24 मई को अलीगढ़ में भीड़ द्वारा अधमरा कर दिए गए चार लोगों से मिलने के लिए कारवां-ए-मोहब्बत की टीम गई. इस दर्दनाक यात्रा से लौटते हुए मेरे दिल में बस इतना संतोष है कि वे जीवित हैं. बुरी तरह से घायल, सदमे में, भयभीत. लेकिन जीवित.
इस घटना के परिणाम को अलग कर दें, तो उनकी कहानी वैसी ही है जैसी मैंने कारवां-ए-मोहब्बत की कम-से-कम सौ यात्राओं के दौरान लोगों के घरों में सुनी हैं. लिंचिंग की जो कहानी बार-बार दोहराई जाती है, उसमें यही होता है कि युवक डरे हुए निहत्थे लोगों पर हिंसक हमला करते हैं. देश का नेतृत्व करने वालों द्वारा फैलाई गई गहरी नफ़रत से प्रेरित उनकी क्रूरता की कहानी. सनकी लोगों द्वारा जबरन वसूली की कहानी. पुलिस बल के मिलीभगत की कहानी. चुपचाप खड़े तमाशबीन की कहानी.
जिन चार लोगों को अधमरा किया गया- अक़ील, अरबाज़, अक़ील और नदीम- इन सभी की उम्र 30 से 40 के बीच होगी. वे कुरैशी समुदाय से थे, भारतीय मुसलमानों की एक जाति, सदियों से जिसका पारंपरिक पेशा मांस के लिए जानवरों को काटना रहा है. गायों की हत्या पर बेशक क़ानूनन प्रतिबंध है, लेकिन उत्तर प्रदेश में भैंस का मांस वैध है.
भाजपा के सत्ता में आने से पहले क़साइयों को बूचड़ख़ानों में भैंसों को काटने का लाइसेंस दिया जाता था
आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के सत्ता में आने से पहले, क़साइयों को उनके बूचड़ख़ानों में भैंसों को काटने का लाइसेंस दिया जाता था. यह एक ईमानदार व्यापार था जिसमें कोई ख़तरा नहीं था. लेकिन आदित्यनाथ सरकार ने इसे अचानक रोक दिया, छोटे बूचड़ख़ानों को लाइसेंस देने से इनकार कर दिया, जहाँ कई पीढ़ियों से जानवरों को वैधानिक रूप से काटा जा रहा था. इस फ़ैसले ने मांस के कारोबार से जुड़े हज़ारों परिवारों की ज़िंदगी को तबाह कर दिया. अक़ील, अरबाज़ और नदीम का परिवार उनमें से एक था.
इस सरकार ने ज़्यादातर बड़ी बीफ़ फ़ैक्ट्रियों को भैंसों को काटने का लाइसेंस दिया है. 2014 में केंद्र सरकार में सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार पर कृषि और दूध उत्पादन के विस्तार के लिए चलाई जाने वाली हरित और श्वेत क्रांति को स्थगित करने और इसकी जगह ‘गुलाबी क्रांति‘ का समर्थन करने या मांस के लिए जानवरों के काटे जाने को प्रोत्साहित करने का आरोप लगाया.
विडंबना यह है कि गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले क़ानूनों को सख़्त बनाने और गोरक्षकों की बढ़ती संख्या के बावजूद, मोदी के नेतृत्व में 11 साल के दौरान भारत से गोमांस का निर्यात लगातार बढ़ा है. भारत की कई सबसे बड़ी गोमांस निर्यात करने वाली कंपनियों के मालिक हिंदू हैं और कुछ तो जैन भी हैं. इस व्यापार को लेकर होने वाली नफ़रत भरी बहस के बावजूद इस व्यापार पर किसी भी तरह से मुसलमानों का एकाधिकार नहीं है. और भी अधिक विडंबना यह है कि जब चुनावी बॉन्ड के ज़रिए भाजपा को चंदा देने वालों के नाम सामने आए, तो कई गोमांस निर्यात करने वाली कंपनियों के नाम भी इस सूची में शामिल थे.
