श्रीनगर: अधिकारियों ने एक लकड़ी का काम करने वाले बढ़ई (कारपेंटर) को हिरासत में लिया है, जो पुलिस रिकॉर्ड में आतंकवादियों के ओवरग्राउंड वर्कर (ओजीडब्लू) के रूप में सूचीबद्ध है. इस व्यक्ति को पहलगाम के पास एक फेस रिकग्निशन प्रणाली (facial recognition system) द्वारा चिह्नित किया गया था, जहां इस साल अप्रैल में एक आतंकवादी हमले में 26 नागरिक, ज्यादातर पर्यटक मारे गए थे.
मालूम हो कि यह पहली बार है जब जम्मू-कश्मीर पुलिस ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि वह इस विवादास्पद तकनीक का उपयोग कर रही है, जिसके बारे में लंबे समय से अफवाह है कि इससे सुरक्षा एजेंसियों को काउंटर-इंटेलिजेंस ऑपरेशनों के लिए कश्मीरी आतंकवादियों और उनके संदिग्ध समर्थकों की प्रोफाइलिंग करने में मदद मिली है.
जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी ने गुरुवार (20 जून) को बताया कि दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग जिले के सीर हमदान गांव के रहने वाले एक संदिग्ध को अमरनाथ यात्रा शुरू होने से पहले पहलगाम में नुनवान बेस कैंप के पास लंगनबल सुरक्षा चौकी पर फेस रिकग्निशन प्रणाली द्वारा चिह्नित किए जाने के बाद पकड़ा गया.
अमरनाथ यात्रा
नुनवान बेस कैंप सालाना होने वाली अमरनाथ यात्रा के लिए दो शुरुआती बिंदुओं में से एक है. यह यात्रा पहलगाम आतंकवादी हमले के तनाव के बीच 3 जुलाई से शुरू होगी और 9 अगस्त को समाप्त होगी.
अधिकारी ने सोशल मीडिया मंच एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा, ‘व्यक्ति हिरासत में है, जांच जारी है. #अमरनाथयात्रा2025 की सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है.’
सूत्रों ने बताया कि इस सिस्टम में कश्मीर के सभी संदिग्ध ओजीडब्ल्यू का डेटाबेस पहले से ही फीड कर दिया गया है और इसे पहलगाम की सड़क पर कम से कम दो चौकियों के पास तैनात किया गया है.
द वायर से बात करने वाले एक संदिग्ध ओजीडब्ल्यू ने कहा कि हाल ही में उन्हें अपने संबंधित थाने में अपना आधार विवरण पेश करने के लिए कहा गया था.
यह तत्काल स्पष्ट नहीं हो पाया कि यह सिस्टम संदिग्ध के चेहरे की विशेषताओं या उनके बायोमेट्रिक्स की पहचान कर काम करता है या नहीं. इसी तरह की प्रणाली अमरनाथ मंदिर के दूसरे और सबसे छोटे मार्ग पर भी स्थापित की जा रही है, जो मध्य कश्मीर के सोनमर्ग स्वास्थ्य रिसॉर्ट के बालटाल क्षेत्र से शुरू होती है.
उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सैकड़ों ओजीडब्ल्यू का डेटाबेस रखा है, जिनका नाम कश्मीर में आतंकवाद से संबंधित एफआईआर में दर्ज है या जिन पर औपचारिक रूप से आरोप लगाए गए हैं. इन कश्मीरी संदिग्धों को अक्सर पुलिस थानों में बुलाया जाता है और गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अवकाशों पर या जब भी प्रधानमंत्री या केंद्रीय गृह मंत्री घाटी का दौरा करते हैं, उन्हें हिरासत में लिया जाता है.
हालांकि, एफआईआर में नामजद अधिकांश संदिग्धों को अदालतों ने जमानत दे दी है, लेकिन पुलिस ने उन्हें आतंकवाद में उनकी निरंतर संलिप्तता की आशंकाओं के चलते अपनी निगरानी सूची में रखा है.
अब विवादास्पद पहचान प्रणाली का इस्तेमाल इन्हें प्रभावी रूप से कानून की नज़र में अपराधी बना देगा और बिना किसी ठोस कानूनी समर्थन के हिरासत या गिरफ़्तारी भी होने की संभावना है.
