जब शांति की चाह अपराध बन जाए: अली ख़ान महमूदाबाद की गिरफ़्तारी

अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अली ख़ान महमूदाबाद सशर्त जमानत पर बाहर हैं. सत्ता द्वारा उनको निशाना बनाया जाना और शांति की मांग करने वाली उनकी फेसबुक पोस्ट में तथाकथित 'डॉग-व्हिसलिंग' की जांच करना परेशान करने वाले कई सवाल खड़े करता है.

अली खान महमूदाबाद. (फोटो: फेसबुक)

अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अली ख़ान महमूदाबाद जेल से रिहा तो हो गये हैं, लेकिन मैं उनकी सशर्त और सीमित स्वतंत्रता को केवल सांत्वना की दृष्टि से देख पा रहा हूं. उन पर राष्ट्र और सामाजिक सद्भाव के ख़िलाफ़ गंभीर अपराधों का आरोप लगाया जा रहा है.

भारत की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि उनका यह प्रयास ‘डॉग-व्हिसलिंग’ की श्रेणी में है साथ ही इस बात की निंदा की गई कि उनके ‘शब्दों के चयन’ ठीक नहीं हैं, ‘सस्ती लोकप्रियता’ हासिल करने के लिए ऐसा किया गया है.

इससे भी भयावह तो यह है कि अदालत ने उनके सोशल मीडिया ट्वीट्स के पीछे के वास्तविक अर्थ को उजागर करने के लिए तीन पुलिस अधिकारियों की एक टीम नियुक्त करना उचित समझा, जिस ट्वीट में खुले तौर पर सामाजिक समानता और शांति का आह्वान किया गया था. साथ ही कश्मीर में पर्यटकों पर हुए क्रूर आतंकवादी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच शत्रुता पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करने से अदालत ने उन्हें रोक दिया है.

सत्ता प्रतिष्ठान के द्वारा उनको स्पष्ट निशाना बनाया जाना और शांति की मांग करने वाले उनके पोस्ट में किसी भी तरह के गुप्त ‘डॉग-व्हिसलिंग’ के लिए जांच करना कई परेशान करने वाले सवाल खड़े करता है. भारतीय राज्य के चरित्र के बारे में, उसके लोकतंत्र के ख़त्म होने के बारे में, विचार-विमर्श के स्थल के रूप में विश्वविद्यालय के बारे में, उदार बुद्धिजीवियों की सीमित होती स्वतंत्रता के बारे में, वीरतापूर्ण सैन्य आक्रमण के समय शांति और सामाजिक समानता की मांग करने के ख़तरों के बारे में, स्वतंत्र आवाज़ को विनियमित करने की शक्ति राज्य को देने की दुविधाओं के बारे में. और शायद सबसे गंभीर बात यह है कि क्या अली ख़ान को उनकी मुस्लिम पहचान के कारण एक नज़ीर बनाकर पेश किया गया.

तथ्य सर्वविदित हैं. प्रोफ़ेसर अली ख़ान पर भारत की क़ानून की किताबों में दर्ज कुछ सबसे गंभीर अपराधों के आरोप हैं. इनमें वे अपराध भी शामिल हैं. जिनमें आरोप लगाया गया है कि उन्होंने राष्ट्र की अखंडता, संप्रभुता और एकता को ख़तरे में डाला तथा समुदायों को विभाजित करने और अलग-थलग करने की कोशिश की.

‘एक विशेष टीम उनके सोशल मीडिया पोस्ट की जांच करेगी’

सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अंतरिम ज़मानत देते हुए आदेश दिया कि तीन पुलिसकर्मियों की एक विशेष टीम उनके दो सोशल मीडिया पोस्ट की जांच करे.

वे दो फ़ेसबुक पोस्ट कौन से हैं जिनके आधार पर अली ख़ान पर ऐसे आरोप लगाए गए हैं? मैंने कई बार इन दोनों पोस्ट को पूरा पढ़ा, कई बार पढ़ा, ताकि पता लगा सकूं कि क्या कहीं से भी इन पोस्ट को देशद्रोही, राष्ट्र-विरोधी या सामाजिक सद्भाव को नुक़सान पहुंचाने वाला माना जा सकता है.

मगर मैं असफल रहा.