अक़ील, अरबाज़ और नदीम के परिवार के बूचड़ख़ाने का लाइसेंस रद्द होने से उनके लिए जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया. क़साई का काम ही एकमात्र पेशा था जिसे वे जानते थे. लेकिन सौभाग्य से, उनके पास अभी भी मांस बेचने का लाइसेंस था. परिवार के पास अलीगढ़ में सात मीट की दुकानें हैं. वे अलीगढ़ से लगभग 40 किलोमीटर दूर अतरौली स्थित एक बीफ़ फ़ैक्ट्री से वैध भैंस का मांस ख़रीदते थे. हर बार वे फ़ैक्ट्री से लगभग 900 किलोग्राम भैंस का मांस ख़रीदते, इसे एक पिक-अप वैन में भरते और चेकपॉइंट से होते हुए अलीगढ़ के हाईवे तक ले जाते.
उन्होंने हमें बताया कि इस काम में बहुत कम मार्जिन है. वे 230 रुपये प्रति किलो के हिसाब से मांस ख़रीदते और उसे 260 रुपये में बेचते. खुदरा मीट बेचने की सात दुकानों से इतनी आमदनी हो जाती थी कि उनके संयुक्त परिवार का ख़र्चा चल जाता था. मज़दूर परिवार से आने वाले 35 वर्षीय ड्राइवर अक़ील के लिए आजीविका के विकल्प और भी कम हैं. वह एक पिक-अप वैन किराए पर लेता है और कई तरह का सामान ढोता है. समय-समय पर पिक-अप में मांस भी ढोता है जो अपने में जोखिम भरा काम है.
‘बजरंग दल के साथ संबंध का दावा करने वाले पुलिस, प्रशासन तथा भाजपा के करीबी’
हिंसक ‘गौरक्षक‘ समूहों के प्रसार की वजह से – जो बजरंग दल के साथ संबंध का दावा करते हैं, और पुलिस, स्थानीय प्रशासन तथा सत्तारूढ़ भाजपा के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हैं – अतरौली से अलीगढ़ तक की 40 किलोमीटर की यात्रा हमेशा जोखिम भरी होती थी. हालांकि, इससे बचने का कोई रास्ता नहीं था.
उग्रवादी समूह अक्सर मांस ट्रांसपोर्टरों से पैसे वसूलते थे. जिन लोगों की हत्या करने की कोशिश की गई, उन्होंने बताया कि कुछ महीने पहले बजरंग दल के लोगों ने उन्हें घेर लिया था और उनसे वसूली के पैसे मांगे थे. जब उन्होंने मना कर दिया, तो बजरंग दल के सदस्य उन्हें पुलिस स्टेशन ले गए. वहां पुलिस ने कथित तौर पर 2.9 लाख रुपये का सौदा किया और इसका एक हिस्सा अपने पास रख लिया. मेरे पास इस दावे की पुष्टि करने का कोई तरीक़ा नहीं है.
24 मई की सुबह, मीट के कारोबार से जुड़े तीन लोग और ड्राइवर सुबह 8 बजे अतरौली स्थित बीफ़ फ़ैक्ट्री से 900 किलोग्राम भैंस के मांस के साथ निकले. जब हम बुरी तरह से घायल लोगों से अस्पताल में मिले तो उन्होंने बार-बार कहा, हम सिर्फ़ एक नंबर का काम करते हैं. उनके पास मांस ख़रीदारी का बिल और पशु चिकित्सक का लाइसेंस भी था जिससे साफ़ ज़ाहिर था कि मांस भैंस का मांस था. राजमार्ग पर लगभग चार किलोमीटर आगे, चार मोटरसाइकिलों पर सवार आठ लोगों ने उनका रास्ता रोक लिया और पिकअप वैन सड़क के किनारे खड़ी करने के लिए मजबूर किया.
उन्होंने मुझे बताया, ‘हमेशा की तरह ये बजरंग दल के लोग थे.’
मैंने पूछा कि उन्हें कैसे यक़ीन हुआ कि वे बजरंग दल से हैं. उन्होंने कहा कि उनके गले में जो भगवा गमछा था, वही उनकी पहचान है. यह वर्दी का काम करता है.
मीट ट्रांसपोर्टरों ने युवकों को अपने सभी काग़ज़ात दिखाए, दलीलें दीं कि मांस वध की गई गाय का नहीं है, और सब कुछ क़ानून के अनुसार ही किया गया है. जिन लोगों ने उनका रास्ता रोका था, वे उन्हें अपमानित करने लगे और काग़ज़ फाड़ दिया. पिकअप में सवार लोगों ने जाने देने को कहा, लेकिन उन्हें रोकने वालों ने कहा कि दूसरे ‘भाई लोग’ रास्ते में हैं. कुछ ही देर में, लगभग एक दर्जन से अधिक मोटरसाइकिलें मौक़े पर आ गईं, युवकों की भीड़ अचानक से बढ़ गई.
