन नुकसानों के बाद, भारतीय वायुसेना ने लगभग दो दिन तक अपने सभी फाइटर जेट्स की उड़ानें रोक दी थीं. इस दौरान रणनीति की समीक्षा की गई और सुधार किए गए.
ब्लूमबर्ग से बातचीत में जनरल चौहान ने कहा, ‘हमने यह समझा कि हमने किस स्तर पर टैक्टिकल गलती की थी, उसे ठीक किया, उसमें सुधार किया और दो दिन बाद फिर से सभी विमान उड़ाए, और लंबी दूरी से लक्ष्य साधा.’ इस रणनीतिक विराम से वायुसेना को फिर से संगठित करने और पाकिस्तान के भीतर गहराई तक सटीक हमले करने का मौका मिला.
3. पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व ने परिपक्वता दिखाई
जनरल चौहान ने कहा कि तनावपूर्ण स्थिति के बावजूद, दोनों देशों ने संयम और समझदारी दिखाई. किसी भी पक्ष ने स्थिति को परमाणु युद्ध की ओर नहीं बढ़ने दिया. रॉयटर्स से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘ऑपरेशन सिंदूर के हर चरण में दोनों पक्षों ने सोच-समझकर और जिम्मेदारी से कदम उठाए.’
उन्होंने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की संभावना को ‘बहुत दूर की बात’ कहकर खारिज किया और यह भी बताया कि दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते खुले रहे, जिससे संकट को नियंत्रित किया जा सका.
जनरल चौहान के सिंगापुर में दिए गए इंटरव्यू एक अहम बदलाव की ओर इशारा करते हैं, जहां सैन्य स्तर पर हुई विफलताओं और सफलताओं को लेकर पहले से कहीं ज़्यादा खुलापन दिखाया गया है. यह बात इस ओर भी ध्यान खींचती है कि हालिया भारत-पाकिस्तान संघर्ष कितनी जटिल स्थिति थी. उनकी टिप्पणियों के बाद अब मोदी सरकार से यह मांग उठ रही है कि ऐसे संवेदनशील मामलों पर आधिकारिक रूप से और ज़्यादा पारदर्शिता बरती जाए — खासकर इसलिए क्योंकि यह अहम खुलासे देश के बाहर, विदेशी धरती पर किए गए थे.
