लद्दाख के नेताओं की नई नियमों पर प्रतिक्रिया: राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का मुद्दा अब भी अधूरा

2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग होकर केंद्र शासित प्रदेश बने लद्दाख में लोकतंत्र की बहाली और छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा की मांगें अब भी अनसुलझी हैं. लेह एपेक्स बॉडी-करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस नेताओं ने नई डोमिसाइल और आरक्षण नीतियों का स्वागत तो किया, लेकिन इन्हें ‘छोटा मुद्दा’ बताया है.

3 फरवरी, 2024 को लद्दाख के लेह और कारगिल ज़िलों में हजारों लोगों ने अनुच्छेद 370 को कमजोर किए जाने के बाद हुए संवैधानिक बदलावों के खिलाफ प्रदर्शन किया था। (फाइल फोटो/स्पेशल अरेंजमेंट)

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर से 2019 में अलग कर लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद वहां लोकतंत्र के निलंबन और संवैधानिक अधिकारों की समाप्ति को लेकर जो व्यापक चिंता बनी हुई है, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा लद्दाख के लिए लाई गई नई आरक्षण और डोमिसाइल (स्थायी निवास) नीतियां उसका समाधान करने में नाकाम रही हैं.

लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) के नेता चेरिंग दोरजे, जो पिछले दो सालों से केंद्र सरकार से बातचीत की अगुवाई कर रहे हैं (करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस – केडीए के नेताओं के साथ मिलकर), ने द वायर से कहा, ‘हमारे लिए मुख्य मुद्दा राज्य का दर्जा और लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना है, जो अब भी अधूरा है.’

उन्होंने कहा, ‘हम इन नए उपायों का स्वागत करते हैं, लेकिन अब सरकार को राज्य का दर्जा बहाल करने और लद्दाख के लिए किसी न किसी रूप में संवैधानिक सुरक्षा देने की बात करनी चाहिए. नौकरी में आरक्षण एक छोटा मुद्दा था, जिसे बहुत पहले सुलझा लिया जाना चाहिए था, लेकिन सरकार ने इसे बिना वजह लटकाए रखा.’

पर्यावरणविद और इनोवेटर सोनम वांगचुक, जो लद्दाख को कथित तौर पर उसके अधिकारों से वंचित करने के खिलाफ प्रदर्शन करते रहे हैं, ने कहा कि आरक्षण नीति एलएबी-केडीए की संयुक्त मांगों में ‘सबसे कम महत्वपूर्ण’ थी.

वांगचुक बोले, ‘ज़रूरत के हिसाब से यह सबसे जरूरी था, लेकिन महत्व के लिहाज़ से सबसे कम. ऐसा लगता है कि (एलएबी-केडीए और केंद्र सरकार) ने आपसी सहमति से सबसे आसान मांग को पहले पूरा करने का फैसला किया.’

उन्होंने कहा कि एलएबी-केडीए की यह प्रमुख मांग थी कि किसी बाहरी व्यक्ति को लद्दाख का डोमिसाइल सर्टिफिकेट पाने के लिए 30 साल की सतत निवास अवधि की शर्त होनी चाहिए, जिसे सरकार ने नहीं माना.

लद्दाख सिविल सेवा विकेंद्रीकरण और भर्ती (संशोधन) विनियमन, 2025, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार (2 जून) और मंगलवार (3 जून) को अधिसूचित किया, के तहत अब बाहरी व्यक्ति को लद्दाख का डोमिसाइल सर्टिफिकेट पाने के लिए 31 अक्टूबर 2019 से लगातार 15 साल का निवास जरूरी होगा.

डोमिसाइल प्रमाणपत्र प्राप्त करने के नियम ‘लद्दाख सिविल सेवा डोमिसाइल प्रमाणपत्र नियम, 2025’ के तहत तय किए गए हैं.

लद्दाख से 2024 लोकसभा चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर जीतने वाले मोहम्मद हनीफा जान ने कहा कि डोमिसाइल नीति ‘निरर्थक’ है जब तक लद्दाख को राज्य का दर्जा वापस नहीं दिया जाता.

उन्होंने कहा, ‘सरकार पहले भी डोमिसाइल नीति लाने को तैयार हो गई थी, इसलिए इसमें कुछ नया नहीं है, खासकर तब जब एलएबी और केडीए की 30 साल निवास की शर्त सरकार ने नहीं मानी.’

हालांकि इन नए नियमों से संबंधित विस्तृत दिशानिर्देश अभी आने बाकी हैं, लेकिन एलएबी प्रमुख दोरजे ने कहा कि लद्दाख आरक्षण (संशोधन) विनियमन, 2025 के तहत अब 95% नौकरियां (जिसमें 10% आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित है) स्थानीय डोमिसाइल वालों के लिए आरक्षित कर दी गई हैं. यह अधिसूचना भी मंगलवार को जारी की गई थी.

नए नियमों के तहत लद्दाख में सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा 50% से बढ़ाकर 85% कर दी गई है, जिसमें अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य शैक्षिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग शामिल हैं.