उन्होंने चारों लोगों को वैन से खींच लिया, उनके मोबाइल फ़ोन और पैसे छीन लिए, कई लोगों के अंडरवियर तक उतार दिए और लोहे तथा लकड़ी की छड़ों, ईंटों और पत्थरों से उन्हें बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया.
बेरहमी से पिटाई, दर्द से कराहते हुए लोगों की चीखें
कुछ मिनट बाद, एक पुलिस जिप्सी जीप आई. भीड़ द्वारा घिरे हुए लोग हताश होकर जिप्सी की ओर भागे और पुलिसवालों से बचाने की भीख मांगने लगे. पुलिसवालों ने कथित तौर पर सांप्रदायिक गालियां देते हुए उनकी विनती को बेरहमी से अस्वीकार कर दिया. उसके बाद भीड़ ने खुलेआम उत्पात मचाना शुरू कर दिया. पीटने वालों और तमाशबीनों दोनों की भीड़ लगातार आक्रामक होती गई. कुछ तमाशबीनों ने वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया, जो व्यापक रूप से प्रसारित हो रहे हैं. बिना परेशान हुए इन वीडियो को देखना मुश्किल है.
लगातार बेरहमी से पिटाई, दर्द से कराहते हुए लोगों की चीखें, ख़ून से लथपथ उनके शरीर, दया की भीख मांगते हुए. कुछ लोगों ने तो अपने शिकार के पैरों पर मोटरसाइकिल भी चढ़ा दी. आप कुछ वीडियो में पुलिस को देख सकते हैं, जो हत्यारी भीड़ को रोकने के लिए कुछ नहीं कर रही है. यह भी चौंकाने वाली बात है कि भीड़ में से कोई भी पीड़ितों की मदद करने के लिए आगे नहीं आया. भीड़ ने मांस से भरी पिकअप वैन को आग लगा दी. जब बचे हुए लोगों ने बाद में अपने वित्तीय नुक़सान का आकलन किया, तो पता चला कि पिकअप वैन की क़ीमत 13 लाख रुपये और मांस की क़ीमत 2 लाख रुपये थी.
लोग बेहोश होने लगे. अगर मामला उसी तरह चलता जैसा कि मैंने देश भर में गायों की हत्या के कई मामलों में देखा है, तो अगला क़दम उन्हें ख़ून से लथपथ करके मार डालना होता. एक व्यक्ति के हस्तक्षेप की वजह से ऐसा नहीं हुआ. एक विवेकशील पुलिस अधिकारी की जजह से. हां, अभी भी ऐसे लोग हैं.
सबसे ख़राब शासन में भी अच्छे अधिकारी हैं
मैंने सरकारी व्यवस्था में इतने लंबे समय तक काम किया है कि मैं इस बात की पुष्टि कर सकता हूं कि सबसे ख़राब शासन में भी अच्छे अधिकारी होते हैं. मैं इस पुलिस अधिकारी का नाम नहीं लूंगा, क्योंकि हम ऐसे विकृत युग में जी रहे हैं कि मुझे नहीं पता कि उसे नायक के रूप में पुरस्कृत किया जाएगा या दंडित किया जाएगा.
वे पहुंचे, भीड़ को तितर-बितर किया, चारों लोगों को बचाया और उन्हें नज़दीकी ज़िला अस्पताल ले गए, और वहां से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले गए. यह हमारे समय पर एक गंभीर टिप्पणी है कि जिस काम को करना किसी अधिकारी की सामान्य ड्यूटी होनी चाहिए उसे इतना अधिक महत्वपूर्ण समझा जाने लगा है, उसे वीरता के दुर्लभ कार्यों के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है. जिन घायल लोगों से हम मिले, उनके परिवारों ने कहा कि अगर पुलिस अधिकारी ने समय पर हस्तक्षेप नहीं किया होता तो उनके लोग बच नहीं पाते. वे उसे आशीर्वाद देते हैं और मानते हैं कि अल्लाह ने उस अधिकारी को भेजा था.