उनके पोस्ट में तीन मुख्य मुद्दे हैं. पहला, आतंकी हत्याओं की हालिया घटना पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया के औचित्य के बारे में उनकी समझ. उनका कहना है कि भारत ने ‘पाकिस्तानी सेना पर यह ज़िम्मेदारी डाल दी है कि वह अब आतंकवादियों और ग़ैर-सरकारी तत्वों के पीछे छिप न सके.’ इससे ‘पाकिस्तान में सेना और आतंकवादी (ग़ैर-सरकारी तत्वों) के बीच के अंतर को ख़त्म करने के मामले में एक नया चरण शुरू हुआ है.’

उनका मानना ​​है कि ‘पाकिस्तानी सेना ने बहुत लंबे समय तक क्षेत्र को अस्थिर करने के लिए सैन्यीकृत ग़ैर-सरकारी तत्वों का इस्तेमाल किया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर पीड़ित होने का दावा भी किया है.’ ऑपरेशन सिंदूर ‘भारत-पाक संबंधों की सभी धारणाओं को पुन: परिभाषित करता है क्योंकि आतंकवादी हमलों का जवाब सैन्य प्रतिक्रिया से दिया जाएगा और दोनों के बीच किसी भी तरह का अर्थपूर्ण अंतर समाप्त हो गया है’.

दूसरा मुद्दा भारत के मुसलमानों के लिए समान नागरिकता सुनिश्चित करने का एक संक्षिप्त आह्वान है. उनका कहना है कि अगर मुस्लिम महिलाओं की हत्या और बुलडोज़र से मुसलमानों के घरों को नष्ट करना जारी रहा तो आधिकारिक ब्रीफ़िंग में सेना का सार्वजनिक चेहरा बनने वाली मुस्लिम महिला कर्नल सोफ़िया कुरैशी का ‘आगे करना’ पाखंड बनकर रह जाएगा.

एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में, राज्य द्वारा अल्पसंख्यकों की समान सुरक्षा के लिए यह अपील लाभकारी मानी जाएगी. एक वास्तविक हिंदू राष्ट्र में, मुसलमानों के समान अधिकारों की मांग को विघटनकारी, निंदा और दमन के योग्य माना जाएगा.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

‘महमूदाबाद की पोस्ट शांति के लिए एक साहसी आह्वान करती है’

उनके पोस्ट का तीसरा मुद्दा शांति के लिए एक साहसी और ज़ोरदार आह्वान है. उन्होंने घोषणा कि ‘नागरिक जीवन का नुक़सान दोनों पक्षों के लिए दुखद है और यही मुख्य कारण है कि युद्ध से बचना चाहिए’ (इस वाक्य में इटैलिक वाला अंश मैंने लिखा है).

‘कुछ लोग बिना सोचे-समझे युद्ध की वकालत कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने कभी युद्ध नहीं देखा है, संघर्ष क्षेत्र में रहना या जाना तो दूर की बात है. एक नक़ली नागरिक सुरक्षा अभ्यास का हिस्सा बनने से आप एक सैनिक नहीं बन जाते हैं और न ही आप कभी किसी ऐसे व्यक्ति का दर्द जान पाएंगे जिनको संघर्ष के कारण नुक़सान उठाना पड़ता है.

‘युद्ध क्रूर है. ग़रीब लोगों को इससे अत्यधिक मुक़सान होता है और केवल राजनेता तथा रक्षा कंपनियां ही लाभान्वित होती हैं. जबकि युद्ध अपरिहार्य है क्योंकि राजनीति मुख्य रूप से हिंसा में निहित है – कम-से-कम मानव इतिहास हमें यह सिखाता है – हमें यह समझना होगा कि राजनीतिक संघर्षों को कभी भी सैन्य तरीक़े से हल नहीं किया गया है.’

वे दुश्मन के ख़िलाफ़ नफरत भरे आह्वान के ख़िलाफ़ भी चेतावनी देते हैं. वह पूछते हैं, ‘तो जब आप युद्ध के लिए शोर मचाते हैं या किसी देश को मिटा देने का आह्वान करते हैं, तो आप वास्तव में क्या चाह रहे हैं? सभी लोगों का नरसंहार? मैं जानता हूं कि इज़राइल ऐसा करके बच निकल रहा है – और कुछ भारतीय इसकी प्रशंसा करते हैं – लेकिन क्या हम वास्तव में बच्चों के संभावित भविष्य के दुश्मनों की तरह सामूहिक हत्या की वकालत करना चाहते हैं?’

