नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ पुलिस के मुताबिक, नारायणपुर जिले में गुरुवार (26 जून) को माओवाद विरोधी अभियान में दो महिला माओवादी मारी गई हैं.
बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक पी. सुंदरराज ने बताया कि यह कार्रवाई अबूझमाड़ क्षेत्र में की गई, जहां माओवादियों के माड़ डिवीज़न के एक बड़े कैडर की मौजूदगी की सूचना मिली थी.
सुंदरराज ने बताया, ‘25 जून की शाम डीआरजी और एसटीएफ की संयुक्त टीम और माओवादियों के बीच मुठभेड़ में दो महिला नक्सलियों के शव बरामद हुए हैं.’
बीते साल भर में मारे गए कथित माओवादियों में एक-तिहाई से अधिक महिलाएं
गौरतलब है कि आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक साल 2024 के बाद से छत्तीसगढ़ में माओवादियों और सुरक्षाबलों के बीच हुए मुठभेड़ में मारे गए कथित माओवादियों में एक-तिहाई से अधिक महिलाएं थीं.
ज्ञात हो कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मार्च 2026 तक देश से माओवाद खत्म करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. जिसके तहत बीते दो वर्षों में माओवादी विरोधी अभियानों में तेज़ी आई है, और महिला माओवादियों की मौतों का अनुपात भी बढ़ा है.
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 में छत्तीसगढ़ में कुल 217 माओवादी मारे गए, जिनमें 74 महिलाएं थीं. वहीं इस साल 20 जून तक 195 माओवादियों के मारे जाने की पुष्टि हुई है, जिनमें 82 महिलाएं शामिल हैं.
वहीं साल 2019 से 2023 के बीच हर साल मारे गए माओवादियों की संख्या क्रमशः 65, 40, 51, 30 और 20 है, जबकि इन वर्षों में मारी गई महिलाओं की संख्या 17, 7, 13, 9 और 5 थी.
‘बाल दस्ते’ और महिला कैडरों की मजबूरी
गृह मंत्रालय के अनुसार, माओवादियों ने छत्तीसगढ़ और झारखंड में ‘बाल दस्ते’ बनाए हैं, जिनमें किशोर और बच्चे शामिल होते हैं.
मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट पर लिखा गया है, ‘इन बच्चों को माओवादी विचारधारा से ब्रेनवॉश कर संगठन में शामिल किया जाता है. कई गरीब आदिवासी परिवार जबरदस्ती या धमकियों के डर से अपने बच्चों को, खासकर लड़कियों को, माओवादियों को सौंपने को मजबूर हो जाते हैं. माओवादियों कि इन्हीं अमानवीय कृत्यों के चलते उनके बीच लड़कियां और महिला कैडर मौजूद रहती हैं.’
मंत्रालय का यह भी कहना है कि माओवादी महिलाओं को सुरक्षा बलों के साथ आमने-सामने की मुठभेड़ों में आगे रखते हैं.
मंत्रालय ने कहा, ‘भले ही माओवादी ‘पितृसत्ता’ का विरोध करते हैं, लेकिन उनकी शीर्ष नेतृत्व, जैसे की पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी में महिलाओं की भागीदारी नाममात्र की है.’
‘मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल किया गया’
बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) पी. सुंदरराज ने बताया कि पहले के वर्षों में बस्तर के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों की महिलाओं और युवतियों को माओवादी संगठन में शामिल होने के लिए जबरन या बहकाकर ले जाया जाता था.
आईजी ने कहा, ‘एक बार संगठन में शामिल होने के बाद इन महिला कैडरों का ज्यादातर मातहत (foot soldier) और मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. समय के साथ वे शोषण, उपेक्षा और शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना की शिकार बनतीं थीं.’
उन्होंने आगे कहा, ‘हम इस गंभीर समस्या से संवेदनशीलता और दृढ़ता के साथ निपटने के लिए प्रतिबद्ध हैं. हमारा जोर मानवीय और लैंगिक दृष्टिकोण से तैयार पुनर्वास नीतियों पर है, जो स्वेच्छा से आत्मसमर्पण को प्रोत्साहित करें और शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं और मुख्यधारा में शामिल होने का दोबारा अवसर दें.’