ड्राइवर अक़ील के भाई राशिद याद करते हुए हमें बताते हैं, ‘जब उनकी पत्नी ने उन्हें पहली बार देखा तो वे बेहोश थे. उसने हमें फ़ोन करके बताया कि वे मर चुके हैं. जब हमने उन्हें देखा, तो उनके शरीर का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं था जो घायल न हो. यहां तक कि उनकी आंखों के आसपास भी काफ़ी चोटें थीं. यह अल्लाह की मेहरबानी है कि वे जीवित हैं. उनके सिर पर बहुत सारे टांके लगे थे. उन्होंने स्टील की छड़ों से उनके सिर, पैरों और पीठ पर वार किया था. उन्होंने उन्हें ईंटों और पत्थरों से भी पीटा था.
जिला अस्पताल में उनका अनुभव निराशाजनक था. अस्पताल न केवल इस तरह की आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार नहीं था. उन्होंने एक डॉक्टर के बारे में बताया जिसने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और कहा कि चूंकि वे कट्टर गौ-हत्यारे हैं, इसलिए वे इससे भी बदतर सज़ा के हक़दार हैं.
विश्वविद्यालय मेडिकल कॉलेज बेहतर था. उन्होंने कहा कि कर्मचारी मेहनती और देखभाल करने वाले थे. लेकिन वे दबाव में लग रहे थे, क्योंकि वे उन्हें डिसचार्ज करने की कोशिश कर रहे थे, जबकि उनके अनगिनत घाव अभी भी ठीक नहीं हुए थे. शायद अधिकारी नहीं चाहते थे कि विभिन्न विपक्षी दलों के राजनीतिक नेता उनसे मिलने अस्पताल आएं क्योंकि वे घायल लोगों से मिलने के लिए लाइन में खड़े थे.
नेताओं के सार्वजनिक बयान सत्तारूढ़ दल की राजनीति का पर्दाफ़ाश करने वाले थे
इन नेताओं के सार्वजनिक बयान सत्तारूढ़ दल की राजनीति का पर्दाफ़ाश करते थे. उदाहरण के लिए, समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन ने घोषणा की, ‘इन लोगों (हमलावरों) का गौ कल्याण से कोई लेना-देना नहीं है. कई बीफ़ कंपनियों ने चुनावी बॉन्ड योजना के तहत भाजपा को भारी मात्रा में चंदा दिया था. कई बीफ़ फ़ैक्ट्री के मालिक हिंदू हैं. यह सब समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करने और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है.‘
सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा: ‘क़ानून-व्यवस्था का मज़ाक़ उड़ाया गया और उन्हें पीटा गया. यह दुखद था और जिस तरह से एसएचओ ने उन लोगों की जान बचाई. अगर वह वहां नहीं होते, तो वे बच नहीं पाते. लेकिन, जिस तरह से उन्हें पीटा गया और जिस तरह से गुंडों की तरह व्यवहार किया गया. क्या इस तरह से क़ानून का राज स्थापित होगा, कि लोगों को सड़क पर पीटा जाए और लूटा जाए?’
चारों में से ड्राइवर अक़ील सबसे ज़्यादा घायल था और जब मैं लिख रहा हूं, तब भी वह ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहा है. उसे जल्दी डिसचार्ज किया जाना सबसे दुर्भाग्यपूर्ण था. उसके परिवार ने उसे तुरंत एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां जब हम गए तो वह आईसीयू में था. उसके लिए चिंतित लोग अस्पताल के बिल का भुगतान कर रहे हैं. बाक़ी तीन लोग मेडिकल कॉलेज के जनरल वार्ड में थे. उनके शरीर पर अभी भी क्रूर लिंचिंग के निशान थे. उनके सिर पर दर्जनों टांके लगे थे, कई हड्डियाँ टूटी हुई थीं, उनके शरीर से मांस अभी भी उधड़ा हुआ था.
जब हमने उनसे बात की, उस दौरान घायल लोग शांत थे. जिस शांति को मैं दर्ज कर पा रहा था. उनका दर्द अभी भी गहरा था, उनका ग़ुस्सा शांत था. उन्होंने दोहराया, वे न्याय चाहते थे, बदला नहीं. लेकिन पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ गोहत्या का अपराध दर्ज किया था (सौभाग्य से जब प्रयोगशाला ने प्रमाणित किया कि मांस भैंस का था, तो उसे वापस लेना पड़ा). पुलिस लिंचिंग का अपराध दर्ज करने के लिए तैयार नहीं थी, और गिरफ़्तारियां भी धीमी थी.
लेकिन पीड़ित बचे लोगों की सबसे बड़ी दुविधा यह थी कि वे अपने घाव ठीक होने के बाद अपने परिवार का पेट कैसे भरेंगे. उन्हें अपने जीवन पर मंडरा रहे स्पष्ट ख़तरों के बावजूद उसी काम पर वापस लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिख रहा था. उन्हें कोई और काम नहीं सूझ रहा था.
