सोशल मीडिया पोस्ट से भड़की हिंसा के केस में गैंगस्टर्स एक्ट लागू करना क़ानून का दुरुपयोग: कोर्ट

गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज एक मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संगठित अपराध से निपटने के लिए बने कठोर क़ानून का इस्तेमाल सोशल मीडिया पोस्ट से भड़की सांप्रदायिक घटना के मामले में करना दुरुपयोग है. कोर्ट ने जोड़ा कि राज्य को दी गई शक्ति को उत्पीड़न या डराने-धमकाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि संगठित अपराध से निपटने के लिए बनाया गया कानून उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एक्ट का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर एक ‘उकसाने वाली’ पोस्ट से पैदा हुई सांप्रदायिक घटना के मामले में करना इस कठोर कानून का दुरुपयोग माना जाएगा. 

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस संदीप मेहता द्वारा लिखित यह हालिया फैसला उन लोगों की अपील पर आया है, जिन पर राज्य सरकार ने सोशल मीडिया पर एक धर्म विशेष के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट करने वाले व्यक्ति के व्यावसायिक प्रतिष्ठान पर भीड़ इकट्ठा कर हमला करने और तोड़फोड़ करने का आरोप लगाते हुए गैंगस्टर एक्ट लगाया था.

जस्टिस मेहता ने लिखा, ‘जब इस मामले की तुलना उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एक्ट के उद्देश्य और मंशा से की जाती है, जिसे संगठित गिरोह आधारित अपराधों से निपटने और ऐसे आपराधिक गिरोहों को खत्म करने के लिए लागू किया गया था जो सार्वजनिक व्यवस्था के लिए लगातार खतरा बने रहते हैं, तो किसी विशेष धर्म के खिलाफ की गई एक उकसाऊ सोशल मीडिया पोस्ट से उपजे सांप्रदायिक तनाव की एकमात्र घटना के आधार पर इस कानून को लागू करना, उस कानून के उद्देश्य से मेल नहीं खाता.’

फैसले में कहा गया है कि मौजूदा मामले में गैंगस्टर्स एक्ट का इस्तेमाल ‘कानून के वैध उद्देश्यों से हटकर सत्ता का अनुचित उपयोग’ प्रतीत होता है.

जस्टिस मेहता ने टिप्पणी की कि विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया निष्पक्ष, न्यायसंगत, तर्कसंगत और गैर-दमनकारी होनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार जब ‘असाधारण और कठोर प्रावधानों वाले कानून’ जैसे कि यूपी गैंगस्टर्स एक्ट का इस्तेमाल करती है, तब व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है.

उन्होंने यह भी जोड़ा कि, ‘राज्य को दी गई शक्ति को उत्पीड़न या डराने-धमकाने के उपकरण के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब इसके पीछे राजनीतिक उद्देश्य छिपे हो सकते हों.’

‘साक्ष्यों की ठोस बुनियाद ज़रूरी’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असाधारण दंडात्मक प्रावधान वाले कानून जैसे कि यूपी गैंगस्टर्स एक्ट, तब ही लागू किए जाने चाहिए जब उपलब्ध साक्ष्य विश्वसनीयता की एक निश्चित कसौटी पर खरे उतरते हों.

अदालत ने कहा, ‘जिस सामग्री पर भरोसा किया जा रहा है, वह आरोपी और कथित आपराधिक गतिविधि के बीच एक तर्कसंगत संबंध स्थापित करने में सक्षम होनी चाहिए, जब कोई कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर रोक लगाता है, तो उसके इस्तेमाल के लिए साक्ष्य भी उतने ही ठोस और जांचे-परखे होने चाहिए, न कि सिर्फ अस्पष्ट दावों पर आधारित.’ 

एफआईआर को रद्द करते हुए और याचिकाकर्ता कि अपील स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि यह मामला गैंगस्टर्स एक्ट लागू करने की ‘आवश्यक न्यूनतम कसौटी’ पर खरा नहीं उतरता. अदालत ने कहा कि यह मामला ‘ज्यादातर अनुमानात्मक सिद्धांतों पर आधारित था, न कि इस बात के ठोस प्रमाणों पर कि आरोपी संगठित आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त थे.’