नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को वरिष्ठ पत्रकार और साक्षी टीवी के एंकर कोमिनेनी श्रीनिवास राव को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, जिन्हें 9 जून को एक टेलीविजन बहस के दौरान पैनलिस्ट द्वारा की गई विवादास्पद टिप्पणियों के लिए आंध्र प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार किया था.
कोर्ट ने कहा कि राव ने खुद आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं की थी और उनकी पत्रकारीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने एक आदेश जारी कर पुलिस को निर्देश दिया कि वह गुंटूर जिले के मंगलागिरी में स्थानीय अदालत द्वारा सुझाई गई शर्तों के अनुसार उसे जमानत पर रिहा करे.
70 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार राव को 6 जून को केएसआर लाइव शो के प्रसारण को लेकर पुलिस शिकायत दर्ज होने के बाद हैदराबाद स्थित उनके घर से गिरफ्तार कर आंध्र प्रदेश के गुंटूर ले जाया गया. शो के दौरान पैनलिस्ट और साथी पत्रकार वीवीआर कृष्णम राजू ने अमरावती क्षेत्र की महिलाओं के खिलाफ कथित तौर पर बेहद अपमानजनक और आपत्तिजनक टिप्पणी की थी.
इस मामले में कृष्णम राजू को आरोपी नंबर 1 (ए-1) बनाया गया, जबकि राव को ए-2 के रूप में नामजद किया गया.
अमरावती कैपिटल फार्मर्स ज्वाइंट एक्शन कमेटी की दलित नेता कंबम्पति सिरीशा ने शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में आरोप लगाया गया है कि शो में अमरावती की महिलाओं, खास तौर पर दलित महिलाओं के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई गई है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि साक्षी टीवी प्रबंधन ने इस बयान को बढ़ावा दिया है.
शिकायत के बाद पुलिस ने राव, राजू और साक्षी टीवी प्रबंधन पर कई कानूनों के तहत मामला दर्ज किया, जिसमें एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, आईटी अधिनियम की धारा 67 (इलेक्ट्रॉनिक रूप से अश्लील सामग्री प्रकाशित करना), और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कई धाराएं जैसे धारा 79 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना) और 196 (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) शामिल हैं.
राव को मंगलगिरी में प्रथम श्रेणी-सह-सिविल जज कोर्ट के अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, जहां से उन्हें दो सप्ताह की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. गुरुवार को उन्होंने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
राव की ओर से दलील देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कहा कि उनके मुवक्किल साक्षी टेलीविजन चैनल पर बहस की मेजबानी करने वाले केवल एक एंकर थे और कथित अपमानजनक टिप्पणी एक पैनलिस्ट द्वारा की गई थी.
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि कोम्मिनेनी उस व्यक्ति को उकसा रहे थे और उसका समर्थन कर रहे थे जो यह बयान दे रहा था. उन्होंने कहा, ‘जब पैनलिस्ट अमरावती की महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे, तो वह हंस रहे थे.
पीठ ने राज्य सरकार से पूछा कि किसी और के बयान के लिए याचिकाकर्ता को कैसे गिरफ्तार किया जा सकता है. पीठ ने कहा, ‘जब कोई अपमानजनक बयान देता है, तो हम उस पर हंसते हैं. उन्हें सह-साजिशकर्ता नहीं कहा जा सकता.’
पीठ ने राव के खिलाफ एफआईआर रद्द करने की मांग वाली उनकी याचिका पर आंध्र प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है, साथ ही पीठ ने राव को चेतावनी दी कि वे किसी भी अपमानजनक बयान में शामिल न हों और न ही किसी पैनलिस्ट को लाइव टीवी शो में ऐसा बयान देने की अनुमति दें.
पीठ ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता की रक्षा करने की आवश्यकता का भी उल्लेख किया. पीठ ने आदेश पारित किया कि कोम्मिनेनी का बहस में भाग लेने वाले प्रतिभागियों में से एक द्वारा दिए गए बयान से कोई लेना-देना नहीं था.
पीठ ने कहा कि आरोपी को ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाई जाने वाली शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए.
स्थानीय अदालत ने पैनलिस्ट पत्रकार वीवीआर कृष्णम राजू को न्यायिक हिरासत में भेजा
इस बीच, मंगलगिरी अदालत ने गुरुवार को कृष्णम राजू को 26 जून तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया, जिन्हें अमरावती की महिलाओं के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणी के लिए विशाखापत्तनम में पिछली रात पुलिस ने गिरफ्तार किया था.
मामले से परिचित लोगों ने बताया कि अदालत में दाखिल रिमांड रिपोर्ट में पुलिस ने कहा है कि कृष्णम राजू ने अपमानजनक टिप्पणी करने की बात स्वीकार की है, क्योंकि उसके मन में मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और सत्तारूढ़ तेलुगू देशम पार्टी के प्रति घोर अवमानना थी.
पुलिस ने रिपोर्ट में कहा, ‘अमरावती क्षेत्र की महिलाओं का अपमान करने वाले उनके अपमानजनक बयानों पर आक्रोश के बावजूद कृष्णम राजू ने माफ़ी नहीं मांगी है. इसके बजाय, उन्होंने कथित तौर पर एक कदम आगे बढ़कर यूट्यूब पर वीडियो बनाकर और जारी करके अपनी टिप्पणियों का बचाव किया, जिसमें कहा गया कि उन्होंने जो कहा उसमें कुछ भी गलत नहीं था.’
उन्होंने अदालत को बताया कि कृष्णम राजू को पूरी जानकारी थी कि अमरावती में विभिन्न समुदायों, जातियों और धर्मों के लोग रहते हैं, इसलिए उन्होंने जानबूझकर इस तरह के भड़काऊ बयान दिए.
उन्होंने आरोप लगाया कि उनका इरादा क्षेत्र की सभी महिलाओं – खासकर दलित और आदिवासी महिलाओं – को नीचा दिखाना और अपमानित करना था, जिससे उनकी गरिमा और आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचे.
