नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने एक नया आदेश जारी किया है जिसमें कहा गया है कि राज्य के मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में कक्षा 1-5 तक के छात्रों को हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाया जाएगा.
डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, नए आदेश में कहा गया है कि हिंदी ‘अनिवार्य’ होने के बजाय ‘सामान्य रूप से’ तीसरी भाषा होगी. इसमें कहा गया है कि अगर स्कूल में प्रति कक्षा 20 छात्र हिंदी के अलावा कोई अन्य भारतीय भाषा पढ़ने की इच्छा व्यक्त करते हैं तो छात्रों के पास विकल्प होगा कि वे इसे छोड़ सकते हैं.
आदेश में कहा गया है कि सभी माध्यमिक विद्यालयों में मराठी अनिवार्य भाषा होगी. निर्देश में यह भी कहा गया है कि अन्य शिक्षण माध्यमों वाले स्कूलों में त्रि-भाषा फार्मूले में माध्यम भाषा, मराठी और अंग्रेजी को शामिल किया जाना चाहिए.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, हालांकि, राज्य स्कूल शिक्षा विभाग ने हिंदी के अलावा किसी अन्य तीसरी भाषा के लिए शिक्षक उपलब्ध कराने की अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया. भले ही 20 छात्र फ्रेंच या स्पेनिश जैसी किसी दूसरी भाषा को सीखने में गहरी दिलचस्पी दिखाते हों, लेकिन राज्य सरकार के लिए स्कूल को उस विशेष भाषा का शिक्षक उपलब्ध कराना अनिवार्य नहीं है.
इस प्रकार, हिंदी के अलावा अन्य तीसरी भाषाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पढ़ाया जाएगा.
सरकार के इस कदम की आलोचना
जहां कुछ मराठी भाषा समर्थकों ने सरकार पर शुरू में पीछे हटने के बाद ‘पिछले दरवाजे’ से नीति को पुनः लागू करने का आरोप लगाया, वहीं विपक्ष ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर मराठी लोगों की छाती में ‘छुरा घोंपने’ का आरोप लगाया.
महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा, ‘आरएसएस और भाजपा का ‘एक राष्ट्र, एक भाषा, एक संस्कृति’ का यह एजेंडा महाराष्ट्र के मूल में पहुंच गया है और जब तक इसे खारिज नहीं किया जाता, हम चुप नहीं बैठेंगे.’
सपकाल ने इस कदम को भाजपा का ‘महाराष्ट्र विरोधी एजेंडा’ और मराठी भाषा, मराठी पहचान और मराठी लोगों को खत्म करने की साजिश करार दिया.
सपकाल ने कहा, ‘इससे यह स्पष्ट होता है कि फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, अजीत पवार की वफ़ादारी महाराष्ट्र या मराठी लोगों के प्रति नहीं, बल्कि दिल्ली के लोगों के प्रति है. शिंदे समूह, जो बार-बार बालासाहेब ठाकरे का नाम लेता है, के पास शिक्षा मंत्रालय है और उसने मराठी को मारने की पहल उसी तरह की है जैसे उन्होंने शिवसेना की पीठ में छुरा घोंपा था. अजीत पवार सत्ता के लिए इतने बेताब हैं कि उन्हें महाराष्ट्र, मराठी भाषा या मराठी लोगों के जीने या मरने से कोई लेना-देना नहीं है. अजीत पवार की नीति केवल वित्त विभाग हासिल करने की है.’
राज ठाकरे ने शिक्षकों को लिखा खुला पत्र
इस बीच महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने भी सरकार पर हमला बोला और महाराष्ट्र के सभी स्कूलों के प्रधानाचार्यों को एक खुला पत्र लिखा.
ठाकरे ने पत्र में कहा, ‘हम आपके साथ इस मुद्दे को उठा रहे हैं, हमने सरकार को भी इसी तरह का एक पत्र भेजा है. हमने सरकार से दृढ़ता से कहा है कि हमें एक लिखित पत्र चाहिए जिसमें कहा गया हो कि हिंदी भाषा या सामान्य रूप से कोई भी तीसरी भाषा नहीं पढ़ाई जाएगी. वे ऐसा पत्र जारी कर सकते हैं या नहीं भी कर सकते हैं, लेकिन अगर आपकी हरकतें सरकार के छिपे हुए एजेंडे का समर्थन करती हैं, तो हम निश्चित रूप से इसे महाराष्ट्र के साथ विश्वासघात मानेंगे… ध्यान रखें कि भाषाओं को थोपने को लेकर महाराष्ट्र में असंतोष बढ़ रहा है! समझदारों के लिए एक शब्द! मैं और क्या कह सकता हूं?’
न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, मराठी भाषा को संरक्षित करने के लिए काम कर रहे मुंबई स्थित मराठी भाषा अभ्यास केंद्र के दीपक पवार ने दावा किया, ‘यह कुछ और नहीं बल्कि हिंदी को पिछले दरवाजे से थोपना है.’
उन्होंने सोशल मीडिया पर लोगों से विरोध करने का आग्रह करते हुए एक पोस्ट में आरोप लगाया, ‘सरकार ने मराठी लोगों के साथ विश्वासघात किया है. अगर हम अब चुप रहे, तो यह संघीय ढांचे और संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन की विरासत को खत्म करने का मार्ग प्रशस्त करेगा.’
घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि नए आदेश से हिंदी सीखने की ‘अनिवार्यता’ हटा दी गई है और अब किसी भी भारतीय भाषा को तीसरी भाषा के रूप में चुना जा सकता है.
फडणवीस ने संवाददाताओं से कहा, ‘जबकि अंग्रेजी को व्यापक रूप से बढ़ावा दिया जाता है, भारतीय भाषाओं को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है. मैंने उनसे (ठाकरे) चर्चा की…वह दो भाषाएं चाहते थे, हालांकि, एनईपी के अनुसार, तीन भाषाएं हैं और हमें इसे स्वीकार करना होगा…इसमें क्या बुराई है…स्पष्ट करने के लिए हमने हिंदी को अनिवार्य बनाने की आवश्यकता को हटा दिया है और छात्रों को किसी भी भारतीय भाषा को चुनने की अनुमति दी है.’
गौरतलब है कि इस वर्ष अप्रैल में मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में कक्षा 1-5 तक हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य बनाने के अपने निर्णय पर भारी आलोचना के बाद महाराष्ट्र सरकार ने अपना कदम वापस ले लिया था.
