ईरान पर इज़रायली हमले और ट्रंप की धमकी से बेनकाब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का असली चेहरा

इज़रायल ईरान पर यह कहकर हमला करता है कि उसके वजूद के लिए वह ख़तरा है. एक मुल्क जिसके पास परमाणु बम हैं, एक पड़ोसी मुल्क पर हमला करता है यह कहकर कि वह परमाणु बम बनाने के क़रीब है.

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बाएं से- आयतुल्लाह अली ख़ामनेई, डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

पूरी दुनिया की जनता एक अविश्वसनीय दृश्य देख रही है. या असली सच अब बिलकुल अनावृत हो कर सामने आ गया है. वह यह कि दुनिया में राजनय जैसी कोई चीज़ नहीं. जो है वह गुंडागर्दी या शस्त्रबल है. अंतरराष्ट्रीय नियम, क़ानून, क़ायदों का कौड़ी भर मोल नहीं है. अगर कुछ बलवान गुंडे, जिन्हें राष्ट्र के नाम से गौरवान्वित किया जाता है, साथ आ जाएं तो वे किसी को भी घेरकर मार डाल सकते हैं.

यह भी एक नाक़ाबिले यक़ीन मंजर है कि दुनिया के सबसे ताकतवर माने जाने वाले मुल्क अमेरिका के प्रमुख को इज़रायल ने नकेल डाल रखी है और अपनी मर्ज़ी से वह उसे नचा रहा है. जैसा बहुत पहले से कई अमरीकी विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय नीति अमेरिका नहीं, इज़रायल तय करता है.

इज़रायल ने ईरान पर यकायक हमला बोल दिया है. सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमला करने के साथ उसने ईरान के फ़ौज के अगुवा लोगों को निशाना बनाकर मार डाला है.

इज़रायल ने फ़ौज और सरकार में ख़ामनेई के सारे करीबी लोगों की निशाना लगाकर हत्या कर दी है. अब वह धमकी दे रहा है कि वह ईरान के प्रमुख ख़ामनेई को भी निशाना बना सकता है. वह ईरान में सत्ता पलट की बात कर रहा है. नेतन्याहू ईरान की जनता का आह्वान कर रहा है कि वह अपनी सरकार को बेदख़ल कर दे. और ख़ुद को उसके उद्धारक के तौर पर पेश कर रहा है. यानी जो तबाही वह ईरान में मचा रहा है, उसके मुताबिक़ वह ईरान की भलाई के लिए है.

वह यह सोच भी पा रहा है कि उसकी बमबारी से मारी जा रही और तबाह हो रही ईरानी जनता उसका अपने उद्धारक के रूप के स्वागत भी करेगी.

अमेरिका अब तक अपने पट्ठे इज़रायल के साथ सीधे मैदान में नहीं दिख रहा. नेतन्याहू पहले दिन से ही अपने सरपरस्त को कह रहा है कि उसे मैदान में उतरना ही पड़ेगा. अमेरिका के राष्ट्रपति को उकसाने के लिए वह खुलेआम कह रहा है कि ईरान ट्रंप का क़त्ल कर सकता है. नेतन्याहू टीवी पर कह रहा है कि ट्रंप ईरान का पहला निशाना हैं. इसका मतलब यह है कि अगर ट्रंप को ख़ुद को बचाना है तो उसे ईरान पर इज़रायली हमले में शामिल हो जाना चाहिए .ऐसा इसलिए कि वह अकेले ईरान को हरा नहीं सकता.

इज़रायल यूरोप और अमेरिका को समझा रहा है कि वह दरअसल उन्हें बचाने के लिए ईरान पर हमला कर रहा है. और वे उसे सुन रहे हैं.

इज़रायल में अमेरिका का राजदूत ट्रंप को एक लिजलिजा ख़त भेजता है. वह लिखता हैं कि ट्रंप को उसे खुदा ने कुछ ऐसे काम को अंजाम देने को भेजा है जो और कोई राष्ट्रपति नहीं कर सकता. वह कहता है कि 1945 के ट्रूमैन के बाद वह दूसरा राष्ट्रपति है जिसे ईश्वर ने अपना काम करने के लिए चुना है. सबको याद है कि 1945 में ट्रूमैन ने क्या किया था. वह था हिरोशिमा और नागासाकी पर अणुबम गिराना. राजदूत राष्ट्रपति को उकसा रहा है कि वह ईरान के साथ भी ट्रूमैन जैसा कुछ करे. और राष्ट्रपति इस ख़त को सार्वजनिक भी करता है.

जब इज़रायल बिना किसी उकसावे के ईरान पर बमबारी कर रहा हो और पूरे इलाक़े में तबाही का मंजर हो, अमेरिका का राष्ट्रपति मज़े लेते हुए कह रहा है, कोई नहीं जानता मेरे मन में क्या है.