इस संबंध में सूत्रों ने कहा, ‘एफआईआर या प्रतिकूल पुलिस रिकॉर्ड वाला कोई भी व्यक्ति खानबल-पहलगाम रोड पर खासकर मट्टन (अनंतनाग जिले में) से आगे तब तक नहीं चल सकता या यात्रा नहीं कर सकता, जब तक कि यात्रा समाप्त न हो जाए.’
विवादास्पद तकनीक
ज्ञात हो कि कानून प्रवर्तन (law enforcement) में फेस रिकग्निशन निगरानी का उपयोग दुनिया भर में तीखी बहस का विषय रहा है, जिसमें मानवाधिकार समूह और कानूनी विशेषज्ञ निजता के उल्लंघन और मानवाधिकार संबंधी चिंताओं के डर से सार्वजनिक स्थानों पर इसके उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं.
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) के 2024 विश्लेषण के अनुसार, भारत में लगभग 170 फेस रिकग्निशन प्रणाली हैं, जिनका सामूहिक खर्च लगभग 15.13 बिलियन रुपये है, जिसमें से 7.7 बिलियन रुपये केंद्र सरकार द्वारा और 7.43 बिलियन रुपये राज्य सरकारों द्वारा खर्च किए गए हैं.
हालांकि, आईएफएफ विश्लेषण में कहा गया है कि दिल्ली, महाराष्ट्र और तेलंगाना में इनमें से केवल 20 सिस्टम ही चालू हैं, साथ ही कहा गया है कि पुलिस, सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने किसी भी अन्य सरकारी विभाग की तुलना में इस तकनीक का अधिक उपयोग किया है.
मालूम हो कि 2018 में पुलिस ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया था कि राष्ट्रीय राजधानी में फेस रिकग्निशन प्रणाली द्वारा उपयोग किया जाने वाला सॉफ़्टवेयर केवल 2% मामलों में ही सटीक था और ये अच्छा नहीं है.
गौरतलब है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो तस्वीरों और वीडियो के बैंक से अपराधियों की पहचान करके अपराध की जांच में कानून प्रवर्तन एजेंसियों की सहायता के लिए फेस रिकग्निशन तकनीक का उपयोग करने के लिए राष्ट्रीय स्वचालित फेस रिकग्निशन प्रणाली (एएफआरएस) विकसित कर रहा है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षित लोगों के निजता के अधिकार में राज्य द्वारा किसी भी तरह का हस्तक्षेप, वैधता, आवश्यकता, आनुपातिकता और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की सीमाओं के अनुरूप होना चाहिए.
हालांकि, आईएफएफ ने कहा है कि एएफआरएस प्रस्ताव इनमें से किसी भी सीमा को पूरा करने में विफल रहता है, जिसमें स्पष्ट मनमानी और वैधता, जवाबदेही और अन्य सुरक्षा उपायों की अनुपस्थिति का हवाला दिया गया है.
कानूनी विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि इस तकनीक का उपयोग कैसे किया जा रहा है, इस पर नज़र रखने के लिए कोई कानून नहीं है.
मानवाधिकारों के 180 वैश्विक रक्षकों में से ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दुनिया भर की सरकारों से सार्वजनिक स्थानों पर फेस रिकग्निशन वाली निगरानी तकनीक का इस्तेमाल बंद करने का आह्वान किया है. उन्होंने इसे ‘बड़े पैमाने पर निगरानी’ का एक उपकरण करार दिया है, क्योंकि सिस्टम द्वारा एकत्र किए गए डेटा के उपयोग और भंडारण को लेकर चिंताएं व्याप्त हैं.
इस संबंध में एमनेस्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में कहा है, ‘पुलिस और सुरक्षा/खुफिया एजेंसियों द्वारा फेस रिकग्निशन के इस्तेमाल से न केवल निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन होगा, बल्कि पहले से ही हाशिए पर पड़े समुदायों के खिलाफ प्रणालीगत पूर्वाग्रह को बढ़ाने में मदद करके मानवाधिकारों का उल्लंघन भी होगा.’
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