‘सिर्फ़ इसलिए कि आप सीमा से दूर हैं या क्योंकि आपने इतनी नफ़रत अपने अंदर समाहित कर ली है कि अब आप पूरे देश, लोगों, धार्मिक समुदाय, जातीय समूह या सामाजिक समूह के बारे में सोचते समय इंसानों के बारे में नहीं सोचते, इसका मतलब यह नहीं है कि आप सुरक्षित हैं… आप सभी लोगों की तुलना उनकी सरकार से नहीं कर सकते. किसी भी मामले में युद्ध अंततः सभी को प्रभावित करता है. यह सिर्फ़ समय की बात है.’

‘सोचें कि जब आप कहते हैं कि ‘उन्हें मिटा दो,’ ‘उन्हें ख़त्म कर दो,’ ‘उन्हें नष्ट कर दो’ आदि, तो इसका क्या मतलब है?’

‘आप कह रहे हैं कि सभी बच्चों, बुज़ुर्गों, अल्पसंख्यकों, युद्ध का विरोध करने वालों और कई अन्य निर्दोष लोगों को मार डालो जो ठीक वही करना चाहते हैं जो आप करना चाहते हैं: पिता, माता, बेटी, बेटा, दादा-दादी और दोस्त बनना. आप इस तरह के व्यापक विनाश की मांग तभी कर सकते हैं जब आपने उन्हें पूरी तरह से अमानवीय बना दिया हो.’

सद्भाव और सौहार्द की अपील में भगवद गीता और पैग़ंबर दोनों की शिक्षाओं का हवाला 

सद्भाव और सौहार्द की अपनी अपील का समर्थन करने के लिए वह भगवद गीता और पैग़ंबर दोनों की शिक्षाओं का हवाला देते हैं. सोशल मीडिया पर कुछ लोगों द्वारा प्रदर्शित ‘युद्ध के लिए अंधी रक्तपिपासा’ की निंदा करते हुए, वह घोषणा करते हैं कि युद्ध की भावना ‘युद्ध की गंभीरता का अनादर करती है और उन सैनिकों के जीवन का अपमान करती है जिनकी जान वास्तव में दांव पर लगी होती है.’

यह किसी त्रासदी से कम नहीं है कि शांति के लिए इस प्रभावी, हृदयस्पर्शी और नैतिक रूप से महत्वपूर्ण आह्वान को राज्य प्रतिष्ठान द्वारा राष्ट्र के ख़िलाफ़ एक घृणित अपराध के रूप में विकृत करके पेश किया गया है. ऐसे समय में जब सीमा के दोनों ओर से शीर्ष नेतृत्व की ओर से युद्ध उत्तेजना फैलाई जा रही थी शांति के लिए उनकी शांतिवादी अपील एक असाधारण नैतिक साहस का कार्य था. उग्र पाकिस्तानी जनरल को फ़ील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत किया गया है. सैन्य वर्दी पहने प्रधानमंत्री मोदी के बड़े-बड़े होर्डिंग्स पूरे भारत में लगे हैं.

यदि दोनों सरकारों से निर्दोष कमज़ोर नागरिकों के जीवन को तहस-नहस कर वासे ऐसे युद्ध से दूर रहने का आह्वान करने वाली आवाज़ें दबा दी जाती हैं, यहां तक ​​कि उन्हें अपराधी बना दिया जाता है, तो यह एक स्पष्ट संकेत है कि उस देश ने अपना नैतिक बोध खो दिया है.

विशेष रूप से प्रोफ़ेसर अली को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा की गई कष्टदायक टिप्पणी से इस सामाजिक संकट की गंभीरता ज़ाहिर हुई. संवैधानिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करने के लिए यह सर्वोच्च मंच है.

विद्वान न्यायाधीशों ने प्रोफ़ेसर के सोशल मीडिया ट्वीट्स में ‘डॉग-व्हिसलिंग’ के बारे में रहस्यमय संकेत दिए, उनके ‘शब्दों के चयन’ की आलोचना की और उन पर ‘सस्ती लोकप्रियता’ हासिल करने का आरोप लगाया.

पीठ ने ‘प्रयुक्त वाक्यांश की जटिलता को समग्र रूप से समझने और दोनों पोस्टों में इस्तेमाल किए गए कुछ अभिव्यक्तियों की उचित व्याख्या करने के लिए’ एक विशेष जांच दल की नियुक्ति का आदेश दिया. यह हमारी समझ से परे है कि कैसे तीन पुलिस अधिकारी इन पोस्ट्स के छिपे हुए अर्थों को समझ पाएँगे जबकि सुरुचिपूर्ण और साफ़ सुथरी अंग्रेज़ी में लिखे गए पोस्ट को ख़ुद न्यायधीश महोदय नहीं समझ सकते.