ट्रंप एक हफ़्ता पहले जो कह रहा था, अब ठीक उसके उलट कह रहा है. हफ़्ता नहीं गुजरा, ट्रंप ने बतलाया था कि ईरान से वार्ता बहुत अच्छी ढंग से चल रही है. ईरान की तरफ़ से जो अमेरिका से वार्ता कर रहे थे, उन ईरानी अधिकारी को इज़रायल ने मार डाला और अमेरिका का राष्ट्रपति ताली बजा रहा है. कह रहा है: वह मारा गया.

एक संप्रभु राष्ट्र को अमेरिका धमकी दे रहा है कि उसके राष्ट्र प्रमुख की वह हत्या कर सकता है लेकिन अभी नहीं करेगा. ईरान हथियार डाल दे, वरना…!

इज़रायल ईरान पर यह कहकर हमला करता है कि उसके वजूद के लिए वह ख़तरा है. एक मुल्क जिसके पास परमाणु बम हैं, एक पड़ोसी मुल्क पर हमला करता है कि वह परमाणु बम बनाने के क़रीब है.

और दुनिया के वे सारे मुल्क, जो ख़ुद को सभ्यता का रक्षक कहते हैं, इज़रायल की तरफ़ से ईरान पर ज़ुबानी हमला करने लगते हैं. फ़्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड सब चीखने लगते हैं कि ईरान ख़तरा है. जिसके पास परमाणु बम है, वह ख़ुद को असुरक्षित बतला कर पड़ोसी पर हमला कर रहा है. अगर परमाणु बम भी किसी को नहीं बचा सकता, तो उसके होने का फ़ायदा क्या है?

दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क कनाडा में इकट्ठा होते हैं. लेकिन यह जी7 मसखरेबाज़ों का अड्डा अधिक जान पड़ता है. ये मसखरेबाज़ हैं लेकिन ख़तरनाक हैं क्योंकि पूरी दुनिया की ताक़त इनके पास है.

अमेरिका का राष्ट्रपति यह अड्डेबाज़ी बीच में छोड़ उठ जाता है यह कहकर कि वह कुछ बहुत बड़ा करने के लिए वाशिंगटन लौट रहा है.

सारे लोग क़यास लगा रहे हैं, वह बड़ा क्या होगा! ‘मेरे मन में क्या है, कोई नहीं बता सकता’, वह सबको चिढ़ाता है.

पत्रकार पूछते हैं, अभी 3 महीना पहले अमेरिका की ख़ुफ़िया विभाग की प्रमुख तुलसी गबर्ड ने बयान दिया था कि ईरान के पास बम बनाने की क्षमता नहीं है. फिर अभी अमेरिका उससे कैसे पलट सकता है. और राष्ट्रपति यह कहता है कि उसे रत्ती भर परवाह नहीं कि वह क्या बोली थी. उसके मन में अभी जो आएगा, वह करेगा. अमेरिका में लोग चीख रहे हैं कि युद्ध का फ़ैसला सिर्फ़ कांग्रेस या सीनेट कर सकती है लेकिन राष्ट्रपति के पास इन नियम क़ायदों के लिए वक्त नहीं है.

आप कनाडा के उस दृश्य को दुबारा देखिए: फ़्रांस, इंग्लैंड, इटली, कनाडा, जापान, कनाडा, अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के प्रमुखों को देखिए. उनकी आपसी चुहलबाजी देखिए. ये सब अपने व्यापारिक स्वार्थों की रक्षा के लिए इकट्ठा हैं. और चाहते हैं कि दुनिया माने कि वे इंसानियत की भलाई के उपाय सोच रहे हैं.

भविष्य में कोई जब इन तस्वीरों को देखेगा तो क्या अनुमान कर पाएगा कि यह उस वक्त का मंजर है जब इन मुल्कों का एक पिट्ठू दुनिया के एक हिस्से में तबाही मचा रहा था? जब ग़ज़ा में रोज़ाना वह पिट्ठू सैकड़ों फ़िलस्तीनियों का क़त्ल कर रहा था?

दुनिया के ये 6 पश्चिमी देश पूरी दुनिया के भाग्य का निबटारा करने का दावा करते हैं. बाक़ी देश उनके साथ दावत के न्योते का इंतज़ार करते हैं, उनके साथ फोटो खिंचाने को धक्का मुक्की करते हैं. सबको वापस अपने मुल्कों में अपने मतदाताओं को फोटो दिखानी है!

दुनिया में नेतृत्व की कमी है, हम अफ़सोस करते हैं. लेकिन हमें शायद ट्रंप का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने यह बतला दिया है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसी कोई चीज़ नहीं. यह पृथ्वी के संसाधनों की सामूहिक लूट के लिए बाहुबलियों के आपसी समझौते का दूसरा नाम है. एक तरह से 20वीं सदी का पूर्वार्द्ध बीता नहीं है. जैसे तब ये मुल्क आपस में मध्यपूर्व का बांट बखरा कर रहे थे, आज फिर कर रहे हैं. उपनिवेशवाद जारी है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)