‘न हिंदू बुरे हैं, न मुसलमान’
अलीगढ़ यात्रा के कुछ दिनों बाद, मैं ड्राइवर अक़ील के बड़े भाई राशिद की बातों से उत्साहित हूं. संयोग से वे साइकिल पंचर बनाने का काम करते हैं. पंचर बनाने का काम कमज़ोर मुसलमान के लिए रूढ़ बना दिया गया है जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में प्रचारित किया. लेकिन राशिद ने समझदारी, दुख और शालीनता के साथ बात की.
उन्होंने सबसे पहले कहा, ‘यह अल्लाह की मेहरबानी है और इतने सारे अच्छे लोगों की मदद है जिसकी वजह से हमारा अक़ील ज़िंदा है. अगर लोगों ने इतनी जल्दी प्रतिक्रिया नहीं की होती, तो हमारा लड़का मर जाता, पुलिस दावा करती कि मांस गाय का मांस था, दूसरे लोगों को जेल में डाल दिया जाता और बुलडोज़र हमारे घरों को गिरा देते.’
उन्होंने आगे कहा, ‘हम आपको यह नहीं बता सकते कि हमारे लड़कों पर हमला करने वाले कौन थे. लेकिन यह तो साफ़ है कि उन्हें कुछ ताक़तवर लोगों का समर्थन प्राप्त है. न हिंदू बुरे हैं, न मुसलमान बुरे हैं. ये बजरंग दल वाले ही गुंडे हैं. बजरंग दल पर प्रतिबंध लगना चाहिए. अगर हममें से कोई ग़लत करता है, तो सरकार, संविधान, क़ानून को कार्रवाई करनी चाहिए.
अगर संविधान और क़ानून कहता है कि गाय को मारना ग़लत है, तो यह ग़लत है. ग़लत करने वालों को सज़ा मिलनी चाहिए. अदालतें उन्हें फांसी पर भी चढ़ा दें. कल्पना करें कि अगर वैन में गाय का मांस होता. तब भी बजरंग दल के गुंडों को उन्हें पीटने का कोई अधिकार नहीं था. उन्हें बस पुलिस को सौंप देना चाहिए था ताकि वह ग़लत करने वालों को सज़ा दे सके. इन बजरंग दल वालों को क़ानून अपने हाथ में लेने का क्या अधिकार है? अगर वे इस तरह से काम करेंगे, तो क्या हम संविधान की धज्जियां नहीं उड़ा रहे हैं?’
उन्हें अपने समुदाय के साथ हो रहे अन्याय का अहसास है. ‘बड़ी फ़ैक्ट्री मालिकों को भैंसों को काटने का अधिकार है, लेकिन हमें नहीं. कोई बात नहीं. यह भी सब्र कर लेंगे. लेकिन हम सरकार से लिंचिंग के लिए न्याय की मांग करते हैं.
सोचिए अगर हमने लिंचिंग की होती तो क्या होता? हमें और हमारे परिवारों को सताया जाता, बुलडोज़र से हमारे घर गिरा दिए जाते. वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि हमारे लड़कों पर हमला करने वाले कौन थे. उन्हें गिरफ़्तार करके सज़ा मिलनी चाहिए. पुलिस हमलावरों के साथ इतनी नरमी क्यों कर रही है?’
उन्होंने अपने देश के प्रति अपने प्यार की पुष्टि की. ‘मैं भारत में पैदा हुआ. यह भारत हम सबका है, हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई, सबका. लेकिन अब हर बच्चे के दिल में नफ़रत घर कर गई है. किसी भी धर्म के व्यक्ति को दूसरों को नुक़सान पहुंचाने की आज़ादी नहीं होनी चाहिए. और मीडिया को सच बताना चाहिए.‘
‘मोदी साहब और योगी साहब से मेरी यही अपील है. हमारा भारत भाईचारे और प्यार का था. वह प्यार कहां ग़ायब हो गया? मुझे अपना भारत वापस चाहिए, वो भारत जो 2014 से पहले था. उसे वापस लाओ.‘
(मैं ज़ायद मंसूर ख़ान, सुमित गुप्ता और इमाद उल हसन के सहयोग के लिए उनका आभारी हूं)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’नामक संस्था से जुड़े हैं.)