विद्वान न्यायाधीशों ने प्रोफ़ेसर को भारत-पाकिस्तान शत्रुता के बारे में कोई और बयान नहीं देने का निर्देश दिया. ऐसे समय में जब देश सोशल मीडिया पोस्ट और नफ़रत फैलाने वाले और युद्ध भड़काने वाले भाषणों से भरा पड़ा है, यह दुखद विडंबना है कि राजनीतिक विज्ञान के एक प्रोफ़ेसर द्वारा शांति की अपील को दबा दिया जाता है.

राजनेताओं और धर्मगुरुओं द्वारा नरसंहार का आह्वान करने वाले भाषणों पर पुलिस और अदालतों का रवैया

इसके उलट राजनीतिक और धार्मिक नेताओं द्वारा नरसंहार का आह्वान करने वाले घृणित भाषणों के साथ पुलिस और अदालतों द्वारा किस तरह का व्यवहार किया जाता है उसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है. 2024 के आम चुनावों के दौरान प्रधान मंत्री ने ख़ुद अपनी पार्टी के घृणा भरे अभियान का नेतृत्व किया, जिसमें भारतीय मुसलमानों को बार-बार घुसपैठिया बताया गया और कहा गया कि वे कई भयावह साज़िशों या जिहादों में शामिल हैं.

और प्रोफ़ेसर अली ख़ान के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्रवाई किए जाने के आस पास ही मध्य प्रदेश के एक मंत्री कुंवर विजय शाह ने कर्नल सोफ़िया क़ुरैशी ख़ान को आतंकवादियों की बहन कहकर संबोधित किया. पुलिस ने शुरू में उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की.

स्थानीय अदालत ने मंत्री के बयानों को ‘कैंसरजनक और ख़तरनाक’ बताया और पुलिस को निर्देश दिया कि मंत्री के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया जाए तब जाकर मंत्री के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया. मगर मंत्री को गिरफ़्तार नहीं किया गया.

(फोटो साभार: फेसबुक)

भारत का नैतिक संकट अशोक विश्वविद्यालय के प्रबंधन की विशिष्ट और शर्मनाक चुप्पी में भी प्रदर्शित हुआ. शांति और सामाजिक न्याय का आह्वान करने वाले फ़ैकल्टी की स्वतंत्रता पर हुए इस हमले के बावजूद उसकी ख़ामोशी दिखाती है कि इसके दावे कितने खोखले हैं.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से बिलकुल उलट जिसने ग़ाज़ा में इज़रायल के नरसंहार युद्ध का विरोध करने वाले अपने छात्रों और फ़ैकल्टी को दंडित करने से इनकार कर दिया. विश्वविद्यालय ने तब भी झुकने से इनकार कर दिया जब देश के राष्ट्रपति ने प्रतिशोध में विश्वविद्यालय को दिए जाने वाले दो बिलियन डॉलर के अनुदान में कटौती की घोषणा की. हमें उन तरीक़ों के बारे में भी सावधान रहना चाहिए जिनसे नाज़ी जर्मनी के विश्वविद्यालयों ने ख़ुद को नाज़ी नरसंहार की विचारधारा का अड्डा बनने दिया.

हालांकि, यह सुखद है कि अशोक विश्वविद्यालय के कई छात्र और संकाय सदस्य, विश्वविद्यालय नेतृत्व की कायरतापूर्ण चुप्पी के बावजूद, प्रोफ़ेसर अली ख़ान के साथ एकजुटता दिखाने के लिए आगे आए. संकाय सदस्यों ने बारी-बारी से उन स्थानों के बाहर धरना दिया जहां प्रोफ़ेसर को हिरासत में रखा गया था.

मैं विशेष रूप से प्रोफ़ेसर अली ख़ान के छात्रों द्वारा जारी किए गए सार्वजनिक बयान से प्रभावित हुआ, जिन्होंने उन्हें दयालु और विचारशील बताया, एक शिक्षक जो अपने देश से प्यार करता है और अपने छात्रों को धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के संवैधानिक मूल्यों के लिए सम्मान सिखाता है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रोफ़ेसर के साथ सार्वजनिक तौर पर एकजुटता प्रदर्शित करने वालों पर भी हमला किया, और प्रोफ़ेसर अली ख़ान का समर्थन करने वाले शिक्षाविदों तथा छात्रों को इन शब्दों में कड़ी चेतावनी दी – ‘हम जानते हैं कि उनसे कैसे निपटना है’.