दोरजे ने कहा, ‘भले ही 2034 के बाद बाहरी लोग लद्दाख के डोमिसाइल बन जाएं, वे केवल 5% नौकरियों के लिए ही प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, जबकि 95% नौकरियां मूल निवासियों के लिए आरक्षित हैं, जो देश में सबसे अधिक है.’

उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर को 2019 के बाद पिछली तारीख से लागू होने वाली डोमिसाइल नीति मिली थी, लेकिन लद्दाख में यह नीति आगे की तारीख से लागू होगी. उन्होंने बताया, ‘यह नीति लद्दाख के मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य प्रोफेशनल कॉलेजों में दाखिले तक के लिए लागू की गई है.’

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अनुसार, लद्दाख की जनसंख्या का 83% से अधिक हिस्सा जनजातीय है. नए नियमों को भाजपा की उस कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है जिसमें वह 2019 के बाद लद्दाख की पहचान और नौकरियों पर बाहरी दावेदारों के प्रभाव को लेकर फैले जनाक्रोश को शांत करना चाहती है.

हालांकि लद्दाखी नेता हनीफा जन, जो 2023 में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित उस उच्च स्तरीय समिति के सदस्य भी हैं जो एलएबी-केडीए गठबंधन की चार सूत्रीय मांगों की जांच कर रही है, ने कहा कि बातचीत का मुख्य मुद्दा लद्दाख में ‘लोकतंत्र की बहाली’ है.

उन्होंने कहा, ‘देश 1947 में ब्रिटिश उपनिवेशवाद से आज़ाद हुआ था, लेकिन लद्दाख को 2019 से गुलामी में धकेल दिया गया है. हमारी नीतियां बनाने में कोई भूमिका नहीं है और बाहर से आए नौकरशाही शासन ने लद्दाख को गुलामी का मैदान बना दिया है. अब सरकार को मुख्य मुद्दों के हल पर ध्यान देना चाहिए.’

सोनम वांगचुक, जो 2023 में दो बार भूख हड़ताल पर बैठे थे, ने चेताया कि डोमिसाइल नीति में 15 साल की शर्त लद्दाख के लोगों को रास नहीं आई है.

उन्होंने कहा, ‘लोगों को कम से कम 30 साल निवास की शर्त की उम्मीद थी. इसलिए यह नियम उन्हें बहुत खुश नहीं कर पाया. फिर भी, यह मुद्दा सुलझाना जरूरी था क्योंकि सभी सरकारी पद खाली थे, जिससे शासन तंत्र भी प्रभावित हो रहा था और लद्दाख के युवा भी बेरोजगार थे.’

उन्होंने कहा कि आगामी दो बैठकें, जो लद्दाख की सिविल सोसायटी और गृह मंत्रालय के बीच होंगी, आंदोलन के भविष्य की दिशा तय करेंगी. वांगचुक ने चेताया कि कई लोग आरक्षण और डोमिसाइल पर लाए गए नियमों को ‘समाधान’ की तरह पेश कर रहे हैं, ‘जबकि यह हकीकत से काफी दूर है.’

उन्होंने कहा, ‘अगर केंद्र सरकार सचमुच छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और लोकतंत्र की बहाली पर चर्चा करती है, तो लोग खुश होंगे. लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ और हिल काउंसिल के चुनाव करा दिए गए, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर असर डालेगा.’

2020 के हिल काउंसिल चुनाव में भाजपा के चुनावी घोषणापत्र के तीन प्रमुख मुद्दों में लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने का वादा शामिल था.

घोषणापत्र में कहा गया था कि भाजपा लद्दाख की ‘ज़मीन, नौकरी और पर्यावरण’ की रक्षा करने के लिए ‘छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा’ लाने और राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में कदम उठाएगी.

वांगचुक बोले, ‘यह पूरा चक्र पूरा होता है.’ उन्होंने कहा कि अगर भाजपा ने फिर वादा निभाया नहीं, तो इसके नतीजे चुनाव में दिखाई देंगे — जैसे 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हार मिली, क्योंकि 2019 में उन्होंने छठी अनुसूची का वादा किया था जिसे पूरा नहीं किया.

उन्होंने आगे कहा, ‘लोकतंत्र में लोग अपने संदेश मतदान से देते हैं. यही फिर हो सकता है जब सितंबर के अंत में हिल काउंसिल चुनाव होंगे.’

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा जारी अन्य अधिसूचनाओं में ‘लद्दाख ऑफिशियल लैंग्वेजेज रेगुलेशन, 2025’ शामिल है, जिसमें अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू, भोटी और पुरगी को लद्दाख की आधिकारिक भाषाएं घोषित किया गया है और इनके प्रयोग से संबंधित सिफारिशें तय की गई हैं.

साथ ही, ‘लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (संशोधन) विनियमन, 2025’ के तहत अब लेह और करगिल की हिल काउंसिलों में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)