क़ानून को अन्यायपूर्ण ढंग से लागू कर स्वतंत्र आवाज़ को दबाना समाज के लिए विनाशकारी

आपराधिक क़ानून को अन्यायपूर्ण ढंग से लागू करके स्वतंत्र आवाज़ को दबाने के ख़तरे और परिणाम एक समाज के लिए बहुत ही विनाशकारी हो सकते हैं. वरिष्ठ पत्रकार सौरव दास ने प्रोफ़ेसर अली ख़ान के साथ पुलिस और अदालतों द्वारा किए गए व्यवहार को सटीक रूप से वर्णित करते हुए कहा कि ‘यह इस बात का एक आदर्श उदाहरण है कि आप किस तरह से बौद्धिक रूप से मृत नागरिकों का राष्ट्र बनाते हैं, जहां आलोचनात्मक समीक्षा की जगह रटे-रटाए दोहराव ने ले ली है और प्रगतिशील आवाज़ों को दबा दिया गया है ताकि हां में हां मिलाने वाले औसत दर्जे के विचारों के लिए जगह बनाई जा सके. इस तरह एक समाज मरता है, जहां न्यायिक रूप से स्वीकृत तरीक़े से बौद्धिक जीवन का गला घोंट दिया जाता है और स्वतंत्र विचारों के प्रसार को दबा दिया जाता है.’

फिर भी, बढ़ती हुई और कभी-कभी नरसंहारक घृणास्पद भाषण को नियंत्रित करने के लिए क़ानून की स्पष्ट अनिवार्यता से संबंधित एक केंद्रीय दुविधा के साथ मैं अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं. घृणास्पद भाषण के खतरे जो लगातार सामाजिक ताने-बाने को विषाक्त करते हैं और घृणा तथा हिंसा को भड़काते हैं, वे स्पष्ट और भयावह हैं.

लेकिन अगर हमारे पास घृणास्पद भाषण के लिए दंडित करने के मजबूत क़ानून हैं, तो कार्यपालिका और उसकी शक्ति को और बढ़ा सकते हैं तथा उन्हें सशक्त बना सकते हैं – मुख्य रूप से पुलिस – ताकि वे यह तय कर सकें कि घृणास्पद भाषण क्या है और क्या नहीं है. प्रोफ़ेसर अली ख़ान के साथ जो कुछ हुआ वह इस बात की दर्दनाक याद दिलाता है कि कैसे एक बहुसंख्यकवादी और दमनकारी राज्य इन शक्तियों का उपयोग कर सकता है.

यह शांति और नागरिक जीवन की सुरक्षा के लिए एक भावुक शांतिवादी आह्वान को आपराधिक घृणास्पद भाषण समझेगा. यह नरसंहार के लिए घृणित ख़तरनाक आह्वानों को दंडित किए बिना छोड़ देगा.

अली ख़ान के उत्पीड़न के माध्यम से भारतीय राज्य और अदालतों का संदेश स्पष्ट है. दो राष्ट्रों के बीच और राष्ट्र के भीतर शांति के आह्वान का स्वागत नहीं किया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कि भारत के मुसलमानों के समान सुरक्षा तथा अधिकारों की बात करने का स्वागत नहीं किया जाता. फिर भी तथ्य यह है कि, उदाहरण के लिए, मैंने पहलगाम आतंकी हमले से पहले और बाद में, अपने लेखों में और ऑनलाइन चर्चाओं तथा एक वीडियो अपील में युद्ध और नफ़रत के ख़िलाफ़ बार-बार इसी तरह की अपील की है.

बेशक प्रोफ़ेसर अली ख़ान द्वारा की गई अपील मेरी अपील से कहीं ज़्यादा प्रभावी है. लेकिन अगर उन्हें राष्ट्र और सामाजिक शांति के ख़िलाफ़ अपराध करने का दोषी माना जाता है, तो मैंने भी यही अपराध किया है. फिर देश की सबसे बड़ी अदालत ने उन्हें क्यों सज़ा दी, जेल भेजा और कड़ी फटकार लगाई, जबकि मुझे नहीं? इसका सिर्फ़ एक ही निष्कर्ष हो सकता है, और वह यह कि उन्हें इसलिए सज़ा दी गई क्योंकि वे मुसलमान हैं और मैं नहीं. मोदी के भारत में सभी नागरिकों के लिए बोलने का अधिकार और विवेक की आज़ादी गंभीर ख़तरे में है. लेकिन भारतीय मुसलमानों के लिए ये आज़ादी पूरी तरह से ख़त्म हो गई है.

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की कोलिकानामक संस्था से जुड़े हैं.)